Search

Cine Manthan

Cinema, Theatre, Music, Literature & Life

Tag

British

Mirza Ghalib (1988-89): अव्यवहारिक एवं दुनियादारी में लापरवाह ग़ालिब धोखे और दुर्भाग्य के घेरे में (अध्याय 4)

ग़ालिब पारंपरिक रूप से धार्मिक नहीं हैं और न ही जड़ता ने उनके दिलो दिमाग पर कोई असर ही डाला है| अपने एक हिन्दू मित्र के घर अन्य हिन्दू साथियों के संग वे दीवाली के अवसर पर चौसर खेल रहे... Continue Reading →

Mirza Ghalib (1988-89): रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’ (अध्याय 3)

अँग्रेज़ भारत के विभिन्न हिस्सों पर अपना कब्जा बढ़ाते जा रहे थे और दिल्ली, लखनऊ जैसी महत्वपूर्ण जगह लोग मोहल्लों में, घरों में, बाज़ारों में मुर्गे लड़ाने में व्यस्त थे| इसका जिक्र ग़ालिब ने एक व्यक्ति पर कटाक्ष करते हुये... Continue Reading →

मिर्ज़ा ग़ालिब (1988-89) : ‘ग़ालिब का बयान’ वाया गुलज़ार – अध्याय 1

‘हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और’ जब यही बात विनोद सहगल की आकर्षक गायिकी बताती है तो असर कुछ ज्यादा ही पड़ता है और ग़ालिब का सिक्का जम जाता है... Continue Reading →

Powered by WordPress.com.

Up ↑