Formula1दुनिया भर में बहुत सारा वैज्ञानिक, तकनीकी एवम औद्योगिक विकास सैन्य क्षमता बढ़ाने के लिये हुआ है और सह-उत्पाद के रुप में आम जनता के काम आने वाली तकनीक और उत्पाद विकसित हो गये हैं।
सैन्य शक्त्ति और वैज्ञानिक तकनीकी विकास लगभग साथ-साथ चलते रहे हैं। भारत चीन युद्ध को ही देखें तो क्या भारत के सैन्य उपकरण शून्य से बहुत नीचे के तापमान में काम करने लायक थे? चीन ने तो पूरी तैयारी और योजना के साथ भारत पर आक्रमण किया था पर भारत न तो मानसिक, न ही वैज्ञानिक और न ही सैन्य तरीके से इस आक्रमण के लिये तैयार था। अगर अचानक हुये आक्रमण के बावजूद भारत मानवीय सैन्य ताकत के साथ-साथ सैन्य रक्षा के लिये तकनीक के मामले में भी आत्म निर्भर और विकसित होता तो भारत इस हमले को बेअसर कर सकता था। उस युद्ध के बाद भारत ने भी वैज्ञानिक और रक्षा तकनीक के मामले में बहुत प्रगति की है।

तकरीबन 100 सालों से दुनिया भर के पैट्रोलियम पदार्थों पर कब्जा करने के लिये युद्ध लड़े जाते रहे हैं क्योंकि ऊर्जा, आवागमन और अन्य तरह की सुविधायें पाने के लिये इन पदार्थों की महती जरुरत सभी देशों को रही है। जिस देश के पास जितनी ज्यादा ऊर्जा और खनिज हैं वह उतना ही शक्तिशाली है या हो सकता है।

पैट्रोलियम पदार्थों के प्रति लालच ने ही ईरान-इराक और बहुत सारे अन्य देश जहाँ धरती के गर्भ से इन पदार्थों को निकाला जा सकता है, दशकों से युद्ध के स्थल बने हुये हैं। अब तो दुनिया को पता चल ही गया है कि अफगानिस्तान की धरती में खनिज पदार्थों का अथाह भंडार है और सारी लड़ाई उसी पर कब्जा करने को लेकर है। भले ही ऊपर से अमेरिका जैसी वैश्विक शक्तियाँ ऐसा प्रचार करें कि वे तानाशाही शक्तियों के खिलाफ हैं पर अगर सच्चाई यही होती तो अमेरिका की दोस्ती उन देशों से कदापि न होती जहाँ लगभग हमेशा से ही तानाशाही रही है।

अगर पिछली सदी के तीस के दशक पर गौर करें तो जर्मनी में हिटलर के उदय के पश्चात जर्मनी ने तेजी से अपनी सैन्य शक्ति में इजाफा करना शुरु कर दिया था और जर्मनी में बहुत सारा विकास सैन्य क्षमता को बढ़ावा देने के कारण हुआ। जर्मनी को अपने साम्राज्यवादी सपने को पूरा करने के लिये बहुत ज्यादा ईँधन की जरुरत थी। अपनी जरुरत का बहुत सारा पैट्रोलियम पदार्थ वह रोमानिया से लेता था पर धीरे धीरे दुनिया युद्ध की ओर बढ़ रही थी और इसी के साथ जर्मनी की जरुरतें भी बढ़ती जा रही थीं। जर्मनी का रास्ता रोके हुये देशों की नज़र जर्मनी को रोमानिया से होने वाली पैट्रोलियम की पूर्ति पर थी और यह पूर्ति अक्सर बाधित हो जाती थी। जर्मनी के पास कोयला तो बहुत था और बहुत अच्छी गुणवत्ता वाला कोयला था पर उसके पास अच्छी गुणवत्ता वाला पैट्रोलियम नहीं था। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जर्मनी के वैज्ञानिक विज्ञान में बहुत तरक्की कर रहे थे और उसके विश्वविद्यालयों में तमाम तरह के शोध चल रहे थे। देश को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिये एक बहुत बड़ी तकनीक विकसित करने में जर्मनी को सफलता प्राप्त हुयी जब 1936 में Kaiser Wilhelm Institute में कार्यरत वैज्ञानिक द्वय- Franz Fischer और Hans Tropsch द्वारा 1930 में विकसित Fischer-Tropsch synthesis को बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने में सफलता पा ली गयी। नाज़ी जर्मनी और जापान ने दूसरे विश्वयुद्ध में Fischer-Tropsch process का उपयोग बहुत बड़े स्तर पर किया। बाकी दुनिया को विश्वयुद्ध में जर्मनी के हारने के बाद ही कृत्रिम ईंधन (Synthetic Fuel) बना सकने वाली तकनीक पर अधिकार करने की सहुलियत प्राप्त हुयी। जर्मनी मैकेनिकल और कैमिकल इंजीनियंरिग में दुनिया की बड़ी शक्तियों से आगे था। यह भी संभावना है कि अगर जर्मनी युद्ध में न हारता और मित्र राष्ट्र उसके वैज्ञानिक संसाधनों और तकनीकों पर कब्जा न कर लेते तो बाकी दुनिया को उन तकनीकों को विकसित करने में कई साल और लगते।

बहरहाल Fischer-Tropsch process की तकनीक से कृत्रिम द्रवीय ईंधन (Synthetic Liquid Fuel) बनाने की प्रक्रिया में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाता है केटेलिस्ट (Catalyst)। आज तो सबको इन प्रक्रियाऒ में इस्तेमाल किये जाने वाले Catalysts की भरपूर जानकारी है पर उस समय यह जानकारी सिर्फ जर्मनी के पास थी।

Formula2Steve Shagan के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म की कहानी भी शुरु होती है दूसरे विश्व युद्ध के समय जब हारते हुआ जर्मनी से एक अधिकारी को सीक्रेट पेपर्स के साथ स्विटजरलैंड भेजा जाता है जिससे दुश्मन देशों के हाथ जर्मनी के गुप्त दस्तावेज़ न लग जायें। इन गुप्त दस्तावेज़ों में कोयले से द्रवीय ईंधन बनाने की तकनीक से जुड़े हुये दस्तावेज़ भी हैं।

उसके बाद फिल्म आ जाती है सत्तर के दशक के Los Angeles में जहाँ Lt. Barney Caine (George C. Scott) अपने पूर्व साथी और मित्र Tom Neeley की हत्या की पहेली को सुलझाने की कोशिश कर रहा है। Tom ने मरने से पहले अपने खून से अपने सीने पर पड़े अखबार पर कुछ लिखने की कोशिश की है। पर शब्द पूरा लिखने से पहले ही वह मर गया है। अधूरा शब्द है Gene, और इस शब्द और Tom के घर पर मिले अन्य सूबूत के आधार पर जाँच करता हुआ Barney Caine कई लोगों तक पहुँचता है और इनमें Tom Neeley की पूर्व पत्नी Kay Neeley (Beatrice Straight) भी शामिल है, जो कि उसकी पूर्व परिचित है। इससे पहले कि वह दूसरी बार Kay Neeley से मिले Kay की हत्या हो जाती है। केस की जांच उसे Titan Oil के अरबपति मालिक Adam Steiffel (Marlon Brando) के पास ले जाती है और वहाँ से उसे जर्मनी जाने के क्लू मिलते हैं।

जाँच के सिलसिले में जहाँ भी Barney Caine पहुँचता है वहाँ या तो उसके पहुँचने से पहले या उसके जाने के बाद एक के बाद एक हत्यायें होने लगती हैं। जर्मनी में भी यह सिलसिला कायम रहता है और वहाँ पहुँच कर तफ्तीश करते हुये उसके साथ कई तरह की साजिशें होती हैं। जिन्हे वह अपना साथी समझने लगता है वे दुश्मन के भेजे एजेंट साबित होते हैं। जाँच में उसे प्रगति मिलती है जब उसे पता चलता है कि असल में उसका मित्र Tom Neeley जर्मनी के एक गुप्त प्रोजेक्ट Genesis से जुड़ा हुआ था और यह प्रोजेक्ट दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान कोयले को पैट्रोलियम में बदलने की तकनीक से जुड़ा हुआ था और ऑयल कम्पनियाँ इस तकनीक को हासिल करने की होड़ में हैं।

Barney Caine के सामने बहुत सारे रहस्य खुलते चले जाते हैं। पर सबसे बड़ा रहस्य अभी तक खुलना बाकी है जो उसके सामने फिल्म के अंत में खुलता है और उसे पता लगता है कि किस तरह से उसे ठगा गया है।

व्यापारी को सिर्फ मुनाफे से मतलब है और इसे प्राप्त करने के लिये बहुत से व्यापारी किसी भी हद तक गिर सकते हैं और गिरते रहे हैं। Adam Steiffel से बातचीत के दौरान उसकी काँइयां और लालची प्रवृत्ति से नाराज होकर Barney Caine कहता है,” तुम तेल के व्यापार में नहीं हो, तेल की कमी के व्यापार में हो”।

और उसकी बात सच है। दशकों से ऑयल कम्पनियों ने साधारण जनता के जीवन पर कब्जा किया है और जैसा वे चाहती रही हैं उसी तरीके से मूल्य और आपूर्ति नियंत्रित करती रही हैं। तेल के व्यापार का इतिहास बहुत कालिख से भरा हुआ रहा है।

Adam Steiffel एक स्विस व्यापारी से फोन पर कहता है कि अगर वह कुछ सालों के लिये रुक जाये तो आज जिस कोयले पर वह बैठा हुआ है वह सोना बन जायेगा और अगर वह ऐसा कर लेता है और तकनीक को बाजार में नहीं लाता तो वह अपने व्यापार से 30% मुनाफे की साझेदारी उसके साथ कर लेगा। पैसे के लालच में स्विस व्यापारी उसकी बात मान लेता है

हत्याओं पर आधारित John G. Avildsen द्वारा निर्देशित यह सस्पैंस थ्रिलर तेल के काले इतिहास से जुड़ कर और ज्यादा रोचक एवम अन्य थ्रिलर्स से भिन्न हो जाता है। यह लोगों को शिक्षित भी करता है दुनिया में व्यापार के नाम पर चल रही धोखाधड़ी के प्रति भी।

ऐसा ही हाल भारत में खनिज पदार्थों का भी है। भारत में झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के आदिवासी इलाकों में शोषण की यही नीति अपनायी जा रही है जहाँ लालची व्यापारियों, नेताओं एवम अधिकारियों ने साठ-गाँठ करके लूट मचायी हुयी है।

देश के नेता और अधिकारी भूल रहे हैं कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितों को बढ़ावा देकर अपने हितों को साधने के लालच में वे देश के प्राकृतिक संसाधनों के साथ बहुत बड़े खिलवाड़ कर रहे हैं।

…[राकेश]

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