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Cinema, Theatre, Music & Literature

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Cinema

दिलीप कुमार : अभिनेताओं के अभिनेता का कालजयी खुमार

मौन साधा परदे पर तो ऐसा कि सन्नाटे के छंद ही बुन दिए और बकर बकर बोल हास्य रचा तो ऐसा कि लगा अभिनेता दिलीप कुमार को ट्रेजडी किंग का खिताब कैसे दे दिया लोगों ने, यह अभिनेता तो हास्य... Continue Reading →

 हंगामा है क्यों बरपा (Ray 2021) : आदतन चोर के घर आदतन चोर

सत्यजीत रे की चार कहानियों से प्रेरित चार फिल्मों के संग्रह में अभिषेक चौबे द्वारा निर्देशित “हंगामा है क्यों बरपा” ही एकमात्र आकर्षक फ़िल्म है जो रे की फिल्मों की टोन के साथ सुर मिला पायी है, बाकी तीनों फिल्मों... Continue Reading →

Haseen Dillruba (2021) : दिल्ली की ‘रानी’ के शोले ज्वालापुर में

पिछली सदी के सत्तर के दशक में बी आर चोपड़ा ने एक बेहतरीन मर्डर मिस्ट्री बनाई थी – धुंध, जिसमें अपने पति के खून का आरोप है रानी (जीनत अमान) पर| २०१३ में फ़िल्म आई क्वीन, जिसकी दिल्ली वासी रानी... Continue Reading →

Grahan (2021): सन चौरासी का दाग भरा इतिहास

किताब पर बनी फ़िल्म में यह अक्सर ही होता है कि किताब भारी पड़ जाती है और उसमें उपस्थित बातें परदे पर रूपांतरित नहीं हो पातीं| लेकिन ग्रहण कई बार किताब से ऊपर चली जाती है और किताब में संक्षिप्त... Continue Reading →

Sherni (2021): विकास और वन्य जीवन के मध्य संतुलन की शिक्षा

तकरीबन तीन दशकों से “शेरनी” शब्द का सम्बन्ध श्रीदेवी और शत्रुध्न सिन्हा अभिनीत एक बेहद सामान्य और फ़ॉर्मूला छाप हिन्दी फ़िल्म से जुड़ा रहा है| अब जाकर विद्या बालन अभिनीत शेरनी फ़िल्म ने इस शब्द को सही मायने दिए हैं,... Continue Reading →

Skater Girl (2021) : अवसर और परिवर्तन

दक्षता, किसी भी क्षेत्र में हासिल की जाये, मुक्ति प्रदान करती ही करती है, नयी संभावनाओं के द्वार खोलती है, उड़ान भरने के लिए प्रेरित करती है| परिवर्तन लाने के लिए अवसर का होना भी आवश्यक है| अगर जेसिका (Amy... Continue Reading →

Shikara (2020) : कैंसर चिकित्सा पर श्वेत पत्र के बदले हीलिंग टच थेरेपी पर लघु पत्र

थल थल में बसता है शिव हीभेद ना कर क्या हिंदू-मुसलमांज्ञानी है तो स्वयं को जानवही है साहिब से पहचान  [संत ललद्यद (1320-1392) कश्मीरी शैव भक्ति की संत कवियित्री]फ़िल्म -शिकारा, में तीस साल बाद अपने गाँव वापिस जाने वाले शिव... Continue Reading →

Tribhanga (2021): Tedhi Medhi Crazy

इंसान सिर्फ आनंद दायक वस्तुओं या घटनाओं में ही अटक कर नहीं रह जाता, बहुत बार तो जीवन में घटित ऋणात्मक भी जीवन को ऐसे घेरे में बाँध लेता है कि पीड़ित व्यक्ति बाकी सारी उम्र सिर्फ उस ऋणात्मक घटना... Continue Reading →

Pagglait (2021) : आस्तिक की तेहरवीं, संध्या की मुक्ति

फ़िल्म “राम प्रसाद की तेहरवीं” के ढांचें में फ़िल्म “क्वीन” की रानी (कंगना रनौत) को रख दें तो “पगलेट” और इसकी नायिका संध्या (सान्या मल्होत्रा) की बुनियाद दिखाई देने लगेगी| फ़िल्म है तो एक युवा व्यक्ति – आस्तिक, की मृत्यु... Continue Reading →

राम प्रसाद की तेहरवीं (2019) : कोई किसी का नहीं, ये झूठे नाते हैं नातों का क्या

सीमा भार्गव (अब पाहवा) ने “बड़की” के चरित्र में जिस क्रांतिकारी धारावाहिक “हम लोग” में काम किया, उसके पीछे भारत के हिन्दी के एक बहुत बड़े लेखक मनोहर श्याम जोशी की विद्वता, समाज शास्त्र और विशेषकर भारतीय समाज की विशद... Continue Reading →

Ankahi [Ajeeb Daastaans (2021)] : दिल ठहरा जहाज का पंछी

O. Henry  की विश्व प्रसिद्ध कहानी  "The Gift of the Magi" जैसी कहानियों का पाठक के ऊपर एक विशेष असर होता है| साहित्य की दृष्टि से ऐसी कहानियां बड़ी सरल भले लगती हों पर उनमें कुछ ना कुछ ऐसा मानवीय... Continue Reading →

Geeli Pucchi [Ajeeb Daastaans (2021)] : अपनी परेशानियों और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त लोगों की स्वहित साधने की बारीक चालें

लघु फ़िल्म Juice (2017) के बाद निर्देशक - लेखक नीरज घायवान दर्शकों को सोचने विचारने के लिए प्रेरित करती हुई एक और स्त्री केन्द्रित फ़िल्म – गीली पुच्ची, लेकर आये हैं| एक लघु उद्योग में प्रोडक्शन विभाग में कार्यरत भारती... Continue Reading →

‘Is love enough, SIR (2018)’ : संवेदनशीलता और परस्पर सम्मान की नींव पर निर्मित होता प्रेम

अमीर घराने की लड़की का घरेलू सहायक, ड्राइवर, चौकीदार आदि लड़के के साथ प्रेम दर्शाती फ़िल्में दिखाई दे जाएंगी| राजे रजवाड़ों के काल में राजा या राजकुमार का दासी संग प्रेम भी किस्से कहानियों का हिस्सा रहा है| राजा द्वारा... Continue Reading →

Meena Kumari

शहतूत की शाख़ पे बैठी मीनाबुनती है रेशम के धागेलमहा-लमहा खोल रही हैपत्ता-पत्ता बीन रही हैएक-एक साँस बजाकर सुनती है सौदायनएक-एक साँस को खोल के, अपने तनपर लिपटाती जाती हैअपने ही तागों की क़ैदीरेशम की यह शायर इक दिनअपने ही... Continue Reading →

Mirza Ghalib (1988-89): अव्यवहारिक एवं दुनियादारी में लापरवाह ग़ालिब धोखे और दुर्भाग्य के घेरे में (अध्याय 4)

ग़ालिब पारंपरिक रूप से धार्मिक नहीं हैं और न ही जड़ता ने उनके दिलो दिमाग पर कोई असर ही डाला है| अपने एक हिन्दू मित्र के घर अन्य हिन्दू साथियों के संग वे दीवाली के अवसर पर चौसर खेल रहे... Continue Reading →

Mirza Ghalib (1988-89): रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’ (अध्याय 3)

अँग्रेज़ भारत के विभिन्न हिस्सों पर अपना कब्जा बढ़ाते जा रहे थे और दिल्ली, लखनऊ जैसी महत्वपूर्ण जगह लोग मोहल्लों में, घरों में, बाज़ारों में मुर्गे लड़ाने में व्यस्त थे| इसका जिक्र ग़ालिब ने एक व्यक्ति पर कटाक्ष करते हुये... Continue Reading →

Mirza Ghalib (1988-89): बंसीधर, ज़ौक़ और शहज़ादा ज़फ़र – ईमानदारी और चापलूसी के बीच घिरे ग़ालिब (अध्याय 2)

ग़ालिब के किशोरवय के काल में उनके ससुर द्वारा उनसे किए जाना वाले दोस्ताना और उनके प्रति सम्मान और प्रशंसा रखने वाले रुख ने ग़ालिब को एक शायर के विकसित होने वाले शुरुआती दौर में बेहद प्रोत्साहन दिया होगा| पिछले... Continue Reading →

मिर्ज़ा ग़ालिब (1988-89) : ‘ग़ालिब का बयान’ वाया गुलज़ार – अध्याय 1

‘हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और’ जब यही बात विनोद सहगल की आकर्षक गायिकी बताती है तो असर कुछ ज्यादा ही पड़ता है और ग़ालिब का सिक्का जम जाता है... Continue Reading →

Chintu Ji (2009) : आधी हक़ीक़त आधा फ़साना

सम्पूर्ण परिवार के संग देखी जाने वाली चंद आधुनिक स्वस्थ हास्य फिल्मों में चिंटू जी को रखा जा सकता है| फिल्म की टैग लाइन - This film is part reality, part illusion and part fact, part fiction फ़िल्म को बेहतर... Continue Reading →

Koshish (1972) : संवेदना उकेरती मौन प्रेमकथा

 लूला, लंगड़ा, टुंडा, गूंगा, बहरा, काना, अंधा   कहकर गाली देते हैं, अपमानित करने के लिए, अपने ही जैसे पूर्ण देह वाले इंसानों को लोग| पहले जिन्हें अपंग, विकलांग आदि कहती थीं, सरकारी परिभाषाएँ, अब “अपूर्ण अंगों” में किसी प्रकार... Continue Reading →

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