सिख धर्म का अपमान करना तो श्रंखला के लेखकों, निर्देशकों और प्रस्तोता का आशय  बिलकुल भी नहीं रहा होगा पर उन्होने अतार्किक गलती अवश्य की या उनसे ऐसी अतार्किक गलती अवश्य ही हुयी या हो गई| इस पर आने से पूर्व एक छोटा सा उपाख्यान, एक छोटी सी घटना का विवरण प्रस्तुत करना अनर्गल न होगा|

लगभग 10-11 साल पहले तक सिनेमा पर आधारित एक वेब पोर्टल हुआ करता था- passionforcinema.com, जो अपने संक्षिप्त नाम – PFC से ज्यादा जाना जाता था| दुनिया भर में फैले भारतीयों के मध्य सिनेमा पर आधारित यह साइट अच्छी ख़ासी लोकप्रिय थी| सिनेप्रेमियों के अलावा इस पर अनुराग कश्यप, सुधीर मिश्रा, ओनिर, हंसल मेहता, पवन कौल, आदि बहुत से फ़िल्म निर्देशक भी नियमित रूप से ब्लॉग लिखा करते थे| गाहे बेगाहे अपनी फिल्मों के प्रदर्शन के वक्त्त इस पर अभय देओल, सौरभ शुक्ला  जैसे अभिनेताओं ने भी ब्लॉग लिखे|  अनुराग कश्यप के बहुत से सहायक भी साइट पर सक्रियता से लिखते थे और ऐसे लोग भी थे जो कालांतर में अनुराग कश्यप के सहायक बने| बहरहाल, इस साइट के जीवन के अंतिम एक दो वर्षों की घटना होगी| सेक्रेड गेम्स की निर्देशकीय टीम से जुड़े एक सदस्य कुछ अरसा पहले ही PFC से एक सक्रिय लेखक के तौर पर जुड़े होंगे| फिल्मों पर वे बेहद गहराई से और बड़ा अच्छा लिखते थे| किसी ऑनलाइन इवेंट की खातिर उन्होने एक पोस्ट लिखी और उसके लिए एक पोस्टर बनाया जिसमें उन्होंने अमर शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद को डाकू-लुटेरा बनाकर प्रस्तुत कर दिया| प्रथम दृष्ट्या ही यह स्पष्ट था कि उन्हे भान नहीं था कि वे किसकी तस्वीर के साथ छेड़छाड़ कर रहे थे| संभवत: उन्होंने आज़ाद की छवि पहले कभी नहीं देखी थी और वे इस नाम से भी परिचित न थे| आपत्ति करने पर उन्होंने एक सज्जन, जैसे कि वे थे, की तरह अपनी अनभिज्ञता ज़ाहिर की और अपनी भूल स्वीकारते हुये पोस्टर को पोस्ट से हटा लिया| उसी समय सेक्रेड गेम्स की लेखकीय टीम से जुड़े एक सदस्य भी PFC पर सक्रिय रहने लगे थे| उन्हे यह बात बेहद नागवार गुजरी कि आज़ाद की मूल छवि से छेड़छाड़ करके बनाए पोस्टर को हटाने के लिए कह कैसे दिया गया? और उन्होंने पोस्टर पर आपत्ति करने और अंततः उसे हटाने के लिए कहने को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर आक्रमण घोषित किया| आम तौर पर वे भी सज्जनता और शालीनता का साथ निभाने वाले  थे पर इस मामले में वे बहुत समय तक तर्क वितर्क करते रहे और यह बात मानने को राज़ी नहीं हुये कि एक प्रमुख स्वतन्त्रता सेनानी चंद्रशेखर आज़ाद की छवि के साथ छेड़छाड़ करके उन्हे डाकू लुटेरा दिखाना एक बड़ी भूल है, इतिहास के साथ छेड़खानी है|

(दुनिया तय कर ले कि शहीद चन्द्रशेखर आज़ाद की तस्वीर के साथ छेड़छाड़ भूल है या इस भूल की तरफ इशारा करना अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पर आक्रमण है?)

उपरोक्त कथा के मूल में संभवतः सेक्रेड गेम्स में सरताज सिंह द्वारा करवाए कृत्य का अर्थ भी छिपा है| क्या यह ऐसी ही भूल है जैसी चंद्रशेखर आज़ाद के मूल फोटो के साथ छेड़छाड़ करके की गई थी?

दूसरे अगर अनुराग कश्यप फ़िल्म्स का इतिहास देखा जाये तो कुछ मुद्दों पर संवेदनशीलता का भी मसला है| फ़िल्म गुलाल में पीयूष मिश्रा 9/11 के अमरीका के ट्विन टॉवर्स पर आतंकवादी हमलों पर हास्य व्यंग्य के अंदाज़ में गीत गाते हैं| उसी अंदाज़ में सेक्रेड गेम्स में गणेश गायतोण्डे भी 9/11 घटना का बखान करता है| यह स्पष्ट ही है कि इस मसले पर अनुराग कश्यप की संवेदनशीलता वैसी नहीं हैं जहां दिखाई दे कि इस घटना के कारण अमेरिका से उन्हे सहानुभूति है| 9/11 की दुपहर बाद बहुत से लोग ऐसे थे जिन्हे जब इस घटना का पता लगा तो उनकी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि अमेरिका को अब पता लगेगा कि आतंकवाद का दंश कैसा होता है? वे अमेरिका की राजनीतिक वैश्विक दादागिरी से उपजे क्रोध के सामने इस आतंकवादी हमले के शिकार बने मासूम लोगों की सामूहिक हत्याओं को नहीं देख पा रहे थे| बहुत से अब भी अमेरिका के राजनीतिक पक्ष के सामने उस घटना के शिकार लोगों से जुड़े मानवीय पक्ष को नज़रअंदाज़ कर देते हैं|

बहरहाल, यहाँ सेक्रेड गेम्स में प्रश्न यह है कि अपने पिता और गणेश गायतोंडे की कथित साठ गांठ से नाराज, और कुंठित सरताज समुद्र में अपना कड़ा क्यों फेंकेगा?

इस दृश्य को दिखाने की कोई तुक नहीं है, इसके पीछे कोई तर्क नहीं है|

कड़ा, सिख धर्म के अनुयायियों द्वारा धारण पाँच आवश्यक वस्तुओं या चिह्नों में से एक है तो सरताज कड़ा ही क्यों फेंकेगा?

उसे अपने पिता के गुरुजी के शैतानी प्रोजेक्ट में हिस्सेदारी करने की शंका से अपने पिता से नफरत और/या नाराजगी दोनों हो सकती है, पर वह  सिख होने की एक निशानी क्यों कर फेंकेगा? क्या वह अपने पिता की धार्मिक/सांप्रदायिक पहचान से रुष्ट है? नहीं! तो फिर सिख होने, दिखने के लिए पाँच आवश्यक प्रतीकों में से एक का बलिदान वह क्यों करेगा?

जो एक चीज़ उसे अपने पिता और गणेश गायतोंडे दोनों से जोड़ती है, वह है गणेश गायतोंडे द्वारा उसके लिए भिजवाया गया क्रिकेट बैट|

यही एक वस्तु ऐसी है जिसे वह दिलबाग सिंह और गायतोंडे से नाराजगी या उनके प्रति उत्पन्न नफरत के कारण फेंक कर मानसिक शांति पा सकता है|

सरताज द्वारा कड़ा फेंकना दिखाता है कि श्रंखला की लेखकीय और निर्देशकीय टीमों ने इस बात पर गौर ही नहीं किया कि इससे सिख भावनाएं आहत हो सकती हैं| भावनाएं आहत न भी हों पर तब भी सरताज द्वारा कड़ा फेंकना तार्किक भी तो नहीं है| वह अपने सिख होने से तो नाराज़ है नहीं, ऐसा होता तो वह केवल कड़ा फेंककर ही क्यों संतुष्ट रह जाता, सिख होने के अन्य लक्षण भी प्रभावित होते उसकी कुंठा और नाराजगी से|

ऐसा भी नहीं है कि आश्रम से आकर सरताज को सीधे समुद्र किनारे कड़ा फेंकते हुये दिखाना ही एकमात्र विकल्प था| वह घर आकर बैट को नष्ट कर सकता था, घर से ले जाकर बैट को समुद्र में फेंक सकता था| आखिर आश्रम से तो वह आया ही, उसने आश्रम में ही तो कड़ा फेंक नहीं दिया जिससे यह दर्शाया जाये कि वह कुंठा की भावनाओं से आश्रम में ही इतना भर चुका था कि पिता द्वारा दिया कड़ा उसने वहीं फेंक दिया| फिर श्रंखला यह तो नहीं ही दिखाती  है कि क्या यह वही कड़ा है जो दिलबाग सिंह ने आश्रम में टंगे फोटो में अपने हाथ में पहना हुआ है? अगर यह वही कड़ा है तो सरताज को कहाँ से मिला जबकि दिलबाग सिंह की हत्या आश्रम में की जाती है?

इतना तो संभव लगता ही है कि श्रंखला सरताज को कड़ा फेंकते दिखाने से बच सकती थी| इस लापरवाही से निश्चित ही बचा जा सकता था|

…[राकेश]

 

 

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