कौन बदन से आगे देखे औरत को
सब की आँखें गिरवी हैं इस नगरी में

~ हमीदा शाहीन

अभिनेत्री रेखा ने एक उद्योगपति से सहसा विवाह कर लिया और कुछ समय के बाद उस उद्योगपति ने आत्महत्या कर ली तो उद्योगपति के परिवार की ही नहीं बल्कि सारे मीडिया और बहुत से लोगों और फिल्म उद्योग की उंगलियाँ भी रेखा की ओर निशाना साधने लगीं| उनके चरित्र की हत्या सार्वजानिक रूप से सामूहिक रूप से की जा रही थी| किसी ने इस केस की बहुत सी अनसुलझी बातों पर विचार न किया| सबके गोला बारूद रेखा की दिशा में ही छोड़े जा रहे थे| उद्योगपति ने रेखा को विवाह से पहले नहीं बताया कि वह गहरे अवसाद से पीड़ित है, और उसकी मानसिक शांति उसकी डॉक्टर के ऊपर निर्भर है| स्पष्ट रूप से कम उम्र में बड़ी सफलता पाए युवा उद्यमी के लिए प्रसिद्द सिनेतारिका से विवाह करना एक बहुत बड़ा स्टेसस सिम्बल था| रेखा को विवाह के पहले ही हफ्ते में पति की मानसिक हालत का अंदाजा हो गया था, ऊपर से पति की यह मांग कि रेखा फिल्मों में काम करना बंद कर उसका घर संभाले, रेखा को स्वीकार्य नहीं थी| जटिल परिस्थितियों में रेखा का यह अधिकार था कि वह अपने जीवन को सरल रूप में जिए| लेकिन जगत ने उन्हें सारी स्थितियों का दोषी ठहरा दिया| रेखा पर दोषारोपण इतना आसान मान लिया गया कि जय प्रकाश चौकसे जैसे अखबार में फिल्मों पर अत्यंत साधारण लिखने वाले फिल्म वितरक ने अपने एक लेख में रेखा पर आपतिजनक टिप्पणी कर दी अमिताभ और जया के दांपत्य जीवन को लेकर| मानो अगर अमिताभ और रेखा के मध्य किसी किस्म का अफेयर अमिताभजया के विवाह के बाद रहा भी तो यह रेखा ने अमिताभ की कनपटी पर बन्दुक तान कर शुरू करवाया|

फ़िल्म- माँ बहन में निर्देशक ने एक प्रयोग किया है| 90% फिल्म दुनिया नायिका रेखा (माधुरी दीक्षित) के बारे में क्या सोचती है और उसे किस निगाह से देखती है उस दृष्टिकोण से दिखाई गयी है| शुरू में ही मोहल्ले के लोगों द्वारा उसे डायन कहने और समझने की राह पर चलाते हुए रेखा को एक डायन के रूप में ही पौधों में पानी देते हुए दिखाया गया है, जिसकी आँखों में अजीब सी लाल रोशनी बसी है, जिसके पैर के पंजे उलटे हैं, जिसके हाथों की उंगलियाँ बेहद लम्बी हैं| रेखा और उसके घर को मोहल्ले के लोगों की निगाह से दिखाया गया है| इस दृष्टिकोण में सबसे बड़ी गड़बड़ किसी सूत्रधार का अभाव है क्योंकि इस अभाव के बिना बहुत से दर्शक इस बात को समझ ही नहीं सकते कि निर्देशक किस विधा की फिल्म उन्हें दिखा रहा है| और जब रेखा को अभी डायन रूप में दिखाया गया है तो आगे वह यह रूप कभी क्यों नहीं धरती? मोहल्ले में लोगों में यह धारणा है कि रेखा ने अपने घर के बाहर बगीचे में लोगों को मारकर दबाया हुआ है और उनके ऊपर गेंदे के फूल उगा लिए हैं| उन फूलों को पानी देते हुए डायन रूप में रेखा को दिखाना उसी धारणा से संबंधित है, लेकिन इसे दर्शकों तक पहुँचाया कैसे जाए , इस बात में फिल्म कमजोर पड़ जाती है|

इस डार्क कॉमेडी प्रकृति की फिल्म में जो दुनिया की नज़रों में शरीफ आदमी है उसका नाम ही चरित्र गुप्ता है, लेकिन वही अंत में सबसे लंपट निकलता है| फिल्म का उद्देश्य तो अच्छा था लेकिन कथा दिखाने का एक सशक्त तरीका फिल्म के पास नहीं था इसलिए जब भी कोई नया किरदार आकर कहानी को आगे बढाता है या उसे एक मोड़ देता है, इस घटना का प्रस्तुतीकरण असल में दर्शक को भ्रम में डाल जाता है और दर्शक के पास कोई अर्थ शेष नहीं रह पाता|

सबसे बड़ी कमी और अतार्किक बात है कि मोहल्ला रेखा के बारे में जो चाहे विचार बनाये लेकिन रेखा की बेटियों की निगाह में तो अपनी माँ का वास्तविक रूप बसा होना चाहिए| लेकिन उनके पास भी अपनी माँ को लेकर भ्रांतियां हैं| रेखा को क्या समस्या रही कि वह अपनी बेटियों, विशेषकर बड़ी बेटी जया (तृप्ति डिमरी) से अपनी वास्तविक प्रकृति में कभी दिल की बात नहीं कह सकी?

फिल्म को यह समझ नहीं आया कि जया को किस रूप में प्रस्तुत करे, उसके विवाह होने का प्रसंग इतना अटपटा है कि उसके स्वभाव से मेल ही नहीं खाता| उसकी सौतेली बहन सुषमा क्यों और कैसे उसके पति के नजदीक आ गयी फिल्म इस पर प्रकाश नहीं डाल पाती| केवल रील बनाने के लिए एक लडकी अपनी बहन के पति के घर ही रहने लगेगी कि पति दोनों बहनों की उपस्थिति में उनकी माँ से कहता है कि अब तो बड़ी और छोटी दोनों बहनों का पति उसे ही समझ लिया जाए|

रेखा को जब चरित्र गुप्ता की नीयत का पता है तो वह उसकी वाइन शॉप में काम क्यों करेगी? परेश रावल का छोटा सा भाग प्रभावी हो सकता था अगर वह चरित्र इतना बड़ा धोखेबाज न निकलता कि रेखा को अंदाजा ही नहीं लगा कभी कि वह नियमित जेल जाता रहा है| पैसे के लालच में भी उसे रेखा और सुषमा को छोड़ कर जाते हए दिखाया जा सकता था| लेकिन एक झटके में उस चरित्र को एक छोटा उठाईगिरा दिखा देने से चैत्र में वज़न ही नहीं बचा|

फिल्म में ऐसी कमजोर कड़ियाँ बहुत हैं|

अभिनय के स्तर पर लचर लेखन के बावजूद माधुरी दीक्षित दर्शाती हैं कि वे किसी भी फिल्म को अपने कंधो पर आराम से ढो सकती हैं और उनके अन्दर अभिनय के कई रंग बसे हुए हैं| उम्र के इस पड़ाव में वे धैर्य से अच्छी फ़िल्में चुन सकती हैं और पचास साल से ज्यादा आयु के चरित्रों में प्रभावशाली अभिनय कर सकती हैं| उनके साथ कल्पनाशील निर्देशक गण बेहतरीन फ़िल्में बना सकते हैं|

तृप्ति डिमरी ने हाल में दो तीन फिल्मों में कॉमेडी में स्वयं को अजमाया लेकिन उनके ऐसे प्रयास लाउड ज्यादा लगे| यहाँ वे माधुरी दीक्षित के समक्ष पूरे आत्मविश्वास से डटी रहीं और यह सन्देश दे गयीं कि वे कॉमेडी में भी अच्छा काम कर सकती हैं अगर विषय में जान हो|

रवि किशन के लिए कॉमेडी आसान क्षेत्र है लेकिन यहाँ उनका चरित्र कायदे से विकसित ही नहीं था तो वे बहुत ज्यादा कर पाने की हालत में थे नहीं|

अन्य कलाकार प्रयास करते हुए ऐसे लगे जैसे क्रिकेट के खिलाड़ी अच्छा खेलें लेकिन मैच जीत न पायें| उनके प्रयासों पर कमजोर लेखन ने पानी फेर दिया|

माँ बहन, डार्क कॉमेडी वर्ग की हालिया दो फिल्मों Crazxy (2025) और Gandhi Talks (2026) जैसी बन सकती थी लेकिन प्रस्तुतीकरण में निर्देशकीय स्पष्टता के अभाव ने इस अवसर को छीन लिया|

…[राकेश]


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