लता मंगेशकर भारत के पिछले सत्तर- अस्सी सालों के इतिहास का सबसे गौरवमयी नाम हैं जिन्होंने सामान्यजन तक बड़ी आसानी से संगीत कला की उंचाई पहुंचाई है| वे पूरे भारत, विश्व भर में फैले भारतीयों और भारतीय उपमहाद्वीप में बसने वाले और भारतीय भाषाओं में से हिंदी, हिन्दुस्तानी, मराठी, आदि को पहचानने वाले लोगों को एक बिन्दु पर जोड़ने वाली शख्सियत रही हैं| उन जैसा कलाकार किसी भी देश में जन्मता, उस देश का गौरव और गुरुर बन जाता, यह भारत का सौभाग्य ही है कि लता मंगेशकर ने भारत में जन्म लिया|

लता का होना समूचे भारत, पुराने दौर के अविभाजित भारत और सारे संगीत संसार के लिए एक ऐतिहासिक घटना रही है, उसी तरह लता का भौतिक रूप से न होना भी एक ऐतिहासिक घटना ही है| 1949 में प्रदर्शित होने वाली फ़िल्म महल, जिसका गीत “ आयेगा आने वाला “ काल की सीमाओं का अतिक्रमण का चुका है, के साथ ही भारत या दुनिया में कहीं भी अन्यत्र किसी भारतीय परिवार में जन्म लेने वाले किसी भी इंसान को सुरों और सुरीलेपन की तहजीब लता मंगेशकर के गायन ने दी ही दी है, भले ही उसे इस बात का एहसास न भी हो| उनके न होने के भाव मात्र से वे सभी जीवित भारतीय, जिनका जन्म महल के बाद हुआ, ऐसा ही खालीपन महसूस करेंगे मानों उनके बचपन का इतिहास सहसा कोई छीन कर ले जाने की चेष्टा कर रहा हो| बचपन के हरेक उस दिन में, जिसकी समृति बनी हुयी है, कहीं न कहीं लता मंगेशकर के सुर भी पार्श्व में बजते सुनाई देते हैं| स्मृति किसी और बात की होगी लेकिन साथ ही रेडियो के किसी कार्यक्रम में लता गीत ऐसे ही उपस्थित होगा मानो यह एक अनिवार्य उपस्थिति हो| सिनेमा का भारत में बहुत ज्यादा असर सामान्य जनजीवन पर रहा है लेकिन अभिनेताओं को देखने के लिए लोगों को सिनेमाघरों में जाने का प्रयास करना पड़ता था| लता मंगेशकर के गीत रेडियो के माध्यम से उनके घरों में ही उपलब्ध थे|

भारत भूमि से उपजा कोई भी महान साहित्य ऐसा नहीं जिसमें स्त्री चरित्र की महतवपूर्ण भूमिका न रही हो| सिने उद्योग भले ही पुरुष नियंत्रित उद्योग रहा है लेकिन हिंदी सिनेमा में हमेशा से ही स्त्री चरित्र हाशिये पर रहे हों ऐसी स्थिति पहले नहीं थी| लता के गायन ने स्त्री चरित्रों को एक मजबूत पहचान दी| लता के गायन ने परदे पर नायिकाओं को विशालता प्रदान की और उनसे हरेक दर्शक या श्रोता (स्त्री या पुरुष) के लिए उसकी कल्पना अनुसार स्त्री की रचना होती गई और यह कल्पित स्त्री बेहद ठोस उपस्थिति लिए होती है| लता के फ़िल्मी गायन ने स्त्री के विभिन्न रूपों के लिए एक -एक आदर्श कल्पना की रचना कर दी| लता का गायन न होता तो कम से कम हिंदी सिनेमा को स्त्री चरित्रों की विविधता की उंचाइयां न प्राप्त हो पातीं| राजा रवि वर्मा और तमाम अन्य बड़े चित्रकारों ने अपनी कल्पना से नारी के इतने रूप चित्रित न किये होंगे जितने लता ने सिनेमा में अपने गायन से दर्शकों के मानस पर उकेर दिए|

जिन निर्देशकों के पास दक्षता थी कि वे अपनी फिल्मों में गीतों का उपयोग इस तरह से करें कि वे फ़िल्म के बहाव के साथ बहकर कथानक को घनीभूत भावनाओं से भर दें उन्होंने लता के गायन का बेहतरीन उपयोग अपनी फ़िल्मों में किया| स्त्री जीवन का ऐसा कोई भाव नहीं जिसे प्रतिनिधित्व उन्होंने अपने गायन के द्वारा न दिया हो|

लता मंगेशकर का गायन ही नहीं वरन उनकी स्वयं की उपस्थिति सैंकड़ों पुस्तकों का विषय है| उनका जीवन महाकाव्य और महाग्रंथ रचने की सामग्री प्रदान करता है|

संगीत के सामान्य श्रोताओं से लेकर संगीत के श्रेष्ठ पंडितों और शास्त्रीय संगीत के बड़े से बड़े संगीतकारों सभी को लता के गायन ने लुभाया| ऐसा बहुत कम होता है| ज्यादातर तो शास्त्रीय संगीत के कलाकार फ़िल्मी गायकों के बारे में बात ही नहीं करते लेकिन लता के बारे में यह सीमा और हिचक टूट गयी|

एक बेहद प्रतिभाशाली लेकिन गरीब कलाकार पंडित दीनानाथ मंगेशकर की असमय मृत्यु के बाद तेरह वर्षीय लता मंगेशकर ने कैसे अपने परिवार को आर्थिक रूप से संभाला होगा इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है| हिंदी फ़िल्म उद्योग मूलतः पुरुष प्रधान और पुरुष नियंत्रित ही रहा है और गाहे बगाहे ही कोई देविका रानी या कोई लता मंगेशकर ही ऐसी स्त्रियाँ रही हैं जिन्होंने इस पुरुष नियंत्रित उद्योग में अपने कार्यक्षेत्र को अपनी शर्तों पर संचालित किया है| देविका रानी एक संपन्न और उच्च शिक्षित महिला थीं, जिनके पति एक बहुत बड़े स्टूडियो के मालिक थे| लता मंगेशकर ने अपनी प्रतिभा के बलबूते अपना साम्राज्य स्थापित किया| उन्हें ऐसी दबंग कलाकार आसानी से कहा जा सकता है जिसने हिंदी सिनेमा के पुरुषवादी वर्चस्व के सम्मुख घुटने टेकने से इंकार ही नहीं किया वरन डंके की चोट पर अपनी शर्तों पर अपने कला का प्रदर्शन किया|

रॉयल्टी के मसले पर मो. रफ़ी द्वारा उनका विरोध किये जाने पर वे भी उनके विरोध का समुचित उत्तर देने में एक मिनट भी नहीं हिचकिचाईं| राज कपूर जैसे बहुत बड़े निर्माता निर्देशक, अभिनेता,  जिनकी संगीत की समझ और उनकी फिल्मों के संगीत का डंका सारे विश्व में बजता था, के द्वारा हृदयनाथ मंगेशकर के साथ गलत किये जाने पर, लता मंगेशकर, राज कपूर के विरुद्ध भी खड़ी हो गयीं और उनके लिए गाने से इनकार कर दिया| पितृतुल्य पंडित नरेंद्र शर्मा उन्हें सहमत न करते तो वे सत्यम शिवम् सुन्दरम में हरगिज न गातीं| राज कपूर का ऐसा सक्रिय विरोध करना हिंदी सिनेमा में कोई मामूली बात नहीं थी| लता न केवल अपने पक्ष पर अडिग रहीं बल्कि राजकपूर को उनके पास जाना पड़ा|  

ऐसी स्वाभिमानी और बेहद सफल स्त्री के विरोध में न केवल पुरुष बल्कि बहुत सी स्त्रियाँ भी आ गयी होंगी| यह एक स्वाभाविक बात है|

बहुत से लोग कहते रहे हैं कि लता ने किसी अन्य प्रतिभा को पनपने नहीं दिया पर यह बात तथ्यात्मक न होकर उनके लता विरोध के कारण जन्मी अनावश्यक बकवास ही रही है|

हिन्दी सिनेमा में शुरू से ही प्रत्येक वर्ष सैंकड़ों फ़िल्में बनती रही हैं और ऐसा तो संभव है नहीं कि सभी फिल्मों के गीत लता मंगेशकर ही गातीं| न ये संभव था कि लता ने बड़े बड़े संगीतकारों के सर पर बन्दुक तान रखी थी कि वे लोग केवल उन्हीं से गीत गवाएंगे| आखिर पचास और साठ के दशक में जब लता के गायन का भी स्वर्णिम काल था, संगीतकार, गीता दत्त, आशा भोसले, सुमन कल्याण पुर आदि गायिकाओं से गीत गवा ही रहे थे| ओ पी नैयर ने तो अपने व्यावसायिक जीवन में किसी फ़िल्म में लता से कोई भी गीत नहीं गवाया और ओ पी नैयर खासे लोकप्रिय संगीतकार थे| गीता दत्त और आशा भोसले के गीत उस दौर में भी खासे लोकप्रिय थे| लता से पहले भी नूरजहाँ और सुरैया बेहद लोकप्रिय गायिकाएं थीं| लेकिन यह अमिट सत्य है कि लता जैसी कोई नहीं थी| उनसे भिन्न अवश्य गायिकाएं हो सकती हैं लेकिन उनसे श्रेष्ठ कोई कभी नहीं रही|

यह एक व्यर्थ का मसला रहा है जिसे समय समय पर उठाकर कुछ लोग लता से अपनी अंदुरनी ईर्ष्या को संतुष्ट करते रहे हैं| ऐसे लोगों के लिए संगीतकार तो महान हो सकता है और उसके गीतों पर वे न्यौछावर हुए रहते हैं लेकिन उसी महान संगीतकार की लता के बारे में समझ उनकी समझ में नहीं आती कि क्यों लगभग सभी संगीतकारों ने अपने श्रेष्ठतम गीत लता से ही गवाए?

लता विरोध का आलम ऐसा रहा है कि कोई नई गायिका पटल पर उभरनी चाहिए थी, लता विरोधी खेमा लता के परिदृश्य से हटने की घोषणाएं करने लगते थे| रुना लैला आ गयीं तो लता अब गायब हो जायेंगी! नाजिया हसन तो आप जैसा कोई की सफलता के बाद पक्का ही लता को घर बिठा देगी|

गायिकाएं आती रहीं, जाती रहीं, लता मंगेशकर एवरेस्ट की भांति अटल संगीत का शिखर बनी रहीं|

लता के सक्रिय वर्षों में उनके द्वारा गीत गाने या न गाने से किसी भी फ़िल्म के संगीत की गुणवत्ता निर्धारित होती रही है| 60 , 70 और 80  के दशकों में खय्याम और लता मंगेशकर की जोड़ी को देखें तो जिस जिस फ़िल्म में लता ने उनके लिए गीत गाये वे लगभग सभी गीत उन फिल्मों के सबसे अच्छे गीत रहे और उन फिल्मों के संगीत की स्मृति औसतन उन्हीं लता गीतों के कारण बनी रहती है|

गुलज़ार के बहुत से बेहतरीन गीतों को लता ने अपने सुरों से सजाया| गुलज़ार ने एक से बढ़कर एक फ़िल्में बनायी हैं, उनकी फ़िल्म “मीरा” के संगीत से वैसी संतुष्टि नहीं मिलती जैसी उनकी उस दशक की परिचय, आंधी, मौसम, किनारा, और खुशबू, के संगीत से मिलती है| “मीरा” के संगीत में अगर एक कमी स्पष्ट रूप से झलकती है तो वह लता के गायन की ही है| काश लता, पंडित रवि शंकर के संगीत निर्देशन में मीरा के गीत गा लेतीं तो फ़िल्म का असर कुछ और ही बन बैठता| आखिर लता मंगेशकर और पंडित रवि शंकर की जोड़ी ने साठ के दशक में हृषिकेश मुकर्जी की फ़िल्म – अनुराधा,  के रूप में एक बेहतरीन संगीत सौगात संगीत रसिकों को प्रदान की ही थी|

लता पंचम के लिए गुलज़ार की फ़िल्म – खुशबू में दो नैनों में आंसू भरे हैं निंदिया कैसे समाये (https://cinemanthan.com/2013/10/15/donainonmeinansoo/), उस तरह न गातीं, तो क्या कुसुम (हेमा मालिनी) के गहन दुःख की तीव्रता उस तरह से सामने आ पाती जैसे कि अब आ पाई है? वह गीत पूरी फ़िल्म के स्तर को एक ऐसी उंचाई प्रदान कर देता है कि आगे पीछे की सारी फ़िल्म अपने आप ऊपर उठ जाती है|  

लता विरोधी अपने विरोध की तपिश के चश्मे से यह देखना भूल जाते हैं कि नूरजहाँ, सुरैया, गीता दत्त, शमशाद बेग़म और आशा भोसले आदि जैसी सभी बेहतरीन गायिकाओं ने अद्भुत गीत तो गाये लेकिन उन्होंने अपने सभी गीत हमेशा मौलिक गायिका बन कर अपने ही अंदाज़ में गाये| इनके गीतों का इस बात से कोई सम्बन्ध नहीं रहा कि वे किस अभिनेत्री के लिए गाये गए हैं?

लता मंगेशकर ने हिंदी सिनेमा को न सिर्फ विलक्षण गीत ही दिए बल्कि पार्श्व गायन के क्षेत्र में गायिकाओं के लिए मील के पत्थर स्थापित कर दिए| पहली बार उन्होंने ही भरकस प्रयास किये कि वे अभिनेत्री की आवाज़ और उसके बोलने के अंदाज़ से मेल खाते तरीके से उसके लिए गीत गायें| मधुबाला, नर्गिस, मीना कुमारी, नूतन, वहीदा रहमान, माला सिन्हा, साधना, वैजयंती माला, पद्मिनी, मुमताज़, हेमा मालिनी आदि अभिनेत्रियों के लिए लता के गाने एक अंदाज़ एक दूसरे से उतने ही भिन्न हैं जितनी ये अभिनेत्रियाँ परदे पर एक दूसरे से भिन्न लगती थीं| माला सिन्हा के बोलने में एक खनक थी, मुकेश की तरह नाक का मिश्रित स्वर था, सो लता ने उनके लिए इसी तरह के गीत गए| माला सिन्हा स्वंय भी गायिका थीं और अगर फ़िल्म “ललकार” में उनके स्वयं के द्वारा गाये गीत को परखें तो लता द्वारा उनके लिए गाये गीत हुबहू उनके गाये गीत के साँचें में ढले लगते हैं| वे गीत मीना कुमारी के लिए गीतों की तरह पूरी तरह रस से भरपूर मिठाई जैसे नहीं हैं बल्कि उनमें स्वाद के पारखी ही जान पायें ऐसा नमक भी है| लता ने तो अभिनेत्री की उम्र और फ़िल्म में उसके चरित्र के हिसाब से भी उसके लिए गीत गाये| मीना कुमारी के लिए “बैजू बावरा”, में गाये गीतों और “दिल अपना प्रीत पराई” में गाये गीतों में अंतर स्पष्ट सुनाई और दिखाई देता है, पर हैं दोनों ही अंदाज़ केवल मीना कुमारी के लिए सुरक्षित सांचे वाले|

पार्श्व गायन में अभिनेता के अनुसार अपने गायन को ढालने की कला को किशोर कुमार और रफ़ी ने भी अपनाया और अपने समकालीन अन्य गायकों से इसलिए वे ज्यादा मुनासिब और सफल रहे| देव आनंद को एक अपवाद माना जा सकता है कि जिस भी गायक ने उनके लिए पार्श्व गायन किया परदे पर उन्होंने उसके गायन को ऐसे अंगीकार कर लिया जैसे इस गायक ने केवल उन्हीं के लिए गीत गाने के लिए जन्म लिया हो|

और कौन गायिका होगी जो जब गाये “ऐसे तड़पूं के जैसे जल बिन मछली” और श्रोता इस दृश्य की कल्पना से ही भर जाए| लता ने जो किया वह बेहद उच्च गुणवत्ता के साथ किया|

अगर वे किसी गीत में हंसी भी हैं तो वह उस गीत की एक विशेष अदा बन गया, जैसे फ़िल्म “घर” के गीत की पंक्तियों – बेवजह तारीफ़ करना आपकी आदत तो नहीं ….(हंसी) … आपकी बदमाशियों के ये नए अंदाज़ हैं”  गाते हुए उनका हलके से संक्षिप्त सा हंसना भी बेहद सुरीला है| रजिया सुलतान के बेहद खूबसूरत गीत “चूम कर रात सुलायेगी तो नींद आयेगी, ख़्वाब बन कर कोई आयेगा तो नींद आयेगी” गाते हुए “ख़्वाब” शब्द गाते हुए जिस तरह से उन्होंने हंसी के पुट का समावेश गीत में किया है, और इस गीत में कई जगह उन्होंने कई शब्दों के साथ ऐसी हरकत की है, वह किसी और गायिका ने तो कभी करके दिखाया नहीं| यह गीत उनके गायन का विलक्षण नमूना है|  

अगर लता मंगेशकर फ़िल्मी पार्श्व गायन के पटल पर न होतीं तो बाकी सभी अच्छी गायिकाओं के लिए बहुत आसानी हो जाती क्योंकि श्रेष्ठ गायन की प्रतिभा तो उनके पास थी ही| बस लता मंगेशकर के अवतरित होने से वे शिखर पर नहीं पहुँच पायीं| वे लता के आसपास की थोड़ी नीची चोटियाँ बन कर ही रह गयीं|  

लता जी ने बरसों से नहीं गाया लेकिन हिन्दुस्तानी संगीत के रसिकों के लिए लता मंगेशकर उनके जीवन का अभिन्न अंग रही हैं| वे अगर 1970 के वर्ष में ही फिल्मों के लिए गीत गाने बंद कर देतीं तब भी संगीत रसिकों के लिए यह मुमकिन न हो पाता कि दैनिक स्तर पर वे लता जी के सुरों के पास नहीं पहुँच रहे हैं|

देश जब सरस्वती पूजा उत्सव मना कर पुनः कोविड से लड़ने बैठा ही था कि अगले दिवस ही स्वर कोकिला, सरस्वती पुत्री लता मंगेशकर के देहावसान के समाचार ने पूरे देश, और दुनिया में यहाँ तहां रहते भारतीयों और भारत से अलग हुए या कभी भारत से जुड़े रहे देशों के लोगों को स्तब्ध कर दिया| उनके कोविड और निमोनिया से ग्रसित होकर अस्पताल में भर्ती होने के बाद से ही संगीत रसिक मानसिक रूप से डावांडोल स्थिति का सामना कर रहे थे लेकिन इसके बाद भी इस दुखद समाचार को सभी ऐसे ही ग्रहण कर पाए होंगे जिसके लिए कहा जाता है – सुनकर मुंह खुला का खुला रह गया!

यह सत्य है कि लता जैसे श्रेष्ठतम कोटि के गायक, जिनका गायन सुरक्षित है, कभी मरते नहीं| जैसे उनके सुर पिछले 72-73 वर्षों से लोगों के संगीत श्रवण काल को आनंद से अभिभूत करते रहे हैं वैसे ही आगे भी करते ही रहेंगे|

सालों से तो भौतिक रूप से लता जी केवल अपने निकट परिवार के सदस्यों के लिए ही उपलब्ध रही थीं और बाकी जगत तो उनके गीतों के माध्यम से ही उनकी उपस्थिति अपने पास महसूस करता रहा है अब जब उनका भौतिक शरीर पंचतत्वों में विलीन हो चुका है, उनकी उपस्थिति संभवतः इतनी बड़ी हो जाए जिसकी कल्पना भी कर पाना अभी संभव न हो और वे मीराबाई की भांति एक किवदंती सरीखी उपस्थिति बन जाएँ|

…[राकेश]