


मजरुह ने शब्दों का विन्यास इस तरह से सजाया है कि गाने और विराम में एक ज़रा सी चूक लय बिगाड़ सकती थी लेकिन लता जी ने अन्तरों की लम्बी पंक्तियों को इस खूबसूरती से गाया है, एकदम उचित जगह पर विराम लेकर, मौन साधकर कि गीत जादुई सा लगने लगता है|
गीत का भाव और बोलों के अर्थ ऐसे स्पष्ट हो जायें जैसे आतिशी शीशे से देखने पर सूक्ष्म वस्तुएं एकदम साफ़ दिखाई दी लगती हैं, और गायिकी गीत की लय की सीमा से रत्ती भर भी बाहर न निकले, और चरित्र का सारा अस्तित्व अपने विराटतम स्वरूप में श्रोता/दर्शक के सम्मुख पनप जाए, ऐसा जो अपने हर गीत के साथ कर पाए, वही लता मंगेशकर है|
© …[राकेश]
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