offside1धरती पर मनुष्य की आबादी का आधा हिस्सा, स्त्रियाँ, भी पुरुषों की तरह जीवन जीने का अधिकार रखती हैं या नहीं?

या सारी लोक लाज, सारी नैतिकता, सारे नियम कायदे स्त्री वर्ग के ऊपर ही मढ़ दिये गये हैं और उनके जीवन वृक्ष को बोन्साई बना दिया गया है?

जफर पनाही की फिल्म हँसते हँसाते और स्टेडियम में चल रहे फुटबॉल खेल की पृष्ठभूमि में हास्य और व्यंग्य की सहायता से मनुष्य की स्वतंत्रता से जुड़े बड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों को उभारती चलती है।

ईरान जैसे समाज, जिसने बरसों धार्मिक और सामाजिक तानाशाही झेली है, ही नहीं वरन फिल्म किसी भी समाज में रह रहे मनुष्य मात्र की बात करती है और फिल्म का खास फोकस है स्त्री को भी आजादी से जीने देने का अधिकार देने पर। फिल्म स्त्रियों के प्रति पुरुषों की सामंतवादी सोच और उनके पूर्वाग्रहों की बखिया उधेड़ते हुये चलती है।

2005 में ईरान में तेहरान के आजाद स्टेडियम में ईरान और बहरीन के बीच खेले जा रहे फुटबॉल मैच, जिसका विजेता 2006 के विश्वकप में प्रवेश पायेगा, के दौरान स्टेडियम में ही वास्तव में एक फिल्म की शूटिंग करने का ख्याल पागलपन से ज्यादा कुछ नहीं लगेगा और वह भी तब जब ईरान में सिनेमा को नियंत्रित करने वाले मंत्रालय और सरकारी कर्मचारियों को वास्तविक स्क्रिप्ट न देकर उन्हे भुलावे में रखने के लिये एक दूसरी ही स्क्रिप्ट दी गयी हो और जफर पनाही का नाम निर्देशक के तौर पर न देकर उनके एक सहायक का नाम दिया गया हो। इतना ही नहीं, फिल्म में वास्तविकता का पुट लाने के लिये व्यवसायिक अभिनेताओं का उपयोग न किया गया हो, मैच देख रहे दर्शकों को पता न चले कि दरअसल में वहाँ एक फिल्म की शूटिंग भी चल रही है, इसलिये छोटे आकार के डिजिटल कैमरे से फिल्म को शूट किया गया हो जिससे कि लोग फिल्म शूट कर रहे कैमरामैन को भी स्टेडियम में इधर उधर फैले हुये मीडियाकर्मी ही समझें, तो इसे फिल्ममेकर का अपने किस्म के सिनेमा के प्रति दीवानगी की हद तक प्रेम ही कहा जायेगा।

महिलायें स्टेडियम में जाकर मैच नहीं देख सकतीं क्योंकि नीति निर्माताओं और ईरानी समाज के नियंत्रकों को भय है कि पुरुष मैच के उतार चढ़ाव के कारण उत्तेजित होकर ऐसा व्यवहार कर सकते हैं जिसे देखना महिलाओं के लिये माफिक नहीं माना जायेगा।

offside3एक लड़की एक नौजवान, जो कि पुलिस या सेना में डेढ़ दो साल की सेवा करने को बाध्य है क्योंकि सरकार ने ऐसी ही व्यवस्था की हुयी है नौजवानों के लिये, से प्रतिप्रश्न करती है कि अगर ईरानी महिलायें पुरुषों के साथ थिएटर में जाकर फिल्म देख सकतीं हैं जहाँ कि अंधेरा रहता है तो दिन के उजाले में स्टेडियम में मैच देखने में क्या कहर बरपा जायेगा?

नौजवान सैनिक के पास कोई स्पष्ट जवाब नहीं है। हो भी नहीं सकता।

लड़की आगे पूछती है कि अगर जापान और ईरान के मैच को जापानी महिलायें देख सकती हैं तो ईरानी महिलायें क्यों नहीं?

सैनिक कहता है कि जापानी महिलाओं का मामला ईरानी महिलाओं से अलग है।
आश्चचर्यचकित लड़की कहती है कि अगर वह भी ईरानी के बजाय जापानी या किसी और देश की महिला होती तो वह भी मैच देख सकती थी।

और ऐसा नहीं कि इन नौजवान सैनिकों को व्यक्तिगत रुप से कोई विरोध है इन महिलाओं के मैच देखने में। वे तो बस उन्हे दिये गये हुक्म को पूरा कर रहे हैं। वे भी एक व्यवस्था में कठपुतली की तरह काम कर रहे हैं और व्यवस्था द्वारा बनाये गये नियम कायदों को लागू कराकर एक अंधी व्यवस्था का न चाहते हुये भी पालन पोषण कर रहे हैं।

लड़कियां लड़कों के भेष में स्टेडियम में घुसने में तो कामयाब हो जाती हैं पर उनमें से कुछ शीघ्र ही सुरक्षा के लिये जिम्मेदार सैनिकों के द्वारा पकड़ ली जाती हैं और उन्हे छत पर अस्थायी तौर पर बनायी खुली जेल में ले जाया जाता है जहाँ स्टेडियम से आने वाला शोर उन्हे और ज्यादा विचलित करता है और मैच न देख पाने की विवशता से उत्पन्न हुयी बैचेनी से भर देता है।

offside2शुरु में नौजवान लड़कियों और नौजवान सैनिकों में बहस होती है पर धीरे धीरे दोनों पक्ष एक दूसरे की मजबूरियों से वाकिफ होते हैं। दोनों ही पक्ष व्यवस्था के शिकार हैं।

देश के लोग जिन व्यवस्थाओं को नहीं चाहते वे व्यवस्थायें शासकों द्वारा लागू की जाती हैं।

जफर पनाही ने बेहद कुशलता से फिल्म को स्टेडियम के उस हिस्से पर केन्द्रित किया है जहाँ लड़कियाँ को एक तरह से कैद किया गया है। लड़कियाँ मैच न देख पाने के लिये विवश हैं और पास ही मौजूद एक झरोखे से मैदान दिखायी देता है और वे प्रार्थना करती हैं कि उन्हे वहीं से मैच देखने दिया जाये पर उनकी यह माँ भी नामंजूर हो जाती है। लड़कियों की विवशता को जफर पनाही दर्शक की विवशता भी बना देते हैं और कभी भी सीधे सीधे मैच नहीं दिखाया गया है। लड़कियों की तरह दर्शक भी पास ही चल रहे मैच के अहसास से तो रुबरु होते हैं परन्तु मैच देख नहीं पाते।

हास्य की कुछ घटनायें घटती रहती हैं लड़कियों और सैनिकों के आपसी टकराव में। एक तरह से स्वयंसेवी सैनिकों के पास अधिकार के नाम पर भी कुछ नहीं है। वे बिना अधिकार वाले वर्दीधारी हैं और लड़कियाँ इस बात को समझती हैं। बस वर्दी का फर्क है उन लड़कियों और इन सैनिकों के बीच वरना व्यक्तिगत रुप से ईरान के छोटे शहरों या देहात से आये ये युवा भी उतने ही निरीह और सीधे सादे हैं। बल्कि ज्यादातर मामलों में तो बड़े शहरों में पली बढ़ी ये लड़कियाँ उन लड़कों से काफी आगे हैं। सैनिक डरते हैं कि यदि कुछ भी गलत हो गया तो सजा के तौर पर उन्हे सैन्य सेवा में और ज्यादा समय बिताना पड़ेगा। सैनिकों की इसी परेशानी को समझ कर टॉयलेट जाने के बहाने से गायब हुयी एक लड़की कुछ समय बाद अपने आप ही वापस आ जाती है।

प्रतिबंधों को झेल रहे समाज में स्वतंत्र रुप से किसी काम को करने के पीछे हरेक के अलग अलग प्रयोजन होते हैं। एक लड़की स्टेडियम में जाकर खेल न देख पाने के प्रतिबंध को इसलिये तोड़ना चाहती है क्योंकि कुछ दिन पूर्व हुये ईरान और जापान के मध्य हुये फुटबॉल मैच के दौरान किसी घटना में मरे सात लोगों में उसके एक करीबी दोस्त की मृत्यु हो गयी थी। मैच के दौरान वह इसीलिये ऊर्जा से भरी रहती है क्योंकि उसे स्वयं को दिया गया वचन पूरा करना है।

ईरान के मैच जीत जाने पर जहाँ सब लोग नाच गाकर सड़कों पर जश्न मनाते हैं वह अपने दोस्त को याद करके रोने लगती है जिसकी याद में वह इतना बड़ा जोखिम लेने चली आयी थी।

फिल्म के क्लाइमेक्स में दर्शाया गया उत्सव रुपी माहौल अगर किसी को लोकतांत्रिक न बना सके तो उसके अंदर मानव जाति के इतिहास में समय समय पर पैदा हुये दुर्दांत तानाशाहों की विरासत के कुछ न कुछ अंश जरुर ही मौजूद हैं।

offside4स्त्री अधिकार के मामले में पुरुषवादी सोच से संक्रमित भारत और इस जैसे अन्य (हिप्पोक्रेट) समाजों के लिये तो यह फिल्म बेहद महत्वपूर्ण है।

ईरानी सिनेमा की अच्छी फिल्मों की खासियत है उनकी सामान्य सी लगने वाली कहानियाँ। पर साधारण कथानक पर आधारित होने के बावजूद वे मन को छू जाती हैं और मानव जाति को प्रभावित करने वाले मुद्दों की परतें खोल देती हैं।

बेहद कम बजट से बनायी गयी फिल्म की गुणवत्ता विश्व भर में फैले इंडिपेंडेन्ट सिनेमा के झंडाबरदारों, प्रतिनिधियों और ऐसे सिनेमा बनाने के इच्छुक नये निर्देशकों के लिये एक प्रेरणा का काम करती है।

…[राकेश]

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