जासूसी, रहस्य रोमांच से भरी किताबें लिखने वाले सभी लेखक, अपनी कहानियों और उपन्यासों में इस दावे को अवश्य ही दर्ज करते हैं कि
“कातिल कितना ही होशियार क्यों न हो, हत्या करते हुए कितनी भी सावधानी क्यों न बरते, हत्या करते हुए उससे ऐसी कोई चूक अवश्य हो जाती है और वह ऐसा कोई न कोई सुराग अवश्य मौका-ए-वारदात पर छोड़ जाता है जिसे देखते ही चतुर जासूस, या पुलिस अधिकारी अपनी जांच का ब्लू प्रिंट तैयार कर लेता है और अंततः हत्यारे का पर्दाफाश कर देता है|”
उपरोक्त सिद्धांत पर ही जासूसी किताबें टिकी रहती हैं| मर्डर मिस्ट्रीज आधारित किताबों के दो प्रकार होते हैं : पहले प्रकार की किताबों में जासूस के जिम्मे यह पता लगाना होता है कि कातिल कौन है और हत्या कैसे हुयी यह मृतक को देख कर ही ज्ञात हो जाता है| दूसरे प्रकार की किताबों में कातिल कौन है के साथ साथ हत्या कैसे की गयी की गुत्थी भी जासूस को सुलझानी होती है|
अन्य जासूसी कथाकारों की तरह सुरेन्द्र मोहन पाठक भी रहस्य और रोमांच की शतंरज की बिसात अपनी हर किताब में बिछाते हैं और इस शतरंज के खेल में जहाँ बहुत सारे मोहरे शामिल होते हैं तो यह बड़ा आवश्यक हो जाता है कि कोई बात तभी पाठक के सामने खुले जब लेखक चाहे अन्यथा पाठक को रहस्य से वैसा रोमांच नहीं मिलेगा जैसी आशा लेखक ने पाठक को बंधवा रखी है|
हिन्दी में जलेबी की तरह उलझे कथानक का सबसे बड़ा उदाहरण देवकीनंदन खत्री का उपन्यास चंद्रकांता है| किसी पात्र ने पेज 20 पर क्या कहा उसका राज पेज 120 पर दिए वृतांत में खुलेगा तो लेखक के दिमाग ने कितनी चौकसी बरती होगी इसका अनुमान उस श्रंखला की किताबें पढने से लग जाता है|
सुरेन्द्र मोहन पाठक ने किताबें लिखने के तीन शतक तो अवश्य ही लगाए हैं| देश भर में उनका बहुत बड़ा प्रशसंक वर्ग है जो गर्व से अपने आप को SMPian कहता है| ऐसा निष्ठावान प्रशंसक वर्ग अन्य किसी लेखक का भारत में संभवतः नहीं होगा|
क्या जासूसी कहानीकार गलतियां भी कर सकते हैं, बड़े और प्रसिद्ध लेखक के साथ ऐसा होने की संभावना कम ही होती है| पर ऐसा हो सकना संभव तो है ही|
सुरेन्द्र मोहन पाठक का रहस्य-रोमांच से भरा एक उपन्यास है – दस मिनट| जिसमें एक युवा लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसा कर वेश्यावृत्ति में धकेल देने वाले विलेन के चंगुल में फंसने से अपनी परिचित लड़की को बचाना चाहता है, क्योंकि वह लड़की से बचपन से ही प्रेम करता है लेकिन अपनी कमजोर आर्थिक स्थितियों के कारण उससे अपने प्रेम का प्रदर्शन कभी कर नहीं पाया है| उसे तो विलेन की असलियत पता हो गयी है लेकिन उसकी परिचित लडकी पूरी तरह से विलेन के प्रेमजाल में जकड़ी हुयी है और उसे पूरा विश्वास है कि वह अपनी किसी कथित पत्नी से तलाक लेकर उससे विवाह कर लेगा| और अगर इस बीच तलाक न हो पाया तो वे दोनों दुबई जाकर विवाह कर लेंगे| यही पट्टी पढ़ाकर विलेन लड़की को पहले मुंबई और वहां से दुबई ले जाने वाला है| लड़का उसका कई बार सामना करता है लेकिन लड़की द्वारा विलेन का पक्ष लेने से वह हर बार कमजोर पड़ जाता है| वह तो विलेन की सारी साजिश समझ रहा है लेकिन लड़की के सामने विलेन के बारे में अपने दावों को सिद्ध नहीं कर पा रहा है| लड़के और विलेन की खींचतान भरी बातचीत में, जब वे दोनों एक कक्ष में अकेले ही हैं, विलेन उसे चुनौती देते हुए कहता है कि जो वह कह रहा है वह सब सही है, वह वास्तव में कुछ दिन इस लड़की के साथ रहकर इसे दुबई में शेखों के यहाँ भेज देगा जहाँ से वह वहां के वेश्यावालों में पहुँच जायेगी, लेकिन यह सब जानते हुए भी लड़का उसे नहीं रोक सकता क्योंकि लड़की उसकी कोई बात नहीं मानेगी|
अपने इस एकतरफा प्रेम की खातिर लड़का कैसे लड़की को विलेन के झांसे से बचाने के लिए अपराध करता है और पुलिस से बचता है, आदि ही उपन्यास की सामग्री है| इस किताब में हत्या किसने और कैसे की यह सब पाठक को अपराध होने से पहले ही बता दिया जाता है और यहाँ रहस्य इस बात का है कि अपराधी पुलिस की जांच से कैसे बचकर निकल पायेगा|
लड़के द्वारा विलेन का असली चेहरा लड़की के सामने लाने के प्रयास में वह विलेन के क्लब में काम करने वाली एक गायिका से मिलता है जो उसकी सहायता करती है और उसे एक पत्र के बारे में बताती है जो उसे विलेन द्वारा कुछ समय पहले दुबई में वेश्यालय में बेची गयी एक और लड़की के बारे में बताती है जिसे फ़िल्म ऐक्ट्रेस बनाने का झांसा देकर विलेन ने अपने जाल में फंसा और उसका शोषण किया और अंततः दुबई ले जाकर उसे अपने एक दलाल साथी के चंगुल की गिरफ्त में बेच दिया जिसने उसे वेश्यालय में बेच दिया| उस लड़की ने दुबई से इस गायिका को पत्र लिखकर अपने दास्तान बताई है जिससे वह अन्य लड़कियों को विलेन का शिकार होने से बचा सके| लड़का उस पत्र को मांगता है लेकिन गायिका उसे अपनी ड्यूटी समाप्त होने के बाद कहीं और मिलने के लिए कहती है| वहां से बाहर जाते हुए लड़का विलेन से टकरा जाता है जहाँ लड़का गुस्से में अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पता और विलेन से झड़प में उसे धमकी दे देता है कि जल्दी ही उसका भंडाफोड़ वह कर देगा और उसकी शिकार एक लड़की का पत्र एक सुबूत के तौर पर पुलिस के पास लेकर जायेगा और उसका खेल ख़त्म कर देगा|
विलेन अपनी बुद्धि लगाता है कि क्लब में कौन ऐसा हो सकता है जिसे दुबई से उसकी पुरानी शिकार पत्र लिख सके, क्योंकि वह लड़की क्लब में किसी को जानती नहीं थी| फिर उसे याद आता है कि एक बार उसने उस लड़की और क्लब की गायिका को बात करते हुए देखा था| वह अनुमान लगाकर गायिका को डराता धमकाता है और उससे पत्र हासिल करके उसे कहीं दूर रहने वाली बहन के घर भेज देता है|
अपने घर पहुँचने पर उसका साथी और घरेलू सहायक उसे बताता है कि लड़के का फोन आया था और वह उसके बारे में पूछ रहा था| बातचीत में वह विलेन से उस लड़की के पत्र के बाबत उससे पूछता है|
यही वह चूक है जो सुरेन्द्र मोहन पाठक जैसे बड़े जासूसी उपन्यासों के लेखक के लेखन में मिलनी नहीं चाहिए| विलेन ने अपने सहायक को कभी भी अपनी पुरानी शिकार लड़की के पत्र के बारे में सूचित नहीं किया और पत्र प्राप्त करने के बाद वह पहली ही बार अपने घर वापिस आया है लेकिन तब भी सहायक उससे पत्र के बारे में पूछता है|
पाठक साहब की सहूलियत के लिए एक ही संभावना बचती है कि उन्होंने तो अपने ड्राफ्ट में लिखा होगा कि विलेन की अपने सहायक से पत्र के बारे में बातचीत अपने सहायक से हुयी लेकिन वह किताब के किसी संस्करण में छपने से रह गयी| “दस मिनट” किताब के कुल पृष्ठों की संख्या अलग अलग देखी जाती है और ऐसा होना संभव तो है ही कि ड्राफ्ट में से एक दो पेज छपने से रह जाएँ|
लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो सुरेन्द्र मोहन पाठक के स्तर से यह एक अच्छी खासी चूक है|
…[राकेश]
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