रिश्तों में गर्माहट का स्थान ठंडक और परस्पर दूरियां ले लें तो इसके लिए उपमा देने के लिए नई सदी में तो गुलज़ार ही श्रेष्ठ विकल्प हो सकते हैं| गुलज़ार के सृजन आवश्यक नहीं कि काल खंड पर सिलसिलेवार ही अस्तित्व में आयें वे आगे पीछे भी जन्मते हैं लेकिन उनका आपस में एक अन्तर्निहित सम्बन्ध अवश्य ही होता है क्योंकि गुलज़ार फिल्मों में फ़िल्मी स्थितियों के लिए लिखते जरुर हैं लेकिन वे रचनाएं भी एक बड़े सृजन का एक हिस्सा मात्र होती हैं|
एक बार वक्त से
लम्हा गिरा कहीं
वहां दास्ताँ मिली
लम्हा कहीं नहीं
फ़िल्म गोलमाल के गीत की उपरोक्त पंक्तियों में कहीं न कहीं गुलज़ार के रचने की प्रक्रिया भी सम्मिलित है|
टूटते रिश्ते से सम्बंधित उनकी एक पुराने नज़्म को याद करें
रात भर सर्द हवा चलती रही
रात भर हमने अलाव तापा
मैंने माज़ी से कई खुश्क सी शाखें काटी
तुमने भी गुजरे हुए लमहों के पत्ते तोड़े
मैंने जेबों से निकाली सभी सूखी नज़्में
तुमने भी हाथों से मुरझाए हुए ख़त खोले
अपनी इन आँखों से मैंने कई मांजे तोड़े
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकी
तुमने भी पलकों पे नमी सूख गई थी, सो गिरा दी
रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हमको
काट के डाल दिया जलते अलावों में उसे
रात भर फूकों से हर लौ को जगाए रखा
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रखा
रात भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हमने…


…[राकेश]
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