Manjhiअपने ‘मैं’ को खोकर जिसे पाते

वह सौगात

‘प्रेम’ की!

प्रेम में पहले दूसरा स्वयं से महत्वपूर्ण हो जाता है फिर दोनों के ‘मैं’ कुछ समय के लिए एक हो जाते हैं और एक समय आता है जब व्यक्ति को उस ‘प्रेम’ से प्यार हो जाता है जिसे वह अपने प्रियतम के प्रति महसूस करता है| तब प्रियतम से बड़ा उसके प्रति प्रेम हो जाता है|

दशरथ मांझी (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) इस फिल्म मांझी- द माउंटेन मैन, में उस अवस्था को पहुँच गया है, जहां उसे अपनी पत्नी फगुनिया (राधिका आप्टे) से हुए प्रेम से इस कदर अटूट प्रेम हो जाता है कि वह धरती के उस दुर्गम ग्रामीण अंचल, जो कि बड़ी-बड़ी चट्टानों से बनी पथरीली पहाड़ियों से घिरा है, के भूखंड को, फगुनिया के पहाड़ से गिरा कर घायल होकर मरने से, फगुनिया का समाधिस्थल मान कर तब भी वहाँ से नहीं हटता जब सारा गाँव अकाल के कारण किसी दूसरी जगह चला जाता है| फगुनिया की भौतिक अनुपस्थिति भी दशरथ के लिए बाधक नहीं बनती और उस जगह के चप्पे चप्पे पर उसे फगुनिया के अपने साथ होने का एहसास रहता है| उसके अपने बच्चे भी उसकी साधना में बाधक नहीं हैं| अगर ऊँचे पहाड़ न होते उसके गाँव आने के रास्ते में तो फगुनिया जिंदा रहती, और अगर रास्ता होता तो वह समय से उसे अस्पताल पहुंचा सकता था|

मोहनदास करमचंद गांधी को दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों ने अपमानित करके टिकट होने के बावजूद जबरदस्ती फर्स्ट क्लास की बोगी से निकाल दिया और रेल के डिब्बे से नीचे रेलवे प्लेटफार्म पर ढकेल दिया| अपमानित गांधी के मानस में ऐसी सघन पीड़ा और उससे ऐसी उर्जा उत्पन्न हुयी कि फिर उसके बाद ब्रिटिश साम्राज्य कम से कम उस जगह चैन की साँस नहीं ले सका जहां गांधी या तो स्वयं उपस्थित थे या वह उनसे प्रभावित क्षेत्र था| गांधी ने उन अंग्रेजों से बदला लेने के लिए पिस्तौल नहीं उठा ली जिन्होने उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अपमानित किया था बल्कि उन्होंने उस अहंकार के मूल, अंग्रेजी साम्राज्य पर निशाना साधा जिससे भारतीय उनके दास न बने रहें, बल्कि स्वतंत्र देश के स्वतंत्र नागरिक बन कर राजनीतिक और सामजिक रूप से अपना जीवन अपने तरीके से जियें|

ऐसे ही व्यक्तिगत हित से उपजे जनहित के विचार की खातिर कभी भगीरथ पहाड़ों में ही फंसी गंगा को मैदानी इलाकों में उतार कर लाये|

फरहाद ने राजकुमारी शीरी के प्रति उपजे प्रेम की खातिर चट्टानों में नहर बनाने का असंभव कार्य हाथ में ले लिया, परन्तु उसके सामने भी आशा का एक ज्योति पुंज जल रहा था अकी अगर वह नहर बनाकर उसमें पानी बहा सकता है तो राजा अपनी पुत्री शीरी का विवाह उसके साथ कर देगा|

पर दशरथ मांझी तो अपने प्रेम के स्रोत, अपनी प्रियतमा, अपनी पत्नी का भौतिक साथ खोने के बाद संकल्प करता है पहाड़ों को तोड़, चट्टानों को काट कर, पत्थरों को चकनाचूर करके रास्ता बनाने का जिससे कभी किसी और के प्रियजनों को अस्पताल ले जाने में देरी न हो|

अगर शाहजहां ने वास्तव में अपने बेगम मुमताज की यद् में ताजमहल बनवाया तो भी उस खूबसूरत इमारत को उसकी परिकल्पना करने वाले कलाकार और हजारों मजदूरों ने बीस साल की मेहनत लगा कर बनाया| पर दशरथ मांझी ने तो बाईस साल अकेले ही काम किया और पहाड़ तोड़ रास्ता बनाया| फगुनिया से अपने प्रेम के शुरुआती दिनों में दशरथ फगुनिया को ताजमहल की अनुकृति उपहार में देता है जो घर से दशरथ के साथ भागते हुए भी वह अपने साथ लेकर भागती है|

दशरथ दवारा बनाया हुआ रास्ता फगुनिया से प्रेम की याद में बनाया ताजमहल ही है, जो वह अकेले अपने बलबूते गढता है और मेहनत के हिसाब से और इसकी उपयोगिता के हिसाब से इसकी महत्ता खूबसूरती के प्रतीक ताजमहल से ज्यादा ही बैठती है|

इस असंभव काम, जिसकी खातिर सब लोग उसे पागल समझते हैं, को करते हुए उसके अंदर फगुनिया के सदा उसके साथ होने का एहसास कायम रहता है| दुखी आत्मा विध्वंसकारी हो जाती है, फगुनिया के देहांत से उसका दिल भी जला हुआ है और पहाड़ के प्रति नफरत और गुस्से से उसका दिल फफक रहा है और उसी गुस्से में वह पहाड को चुनौती देता है कि वह उसके घमंड को तोड़ कर दिखायेगा| दशरथ के वचन खोखली कुंठा के परिणामस्वरूप नहीं निकले हैं बल्कि प्रियतम का भौतिक साथ खोने से उपजी ऋणात्मक ऊर्जा को वह देह-तोड़ काम में निवेशित करने अगली सुबह जब एक रस्सी, एक सब्बल, एक छैनी और एक हथौड़े के साथ वह पहाड़ की ओर कूच कर जाता और वहाँ पहुँच कर पहाड़ को शीश नवा कर एक मुस्कान के साथ काम का श्रीगणेश करते हुए एक पत्थर पर हथौड़े की पहली चोट करता है| वहाँ से अपने पशु के साथ गुजर रहा व्यक्ति उसका मंतव्य जानकर कहता है वह पागल है और यहीं मर जायेगा|

दशरथ के पिता सहित गाँव के हर व्यक्ति के लिए दशरथ पागल है| पर ऐसे काम जुनूनी दिमाग वाले व्यक्ति ही करने का स्वप्न देख सकते हैं, काम करने की ओर कदम उठा सकते हैं| सामान्य दिमाग वाला आदमी ऐसा काम हाथ में नहीं ले सकता|

पहाड़ तोडना दशरथ का यज्ञ है, उसकी तपस्या है, उसकी साधना है और उसका ध्यान है| इस कठिनतम कार्य को अकेले ही करते हुए, लोगों का उपहास और उनके ताने झेलते हुए उसके मन का बाहरी जगत से हट कर अपने अंदर ही रम जाना स्वाभाविक है भले ही लोगों के लिए वह सनकी हो पर इस नितांत अकेलेपन के श्रमसाध्य काम ने न केवल उसके मन की विचलन को हटाया होगा बल्कि उसे एक ऐसी अति-साधारण समझदारी दी होगी जो तपस्वियों के पास मिल सकती है और जो भले ही दुनियावी मामलों में अटपटी हो और एकदम अनुतीर्ण हो जाए पर जो मूल बातों में एक सटीक समाधान लेकर आती है| उसी परिवेश में रह रहे अन्य लोगों की तरह उसके मन में जातिवादी और वर्गवादी शोषण के कारण घृणा नहीं पलती| नक्सली बन गये अपने एक साथी (प्रशांत नारायण) को वह मुखिया (तिग्मांशु धूलिया) से व्यक्तिगत बदला लेने से रोकता है और सही कायदे की बात करता है|

पहाड़ तोड़ते वक्त उसके पास कई मर्तबा आने वाले पत्रकार आलोक के विवशता का रोना रोने पर कि अखबार में कोई स्वतंत्रता नहीं और अखबार का मालिक बिक चुका है और समझौते करता है, सच को छापने नहीं देता, दशरथ उससे कहता है,’अपना अखबार क्यों नहीं निकालते|’

आलोक के यह कहने पर कि अपना खुद का अखबार निकालना बहुत कठिन काम है, दशरथ उसे एक पंक्ति बोल कर निरुत्तर कर देता है,

’ क्या पहाड़ तोड़ने से भी ज्यादा मुश्किल है|’

एक अन्य मौके पर दशरथ एक अन्य चरित्र को कहता है,

’ भगवान के भरोसे मत बैठो क्या पता वो हमारे भरोसे बैठा हो|’

ऐसी दो टूक समझ शांत हो चुके और हर दुनियावी बात से स्वतंत्र हो चुके दिमाग की ही हो सकती है|

फिल्म में दशरथ का चरित्र एक आर्क लिए हुए है| बचपन में जहां दशरथ विद्रोही और उस बात को करने वाला है जो उसे अच्छा लगता है और इसलिए अपने पिता के कहने और मुखिया को वचन देने के बावजूद वह मुखिया का बंधुआ मजदूर बनना अस्वीकार कर देता है और घर से भाग जाता है, परन्तु जब सात साल बाद बड़ा होकर कोयला खान में कुछ साल काम करने के बाद वह अपने गाँव लौटता है तो फिल्म अब उसे एक विदूषक के रूप में दिखाती है| हास्य बिखेरने के बावजूद ये दृश्य फ़िल्मी लगते हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि दशरथ और फगुनिया के प्रेम के शुरुआती भाग की प्रेरणा फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी – ‘पंचलाईट’ से ली गई है|

दशरथ का चरित्र परवान चढ़ता है फगुनिया के आकस्मिक देहांत के बाद|

जब निराशाएं चारों तरह से घेर लेती हैं

और कुछ भी ऐसा नहीं हो पाता

जो सहायता कर सके

तब मैं जाता हूँ उस पत्थर तोड़ने वाले को देखने,

जो कि तन्मयता से चट्टान पर हथौड़े की चोट कर रहा होता है,

कभी कभी सौ बार हथौड़ा मारने के बाद भी चट्टान में

एक दरार तक पड़ती दिखाई नहीं देती,

लेकिन हथौड़े की एक सौ एक वीं चोट चट्टान के सीने को दो भागों में तोड़ देती है,

मुझे पता है कि इस अंतिम चोट ने ही चट्टान को नहीं तोड़ा है,

बल्कि उससे पहले की उन तमाम चोटों की भी इसमें पूरी पूरी भागीदारी रही है|

Jacob A. Riis की उपरोक्त कविता कविता के दोनों पात्रों समेत दशरथ मांझी पर सटीक बैठती है| बाईस सालों में ऐसे दौर अवश्य आयेंगें जब निराशाओं ने दशरथ को घेरा होगा, तब उनके सामने फगुनिया, उसका प्रेम, उसके प्रति प्रेम, अपनी ही पहाड़ तोडती छवि सामने आई होगे जिसने संबल प्रदान किया होगा कि फिर सवेरा हुया है नया दिन उगा है, फिर लक्ष्य पूर्ति के प्रयास में लगना है| पहाड़ तोड़ने की हिम्मत और मेहनत दशरथ की अपनी है और उसकी उर्जा है उसका प्रेम| तभी वह हुंकार भरा करता है – जब तक तोड़ेंगे नहीं तब तक छोड़ेंगे नहीं!

उसकी हिम्मत को कुछ समय के लिए तोडता है भ्रष्टाचार, और घटिया लोग जो उसकी मेहनत पर भी अपनी दुकान सजा लेटे हैं और भ्रष्ट और असंवेदनशील तंत्र जो उसे दिल्ली से बैरंग लौटा देते हैं|

दशरथ द्वारा पहाड तोड़ कर रास्ता बनाने के काम में भ्रष्टाचारियों दवारा डाली गई बाधाओं को देख दर्शक का अपने देश भारत के सरकारी तंत्र और यहाँ की सारी व्यवस्था के घटियापन पर शर्म महसूस करना स्वाभाविक है|

यह फिल्म नवाजुद्दीन सिद्दीकी की है, उनके ही मजबूत अभिनय पर टिकी हुयी है| उन्होंने दशरथ मांझी के अंदर के जुनूनी आशिक, उसके प्रेम, उसके दुख, उसकी कुंठा, उसके गुस्से, उसके शारीरिक और मानसिक बल, उसके शक्तिशाली धैर्य, उसकी धुन, उसकी सीधी-सादी बिना लाग लपेट वाली बुद्धि, उसकी साधुता, उसके अति-जुड़ाव, उसकी विरक्ति, उसके पागलपन, उसकी विवशता, उसकी कमजोरियों, और उसकी बेइंतहा जिजिविषा को इस खूबसूरती से परदे पर उतार दिया है कि उनकी फिल्म में उपस्थिति चीख चीख कर दावे कर रही है कि वे देश के ही नहीं वरन दुनिया के उन चंद अभिनेताओं में शामिल हैं जिनके ऊपर पूरी फिल्म केंद्रित की जा सकती है और जिन्हें एक-डेढ़-दो-तीन घंटे तक दर्शक पूरी तन्मयता से परदे पर निहार सकते हैं| ऐसी योग्यता बहुत अभिनेताओं में नहीं होती हालांकि वे बड़े स्टार हो सकते हैं पर तब उनके लिये फार्मूले की तरह कथाएं और पटकथाएं इस अंदाज में इकट्ठी की जाती हैं कि जो कम वे आसानी से कर सकते हैं वही फिल्म में रखा जाए| स्टार कठिन भूमिकाएं नहीं निभाया करते, अगर कोशिश करते हैं और उतनी योग्यता नहीं होती तो वे औंधे मुँह गिरते हैं और इसलिए कम से कम हिंदी सिने उधोग को तो बंदी बना कर रखा गया है स्टार सिस्टम में और गाहे बेगाहे ही कोई कायदे का अभिनेता अच्छे किरदार वाली फिल्म पा जाता है, जिसे बनाने का पैसा भी मिल जाता है और फिल्म प्रदर्शित भी हो जाती है| दशरथ मांझी के किरदार पर फिल्म बनी देखना सुखद है और यह दर्शकों को पसंद आ रही है और ऐसा बिरला ही होगा जिसे यह पसंद न आए, इस बात से नई आशा के द्वार भी खुलते हैं कि ऐसी फ़िल्में बन सकती हैं और चल सकती हैं|

नवाजुद्दीन को अभी तक सहायक भूमिकाएं ही मिलती रही हैं (गैंग्स ऑफ वासेपुर भाग दो को छोड़ दें तो) पर मांझी फिल्म से वे सिद्ध रूप में नायक बन गये हैं हिंदी फिल्मों के इतिहास में| किसी भी किरदार के रूप में एकदम ईमानदार अभिनय करने की उनकी योग्यता सराहनीय है| उनके ईमानदार अभिनय की झलक ब्लैक फ्राइडे में ही मिल गई थी, जहां यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि उस फिल्म में बड़ी भूमिकाओं वाले अभिनेताओं से ज्यादा वास्तविक उस छोटी सी भूमिका में उनका अभिनय प्रदर्शन था|

पहाड़ तोड़ने के काम में अनवरत लगे दशरथ को जब मुखिया के बेटे और सरकारी अधिकारी दवारा प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दवारा उसके काम के लिए दिए गये बीस लाख रूपये गबन किये जाने का पता चलता है और दिल्ली के लिए निकल पड़ता है प्रधानमंत्री से मिलने के लिए तो वह यात्रा उसके जीवन के अनुभवों, उसकी न्यूनतम जरूरतों और हर स्थिति में काम चला लेने की योग्यता को दर्शाने की एक बेहतरीन यात्रा बन जाती है| रेलवे का टिकट चैकर जब उसे रेल से उतार फेंकता है तो वह पैदल ही दिल्ली चल देता है| और दिल्ली में लोग उसके साथ उसके पीछे चलने लगते हैं| यह दृश्य Tom Hanks की प्रसिद्द फिल्म Forest Gump की याद दिलाता है जिसमें वह तो अपने आनंद के लिए दौड़ता है बाकी उसके साथ और उसके पीछे दौड़ने लगते हैं यह सोचकर कि वह किसी उद्देश्य के लिए दौड़ रहा है|

बोरी को चोगे के तरह पहन कर पैदल चलता दशरथ न केवल ‘पथ का दावेदार’ लगता है बल्कि सिर पर कागज़ की टोपी पहनने से फ़कीर बादशाह लगता है, जिसका वैभव और सौंदर्य अनूठा है|

दशरथ के चरित्र की इस यात्रा को पूर्ण विश्वास और बेहतरीन कलाकारी के साथ निभाते नवाजुद्दीन को देख ऐसी संभावनाएं दिखाई देती हैं कि वे परदे पर विभिन्न ऐतिहासिक चरित्रों, संन्यासियों के चरित्रों, सड़क पर बसर करने वाले विभिन्न किस्म के रोचक किरदारों को इस कदर जीवंत कर सकते हैं कि इतिहास रच दें|

मिर्च मसाला के बाद इस फिल्म में केतन मेहता फिर से गाँव की ओर गये हैं और फिर से फिल्म पर अपनी पकड़ दिखाई है|

फिल्म के बहाव के साथ राजनीतिक – सामजिक बदलावों को उन्होंने बखूबी तैरा दिया है|

कुछ बातों को छोड़ दिया जाए तो यह फिल्म उनके दवारा रचा गया रोचक प्रयास है|

जिस तरह के आधुनिक हैंडपंप को फिल्म के शुरू में दिखाया गया है वैसे हैंडपंप हद से हद अस्सी के दशक के अंत से भारत में लगने शुरू हुए और उन्हें पचास के दशक के अंत में या साठ के दशक के शुरू में दिखाना चूक है| हो सकता है बजट की सीमा की वजह से ये सब वास्तविकताएं फिल्म में लाने में दिक्कतें थीं और इसलिए जो सुविधा मिल पाई उन्ही से फिल्म बना दी गई| इस जैसी अन्य कमियों को दरकिनार कर दिया जाता तो फिल्म और ज्यादा असरदार और वास्तविकता के और नजदीक लगती|

बिहार के जिस अंचल की यह गाथा है वहाँ की बोली जानने वालों को राधिका आप्टे और नवाजुद्दीन के आंचलिक भाषा बोलने के उच्चारण में दोष दिखाई दे सकता है क्योंकि कई मौकों पर साफ़ प्रतीत हो जाता है कि वे बहुत प्रयास करके इतना आंचलिक असर ला पाए हैं|

फिल्म में सबसे बड़ी खलने वाली बात है फगुनिया (राधिका आप्टे) के चरित्र को प्रस्तुत करने का तरीका| राधिका आपटे की फिल्म में उपस्थिति में अनियमितता है| वे कभी ग्रामीण आँचल की लगती हैं और कभी आधुनिक मेकअप आदि से परिचित अभिनेत्री| विगत कुछ समय में राधिका आप्टे शारीरिक प्रदर्शन को लेकर चर्चा में रही हैं और इस फिल्म में भी उनके शरीर पर कैमरा जरुरत से ज्यादा फोकस करता है| और हालत ऐसी हो जाती है कि दशरथ के कथनानुसार उसका फगुनिया से प्रेम बहुत गहरा है पर फगुनिया के जीवित रहने तक फिल्म स्थापित यही कर पाती है कि यह दैहिक ज्यादा है|

बल्कि फगुनिया के चरित्र के अनायास देहांत के बाद ही जब परदे पर दशरथ का चरित्र अकेला रह जाता है तब नवाजुद्दीन के अपने प्रदर्शन में भी गहराई आ जाती हैं क्योंकि अब सब कुछ उनके कन्धों पर है और उन्हें अकेले ही फिल्म में अभिनय के स्तर को ऊँचा बनाए रखना है|

अकेले पड़ जाने के बावजूद दशरथ का फगुनिया से प्रेम कम नहीं होता और वह हमेशा फगुनिया के अपने साथ होने की ऊष्मा को महसूस करता है जिस तरह से दशरथ ने फगुनिया के देहांत के बाद दर्शाया है कि उसका कितना गहरा और रूहानी रिश्ता फगुनिया के साथ है, वैसा रिश्ता फिल्म तब स्थापित नहीं कर पाती दशरथ और फगुनिया के मध्य जब फगुनिया जीवित थी|

इस कोण को फिल्म कायदे से प्रदर्शित कर पाती तो फिल्म में और गहराई आ जाती|

…[राकेश]

 

 

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