अँग्रेज़ भारत के विभिन्न हिस्सों पर अपना कब्जा बढ़ाते जा रहे थे और दिल्ली, लखनऊ जैसी महत्वपूर्ण जगह लोग मोहल्लों में, घरों में, बाज़ारों में मुर्गे लड़ाने में व्यस्त थे| इसका जिक्र ग़ालिब ने एक व्यक्ति पर कटाक्ष करते हुये पहले अध्याय में, जिसमें उनके बुढ़ापे का काल दिखाया गया था, किया भी था| पर लोगों की ऐसे बेकार के कामों से जुड़ाव उनकी जवानी के समय भी भरपूर ज़िंदा था|

यह अध्याय एक और चरित्र से दर्शकों को परिचित करवाता है| दिल्ली के शहर कोतवाल| सोहराब मोदी की फ़िल्म – मिर्ज़ा ग़ालिब में यह शक्तिशाली चरित्र बड़ा महत्वपूर्ण था और वहाँ इसे अभिनेता उल्हास ने बड़े प्रभावशाली अंदाज़ में निभाया था| यहाँ इसे अभिनेता अजीत वाच्छानी ने निभाया है और इस अध्याय में उनके कुल जमा दो हे दृश्य हैं और एक में वे नसीरुद्दीन शाह के समक्ष हैं और इसे कहने में कोई कठिनाई नहीं कि अजीत वाच्छानी को इतना असरदार पहले कभी या बाद में कभी नहीं देखा गया जितना वे क्रूर कोतवाल की भूमिका में यहाँ मिर्ज़ा ग़ालिब में नज़र आते हैं| यहाँ वे पहली नज़र में ही जम जाते हैं| उनकी संवाद अदायगी, शारीरिक हाव-भाव सभी बेहद संतुलित और आकर्षक रहते हैं| सिनेमा की दृष्टि से उनका और मिर्ज़ा का पहले ही दृश्य में टकराव यही आशा जगाता है कि आगे जब जब कोतवाल और ग़ालिब मिलेंगे तो शोले निकलेंगे और दोनों अभिनेताओं के मध्य अभिनय के अखाड़े में कुश्ती से दर्शकों को आनंद आ जाएगा|

कोतवाल और ग़ालिब के टकराव का पहला दृश्य रगों में सनसनी दौड़ाने वाला और मनोरंजक है| उनकी आपस में देखा देखी से पूर्व ही दर्शक को कोतवाल की क्रूर शख्सियत का नमूना मिल चुका है जहां वह बीच बाज़ार मुर्गे लड़ा रहे लोगों को हड़काता है और कहता है कि

दिल्ली से जुए की वबा न निकाल दी तो मेरा नाम भी मुनीर खाँ नहीं

साथ ही वह एक वृद्ध को जुआ न खेलने की चेतावनी देता है और कहता है कि वह मिर्ज़ा ग़ालिब को भी चेता दे|

 

ग़ालिब जैसे शख्स हजारों में बैठ जाएँ तो वहाँ भी चमक जाएँ और कहीं से चले आयें तो वहाँ भी उनका चर्चा आम होता रहे| ज़ौक़ के घर महफिल लगी है जहां मोमिन और मुफ्ती भी उपस्थित हैं| ज़ौक़ कक्ष में घुसते ही पूछते हैं

अबु जफर नहीं आए अभी तक

मुफ्ती महफिल छोड़ जाना चाहते हैं तो मोमिन उनसे हंसी करते कहते हैं कि उन्हें कहाँ की जल्दी है|

मुफ्ती कहते हैं –

सोचता हूँ ज़रा मिर्ज़ा ग़ालिब से मुलाक़ात कर आऊँ| उस दिन मुशायरे से रूठ कर चले गए थे|

मोमिन ग़ालिब का मज़ाक बनाते हुये कहते हैं –

बेचारे कहीं बैठे गिरह लगाते होंगे या खोलते होंगे|

इस बात को लपक कर ज़ौक़ कहते हैं –

भाई ये गिरह लगाने का मतलब तो शेर कहते होंगे पर ये गिरह खोलना क्या हुआ

उत्साहित स्वर में मुफ्ती तपाक से कहते हैं –

शेख साहिब कमाल का हाफिज़ा है उस आदमी का

ज़ौक़ अचरज से पूछते हैं –

मिर्ज़ा का ?

मुफ्ती बताते हैं

जनाब, शेर कहते जाते हैं और गिरह लगाते जाते हैं रुमाल पर और सुबह को एक एक गिरह खोलते जाते हैं और शेर दर्ज कर लेते हैं|

ग़ालिब के हुनर का बयान ज़ौक़ को पसंद नहीं आता और उनके अंदर से ग़ालिब के लिए अविश्वास निकलता है

भाई हाफ़िज़ा तो कमाल है पर उनमें हुनर भी…

उनकी बात बीच में काट मुफ्ती उठ खड़े होते हैं और महफिल छोड़ जाने की इजाज़त मांगते हैं| उनके दिल में ग़ालिब के प्रति सम्मान है और वे ग़ालिब की कला को नज़रअंदाज़ कर उनकी बेमतलब की बुराई सुनने में रुचि नहीं रखते और न ही उसे बढ़ावा देना चाहते हैं|

उनके इस रुख से ज़ौक़ की ग़ालिब के प्रति उत्सुकता बढ़ना स्वाभाविक है| ग़ालिब की शायरी का स्तर वे मुशायरे में देख ही चुके हैं| उनके लिए अच्छा रहा कि एक तो ग़ालिब की शायरी किसी के पल्ले नहीं पड़ी| दूसरे ग़ालिब शहजादे जफर की महफिल को गुस्से में छोड़ गए और शहजादे के ऊपर अपने खराब व्यवहार की छाप छोड़ गए इसलिए ज़ौक़ के लिए ग़ालिब को या उनकी चर्चा को नीचा दिखाना आसान हो गया था लेकिन मुफ्ती द्वारा ग़ालिब की प्रशंसा मुक्त कंठ से करने पर ज़ौक़ के कान खड़े होने तय था|

ज़ौक़ मोमिन से पूछते हैं कि क्या मिर्ज़ा ग़ालिब का कोई दीवान छ्पा है अभी तक?

मोमिन के इंकार करने पर ज़ौक़ सोच विचार में डूब जाते हैं| शायद सोचते हों कि ग़ालिब की शायरी की गहराई को जाँचने का एकमात्र रास्ता अब उन्हें सीधे सुनना ही बचता है|

ग़ालिब की शायरी पर चर्चा सुनने के बाद उसके दर्शन करना ही दर्शक को माफिक बैठेगा सो दर्शक को ले जाया जाता है ग़ालिब के शेर कागज पर दर्ज करते व्यक्ति के पास| वह ग़ालिब का शेर पढ़ता जाता है, उसकी खूबसूरती पर न्यौछावर हुआ जाता है और उसे कागज़ पर दर्ज करता जाता है|

 

दाइम पड़ा हुआ तिरे दर पर नहीं हूँ मैं.

ख़ाक ऐसी ज़िंदगी पे कि पत्थर नहीं हूँ मैं.

ग़ालिब अपने जीवन में ग़मों, संघर्षों और मुश्किलों की लगातार चलने वाली भीड़ के कारण ईश्वर से शिकायत करते नज़र आते हैं इस शेर में, या इसे यूं भी देखा जा सकता है कि ग़मों, मुश्किलों और संघर्षों से घिरे इन्सानों के उस वक्त के भावों को उन्होंने इस शेर में व्यक्त किया है जब वे ईश्वर से मुखातिब होते हैं और किन्हीं क्षणों में उससे उसी की शिकायत करते हैं|

 

अनंत काल के लिए तेरे दरवाजे पर पड़ा पत्थर नहीं एक जीता जागता इंसान हूँ मैं, अगर मेरी ज़िंदगी इतनी ही मुश्किल बनानी थी तो क्यों मुझे ज़िंदगी दी तूने| जब से इंसान का जन्म धरती पर हुआ है असंख्य लोगों ने इस बात को अपने अपने ईश्वर से कहा होगा, उसी एक भाव को ग़ालिब ने एक खूबसूरत शेर के रूप में ढाल कर अमर कर दिया|

 

क्यूँ गर्दिश-ए-मुदाम से घबरा न जाए दिल

इंसान हूँ पियाला ओ साग़र नहीं हूँ मैं

ग़ालिब इंसान के जीवन में भाग्य की भूमिका को भी रेखांकित करते कहते हैं – इंसान होने के नाते लगातार भाग्य के लगातार चले बुरे चक्र से दिल क्यों न घबराएगा, यूं ही निरुद्देश्य इधर उधर ऊपर नीचे डोलता सागर तो नहीं हूँ न कि किसी झंझावात से खुद न विचलित होऊँ|

या-रब ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिए.

लौह-ए-जहाँ पे हर्फ़-ए-मुकर्रर नहीं हूँ मैं

ग़ालिब इस बात पर आश्चर्य चकित हैं कि उनके जैसे बुरे भाग्य वाले, लगातार संघर्षों में जी रहे व्यक्ति से भी लोगों को समस्याएँ हैं और वे लगातार उनके वजूद को (शायर के वजूद को) मिटाने की चेष्टा में लगे रहते हैं| वे कहते हैं –

हे ईश्वर, ज़माना मुझे क्यों मिटाने पर तुला हुआ है, मैं कोई धातु की बनी तश्तरी पर गढ़ी गई इबारत तो हूँ नहीं कि सैंकड़ों हजारों साल तक कायम रहेगी, इंसान हूँ अपनी उम्र पूरी करके एक दिन मुझे भी मर ही जाना है| मृत्यु के उस दिन तक ये दुनिया वाले मुझे मेरे ढंग से जीने क्यों नहीं देते?

और इसी शेर को दूसरे नज़रिये से भी देखा जा सकता है –

हे ईश्वर, ज़माना मुझे अपनी मूर्खता में क्यों मिटाने पर तुला हुआ है, मैं तो खुद ही एक दिन मर जाऊंगा लेकिन मैं धातु पर उकेरी जाने वाली इबारत नहीं हूँ कि दुबारा लिख लेगा ये ज़माना, मैं गया तो गया, आज मुझे नहीं जाना इसने तो फिर हाथ मलता ही रह जाएगा|

वैयक्तिक स्वतन्त्रता पर, मनुष्य की क्षण भंगुरता और मनुष्य की विशिष्टता, उसके अनूठेपन पर इससे बेहतर शेर या काव्य क्या होगा, जैसा ग़ालिब ने रच दिया?

ऐसे ही बेहतरीन अश’आर को लिखते समय उन्हें पढ़ते भी हुये उनके गहरे अर्थों को समझ कर कलमकार झूम रहा है और ग़ालिब की महान शायराना प्रतिभा की तारीफ में कसीदे कढ़ता जा रहा है और उसकी इस लय के रंग में भंग डालती है उसकी बेग़म जो पूछती है ये किसकी शायरी है जिस पर वह इतना लुटा जा रहा है|

कलमकार प्रशंसा में कहता है –

मिर्ज़ा बेग़म ऐसा शेर तो केवल मिर्ज़ा ही कह सकते हैं|

कौन मिर्ज़ा?

मिर्ज़ा ग़ालिब !

हाए ये किस कंगले का काम ले लिया| फूटी कौड़ी भी नहीं मिलेगी उनसे| कागज और रोशनाई के पैसे भी नहीं मिलेंगे| पूरी दिल्ली के कर्ज़दार हैं मिर्ज़ा, पता भी है|

बेग़म एक बार ये दीवान छप जाने दो, पूरी दिल्ली अगर मिर्ज़ा की कर्जदार न हो जाये तो कहना| ऐसे शायर आसानी से पैदा नहीं होते|

बेग़म बुदबुदाती है –

आसानी से मरते भी नहीं|

 

बड़े कलाकार के साथ यह समस्या हमेशा रहती है अगर वे लोग, जो उतने उच्च स्तर की कला को समझ सकते हैं, समझना नहीं चाहते, या समझ कर भी जान कर कलाकार को व्यक्तिगत मामलों से नज़रअंदाज़ करने के लिए उसकी कला को फैलने नहीं देना चाहते तो उस कला को समझ न पाने वाली जनता की भीड़ उस बड़े कलाकार को उस व्यक्ति के रूप में देखती है जो व्यवहारिक मामलों में कदम गया गुजरा आदमी है जो धन के मामले में बेहद गरीब है और जो शायद कर्जे से काम चलाता है| उनके लिए ऐसा कलाकार बेकार इंसान है और फिर कलाकार की यही छवि कानाफूसियों और नुक्कड़ों और चौराहों की बातचीत के माध्यम से हर तरह फ़ेल जाती है या फैला दी जाती है और कलाकार बाहर निकले भी तो उसे  समय अपने ऊपर लोगों की चीरती निगाहों की चुभन महसूस होती रहती है| ऐसे में बहुत से पलों  में कलाकार का दिल घायल न हो, जले नहीं, रोष से न भरे तो और क्या हो? इन क्षणों में रची शायरी में वे सारे ग़म और शिकायतें समा जाती हैं जो ज़माना उन्हें देता है और वे जमाने और इस नाते ईश्वर से रखते हैं|

ऐसे में घर परिवार के लोग,सच्चे मित्र और कला के सच्चे पारखी बेहद अहम भूमिकाओं में आ जाते हैं क्योंकि उनके कलाकार के ऊपर अगाध विश्वास के बलबूते ही कलाकार दिन प्रति दिन आगे जीता रहता है और कला को अपने माध्यम से बाहर निकालने का कार्य करता रहता है| ग़ालिब के व्यक्तिगत जीवन में भी अपनी बेग़म, प्रिय मित्र बंसीधर हैं ही जो उनकी कला के प्रति गहरा विश्वास रखते हैं कि एक दिन ग़ालिब की कला को दुनिया पहचानेगी और उन्हें उनका सच्चा स्थान देगी| उनके घेरलू सहायक, कल्लू मियां और वफ़ादार भी ग़ालिब को उनकी निर्धनता के कारण कम महत्वपूर्ण नहीं बल्कि उनके शायर होने के कारण सम्मान की दृष्टि से देखते हैं| घरेलू स्तर पर ग़ालिब को अच्छा सहारा मिला हुआ है|

बाहर के जीवन में भी हाजी मीर, जिनकी दुकान पर वे घंटों बैठा करते हैं, मुफ्ती साहब, जिनका  सम्मान शहजादा जफर और ज़ौक़ की महफिलों में भी है, और कलमकार जैसे ग़ालिब के प्रशंसक भी हैं और इन सबसे बढ़कर ग़ालिब की खुद की जिजीविषा और विनोदप्रियता और हाजिरजवाबी हैं जो उनसे ज्यादा बड़ी उनकी छवि बनाकर चलते हैं और हजारों मुश्किलों के बावजूद भी ग़ालिब एक ताकत के रूप में खड़े दिखाई देते हैं|

मुफ्ती, ग़ालिब के घर पर हैं तो ग़ालिब को बिल्ली के बच्चे को दूध पिलाते देख पूछते हैं,

ये नया क्या शौक पाल लिया मिर्ज़ा बिल्लियों का|

अजी शौक किस नामुराद को था मुफ्ती साहब वो हमारे यार हैं बंसीधर, आए थे आगरे से, कहा था कुम्हड़ा ककड़ी मत लाना वे बिल्ली उठा आए| कहने लगे छह बच्चे दिये हैं उनकी बिल्ली ने जो सबसे खुशरंग था वो मेरे लिए ले आए| अब कोई औलाद बांटे हमारे साथ तो हम कैसे इंकार कर दें| फिर बता गए कि मेरी तरह गोश्तखोर है पर अपना शिकार खुद ढूंढ लेगी इसलिए घर में चूहे रखना लाजिमी हो गया|

अरे भाई मिर्ज़ा अगर घर में अनाज की बोरियाँ हैं तो इंशा अल्लाह चूहों की कमी नहीं होगी|

जी डरता हूँ इंशा ए अल्लाह से कि कहीं अनाज की ही कमी न पड जाये|

मुफ्ती संग ग़ालिब के वार्तालाप से एक तो उन दोनों के आपस में बेतकल्लुफ़ रिश्तों की सुध मिलती है| दूसरे इस बात की भी कि घरेलू मोर्चे पर ग़ालिब का जीवन अभी दुरुस्त चल रहा है और हजारों मुश्किलों के बावजूद अभी जीवन के कई पहलू जीवन को रंगीन बनाए हुये हैं| यह वार्तालाप ग़ालिब की संवेदनशीलता को भी दर्शाता है और बच्चों के प्रति उनके स्नेह को भी|

कोई औलाद बांटे हमारे साथ …

यह एक छोटा सा संवाद ग़ालिब के व्यक्तित्व के बहुत से पहलुओं को ज़ाहिर कर देता है|

ऊपर के कमरे से नीचे आते हुये ग़ालिब मुफ्ती को यह कह कर सावधानी से उतारने के लिए कहते हैं कि ज़ीना तंग है| मुफ्ती की मेहमान नवाजी में ग़ालिब की नम्र मेजबानी यही दर्शाती है कि वे घरेलू और व्यवहारिक जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाह व्यक्ति हों, ऐसे उड़े उड़े रहने वाले शायर नहीं हैं वरन सुसंस्कृत और ज़हीन व्यक्ति हैं|

सीढ़ियाँ उतरते मुफ्ती पूछते हैं –

भाई मिर्ज़ा साहब आपके दीवान का क्या हुआ जो बंसीधर लिए लखनऊ ले जाने वाले थे छपवाने के लिए

ग़ालिब कहते हैं कि दो माह से कलमकार के यहाँ पड़ा है बस जल्दी ही मुकम्मल हो जाएगा फिर बंसीधर आकर ले जाएंगे|

 

मुफ्ती और ग़ालिब आपस में नियमित अंतराल पर मिलते रहते हैं और बंसीधर का भी ग़ालिब के घर दिल्ली आना नियमित रूप से होता रहता है| ये सब रिश्ते ग़ालिब को अच्छा महसूस कराने वाले सहारे हैं| ये उनके दिली शुभचिंतकों के सहारे हैं क्योंकि अभी उनकी शायरी जनता के समक्ष कम ही आई है सो अंजान लोगों की दुआओं का, उनके प्रेम का सहारा ग़ालिब के पास  नहीं है| कला के कारण कलाकार को मिलने वाले जन-प्रेम की ताकत बहुत बड़ी होती है कलाकार के लिए कम से कम उसके कलाकारी जीवन के शुरुआती दस बीस साल| उसके बाद तो वह हर बात से ऊपर उठ जाता है, और कला के संबंध में केवल कला और कला प्रदान करने वाले ईश्वर या प्रकृति से ही उसका नाता रह जाता है|

मुफ्ती को विदा करते ही ग़ालिब के सामने कलमकार आ खड़ा होता है जो उनका दीवान लिख कर लाया है| पहली बार दर्शकों को मुफ्ती का नाम पता चलता है जब ग़ालिब कहते हैं –

अरे बहुत लंबी उम्र है तुम्हारी अभी तुम्हारा ही जिक्र हो रहा था मुफ्ती सदरुद्दीन साहब से|

आपका दीवान मुकम्मल कर लाया हुजूर

यह सुनते ही पार्श्व में ही सितार नहीं बजने लगता यह ग़ालिब के भी दिलो दिमाग में बजने लगता है और दर्शक भी अपने शरीर और दिमाग में एक ऐसी सुरसुराहट महसूस करता है जैसी बहुत इंतजार करने के बाद किसी मनचाही वस्तु के मिल जाने पर उत्पन्न प्रसन्नता के क्षणों में हो जाती है|

छोटे छोटे इशारों से गुलज़ार ग़ालिब का जीवित बुत दर्शकों के समक्ष गढ़ते जाते हैं| उनके व्यक्तित्व के कुछ पहलू मुफ्ती संग लम्हों के माध्यम से दर्ज किए गए और कुछ पहलू अब कलमकार के साथ के इन क्षणों से किए जा रहे हैं|

ग़ालिब दीवान के पृष्ठों को पलट कर देख रहे हैं और कलमकार जिस शायर की शायरी का मुरीद बन चुका है उसे पहले से जानने के बावजूद इस बार सामने आने पर इस बात की सच्चाई से भरा हुआ है कि वह अपने वक्त के ही नहीं बल्कि आने वाले समय के भी एक बहुत बड़े शायर के सामने खड़ा है| वह इस तथ्य के कारण भी भावातिरेक से भरा हुआ होगा कि इतने महान शायर के पहले दीवान को कलमबद्ध करने का सौभाग्य उसे प्राप्त हुआ है|

मुझ नाचीज़ की हैसियत ही क्या जो राय देने की जुर्रत करूँ मगर आप बहुत बड़े सुखनवार हैं, एक एक शेर पुर्जे में दरियाबंद लगता है| पढ़ पढ़ के सर धुनता था|

 

आम जनता से थोड़ा ऊपर की समझ वाले और शायरी से व्यावसायिक रूप से जुड़े व्यक्ति से ऐसी सराहना पाने का ग़ालिब का यह पहला ही अवसर है| ऐसी सराहना ऐसा आश्वासन देती ही है कि आम जनता तक उनकी शायरी अपनी पहुँच बना पाएगी और उनके शेर के मानी वे अपने अपने जीवन से जोड़ कर निकाल पाएंगे|

मियां दीवान तुम्हें लिखने के लिए दिया था, पढ़ने के लिए नहीं| खैर, ये रही तुम्हारी लिखने की उजरत और पढ़ने की तुम दोगे|

नहीं नहीं मैं इस काबिल कहाँ, ये रहने दीजिये|

देखो पढ़ने की उजरत तो तुमने दाद से अता कर दी, अब मुझे भी अपना फर्ज़ अता करने दो|

शुक्रिया, मिर्ज़ा ये बहुत ज़्यादा हैं कुछ कम कर दीजिये

अरे भाई जाकर थोड़े खर्च कर दो कम हो जाएँगे जाओ जाओ|

ग़ालिब की विनोदप्रियता और हाजिरजवाबी दो गुण बार बार सामने आते हैं और स्वाभाविक रूप से ग़ालिब बेहद खुशगवार इंसान हैं इस बात को दर्शाते हैं| साथ ही ग़ालिब अपने इर्द गिर्द सभी की जरूरतों के प्रति सचेत भी हैं और सबसे न्यायोचित व्यवहार करने के समर्थक हैं| जिसका जैसा काम हो उसे वैसी सराहना और दुनियावी सांकेतिक सापेक्षिता मिल जाये, ऐसा उनका दर्शन दिखता है|

हाथों में अपने दीवान को पकड़े ग़ालिब घर में घुसते हैं| अब वे अपने घर में हैं और कोई बाहरी मनुष्य उनके साथ नहीं सो वे सभी बाह्य आवरण उतार घरेलू रूप में आकर कल्लू मियां से कहते हैं-

कल्लू मियां ऊपर ज़रा बाम भिजवा देना सिर ज़रा भारी है|

मुबारक हो हुजूर

आँय सर भारी होने की मुबारकबाद दे रहे हो

यहाँ आपका सर भारी है वहाँ बेग़म का पैर भारी है

हैं?

जी मुझे तो वफ़ादार ने बताया

तेजी से बेग़म के कक्ष की और जाते ग़ालिब को रोक कल्लू मियां कहते हैं

उन्होंने अभी तक आपसे राज़ रखा हुआ है

ये लो कल्लू तुम्हारा इनाम खुशखबरी का

ग़ालिब और उनके साथ उनका जीवन जीते दर्शक को ऐसा ही प्रतीत होगा कि पहले दीवान और अब घर में बच्चे के आने की संभावना की दुगनी खुशी को ग़ालिब किस तरह संभाल पा रहे हैं|

बेग़म के कक्ष में बेग़म से शरारत करते ग़ालिब को देखना बेहद सुखद है| ग़ालिब और उनकी बेग़म के मध्य बड़ा सहज वार्तालाप है और दर्शक को पहली ही बार बेग़म का नाम – उमराव जान, पता चलता है| बेग़म के कहने पर कि बाहर काम कर रहे नौकर सुन लेंगे ग़ालिब शरारतन मज़ाक करते कहते हैं –

अरे उनकी क्या मजाल कि सुन लेंगे| उन्होंने तो तब नहीं सुना जब मुझे खबर दी थी, कानों पर हाथ रख कर बताया था मुझे|

बेग़म कहती हैं

हाय अल्लाह ये मुई वफ़ादार ही होगी| उसके पेट में एक बात नहीं पचती|

ग़ालिब कल्लू मियां को कक्ष में बुलाते हैं

कल्लू मियां बाज़ार जाओ और चंद टोकरे कच्ची कैरियों के उठवा ले आओ बेग़म के लिए

अभी तो आम के पेड़ पर बौर भी नहीं आया हुजूर

क्या कहते हो कल्लू मियां हमने तो आज सुबह ही कोयल की आवाज सुनी थी

उम्मीद से चहक उठी होगी हुजूर

वल्लाह उम्मीद की तरकीब बहुत खूबसूरत इस्तेमाल की कल्लू मियां

उपरोक्त संवाद से एक तो यही पता लगता है कि प्रकृति के साथ रहते लोग कैसे पशु पक्षियों और पेड़ पौधों के मौसम अनुरूप बदलते व्यवहार से अपना संबंध बनाए रखते थे और यह एक प्राकृतिक चक्र के साथ जीते थे और तब परिस्थितिकी (इकोलोजी) को एक विषय में अलग से पढ़ कर सीखने की जरूरत नहीं थी| पारिस्थितिकी संतुलन लोगों के दैनिक जीवन के व्यवहार का हिस्सा था|

दूसरा अच्छी संगत का असर रचनात्मक हटा है| ग़ालिब के साथ घंटों घर में रहने वाले कल्लू मियां के अंदर भी शब्दों के सही काव्यात्मक उपयोग की समझ विकसित हो गई है जिसकी सराहना ग़ालिब भी करते हैं|

आगे ग़ालिब कल्लू मियां से कहते हैं-

तो यूं कीजिये पिशता बादाम की कुछ बोरियां उठवा लाइये

बोरियां?

उधार मांगना बहुत बड़ा फन है बेग़म, बोरी मांगो तो थैला मिलता है

इतना उधार आता है चूकेगा कैसे

सरकार के फैसले के आने की देर है, बाप-चचा की पेंशन जो जमा हो रही है सब वसूल हो जाएगी फिर तुम दुकानें नहीं बाज़ार खरीदा करना| जाओ कल्लू मियां| अरे बाज़ार में हमारा चर्चा न सही पर्चा तो  चलता है|

बाज़ार में दुकान से सामान लेती वफ़ादार को दुकान के बाहर बैठे लोग ग़ालिब के ऊपर व्यंग्य कसते हुये छेड़ते हैं और कहते हैं कि चंडूखाने में आम बहस है कि –

ग़ालिब घुड़सवारी करते तो भी ठीक था पर शायरी क्यों करते हैं| शायरी के अलावा सब कुछ अच्छा कर लेते हैं मिर्ज़ा| सुना है कौड़ी भी अच्छी खेल लेते हैं| यही आलम रहा तो कौड़ियों में ही खेलेंगे|

ग़ालिब के बारे में ऐसी अफवाह कहाँ से आ रही है| ज़ौक़ के इर्द गिर्द मंडराने वाले कुछ लोग चंडूखाने के नियमित ग्राहक हैं| ज़ौक़ की महफिलों में ग़ालिब के बारे में कही जाने वाली बातें टूट फूट कर आम लोगों में चंडूखाने में इस विकृत रूप में पहुँचती है और एक बड़े शायर के चरित्र का हनन होता रहता है|

 

साथियों संग जुआ खेल रहे ग़ालिब को उनके साथी चेताते हैं कि कोतवाल बड़ा बेरहम है और जुआ खेलते पकड़ लिया तो सीधी जेल में कैद कर देगा|

नाक मुंह सिकोड़ कर ग़ालिब अपने पैसे बटोर कर अपने कमरबंद में ठूँसते हुये बाहर आते हैं कि कोतवाल घोड़े पर सवार होकर वहाँ आकर रुक जाता है और ग़ालिब को पैनी निगाहों से घूरते हुये पूछता है –

क्या हो रहा है मिर्ज़ा

जुआ चल रहा था आपने आकर रंग में भंग कर दिया

जुआ खेलना कानूनन मना है जानते हो न

कोई अपने पैसों से खेले तो भी

कोई अपने घर में खेले तब भी गैर कानूनी है

अरे घरों में लोग क्या करते हैं इसकी खबर तो फरिश्तों को भी नहीं होती कोतवाल साहब

शैतान को हो जाती है| हमारे पास फहरिस्त है सब जुआ खेलने वालों के नाम लिखे हैं उसमें

हमारा भी

जी हाँ

चलो जिक्र मेरा मुझसे बेहतर है कि उस महफिल में है

 

ग़ालिब और कोतवाल के सीधे टकराव का यह दृश्य सिनेमा की दृष्टि से शक्तिशाली है और रोमांच के हिसाब से दर्शक को भरपूर मनोरंजन देकर जाता है लेकिन इसके साथ ही ग़ालिब का पहले साथियों संग चौसर से जुआ खेलना दर्शक को दो भाग में विभाजित करेगा|

एक भाग के रूप में वह ग़ालिब की बेग़म, उनके मित्र बंसीधर के पक्ष का होगा जो ग़ालिब की बेहतरी चाहते हैं और उनका यूं बाज़ार में किसी के यहाँ बैठ जुआ खेलना उन्हें बिलकुल नहीं भाएगा क्योंकि उन्हें एक तो यह ग़ालिब के स्तर से बहुत छोटा कृत्य लगेगा दूसरे यह ग़ालिब जैसे बड़े शायर के समय की बरबादी के रूप में देखा जाएगा| तीसरे अगर शहर कोतवाल ने सही या गलत अगर घर में भी जुआ खेलना गैर कानूनी बना दिया है तो ग़ालिब के शुभचिंतक बिलकुल नहीं चाहेंगे कि ऐसे तुच्छ बहाने से कोतवाल ग़ालिब को बदनाम करे, उन्हे गिरफ्तार कर कैदखाने में डाल दे|

दूसरे भाग के रूप में जो दर्शक ग़ालिब के साथ साथ ही आगे बढ़ रहा है और उनके द्वारा उनके जीवन के लम्हे जी रहा है वह शायद इसे वैयक्तिक स्वतन्त्रता के रूप में ले कि अगर कोई व्यक्ति अपने मित्रों संग मौज मस्ती के लिए चौसर खेल रहा ही अपने पैसे से तो कोतवाल और कानून को क्या अधिकार कि व्यक्ति की स्वतन्त्रता में दखल दे|

दोनों पक्षों में से एक को चुन लेना एक बेहद कठिन चुनाव है! एक में ग़ालिब बन सोचना विचारना है और दूसरे में ग़ालिब के लिए क्या बेहतर है उसका विचार करना है| गुलज़ार खुला छोड़ देते हैं इसे, अपनी समझ अनुसार दर्शक एक पक्ष के साथ खड़ा हो जाये|

कोतवाल से हल्की नोक झौंक के बाद ग़ालिब वहाँ से चलते हैं तो उनके सामने गली मोहल्लों में गीत गाकर भिक्षा मांगने वाला फकीर पड़ जाता है जो बेहद सुरीली आवाज़ में गा रहा है

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है

जाने न जाने गुल ही न जाने

बाग़ तो सारा जाने है

इतना सुरीला गायन सुन अपनी ही रवानी में चले जा रहे ग़ालिब के कदम ठिठक जाते हैं और वे आहिस्ता से फकीर के पास पहुँच जाते हैं जो उन्हें देखकर पंक्ति पूरी गाकर उनका अभिवादन करता है

बड़ा ज़िंदा शेर है हाफ़िज़ जी, किसका कलाम है ये

मीर तक़ी मीर का है, दिल्ली के शायर थे|

वाह क्या अंदाज़ है

मीर की तारीफ करके ग़ालिब संतोष भरी आह सी भरते हुये वहीं खड़े खड़े शेर जन्मा देते हैं

रेख्ते के तुम्ही उस्ताद नहीं हो ग़ालिब

कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था

बड़े कलाकार की खूबी कि जब मार्के की रचना मिली तो उसके सामने नत-मस्तक हो लिए|

ग़ालिब हँसते हुये फकीर से कहते हैं –

कभी हजरत इब्राहिम ज़ौक़ के दरवाजे पे खड़े होकर पढ़ना ना-अहल ये तो जानें कि केवल जबानदानी और काफियांबंदी से शायरी नहीं हो जाती|

हम तो अच्छे शेर के आशिक हैं जहां मिल जाये जिससे मिल जाये

और जुए में जीते सब पैसे फकीर के बर्तन में डाल देते हैं|

वर्तमान मुफ़लिसी के बावजूद ग़ालिब दिल से बादशाह हैं, और यह बात इस अध्याय में  कई  मर्तबा दर्शायी गई

है|

अल्लाह तुम्हें लंबी उम्र अता करे मिर्ज़ा

फकीर ग़ालिब के लिए दुआ करता है और जब उसका आलाप चारों दिशाओं को गुंजाता लगता है तो

सामने सड़क को पानी से गीला करते भिश्ती को देखते हुये दर्शक के भीतर भी कुछ भीजने लगता है, फकीर की दुआ और पल में ग़ालिब के जीवन के कई दृश्य उसके सामने आना इसके कारण हो सकते हैं|

चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है

मेहर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं
और तो सब कुछ तन्ज़-ओ-किनाया रम्ज़-ओ-इशारा जाने है

 

उसकी सुरीली आवाज अपने घर की ऊपरी मंजिल से बाहर झाँकते ज़ौक़ के कानों में भी पड़ती है| ज़ौक़ की आँखें गाने वाले को नीचे सड़क पर खोजती हैं|

कौन शायर नहीं चाहेगा कि गली गली घूमने वाले उसके कलाम को गाते फिरें| ज़ौक़ के हृदय में भी यह चाह उभरी हो तो क्या अचरज|

सूर, तुलसी, कबीर, मीरा, दादू, पल्टू, और सहजो आदि के काव्य की ये भी एक बहुत बड़ी विशेषता रही कि आम जनता के दिलों में उनके रचे काव्य घर कर गए और लोगों की जुबान पर चढ़ गए|

भारतीय फ़िल्मों में गीतों की उपस्थिति ने सभी अच्छे और बड़े गीतकारों को यह सुनहरा अवसर दिया कि उनके रचे गीत आमजन के ओठों पर नाचने लगे| इस जादू को फैलाने में इन गीतों को कायदे से संगीतबद्ध करने वाले संगीतकारों और इन्हें गाने वाले बड़े गायकों का भी बहुत बड़ा हाथ है|

मीर का कलाम गाने वाले गायक विनोद सहगल, जो जगजीत सिंह के शिष्य भी रहे, की खनकती आवाज में सुनने पर श्रोता एवं दर्शक के अंदर उनकी आवाज में और ज्यादा सुनने की चाह जागती है|

…[राकेश]

 

…ज़ारी

मिर्ज़ा ग़ालिब (1988-89) : ‘ग़ालिब का बयान’ वाया गुलज़ार – अध्याय 1

Mirza Ghalib (1988-89): बंसीधर, ज़ौक़ और शहज़ादा ज़फ़र – ईमानदारी और चापलूसी के बीच घिरे ग़ालिब (अध्याय 2)