whiteballoonज्यादातर समाज कई सारे धरातलों पर जीते हैं और कोई एक परिभाषा उनका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती। बच्चे भी अक्सर समाज में व्याप्त धारणाओं से ही सीखते हैं। समाज में बड़े जैसा कर रहे होते हैं बच्चे भी जाने अन्जाने उन्ही विचारधारओं को अपनाने लगते हैं। नैतिक शिक्षा में फिर लाख आदर्शवादी बातें पढ़ा दी जायें पर वे बच्चों के लिये भी ऐसी आदर्श बातें बन कर रह जाती हैं जो केवल किताबों में ही अच्छी लगती हैं और वास्तविक दुनियादारी से उनका कम ही वास्ता पड़ता है।

बच्चों की दृष्टि व्यापक नहीं होती और जिस चीज को वह चाहने लगते हैं उसी चीज या उसकी चाह पर ही उनका सारा ध्यान केन्द्रित हो जाता है और अगर उन्हे वह वस्तु न मिले तो उन्हे लगने लगता है कि जीवन का अभी तो फिलहाल कोई मतलब है नहीं और अपने ही माता पिता, जो कि उस वस्तु को देने या दिलाने से मना कर रहे हैं, उन्हे अपने विरोधी और कई मामलों में तो थोड़े समय के लिये दुश्मन जैसे लगने लगते हैं।

उन्हे लगता है कि बस एक उन्ही की इच्छाओं को सम्मान नहीं दिया जाता। माता पिता की आर्थिक स्थितियों और परेशानियों को बच्चे कम ही समझ पाते हैं।

ऐसे बालहठ को और बच्चों का ध्यान एक ही बात, जो उन्हे महत्वपूर्ण लगती है, पर केन्द्रित होने की मनोस्थिति को लेखक स्वर्गीय मुल्क राज आनन्द ने बहुत अच्छे ढ़ंग से अपनी कहानी The Lost Child में प्रस्तुत किया था।

यह बड़े मजे की बात है कि किसी भी समाज में और विभिन्नता से भरे समाज में तो खास तौर पर, भेदभाव हर स्तर पर देखने को मिलता है। पुरुष ही नारी और बच्चों से भेदभाव नहीं रखता बल्कि ऐसा भेदभाव स्त्रियों और बच्चों में भी आपसी तौर पर दिखायी देता है।

जफर पनाही की इस पहली फीचर फिल्म की कहानी भी मूल रुप से एक छोटी बालिका के जीवन के एक दिन के कुछ घंटों पर आधारित है। प्रसिद्ध ईरानी फिल्मकार अब्बास कियारोस्तामी ने इस फिल्म की कहानी लिखी है। नववर्ष आने वाला है और बालिका रजिया को गोल्डफिश खरीदनी है और काफी मिन्नतों और रोने के बाद उसकी माँ उसे अपनी बचत में से 500 दीनार दे देती है। बाजार जाते हुये रजिया का नोट एक दुकान के बाहर बनी जालीबंद नाली में गिर जाता है और सारी फिल्म रजिया और उसके बड़े भाई के नोट को बाहर निकालने के प्रयासों पर आधारित है। इस प्रयास के दौरान रजिया की भेंट भिन्न भिन्न किस्म के लोगों से होती है और अंत में अफगानी मूल का एक अप्रवासी लड़का, जो सड़कों पर गुब्बारे बेचने का काम करता है, नोट को बाहर निकाल देता है।

whiteballoon2एकदम साधारण सी दिखने वाली कहानी पर बनी फिल्म में जफर पनाही ने दृष्यों को बहुत अच्छे तरीके से फिल्माया है और फिल्म को एक ऊँचाई प्रदान की है और फिल्म की क्वालिटी दर्शक को सारे समय गहरे में प्रभावित करती चलती है।

निर्देशक ने फिल्म में इस कदर अपनी पकड़ दिखायी है कि दर्शक रजिया की भावनाओं के साथ बहते रहते हैं। रजिया की तरह दर्शक भी नहीं जानते कि सड़क पर साँपों के खेल दिखा रहे सपेरे रजिया से धोखे से लिया गया नोट वापिस करेंगें या नहीं।

रजिया के साथ सहानुभूति से विचरण करते दर्शकों को जफर पनाही संवेदनशीलता की कसौटी के सम्मुख ला खड़ा कर देते हैं जब रजिया और उसका भाई अपने दीनार लेकर चले जाते हैं बिना गुब्बारे वाले अफगानी लड़के को धन्यवाद दिये हुये। कौन सही है यहाँ, कौन गलत? मानव की सहानुभूति एक चरित्र से दूसरे की तरफ चली जाती है।

इतनी साधारण कहानी पर बनी फिल्म भी शुरु से ही एक योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ती है। शुरु में ही जब बाजार में रजिया की माँ उसे खोज रही है तब फिल्म में आगे आने वाले सारे चरित्र भी उसी जगह से गुजर रहे होते हैं। उन सबका आपस में परिचय भले ही न हो पर वे एक ही समाज का हिस्सा हैं और आगे आने वाले कथानक में एक दूसरे के रास्तों को काटने वाले हैं।

सब अपनी अपनी जिन्दगी जी रहे हैं और अंत तक एक अहसास होने लगता है कि दूसरों का अहित करे बिना भी अपना हित हो सकता है और दूसरों का हित करके भी अपना हित हो सकता है।

रोचक बात है कि फिल्म के शुरु में भी ईरान में शरणार्थी के तौर पर गुब्बारे बेचकर अपना गुजर बसर करने वाला लड़का ही रजिया की माँ को बताता है कि रजिया बाजार में किस तरफ मिल सकती है और बाद में भी उसी की मदद से रजिया को अपने दीनार वापिस मिलते हैं।

शुरु में गुब्बारे वाले के डंडे में भिन्न भिन्न रंगों के कई सारे गुब्बारे बँधे रहते हैं और अंत में उसके पास सिर्फ एक सफेद रंग का गुब्बारा रह जाता है जो कि वह बेच नहीं पाया है। सफेद रंग में कई मायने छुपे रहते हैं। सब रंगों का मिश्रण भी है, इसे जीवन में मौजूद एक ही रंग का प्रतिनिधि भी कहा जा सकता है, इसके द्वारा जीवन से रंगों की गैर मौजूदगी को भी दर्शाया जा सकता है, और यह शांति का प्रतीक भी है।

whiteballoon1जफर पनाही ने बच्चों से बेहद अच्छा काम लिया है।

दुख की बात है कि ईरानी फिल्मों के झण्डे को संसार भर में बुलन्द करने वाले फिल्मकार और उनकी स्वतंत्रता को उन्ही के देश की सरकार ने अजीब तरीके से कैद कर रखा है।

कब जफर पनाही को स्वतंत्रता मिलेगी जिससे कि वह अपनी कल्पना के गुब्बारे आकाश में ऊँचे से ऊँचे उड़ा सकें?

…[राकेश]

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