bavarchiसन 1972 से पहले ही भारत में हिंदी फिल्म उधोग के सुपर स्टार के रूप में राजेश खन्ना की अनूठी सफलता की चमक हिंदी सिनेमा के संसार को चुंधियाने लगी थी| आराधना के बाद राजेश खन्ना की लगभग हर फिल्म सुपर हिट रही और उनका नाम हिंदी फिल्म जगत के सबसे ज्यादा सफल सितारे का पर्याय बन गया था| | इतने बड़े और सफल सितारे को, जिसकी छवि एक रोमांटिक नायक की हो, एक बावर्ची कम घरेलु सहायक के ग्लैमरहीन और गैर-रोमांटिक रूप में दिखाना कम साहस का काम नहीं| यह साहस हृषिकेश मुकर्जी ने तो किया ही पर उनसे बड़ा दुस्साहस स्वयं राजेश खन्ना ने यह फिल्म करके दिखाया| उस वक्त राजेश खन्ना रोमांटिक फिल्मों के बेताज बादशाह बन चुके थे और देश भर के युवाओं के दिलों पर राज करते थे| रोमांटिक भूमिकाओं में उनकी खास अदाओं से भरी अदाकारी युवाओं पर फिल्म दर फिल्म कहर बरपा रही थी और युवा दर्शक राजेश खन्ना के सम्मोहन में पूरी तरह से कैद हो चुके थे| ऐसे में एक ऐसी फिल्म करना, जिसमें उनकी भूमिका एक खाना बंनाने वाले, बर्तन धोने वाले और साफ़-सफाई करने वाले घरेलू सहायक की हो और जिसमें पूरी फिल्म में उन्हें एक ही वेशभूषा में (पूरी फिल्म में स्काउट के कैडेट की भांति खाकी कमीज और हॉफ पैंट और सिर पर गांधी टोपी पहने रहकर उन्हें रहना था) रहकर काम करना था और जहां वे अपनी चिर परिचित रोमांटिक अदाएं नहीं दिखा सकते थे, एक सुपर स्टार के लिए हिम्मत की बात तो थी ही|

गौर तलब है कि हृषिकेश मुकर्जी ने निर्देशक तपन सिन्हा दवारा 1966 में बंगाली में बनाई गई फिल्म – Golpo Holeo Sotti, का ही रिमेक हिंदी में ‘बावर्ची’ नाम से बनाया और मूल बंगाली फिल्म में बंगाली अभिनेता रोबी घोष ने नायक की भूमिका निभाई थी| अगर यह बंगाली में उत्तम कुमार को नायक की भूमिका में लेकर बनाई जाती तब भी समझ में आने वाली बात थी कि बंगाली फिल्मों के एक बड़े सितारे की फिल्म को हिंदी में बनाया जा रहा था| राजेश खन्ना ने फिल्म में कटेंट देख कर ही फिल्म करने के लिए हामी भरी होगी और आराधना के बाद के चंद बरसों में उन्होंने बेहतर विषयों वाली फ़िल्में कीं जिन्होने उन्हें सुपर स्टार बनाए रखने के साथ साथ उनको अच्छा अभिनय कर सकने के भरपूर अवसर भी प्रदान किये|

फिल्म का 95% हिस्सा एक साधारण से मकान के भीतर व्यतीत होता है| साधारण सी कथा को साधारण से आम लोगों जैसे चरित्रों के माध्यम से, ग्लैमर से कोसों दूर साधारण तरीके से फिल्मा कर दिखाया गया है और हर बात में यही साधारणता फिल्म को असाधारण रूप से रोचक बनाती है और दर्शक क्षण भर को भी फिल्म से दूर जाने में या फिल्म से ध्यान हटाने में अपने को असमर्थ पाता है|

बावर्ची में बहुत कुछ है – भावनाएं, हास्य, भावुकता,व्यंग्य के बाण, खुली हँसी, आंसू, चिड़ाना, मीठे झूठ, संयुक्त परिवार की जटिलताएं, परिवार के सदस्यों के मध्य पनपी गलतफहमियां, मद्यपान जैसी बुराई, पीढ़ियों का अंतर, घर के अनाथ सदस्य के प्रति भेदभाव, और घरेलू सहायक के इर्दगिर्द छाया रहस्य का वातावरण! 43 साल के लंबे अरसे के बाद भी फिल्म न केवल जीवित है बल्कि आज भी दर्शकों को बांधती है अतः इसे क्लासिक का दर्जा देना तो एक सहज बात है| यह काल खंड से ऊपर उठ चुकी फिल्म है|

बावर्ची हिंदी सिनेमा के उन निर्देशकों के लिए एक मास्टर क्लास का भी कार्य करती है जो निम्न-मध्यवर्गीय चरित्रों को लेकर बनाई गई फिल्म में भी भव्यता पर करोड़ों खर्च कर देते हैं और फिल्म की आत्मा को मारकर शरीर को महंगे वस्त्रों में प्रस्तुत करके फिल्म की ऐसी तैसी कर देते हैं|

फिल्म की आत्मा कायदे से गुरुदेव टैगोर के एक कथन में वास करती है जिसे फिल्म का नायक रघु (राजेश खन्ना) एक चरित्र से कहता भी है – ‘It is very simple to be happy, but it is very difficult to be simple.’

bavarchi1बावर्ची की कथा कुछ इस प्रकार है – किसी शहर में एक मकान है – शान्ति निवास, जहां वृद्ध शिव नाथ शर्मा (Harindranath Chattopadhyay) अपने तीन बेटों, दो बहुओं, दो पोतियों एवं एक पोते के संग रहते हैं| घर का नाम बस नाम को ही शांति-निवास है क्योंकि हरदम तो वहाँ अशांति का ही वास रहता है| घर के सभी सदस्यों की आदतें एक दूसरे से इतनी अलग अलग हैं और वे अपने आप कोई काम नहीं करना चाहते और उनकी चिल्ल पों के कारण ही कोई भी नौकर एवं बावर्ची उनके यहाँ महीने भर भी नहीं टिक पाता| अगर घर में शिवनाथ शर्मा के एक दिवंगत बेटे की बेटी कृष्णा (जया भादुड़ी) न हो तो घर में किसी को बेड ती तो छोड़ दीजिए, नाश्ता और खाना तक न मिले| बिना अमां-बाप के लड़की कृष्णा ही ऐसी है जो अपनी पढ़ाई के साथ साथ बाकी घरवालों की खिदमत में लगी रहती है| सिर्फ दादा शिव नाथ को ही कृष्णा की भावनाओं की परवाह है और कृष्णा के ताऊ, ताईयां और चाचा और चचेरी बहन के लिए उसके प्रयासों का कोई मोल नहीं| बावर्ची और घरेलू सहायक की अनुपस्थिति में शांति निवास में सुबह से ही घर के सदस्यों में झगड़े होने प्रारम्भ हो जाते हैं और जब तक शिव नाथ अपने कमरे एन अपने बिस्तर पर बैठे बैठे चिल्ला कर सबको शांत नहीं कराटे तब तक घर मछली बाजारा जैसा अशांत बना रहता है| बावर्ची के बिना बूढ़े शिवनाथ को अपने खाने के लिए भी चिल्ला कर बताना पड़ता है कि घंटों की देरी हो गई है, पर उनकी बहुएं अपना अपना रोना लेकर बैठ जाती हैं| शिवनाथ के दोनों बेटे, बड़ा रामनाथ शर्मा (A.K.Hangal) और छोटा काशीनाथ शर्मा (Kali Banerjee), दोनों अपने अपने दफ्तर देरी से पहुंचा करते हैं और अपने अधिकारियों से डाट खाया करते हैं| रामनाथ एक प्राइवेट कम्पनी में हेड क्लर्क हैं और काशीनाथ स्कूल में पढ़ाते हैं| रामनाथ को शाम को शराब पीने की आदत है और वे शाम को दफ्तर से लौटते हुए सब्जी लाना तो भूल जाते हैं पर शराब की बोतल लाना कभी नहीं भूलते| शराब के मुददे पर रामनाथ और काशीनाथ में अक्सर झगडा होता है क्योंकि काशी को लगता है कि उनका बेटा, अपने ताऊ को शराब पीते देख बिगड सकता है| रामनाथ की पत्नी है सीता (Durga Khote) और काशी की पत्नी है शोभा (Usha Kiran)| सीता और शोभा के मध्य भी दरार चौड़ी हो चुकी है और दोनों एक दूसरे को नापसंद करने के दौर से गुजर रही हैं| शिवनाथ का तीसरा बेटा है अविवाहित विश्वनाथ शर्मा (Asrani), जो कि फिल्मों में संगीतकार बनने की फिराक में है और जहां बाकी घर के सदस्य उसे व्यर्थ का आदमी समझते हैं अपने स्वयं के बारे में उसके विचार बेहद उच्च हैं और वह अपने आप को बहुत बड़ा संगीतकार मानता है और घर के किसी भी काम करने को वह समय और उर्जा का अपव्यय मानता है और दिन भर पश्चिमी गीतों की नक़ल अपने टेप पर रिकार्ड किया करता है|

रामनाथ की बेटी कालेज में पढ़ती है और उसे घर के कामकाज में कतई कोई रूचि नहीं है, कालेज से आकर वह नृत्य का अभ्यास करती है और शाम को उसके गुरु (Paintal) उसे नृत्य सिखाने घर पर ही आते हैं|

तो ऐसे माहौल में एक सुबह जबकि शांति निवास के बाशिंदे सोकर भी नहीं उठे हैं, घर की घंटी बजती है, और कृष्णा के दरवाजा खोलने पर पता चलता है कि नया बावर्ची आया है| नया बावर्ची इस घर के लोगों के लिए ईश्वरीय वरदान से कम नहीं और सारा घर बावर्ची को देखने के लिए जैसे उस पर टूट पड़ता है| और तब तो इस घर के सदस्यों के आश्चर्य का कोई ठिकाना हे नहीं रहता जब नया बावर्ची – रघु, उनसे पहले बावर्ची को दिए जाने वाले वेतन से काफी कम वेतन की मांग यह कह कर करता है, कि मंहगाई के दौर में ज्यादा वेतन देने से ऐसे बड़े परिवार का काम कैसे चलेगा?

परिवार के सदस्यों को अपनी मीठी बातों से लुभाते हुए रघु की निगाहें वृद्ध शिवनाथ के बिस्तर के नीचे रखे लोहे के संदूक पर जा ठहरती है, जिस पर एक बड़ा सा ताला लगा है|

रघु घर के सभी सदस्यों को केवल बेहद स्वादिष्ट खाना समय पर खिलाकर ही उनके दिल नहीं जीतता बल्कि वह घर के हरेक सदस्य के निजी गुण को उदघृत करके उसकी कमियों की आलोचना न करके उसका विश्वास जीतता है और घर के सदस्यों के बिखरते हुए आपसी संबंधों में भी मिठास भरता है, उन्हें एक दूसरे के नजदीक लाता है, इसमें उसे छोटे छोटे झूठ भी बोलने पड़ते हैं| बावर्ची दर्शाती है कि नेक काम के लिए बोले गये छोटे स्तर के झूठ से कोई हर्जा नहीं होता| बावर्ची मीठा बोलने, नैतिकता और पारिवारिक मूल्यों की बात करती है|

जब लगता है कि शांति-निवास वाकई स्वर्ग जैसा घर हो गया है जहां सुख-शांति का वास स्थायी रूप से हो गया है, तभी कृष्णा के जीवन में एक हलचल उठती है और उसकी स्थिति घर में सबसे नाजुक है यह बात और ज्यादा स्पष्ट हो जाती है| रघु इस मामले को भी संभालता है, पर अगली सुबह जब घर के सदस्य देर से सोकर उठते हैं तो यह जानकर घर में भूचाल आ जाता है कि उनके दिलों को लूटने वाला बावर्ची – रघु गायब है, और वह अकेला गायब नहीं है बल्कि शिवनाथ के कमरे से लोहे के बक्से से जेवरात भी गायब हैं|

अब घर के लोग उल्टी गणना करते हैं कि रघु वास्तव में चोरी के इरादे से ही उनके घर में बावर्ची बन कर आया था वरना ऐसा गुणी आदमी जो खाना बनाना जानता हो, जिसका हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, बांग्ला, मराठी और अनेक भाषाओं पर अधिकार हो, जो शास्त्रीय संगीत और नृत्य में भी पारंगत हो, जो गणित का अच्छा ज्ञान रखता हो, जो मानवीय प्रबंधन में इतना कुशल हो, जो मनुष्य के मनोविज्ञान को इतनी गहराई से समझता हो, वह केवल एक बावर्ची कैसे हो सकता है| घर के सभी सदस्य जो रघु के आने से पहले एक दूसरे को पसंद नहीं करते थे, इस एक बात पर एकमत हो जाते हैं कि रघु ठग था, यहाँ तक कि शिवनाथ, जिनकी सबसे ज्यादा सेवा रघु ने की होगी, भी ऐसे ही विचार के पक्ष में हो जाते हैं| केवल कृष्णा ही ऐसी है जो इस बात को मानने से इंकार करती है कि रघु चोर और ठग हो सकता है|

दर्शक को भी सर्वगुणसम्पन्न रघु के बावर्ची के काम करने पर अब संदेह होने लगता है और उसे भी एकबारगी यही प्रतीत होता है कि रघु एक ठग ही था जो मीठी बातें करके लोगों का भरोसा जीत कर उन्हें ठग कर अपने अगले लक्ष्य की ओर निकल जाता है| लेकिन फिर संदेह उठता है कि इतने गुणों के मालिक रघु को क्या जरुरत है इतनी छोटी चोरियां करने की| अपने किसी भी गुण से वह लाखों कमा सकता है|

सच्चाई क्या है?

हास्य और भावनाओं से भरी इस फिल्म में कलाकारों के उत्कृष्ट अभिनय प्रदर्शन के साथ साथ चुटीले संवादों की भरमार है| गुलज़ार ने हास्य-व्यंग्य और भावनाओं से भरे तीनों किस्म के संवादों में श्रेष्ठता दर्शाई है|

हास्य महीन स्तर पर कातता हुआ दर्शक के समक्ष आता है| एक द्रश्य है जिसमें शिवनाथ के पास उनका बड़ा बेटा रामनाथ आता है| रामनाथ का घर का नाम मुन्ना है जो अपने आप में ही हास्य उत्पन्न करता है क्योंकि रामनाथ नौकरी से अवकाश ग्रहण करने की आयु में हैं|

शिवनाथ – मुन्ना, सालों से कह रहा हूँ, कि सुबह जल्दी उठने की आदत डाल लो|

रामनाथ – कोशिश कर रहा हूँ बाबू जी, पड़ जायेगी आदत|

यह संभवतः पहली फिल्म होगी जिसमें ए.के. हंगल ने हास्य भूमिका को बेहतर ढंग से निभा सकने की काबिलियत प्रदर्शित की|

अमिताभ बच्चन की कमेंटरी से शुरू होने वाली, कैफ़ी आज़मी के गीतों से और मदन मोहन के संगीत से सजी, हृषिकेश मुकर्जी के कुशल निर्देशन में गढी गई यह फिल्म भी राजेश खन्ना की चंद कालजयी फिल्मों में से एक है| नाटकीय अंदाज में और अपने आकर्षक व्यवहार से अपने इर्दगिर्द के लोगों के दिल जीतने वाले की भूमिका में राजेश खन्ना का कोई सानी नहीं| उनकी दो अन्य फ़िल्में आनंद और नमकहराम भी इस कथन के समर्थन में मजबूत गवाही प्रस्तुत करती हैं|

…[राकेश]

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