manhgai-001भारत की सरकारों का सौभाग्य रहा है कि देशवासियों की कमर तोड़ने वाले मुद्दों को लेकर भी भारतवासी सड़कों पर नहीं उतरते बल्कि किसी न किसी तरह से इन अव्यवस्थाओं से पार पाने की सहन शक्ति विकसित कर लेते हैं और भ्रष्ट नेता कुर्सी और इसकी पावर का दुरुपयोग करके अपनी और अपने परिवार वालों की सात पुश्तों के लिये सुख सुविधाओं को जुटाने में लगे रहते हैं।

लोग हास्य-व्यंग्य के माध्यम से अपने कष्टों को सहन करने के लिये ऐसे सामाजिक उपचार खोज लेते हैं जो जन समूह के लिये कैथार्सिस का काम करते हैं। गाँव-देहात और छोटे कस्बों में ऐसे ऐसे लोकगीत या किस्से जन्म लेते हैं जो देश के करोड़ों लोगों की भावनाओं को अभिव्यक्ति दे सकते हैं।

प्रैशर कुकर की तरह ही एक सेफ्टी वाल्व की जरुरत जीवन के हरेक मामले में पड़ती है। आसमान छूती महंगाई ने निम्न मध्यवर्ग और उससे नीचे के तबके के लोगों का जीवन मुहाल कर रखा है। यह कैसी अर्थव्यवस्था है कि जहाँ बच्चों को अभी भी पढ़ाया जाता है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और लगभग 70% भारतवासी गाँवों में रहते हैं और कृषि पर आधारित होने के बावजूद भारतवासियों को ही खाने के लिये फल नहीं हैं, दालें नहीं है, गेहूँ और चावल भी नखरे दिखाने लगे हैं, और सब्जियों का तो पूछना ही क्या।

वक्त ऐसा आता जा रहा है जब सब्जियों के स्वाद के कृत्रिम रुप से बने फ्लेवर्स बाजार में मिलेंगे और लोग पानी में एक चम्मच फ्लेवर डालकर ही किसी सब्जी विशेष का स्वाद ले लिया करेंगे। ऐसा क्यों है कि भारत में पैदा हुये उत्कृष्ट खाद्य उत्पाद विकसित पश्चिमी देशों में देखे जा सकते हैं, खाये जा सकते हैं पर भारत वासी, जिनके देश की मिट्टी, पानी और मेहनत इन उत्पादों को उगाने में लगी है, इन अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पादों से वंचित हो रहे हैं? अच्छा बासमती, अच्छा दशहरी, बढ़िया लीची और रसीला सेव आदि इत्यादि खाने के लिये अब भारतवासी के पास खुद का फार्महाउस होना चाहिये जहाँ वह खुद के लिये इन सब चीजों को उगा सके और इन्हे खाने का आनंद उठा सके।

किस तरह का भ्रष्टाचर ऐसी कुव्यवस्था वाले अर्थतंत्र को जन्म दे रहा है। कुछ साल पहले ऐसी सोच विकसित हुयी थी कि संघर्ष करके ऊपर आये लोग नेता बनने पर पहले अपनी दरिद्रता दूर करने की इंतजाम करते हैं और शायद पहले से धनी नेता भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा पायेंगे और आधुनिक ग्लोबल अर्थतंत्र से परिचित धनकुबेर ज्यादा तेजी से और ज्यादा अच्छे ढ़ंग से देश के आर्थिक हाल को सुधारेंगे परन्तु यह बुलबुला भी फूट चुका है और ये धनी नेता तो आम आदमी की कल्पना से बड़े स्तर के भ्रष्टाचार में लिप्त पाये गये हैं और अर्थतंत्र की जटिलताओं की वजह से आम जनता इन बातों को या तो समझ नहीं पाती या उतना ही समझ पाती है जितना एक खास फिल्टर से छानकर उस तक मीडिया पहुँचाता है।

देश का दुर्भाग्य ही समझा जायेगा इसे कि देश में मैनेजमेंट पढ़ाने वाले संस्थान भी ऐसी शिक्षा पद्यति विकसित नहीं कर पाये हैं जहाँ भविष्य में देश के अर्थतंत्र की बागडोर सम्भालने जा रहे युवा कुछ ऐसा सीखकर जायें जो देश के सब लोगों की भलाई कर सके, पढ़ाई पूरी करके वे उसी उपभोक्तावादी अर्थतंत्र की व्यवस्था चलाने में अपनी ऊर्जा लगाते रहते हैं जो मूलतः मुनाफे, कैसे भी और किसी भी कीमत पर किसी भी रास्ते से, की अवधरणा पर ही टिकी है।

सखी सैयां तो खूब ही कमात हैं, महंगाई डायन खाए जात है” ऐसा गीत है जो भारत के न केवल वर्तमान बल्कि भूत और भविष्य के समय पर भी सटीक बैठता है। इसे भारत के लिये एक विडम्बना वाली बात ही कहा जायेगा कि जीवन को झझकोरने वाले मुद्दों पर भी भारत के गरीब लोग अपने जीवन के सबसे ज्वलंत मुद्दे को भी ऐसे हास्य की चाशनी में लपेट कर प्रस्तुत कर सकते हैं। ऐसी अपेक्षा तो बहुत बड़ी होगी कि भारत के भ्रष्ट और बेशर्म नेताओं को ऐसे गाने को सुनकर शर्म आयेगी और उनमें एक चेतना का बीज पनपेगा परन्तु यह और ऐसे गीत जनता को कुछ राहत जरुर दे सकते हैं और लोग इस हास्य के माध्यम से अपनी कुंठाओं को बाहर निकाल सकते है और आगे संघर्ष करने और जिंदा रहने के लिये शक्ति जुटा सकते हैं।

ऐसे गीत रचना फिल्मों में बरसों से गीत लिख रहे गीतकारों के लिये मुश्किल हो सकता है क्योंकि उनका भी आम जनता से वह टच तो खत्म हो ही जाता है जो उस समय था जब वे किसी छोटे शहर या कस्बे में बचपन गुजार कर संघर्षपूर्ण जीवन व्यतीत करके फिल्मी दुनिया में संघर्ष करने पहुँचे थे। ऐसा गीत करोड़ों आम लोगों के जीवन की समस्याओं से रोजाना दो चार होते लोग ही रच सकते हैं। मध्यप्रदेश में रहने वाले श्री गयाप्रसाद प्रजापति, जो कि व्यवसाय से एक माध्यमिक स्कूल में शिक्षक हैं, ने दावा किया है कि उन्होने इस गीत को रचा और वे इसे अपने मंडली के साथियों के साथ गाते रहे हैं। आमिर खान द्वारा “पीपली लाइव” में इस गीत को लिये जाने से इसे बहुत शीघ्रता से देशव्यापी ख्याति मिल गयी है।

सारे राजनीतिक दल इस गीत को केन्द्रीय सरकार, चाहे वह किसी भी दल की सरकार क्यों न हो, के खिलाफ उपयोग करने में बहुत उत्सुक रहेंगे। इस गीत में वह क्षमता है कि यह पीपली लाइव का बॉक्स ऑफिस पर प्रदर्शन सुधार सकता है। महंगाई की खिलाफत कर रहे किसी भी प्रदर्शन के लिये तो यह राष्ट्रीय गीत से कम दर्जे का नहीं ही रहेगा।

हो सकता है कि विलक्षण अभिनेता रघुबीर यादव की गायन क्षमता के बारे में बहुत सारे लोग पहली बार जानें पर जो लोग उन्हे मैसी साहब के जमाने से देख सुन रहे हैं उन्हे पता है कि उनके अंदर कैसी संगीत प्रतिभा छुपी हुयी है। दिल्ली ६ के ससुराल गैंदा फूल के फिल्मी संस्करण के विकास में भी उनकी भूमिका थी।

इस गीत में भी “तीसरी कसम” के अमर समूह गीत “चलत मुसाफिर मोह लिया रे” जैसा आकर्षण है। इसमें लय है और नृत्य इस गीत की संगीत रचना में छिपा है। गीत के दोनों, साधारण और रिमिक्स, संस्करण अच्छे हैं पर बहुत ही अच्छा होता कि अगर रिमिक्स के स्थान पर इस गीत का स्त्री संस्करण फिल्म में होता क्योंकि गीत के बोल स्त्रियों के समूह गीत के रुप में लिखे गये हैं।

कम ही फिल्में आजकल देश की वास्तविक समस्याओं पर बन रही हैं और ऐसे में एक समसामायिक विषय पर फिल्म बनाने के लिये आमिर खान और अनुषा रिज़वी प्रशंसा के पात्र हैं।

…[राकेश]

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