पुल पार करने से
पुल पार होता है
नदी पार नहीं होती
नदी पार नहीं होती नदी में धँसे बिना
नदी में धँसे बिना
पुल का अर्थ भी समझ में नहीं आता
नदी में धँसे बिना
पुल पार करने से
पुल पार नहीं होता
सिर्फ़ लोहा-लंगड़ पार होता है
कुछ भी नहीं होता पार
नदी में धँसे बिना
न पुल पार होता है
न नदी पार होती है। (नरेश सक्सेना)
पुल बनाना मानव विकास के क्रम में मनुष्य के संगृहीत ज्ञान का एक परिणाम है, पुल न हो तो धरती पर हर नए जन्मे मनुष्य को डूबने का खतरा उठाकर नदी, बरसाती नालों, और समन्दर में उतरना पड़ेगा| इस दुस्साहस को उठाने वाले लोगों में गिनती के लोग जीवित बच पायेंगे|
आग जला देती है, इसका अनुभव स्वयं करने की आवश्यकता हर मनुष्य को नहीं होती|
ज़हर प्राण ले सकता है इसे जांचने के लिए मनुष्य को ज़हर पीने या खाने की आवश्यकता नहीं पड़ती| मनुष्यों पर ज़हर के प्रभाव की बातें हजारों साल से मनुष्य के संज्ञान में आती रही हैं इसलिए उसे यह पता होता है|
पहाड़ी नदी के तीव्र वेग को देख आँखों से न देख सकने वाला भी बहाव के शोर को सुनकर नदी में उतरने या धंसने की मूर्खता नहीं ही करेगा| ऐसी नदी पर ज्ञानी और साहसी मनुष्यों ने एक पुल बना दिया होगा तो लोग उसका उपयोग कर इस पार से उस पार चले जायेंगे|
पुल की महत्ता भारतीय परंपरा से ज्यादा कौन जानेगा? राम-सेतु न बनता तो श्रीराम अपने साथियों के साथ अधर्म पर धर्म की विजय की स्थापना न कर पाते| असभ्यता के ढेर पर सभ्यता का महल खड़ा न कर पाते|
पुल है तो मनुष्य खाईयां और नदियाँ, पार कर लेता है और समुद्र में भी बहुत दूर तक चहलकदमी कर लेता है|
पुल नदी में धंस कर ही बनाए जाते हैं| कुछ मनुष्यों ने नदी में धंस कर पुल बना दिए अब सारी मानवता को नदी में धंसने की आवश्यकता नहीं है|
ऐसे ही जैसे हर आदमी को कोई नदी, झील, समंदर तैर कर पार करने की आवश्यकता नहीं होती तकनीकी विकास के क्रम में मनुष्य ने नाव, और जहाज जैसे साधन बना लिए हैं|
अनुभव लेने भर को कोई नदी में घुस जाए लेकिन यह वही कर पायेगा जिसे नदी की गहराई का अनुमान है कि कहाँ तक वह सुरक्षित रूप से धंस सकता है, या वह एक अच्छा तैराक है, अन्यथा नदी की किसी से निजी मित्रता नहीं होती कि अनाड़ी को भी वह सुरक्षित वापिस किनारे भेज देगी| जिन्हें तैरना नहीं आता उन्हें डुबोना नदी का स्वभाव है|
जीवन में स्वयं अर्जित अनुभव का बहुत महत्व होता है लेकिन यह निपट मूर्खता के आधार पर अर्जित नहीं किया जा सकता| मनुष्य जीवन कीमती है और कवियों के जीवन तो और भी कीमती होते हैं, वे अपनी बारीक दृष्टि से संसार, लोगों और जीवन को देख कुछ रचनात्मक लिख या कह देते हैं जो बाकी मनुष्यों के लिए लाभदायक सिद्ध होता है|
कौन सा कवि पुल छोड़कर नदी में धंसने चला जाएगा? कवि लोग क्या पुल छोड़कर नदी में उतर कर ही उसे पार करेंगे? या वे जहाँ नाव से पार हो सकते हैं वहां नदी तैर कर ही पार करेंगे?
जीवन में स्वंय के अनुभव के लिए बहुत सी तुलनाएं हो सकती हैं लेकिन नदी पार करने के लिए पुल का महत्व समाप्त करना न जीवन के हित में है न कविता के| सतही और गहन अनुभव के अंतर को दर्शाने के लिए और बहुत सी तुलनाएं जाग्रत हो सकती थीं| पुल और साधन के रूपक कविता में सही सन्देश स्थापित नहीं कर पाते| यह कविता मनुष्य के निर्माण के संयुक्त ज्ञान पर एक कुठाराघात सरीखी है|
पुल का तो बड़ा महत्व मनुष्य जीवन में रहा है| दो मनुष्यों के बीच अनबन में एक अदृश्य पुल ही होता है जो उनके बीच की खाई को दूर करता है, और दिलों को मिलाता है| जहाँ भी दो किनारे होंगे वहां पुल की आवश्यकता पड़ेगी ही| पुल सिर्फ लोहा, लकड़ी, सीमेंट आदि से बना ढांचा ही नहीं होता| यह पीढ़ियों को पलने वाला, उन्हें सुविधा देने वाला तकनीकी साधन है, विकास क्रम में मनुष्य का एक साहसी और बुद्धिमानी भरा उपक्रम है|
पुल के साथ इतनी बेरुखी किसी कविता को नहीं बरतनी चाहिए| कवि का ऐसा उद्देश्य बिलकुल नहीं रहा होगा लेकिन यह कविता विकास विरोधी प्रकृति की बन गयी है| बहुत से कबीले ऐसे हैं दुनिया में और भारत में भी कई जगहों पर, विशेषकर अंडमान निकोबार द्वीप समूहों में, जहाँ वे संगृहीत ज्ञान का उपयोग करते हैं, वहां लगभग हर मनुष्य अपने जीवन में स्वयं अर्जित अनुभव के भरोसे जीवन व्यतीत करता है, कुछ क्षेत्रों में उनके यहाँ भी ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाता है लेकिन उसकी गति बहुत ही कम है, क्या मनुष्य को उस मार्ग को अपना लेना चाहिए?
नरेश सक्सेना की कविता अच्छी शुरूआत करती है — “सतही ज्ञान पर्याप्त नहीं, गहरा अनुभव जरूरी है” — लेकिन आगे जाकर अति कर जाती है। वे रूपक को इतना कठोर बना देते हैं कि कविता दार्शनिक होने के बजाय एकतरफा हो जाती है। “लोहा-लंगड़” और “पुल पार करने से पुल भी पार नहीं होता” वाली पंक्तियाँ कविता को शाब्दिक (literal) व्याख्या की तरफ धकेल देती हैं।
जीवन के कई क्षेत्रों में प्रत्यक्ष अनुभव के बिना भी बहुत कुछ जान और समझ सकते हैं:
इतिहास, विज्ञान और साहित्य आदि का तो उद्देश्य ही सभी को वह सिखाना है जो उनसे पहले अन्य जान चुके हैं|
…[राकेश]
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