नारी बिचारी हैabpADMA
पुरुष की मारी है
तन से क्षुधित है
मन से मुदित है
लपककर झपककर
अंत में चित्त है

(रघुवीर सहाय)

पतझड़ को ही मौसम की स्थायी अवस्था मानकर विधवा माजू बी (नूतन) किसी तरह जीवन काट रही हैं। उनके मरहूम शौहर रज्जाक मियाँ उनके लिये धन-सम्पत्ति के नाम पर कुछ छोड़कर गये हैं तो केवल एक झौंपड़ी और एक जमीन का छोटा सा टुकड़ा जिसे माजू बी जोत भी नहीं सकतीं। आजीविका के नाम पर उनके पास है गुड़ बनाने की कला, जिसका उपयोग करके वे जैसे तैसे खाने भर को धन जुटा लेती हैं। गुड़ बनाने में जरुर माजू बी को महारत हासिल है। गुड़ बनाना या किसी भी तरह के खाने की कोई किस्म बनाना अगर एक कला है तो माजू बी को भी एक कलाकार कहना अनर्गल न होगा।

हर हसीन चीज के तलबगार हैं मोती (अमिताभ बच्चन), जो गुड़ बनाने के लिये खजूर के पेड़ों से रस इकटठा करने का काम किया करते हैं। मोती मियाँ मेहनती हैं और इस अविवाहित युवा के बाँकपन पर गाँव भर की अविवाहित युवतियाँ फिदा रहती हैं। वह भी एक भँवरे की तरह इधर उधर मँडराते रहते हैं पर अपने को चाव से निहारते इन फूलों के पास जा बैठने का उनका इरादा दिखायी नहीं देता, वे बस यूँ ही नैनों के तीर खाते हुये मन ही मन खुश होते हुये घूमा करते हैं।

यूँ शादी करके घर बसाने के लिये वे उत्सुक हैं पर रिश्ते जोड़ने वाला नाई उनकी भ्रमात्मक स्थिति का बयान कुछ यूँ करता है,” मोती मियाँ, तुम्हे लड़की भी कमसिन चाहिये, उसे खूबसूरती में परी माफ़िक भी होना चाहिये पर ऐसी किसी हसीना से निकाह रचाने के लिये आवश्यक मेहर की रकम तुम्हारी खींसे से निकलती नहीं।”

मोती की आर्थिक हालत में कुछ पेंच हैं। मोती खजूर के पेड़ों से रस निकालने में तो माहिर हैं परन्तु गुड़ वे बनवाते हैं विधवा माजू बी से। गुड़ बन जाने के बाद मोती उसे बाजार में रोजाना बेच आते हैं। मोती और माजू की जोड़ी का बनाया हुआ गुड़ सारे इलाके में प्रसिद्ध है और हाथों हाथ बिक जाता है। उनके गुड़ की जबर्दस्त माँग है उस इलाके में।

गुड़ से कमाई साख मोती को जरुरत से ज्यादा आत्मविश्वास देती है। परंतु अच्छी साख होने के बावजूद गुड़ बेचने से इतनी कमाई नहीं हो पाती जिससे कि वह अपने मन को भाने वाली किसी सुंदरी के साथ घर बसा सकें। सो उनका जीवन ऐसे ही परिश्रम करते हुये और अच्छे भविष्य के सपनों में खोये हुये कट रहा है।

जीवन पथ पर बढ़ते बढ़ते एक दिन उनके नैना चार हो जाते हैं पड़ोस के एक गाँव में रहने वाली फूल बानो (पदमा खन्ना) के साथ। फूल बानो भी पहली ही मुलाकात में मोती के प्रति अपने आकर्षण का इज़हार खुले आम करती हैं और उन्हे एक तरह से अपनी ओर लुभाती हैं।

फिल्म की प्रकृति को देखते हुये ऊपर दिया गीत और फूल बानो द्वारा मोती को इस तरह खुलेआम लुभाना फिल्म का सबसे कमजोर भाग है। बाकी तो नरेंद्रनाथ मित्र की कथा, सुधेन्दु रॉय की पटकथा, पी.एल.संतोषी के संवादों की बुनियाद पर खड़ी सौदागर कंटेंट के स्तर पर अच्छी सामग्री प्रस्तुत करती है। कथा तो अच्छी है ही, निर्देशक सुधेन्दु रॉय ने कथा को फिल्म के रुप में एक अच्छा दर्शनीय विस्तार दिया है। रविन्द्र जैन ने कुछ अच्छे गीत रचे इस फिल्म के लिये।

चरित्र अच्छे ढ़ंग से उभर कर आते हैं और मानव जीवन के बहुत सारे भाव जीवंत रुप में परदे पर साकार दिखायी देते हैं और गरीबी भरे जीवन में कैसे कैसे प्रपंच करके मानव जीवित रहता है और जीवित रहने का प्रबंध करके कैसे कैसे प्रपंच करके अपने लालच की पूर्ति करता है, यह सब बड़े ही प्रभावी ढ़ंग से फिल्म में दिखाया गया है।

फूल बानो के आकर्षण के वशीभूत होकर मोती, फूल बानो का पीछा करते हुये सीधे फूल बानो के घर पहुँच जाते हैं उनसे निकाह करने का पैगाम लेकर। फूल बानो के पिता (मुराद) पके हुये व्यक्ति हैं और हुक्के की गुड़गुड़ाहट के बीच वे बेहद संतुलित स्वर में एक घाघ व्यापारी की तरह मोती के सपनों पर यह कह कर तुषारापात कर देते हैं कि उन्होने दुनिया देखी है और वे अपनी बेटी का निकाह उस आदमी से करेंगे जो निकाह से पहले मेहर के रुप में नकद पाँच सौ रुपिये दे देगा जिसे वे अपनी बेटी के नाम से डाकखाने में जमा करा देंगे।

मोती कहाँ से इतना धन ला सकते हैं? वे सेठ साहुकारों से पैसा माँगते हैं पर कोई भी उन्हे उधार नहीं देता, हाँ कहीं से उन्हे मुफ्त की सलाह जरुर मिल जाती है कि यदि वे कुछ ऐसा करें जिससे कि गुड़ बेचने से उनकी आमदनी उनके ही पास रहे और किसी और के पास न जाये तो वे शीघ्र ही पैसा इकटठा कर सकते हैं।

निकाह करके फूल बानो को पाने का लालच मोती के सिर पर चढ़कर सुबह शाम बोलने लगता है और उनकी आँखों में यह चाहत एक सपना बनकर भर जाती है और उनकी बुद्धि कुटिलता की हदों में प्रवेश करने लगती है और अब तक साफ सुथरे ढ़ंग से जीवन जीते आये मोती मियाँ अपनी चाहत को पूरा करने के लिये एक षडयंत्र बुनते हैं और उनकी इस साजिश का शिकार बनती हैं अकेलेपन से जूझकर किसी तरह जीवन बसर कर रही माजू बी।

मोती और माजू की जोड़ी गुड़ के व्यापार के लिहाज से एक लाजवाब जोड़ी है। अपनी बनायी योजना को फलीभूत करने के लिये मोती माजू के पास रात के अंधेरे में ही जा पहुँचते हैं और मोती के साथ व्यापार कर रही माजू उन पर विश्वास करते हुये दरवाजा खोल देती हैं। एक चालाक शिकारी की तरह मोती मियाँ अपनी झूठी चाहत का जाल माजू बी के ऊपर फेंकते हैं और तोल-तोल कर जालसाजी शब्दों का ऐसा ताना बाना माजू बी के सामने पेश करते हैं कि अकेलेपन की कराहती हुयी ज़िंदगी जी रही माजू बी मोती के शब्दों में फँसने लगती हैं। पर उनकी अपनी सच्चाई, उम्र और विधवा होना, उन्हे सचेत भी कर जाता है और आशंका से भरी वे पूछती हैं कि क्यों मोती मियाँ गाँव में कुँवारी लड़कियों की कोई कमी है क्या जो राते गये तुम दिल्लगी करने यहाँ आ गये हो?

AbNutan अंधेरा मोती की आँखों में छिपी कुटिलता को छिपा लेता है और अपनी आवाज पर पूरा नियंत्रण रखकर मोती माजू बी को उनके प्रति अपनी सच्ची चाहत का विश्वास दिलाकर उन्हे असमंजस में छोड़कर आ जाते हैं। वे जानते हैं कि बुरे आर्थिक हालात से गुजर रही माजू बी उनके प्रस्ताव पर गम्भीरता से सोचेंगी और उनका अकेलापन भी उन्हे फिर से निकाह करने के लिये उकसायेगा जरुर।

अकेलेपन से भरी निर्मम ज़िंदगी काटती विधवा माजू बी के लिये कैसी कठिन रात रही होगी, इसका अनुमान ही लगाया जा सकता है। अब तक के कठिन जीवन से मिली कठोरता ने उनके अंदर के स्त्री सुलभ कोमल भावों को परतों के घेरे से घेर कर बंद कर दिया है और मोती के प्रस्ताव ने उन भावों के ऊपर से परतों को खुरचना प्रारंभ कर दिया है। भय और उल्लास ने मिलकर उनकी आँखों से नींद छीन ली होगी।

उनके जैसे ही किसी व्यक्ति के लिये डा. सतीश आलोक ने कभी लिखा था

जिनको आकाश का एक टुकड़ा नहीं मिलता
पता नहीं उन्हे पर क्यों मिल जाते हैं

सुबह तक माजू बी पर के मिल जाने के कारण मन की चंचलता को किसी तरह रोके हुये मन के अंदर ही अंदर उड़ान भरती हैं।

आज मोती से सामना कैसे होगा?
क्या मोती के मन में रात दिया गया प्रस्ताव अभी भी घर किये हुये होगा?
या यह सिर्फ एक सपना ही था जो उन्होने बीती रात खुली आँखों से देखा था?

मोती आते हैं और रोजमर्रा की तरह दोनों के बीच दुआ-सलाम नहीं होती। मोती तो शिकारी की तरह रात फेंके गये पासे का परिणाम जानने को उत्सुक हैं और संकोच करती माजू बी को देखकर वे ताड़ जाते हैं कि रात उन्होने सही चाल चली थी और वे अगली चाल चलते हुये पूछते हैं कि माजू बी ने उनके प्रस्ताव के बारे में क्या सोचा?

लाज से झुके सिर को बामुश्किल उठाकर माजू बी अपनी भटकती भावनाओं को दिशा दे देती हैं,”आज दोपहर का भोजन तुम मेरे साथ खाओगे”।

फिल्म का एक बहुत अहम पड़ाव आता है इस मौके पर जबकि सजे धजे मोती मियाँ माजू बी के सामने उनके घर पर बैठे हैं और माजू बी दावत के लिये भोजन पका रही हैं। माजू बी से मिलने उनके दिवंगत पति के बड़े भाई आ जाते हैं और हवा में पुलाव की तैरती खुशबु का सबब पूछते हैं,” किसकी दावत का इंतजाम हो रहा है?”

शर्मायी हुयी माजू बी मोती की तरह आँखों से इशारा करके कहती हैं,” आपकी”।

माजू बी के जेठ अचरज से दोहराते हैं,”आपकी” और मोती और माजू बी की और बारी बारी से देखते हैं और फिर वास्तविकता को भाँप कर चेहरे पर मुस्कान लाकर दोनों से कहते हैं,” मुबारक हो – मुबारक हो”।

बड़ी आसानी से वे इस रिश्ते को स्वीकार कर लेते हैं। उन्हे खुशी है कि माजू बी को एक सहारा मिल गया। ऐसी सामाजिक व्यवस्था अच्छी है जहाँ जो स्त्री-पुरुष करना चाहें वे फिर से जीवन की शुरुआत कर सकें।

अचरज और ईर्ष्या से भरी गाँव की कुँवारी युवतियों के दृष्टि भेदन और माजू बी पर किये गये कटाक्षों के मध्य चलते मोती माजू बी को अपने घर ले आते हैं। माजू बी का स्पर्श मोती की बिखरी पड़ी ज़िंदगी को शीघ्र ही एक व्यवस्थित गृहस्थी का रुप दे देता है।

माजू केवल व्यवसाय के लिये ही गुड़ नहीं बनातीं बल्कि वे इसे दिल से बनाती हैं। एक कलाकार की तरह वे मोती द्वारा लाये गये खजूर के रस को उबालती हैं, और उसे बार बार पत्तों से साफ करके सबसे उम्दा किस्म का गुड़ बनाने के लिये एकदम उपयुक्त चाशनी बनाती हैं और सारी प्रक्रिया को मन लगाकर पूरा करने के बाद जब गर्म और पिघली हुयी चाशनी को गोल सांचे में बिछे कपड़े पर उड़ेलती हैं तो सुनहरा रंग चाशनी में भी चमकता है और संतोष और खुशी से भरे उनके चेहरे पर भी।

गोल सुनहरे गुड़ की भेलियाँ जब मोती बाजार में ले जाते हैं तो उन्हे एक घंटा भी नहीं लगता अपना गुड़ बेचने में।

माजू बी के लिये गुड़ बनाना भी उनके मोती के प्रति स्नेह की ही अभिव्यक्ति है और मोती द्वारा ज्यादा से ज्यादा रस लाने पर वे इस बात से परेशान नहीं होतीं कि उन्हे बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ेगा बल्कि वे परेशान होती हैं कि इतनी मेहनत करने से मोती की सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है।

अपनी कला का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वे मोती के लिये गुड़ बनाने में करना चाहती हैं। वे मोती से बाजार से सोडा लाने के लिये कहती हैं,” थोड़ा सा सोडा डालने से गुड़ का रंग भी निखरता है और उससे सौंधी सौंधी खुशबु भी आती है। मैं चाहती हूँ कि मेरे मियाँ का गुड़ दिल्ली तक जाये, विलायत जाये”।

मोती के लिये तो माजू बी का इतना लगाव, स्नेह, भक्तिभाव दुविधायें लाता है पर अभी वे धन जुटाने में लगे हुये हैं सो नाटक करते रहते हैं।

ढ़ाई सौ रुपिये इकटठा होते ही वे फूल बानो के अब्बा से मिलने पहुँच जाते हैं और उन्हे निकाह से पहले की पेशगी देते हैं यह आग्रह करते हुये कि शेष ढ़ाई सौ रुपिये वे निकाह के वक्त्त दे देंगे।

खेले खाये बुजुर्ग मोती से कहते हैं कि अब वे पैसा लेकर क्या करेंगे? अब तो मोती ने एक विधवा से निकाह रचा लिया है और वे नहीं चाहते कि उनकी बेटी दूसरी पत्नी बन कर जाये और रोज रोज झगड़े हों दो औरतों के बीच।

शातिर मोती मियाँ बुजुर्गवार को विश्वास दिलाते हैं,” माजू बी की चिंता आप क्यों करते हैं। सर्दी बीत जाने दीजिये, दक्खन की हवा अपने साथ माजू बी को भी उड़ा ले जायेंगी। मैं उन्हे तलाक दे दूँगा”।

फूल बानो के पिता, मोती की ऐसी शातिराना चालाकी को उसकी काबिलियत करार देते हैं और कहते हैं,” आदमी तुम काबिल हो, तुमसे निभ जायेगी, जाते हुये बानो से मिलते जाना”।

मोती की योजना कामयाबी के करीब है। अब उनके सामने मुश्किल है किसी तरह से माजू बी से पीछा छुटाना, जो इतना आसान है नहीं क्योंकि माजू बी उन्हे किसी किस्म की शिकायत का मौका देती ही नहीं हैं। वे तो पूरी तरह से समर्पित हैं मोती के प्रति।

ऐसी निष्ठावान पत्नी से छुटकारा पाने के लिये मोती को बेशर्म बन जाना पड़ेगा और फूल बानो को पाने की हसरत के चलते उन्हे माजू बी के प्रति क्रूर बन जाने में कोई हिचक नहीं है। किसी भी सामाजिक व्यवस्था का दुरुपयोग मानव ही अपने हित के लिये करता है। जो सामाजिक व्यवस्था स्त्री और पुरुष को घर बसाने का मौका देती है वही सामाजिक व्यवस्था यह भी अवसर देती है कि पुरुष बड़ी आसानी से अपनी पत्नी से छुटकारा पा ले।

यह कैसी व्यवस्था है कि निकाह पढ़वाने वाले मौलवी बखूबी जानते हैं कि मोती माजू बी के ऊपर चरित्रहीनता के झूठे आरोप लगा रहे हैं पर तब भी वे मोती का साथ देते हैं । मोती मौलवी के सामने आश्चर्य और दुख से भरी माजू बी को तलाक-तलाक-तलाक कह कर उन्हे अपनी ज़िंदगी से बाहर निकाल देते हैं।

नूतन कितनी बड़ी अभिनेत्री थीं इसका पूरा पूरा प्रदर्शन वे इन दृष्यों में करती हैं जहाँ वे मौलवी द्वारा मोती की मंशा कहे जाने के बाद मोती को लताड़ती हैं। घायल सिंहनी की तरह दहाड़ रही टूटे हदय वाली माजू बी की आहों और भावों को बहुत ही प्रभावी ढ़ंग से नूतन ने प्रदर्शित किया है।

सर्दी बीत गयी हैं, गुड़ का मौसम खत्म हो चला है और माजू बी का जीवन फिर से पतझड़ की लपेट में आ गया है। उजाड़ झौंपड़ी में जहाँ आवारा कुत्तों ने बसेरा कर लिया है उन्हे फिर से अकेले ही जीवन जीना होगा। बसंत आया है मोती और फूल बानो की ज़िंदगी में। नवविवाहित मोती और फूल बानो मधुमास का ही आनंद लेते रहते हैं।

पर गरीब आदमी का जीवन केवल घर में बैठे बैठे आनंद में समय व्यतीत करने से तो कटेगा नहीं। बसंत को बीतना है, गर्मियाँ भी बीतेंगी और सर्दियाँ फिर से आयेंगीं। खजूर के पेड़ों से रस टपकना शुरु हो जायेगा और मोती को फिर से गुड़ बनाकर बाजार में बेचने जाना होगा।

फूल बानो को गुड़ बनाना नहीं आता। काम करने में उनका मन ही नहीं है और फिर गुड़ बनाने का काम तो उनके लिये एक बोझ ही है। उनका मन तो श्रंगार आदि में ही रमता है।

पिछले मौसम तक जिस मोती का गुड़ हाथों हाथ बिक जाया करता था उसी मोती को अब ग्राहकों के ताने सुनने पड़ते हैं कि इतना बेकार गुड़ उन्होने ज़िंदगी में नहीं खाया। मोती का व्यापार चौपट हो जाता है। अपरिपक्व फूल बानो की कामचोरी से गृहस्थ जीवन भी कड़वाहट और लड़ाई-झगड़ों से भरने लगता है।

बड़ी मुश्किल से जीवन काट रही माजू बी के लिये उनके जेठ फिर से एक सहारा लेकर आते हैं और उन्हे अपने एक विधुर दोस्त से निकाह करने के लिये मनाते हैं।

मोती को अंदर से तो ठेस लगती है जब वे माजू बी को अपने नये पति के साथ जाते देखते हैं परन्तु उनके अंदर का पुरुषोचित अहंकार उन्हे फूल बानो के सामने झूठा अभिनय करने पर विवश करता है और वे कहते हैं,” अच्छा हुआ निकाह करके चली गयी, बला टली वरना सारे दिन आहें भर भर कर हमें कोसती रहती थी। अब जाकर जान छुटेगी।”

माजू बी तो निकाह करके एक खाते पीते परिवार की मालकिन बन जाती हैं पर मोती का जीवन कष्टों से भर जाता है।

आह को हमेशा नहीं चाहिये एक उम्र असर होने तक।

कई बार किसी दुखी दिल से निकली आह बहुत जल्दी असर कर जाती हैं। बिना माजू बी की आहों के भी मोती का कदम उन्हे व्यवसायिक रुप से नीचे लाने ही वाला था क्योंकि फूल बानो पर निर्भर रह कर वे गुड़ नहीं बना सकते और माजू बी वाली गुणवत्ता वाला गुड़ तो किसी भी हालत में वे नहीं बना सकते।

माजू बी के साथ वे गुड़ के बाजार के ऐसे राजा थे जिनकी बादशाहत को कोई चुनौती देने वाला नहीं था और माजू बी से अलग उनका वजूद ही खत्म हो जाता है बाजार से। जीवन के कष्ट और फूल बानो की अपरिपक्व प्रकृति उनके गृहस्थ जीवन को भी चौपट करने लगती है। फूल बानो के प्रति उनका सारा मोह खत्म होने लगता है और जिस फूल बानो को पाने के लिये उन्होने इतने प्रपंच रचे उसी फूल बानो की गुस्ताखी पर वे गाली गलौच और मार पीट करने पर उतर आते हैं।

अंधेरों में भटकने से अंधेरे कम नहीं होते
सहर को ढ़ूँढ़ लायें अभी कुछ रात बाकी है।

जीवन मोती को ऐसी परिस्थितियों में लाकर खड़ा कर देता है कि जिस माजू बी के साथ उन्होने जानवर से भी बदतर सलूक करके उन्हे घर से निकाल दिया था उसी माजू बी के सामने याचक की मुद्रा में उन्हे जा खड़ा होना पड़ता है इस प्रार्थना के साथ,” अगर माजू बेगम कृपा करके उन्हे दो किलो गुड़ बना कर दे दें तो वे बाजार में जाकर अजनबी ग्राहकों को गुड़ बेचेंगे”।

मोती ने भले ही साजिशन माजू बी से प्रेम करने का ढ़ोंग रचाया हो पर माजू बी ने तो अपने को पूरी तरह उनके प्रति समर्पित कर दिया था। उनका तो मोती से लगाव सच्चा था। मोती से खाये धोखे और चोट के बावजूद मोती के पश्चाताप की सच्चाई माजू बी को कुछ पिघला देती है और अपने घर के बाहर छिप कर खड़ी फूल बानो के आँसू उन्हे कुछ और पिघला देते हैं।

उन्हे आपा कहकर रोकर लिपटती फूल बानो को वे अपनी बाहोँ का सहारा दे देती हैं।

सौदागर शायद अब मानव बना रह कर वस्तुओं की तिजारत करना सीख गया होगा। उसे समझ आ गया होगा कि मानवीय भावों की तिजारत नहीं हुआ करती और अगर होती है तो ऐसी तिजारत अपने साथ दुख भी लाती है।

सौदागर उन कुछ हिन्दी फिल्मों मे से एक है जो भारतीय गरीब मुसलमान चरित्रों को कथा के केन्द्र में रखती हैं और व्यवहारिक स्तर पर मुसलमान चरित्रों को दिखाती है और उन्हे एक प्रोटोटाइप के रुप में प्रयुक्त नहीं करती।

ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाये तो सौदागर मुसलमानों में निकाह और तलाक के दुरुपयोग को कुछ साल बनने वाली बी आर चोपड़ा की चर्चित फिल्म निकाह से ज्यादा प्रभावी ढ़ंग से दिखाती है।

अभिनय के स्तर पर बाजी हाथ रहती है नूतन के हाथ। भले ही शीर्षक भूमिका अमिताभ बच्चन के हाथ लगी हो पर फिल्म में सर्वोत्तम अभिनय नूतन ने करके दिखाया है। माजू बी का अकेलापन, लाचारी, भय, और बदलते समय में माजू बी के दिल की उमंगें, उनका अपने पति के प्रति समर्पण, और बाद में पति द्वारा धोखा दिये जाने पर माजू बी के मन की टूटन, कुछ बाद में व्यवहारिक स्तर पर माजू बी द्वारा वास्तविकता को समझ कर नादिर मियाँ से निकाह करने को राजी होना, और मोती से नाराज़गी को मन में ही रखना और अंत में अपने ही स्वभाव से चलना, न कि मोती द्वारा दिये गये घावों के कारण एक दिलजले व्यक्तित्व बने रहना, इन सब विभिन्न अवस्थाओं को इतने प्रभावी ढ़ंग से नूतन ने निभाया है कि सौदागर में उनका अभिनय उनके द्वारा प्रदर्शित बेहतरीन अभिनय प्रदर्शनों में से एक बन गया है।

अमिताभ बच्चन बाद में सुपर स्टार बन गये और सौदागर को इस बात के लिये ज्यादा जाना जाता है कि अमिताभ ने इसमें ऑफ-बीट किस्म की भूमिका की थी। ईमानदार मूल्यांकन तो नूतन के सिर पर ही ताज रखता है।

अमिताभ ने भी बहुत अच्छा अभिनय किया है और उनके लिये भी इस फिल्म में किया गया अभिनय उनके द्वारा किये गये श्रेष्ठ अभिनय प्रदर्शनों में से एक है। अभिनय से जुड़े हुये एक अन्य पहलू पर अगर वे ध्यान देते तो उनके अभिनय का स्तर अपने आप ही बढ़ जाता। उन्होने गाँव में रहने वाले मेहनत करने वाले एक गरीब गुड़ बेचने वाले का किरदार निभाया है पर न तो वे और न ही उनके निर्देशक सुधेन्दु रॉय इतनी हिम्मत जुटा पाये कि उन्हे एक वास्तविक सा रुप दे पाते। यह बात इतनी गम्भीर इसलिये नहीं लगती कि हिन्दी फिल्में इन बातों पर ध्यान नहीं देती। पर सत्तर के दशक में जब समानांतर सिनेमा ने भारतीय सिनेमा के परिदृष्य पर दस्तक दे दी थी तब चरित्रों की सही वेशभूषा और सही रहन सहन मायने रखने लगा था। यह पचास के दशक में भी मायने रखता था पर साठ के दश्क के दौर की चमकती व्यवसायिक फिल्मों ने इसमे कुछ बनावट ला दी थी और रंगीन फिल्मों के दौर ने भी इसमें भूमिका निभाई और अभिनेताओं पर दबाव आने लगा कि उन्हे हर फ्रेम में अच्छा दिखना है।

सौदागर में मोती के रुप में अमिताभ हर शॉट में बेहतरीन ढ़ंग से शेव किये हुये रुप में दिखायी देते हैं। बहुत सारे दृष्य ऐसे हैं जिनमें वे सुबह सोकर उठते हुये दिखाये गये हैं पर उनके गाल ऐसे चमकते हैं जैसे उन्होने सुबह पाँच बजे ही शेव की हो और फिर से सो गये हों और अब छह बजे उठे हैं। रुप की ऐसी कमी के बावजूद अमिताभ ने बहुत अच्छा अभिनय किया है। मोती की भावनाओं, लालच, साजिशों, और पश्चाताप आदि को उन्होने बड़े अच्छे ढ़ंग से दर्शाया है। उन्होने चरित्र में गहरे उतर कर अभिनय किया है।

फिल्म का स्तर अपने आप और बढ़ जाता यदि तीसरे महत्वपूर्ण किरदार फूल बानो में किसी बेहतर अभिनेत्री को लिया जाता। पदमा खन्ना के अपने स्तर से जरुर यह उनका अच्छा प्रदर्शन होगा परंतु नूतन और अमिताभ की प्रभावी उपस्थितियों के सामने उनकी उपस्थिति बेहद औसत स्तर की है। अच्छी अभिनेत्री ऐसा घर्षण लाती कि फिल्म का स्तर अपने आप उठ जाता।

आज के दर्शक को एक और बात खल सकती है फिल्म में वह है फिल्म के कुछ कलाकारों के लिये डबिंग का इस्तेमाल। सी.एस.दूबे फिल्म में खुद भी एक चरित्र के रुप में मौजूद हैं तब भी उनकी आवाज एक अन्य चरित्र के लिये भी उधार ली गयी है और ऐसा ही कुछ अन्य चरित्रों के साथ भी किया गया है।

…[राकेश]

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