लघु फ़िल्म “जूस” अच्छे निर्देशन और अच्छे अभिनय से सजी हुई है| घरेलू माहौल में पार्टी के दौरान कमरों के सीमित स्पेस में असरदार तरीके से फ़िल्म को फिल्माया गया है| चरित्रों की क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं को बहुत कुशलता से कैमरा प्रदर्शित करता है और यह इतना बेहतरीन है कि उनके सोच विचार तक उनके चेहरों के हावभावों और आँखों की मार्फ़त दर्शक तक पहुँच जाते हैं| आधुनिक काल की फिल्मों में अक्सर ऐसे सीमित स्पेस में कैमरा अपनी उपस्थिति इस गतिमान तरीके से दर्ज कराता है कि उसका होना कई मर्तबा खटकने लगता है पर यहाँ एकदम निर्बाध तरीके से दृश्य दर्शक के सम्मुख आते रहते हैं|

सामाजिक परिवेश पर निर्भर ऐसी फ़िल्मों में गुणवत्ता बहुत हद तक देश, काल और वातावरण के विश्वसनीय आधार पर टिकी होती है|

पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के मुखर अधिकार कम होते हैं या ऐसे समाज में कदम कदम पर स्त्री के साथ भेदभाव होता है| ऐसा कहना एक ऐसा छाता तान देता है जिसकी छाया में सब एक ही रंग का दिखाई देता है, क्योंकि मानव अंत में एक एकल ईकाई है और ऐसे वातावरण में भी हमेशा से ही ऐसी स्त्रियाँ भी होती आई हैं जो घर के शासन की बागडोर अपने हाथों संभालती आई हैं, पर औसत रूप में पितृसत्तात्मक तंत्र में ऐसा ही माना जाता है और माना जायेगा कि स्त्री के साथ भेदभाव होता है| अब यह सूक्ष्म सामाजिक विश्लेषण का विषय है कि अगर स्त्री का शोषण है तो स्त्री के साथ भेदभाव में तंत्र के साथ स्त्री भी खड़ी रही है और वही अपने से कमजोर स्त्री के साथ भेदभाव न केवल होने देती रही है बल्कि इसमें सक्रिय भूमिका भी निभाती रही है| और अगर मामला विभिन्न आर्थिक वर्ग की स्त्रियों के बीच का है तो धनी स्त्री वैसे ही गरीब स्त्री का शोषण करेगी जैसे एक पुरुष किसी भी वर्ग की स्त्री का| भारत जैसे देश में जहां एक ही समय काल में एक ही जैसे परिवेश में लोग विभिन्न श्रेणी का जीवन जीते हैं वहाँ एक परिभाषा सब कुछ नहीं संभाल पाती| बहुसंख्यक हिंदुओं को ही लें तो अगर किसी जाति के लोग यह शिकायत करते मिलें कि कथित रूप से उनसे ऊँची जाति के लोग उनसे भेदभाव करते हैं तो व्यवहार में उसी काल में इस शिकायती वर्ग के लोग कथित रूप से अपने से निम्न वर्ग की जाति के लोगों के साथ वैसा ही या उससे भी ज्यादा भेदभाव वाला व्यवहार करते दिखाई देते हैं|

जहां यह सच है कि पितृसत्तात्मक तंत्र में एक बड़े स्तर पर औसत स्त्री अगर घरेलू वातावरण को छोड़ बाहर जीवन तलाशती है और तमाम तरह की बंदिशें सहकर वह आगे बढ़ती है तो सहकर्मी पुरुषों के लिए यह विकास उस स्त्री ने अपने स्त्री होने और ज्यादातर मामलों में तो अपने शरीर की बदौलत कमाया होता है, पर इसी भारतीय समाज ने ऐसे ही तंत्र में शक्तिशाली स्त्री जैसे इंदिरा गाँधी, के उत्थान का जलवा भी देखा है| ऐसा नहीं कि उनकी राजनीतिक विकास यात्रा में साथी राजनेताओं ने उन पर चारित्रिक लांछन नहीं लगाए, पर कमोबेश उनके सम्मुख पुरुषों ने सिर झुकाए|

ऐसे पितृसत्तात्मक वातावरण में भी ऐसे पुरुष कम संख्या में नहीं पाए जाते रहे जिनकी अपनी पत्नी के सामने हमेशा ही घिग्घी बंधी रही या ऐसे पुरुष भी कम संख्या में कभी नहीं रहे जो पत्नी से लड़ाई में डरते रहे और वे इस बात से डरते रहे कि कहीं उनकी पत्नी सरेआम उनकी बेइज्जती न कर दे| इन सब किन्तु परन्तु के बावजूद एक मॉडल स्वीकृत सा ही रहा है कि पितृसत्तात्मक दृश्य में स्त्री के मौलिक अधिकार भी कुचले जाते रहे हैं, उनकी भावनाओं के दबने कुचलने की बात तो क्या ही की जाए|

उपरोक्त वर्णित सारे परिदृश्य अपने में कई तरह की रोचक कहानियां समेटे रहते हैं और जाग्रत कलाकार चाहे वे चित्रकार हों, या मूर्तिकार या लेखक, और कवि, या निर्देशक हों, इनमें से किसी भी एक परिदृश्य पर अपनी रचना को केंद्रित कर सकते हैं| भारत जैसे विभिन्नताओं वाले देश में एक ही परिभाषा सब कुछ नहीं संभाल सकती और कहीं न कहीं सीमा रेखाएं खींचनी ही पड़ती हैं कि यह विशेष मॉडल सिर्फ इन्ही सीमाओं के भीतर सच लग सकता है, और सीमाओं से बाहर इसके सिद्धांत प्रभाव में नहीं रहते|

जूस” भी एक सिनेरियो तो लेकर चलती है और देश, काल और वातावरण के वर्गीकरण में जैसा फ़िल्म में दिखाया गया है वैसा वातावरण हमारे देश में उपस्थित रहा है, यह बात सच है, लेकिन काल के मामले में किन्तु परन्तु फ़िल्म के साथ जुड़ सकते हैं| स्मार्टफोन के साथ खेलते बच्चों के युग में फ़िल्म में दिखाया सिनेरियो थोड़ा अटपटा लगता है| यही सिनेरियो बीस साल पहले के परिवेश में पूर्णतया सटीक ठहरता|

स्मार्टफोन के दौर में जहां किरदारों के एक या हद से हद दो बच्चे दिखाए गये हैं वहाँ तीन हमउम्र लड़कों के साथ बैठी एक लड़की से इस घर में मेहमान उसकी माँ का आकर यह कहना,” डॉली, थाली लग गई है, भईया लोगों को खाना खिलाओ| बहुत खेल ली हो तुरंत आओ|” मनचाहा प्रभाव प्राप्त करने के लिए किया गया जबरन प्रयास प्रतीत होता है| एक एक या हद से हद दो बच्चों वाले युग में और वह भी 9-10-11 साल के बच्चों के साथ आजकल के माता पिता ऐसा करेंगे इसके आसार लगभग नगण्य हैं| अपवाद स्वरूप सच मान भी लें तो यह और ऐसी बात अब प्रतिनिधित्व नहीं करती और इस लिहाज से सामाजिक विश्लेषण पर आधारित फ़िल्म की एक कमजोर कड़ी बन जाती है|

अभिनेताओं के अच्छे अभिनय के बावजूद फ़िल्म में दिखाए बच्चों के आयु वर्ग को देखते हुए पहली बार माता-पिता बनने जा रहे किरदारों को निभाने वाले अभिनेताओं को छोड़कर बाकी अन्य अभिनेता ज्यादा उम्रदराज लगते हैं और सटीक चयन की परिभाषा से तनिक बाहरी बन जाते हैं| ये भी मान लिया जाए कि सबकी बड़ी उम्र में शादियाँ हुईं या बच्चे बढ़ी उम्र में हुए तब भी उस उम्र के आधुनिक माता पिता बच्चों के संग अन्य तरीकों से पेश आयेंगें|

इन कमजोरियों को छोड़ दें और फ़िल्म को और इसके प्रस्तुतीकरण को जैसा का तैसा स्वीकार करें तो यह एक रोचक फ़िल्म है, जिसमें ज्वालामुखी फटने के कगार पर बैठी स्त्री जब वातावरण की डोर शांति से अपने हाथ में ले लेती है तो वहाँ उपस्थित पुरुष वाचालता बंगले झाँकने लगती है|

कायदे से फ़िल्म दवारा उठाये गये मुद्दों को बारीकी से देखा जाए तो कुछ बातें विचारणीय हैं| क्या स्त्री घर पर बच्चे भी संभाले और बाहर भी काम करे, ऐसा संतुलन नहीं साध सकती? ऐसे प्रश्न भारत जैसे विकासशील और गरीब देशों की पृष्ठभूमि में ही जन्मते हैं क्योंकि विकसित धनी देश इस बात को लम्बी जद्दोजहद के बाद मान चुके हैं कि बच्चों का खासकर छोटे बच्चों का लालन-पोषण अंशकालिक नहीं वरन पूर्णकालिक कर्तव्य है और वहाँ बच्चों के सुगम और सम्पूर्ण विकास के लिए स्कूल और समाज दवारा ऐसा परिदृश्य विकसित कर दिया गया है कि माता पिता दोनों पूर्ण कालिक नौकरी करें यह संभव ही नहीं है, दोनों में से एक को तो पूर्णतया बच्चों पर ध्यान केंद्रित करके उन्हें वांछित समय देना ही पड़ेगा| पति पत्नी को यह बात आपस में जरुर सुलझा कर सहमति बनानी पड़ सकती है कि दोनों में से कौन पूर्णकालिक नौकरी छोडेगा और बच्चों के साथ दिन में रहेगा| भारतीय परिदिश्य में इसे स्त्री बनाम पुरुष का रूप दे दिया गया है और यह फ़िल्म “जूस” भी यही करती है जहां स्त्री दवारा बाहर के काम छोड़ने को पुरातन और स्त्री विरोधी कदम दर्शाया गया है| ऐसे नतीजे अंतिम नहीं हो सकते| वैसे भी भारत में सामाजिक परिवर्तनों का तर्कशील विश्लेषण करने की परम्परा लगभग नगण्य ही रही है, यहाँ बस अपनी अपनी बुद्धि अनुसार लोग निष्कर्ष निकाल लिया करते हैं और उन्हें सिद्धांतों का अमली जामा पहना दिया करते हैं|

वैसे तो घरेलू कार्य प्रबंधन को हल्के में लेने की परम्परा हमारे देश में पुरानी है| अगर स्त्रियों का गुट पार्टी करने बैठा है और पुरुष पर गृहकार्य संभालने की जिम्मेदारी है तो पार्टी के दौरान फ़िल्म में दिखाए के विपरीत परिदृश्य की गुंजाइश भी बनती है| भले ही उस स्तर की न हो पर अगर पुरुष ही गृहकार्य संभाल रहा है और स्त्री बाहर नौकरी कर रही है तो ऐसे दृश्य के उलट भी संभावना बनती है|

शायद फ़िल्म की 14 मिनट की लघु अवधि विस्तार और बारीकी में जाने से लेखक और निर्देशक की इच्छा पर रोक लगा गई हो पर अब जो प्रस्तुत हुआ है वही सबके सामने है| उसी का विश्लेषण करना सिने प्रेमियों की मजबूरी है|

फ़िल्म में इतना कुछ है कि यदि लेखन में ज्यादा तार्किक सामग्री जुटती तो सामाजिक विश्लेषण पर आधारित यह एक बेहतरीन और उल्लेखनीय फ़िल्म बन जाती| प्रसिद्ध फ़िल्म तो यह अब भी हो जायेगी|

कलाकारों के मनोभावों को सूक्ष्म तरीके से परदे पर प्रस्तुत करने के मामले में निर्देशक नीरज की प्रतिभा को उनकी बहुचर्चित फ़ीचर फ़िल्म “मसान” से ज्यादा यह लघु फ़िल्म प्रदर्शित करती है और उनसे भारतीय सामाजिक परिवेश पर महान फ़िल्में बनाने की अपेक्षा को जगाती है|

…[राकेश]

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