
ऐसी उलझी नज़र उनसे हटती नहीं दाँत से रेशमी डोर कटती नहीं
उम्र कब की बरस कर सफ़ेद हो गयी कारी बदरी जवानी की छँटती नहीं
वल्लाह ये धड़कन बढ़ने लगी है चेहरे की रंगत उड़ने लगी है
डर लगता है तन्हा सोने में जी ।
दिल तो बच्चा है जी थोड़ा कच्चा है जी
किसको पता था पहलू में रखा दिल ऐसा पाजी भी होगा
हम तो हमेशा समझते थे कोई हम जैसा हाजी ही होगा
हाये जोर करें कितना शोर करें
बेवजह बातों पे ऐवंई गौर करें
दिल सा कोई कमीना नहीं
कोई तो रोके कोई तो टोके
इस उम्र में खाऒगे धोखे
ऐसी उदासी बैठी है दिल पे हँसने से घबरा रहे हैं
सारी जवानी कतरा के काटी पीरी में टकरा गये हैं
दिल धड़कता है तो ऐसे लगता है वो आ रहा है यहीं
देखता ही न हो
प्रेम की मारे कटार रे
तौबा ये लम्हे कटते नहीं क्यूँ
आँखों से मेरी हटते नहीं क्यूँ
डर लगता है खुद से कहने में जी
…..

…[राकेश]
Discover more from Cine Manthan
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
Leave a comment