इस गीत से किशोर कुमार हिन्दी फिल्मों में गायन की अपनी दूसरी एवं आधुनिक पारी के श्रीगणेश का शंखनाद करते हैं|likha hai हालांकि किशोर कुमार की गायिकी के आधुनिक काल में प्रवेश की झलक Mr. X in Bombay (1964) के गीत ” मेरे महबूब क़यामत होगी“, जिसे आनंद बक्शी ने लिखा था और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत से सजाया था, में भी मिलाती है पर उनकी गायिकी के नए दौर में पहुँच जाने के सबसे निश्चित प्रमाण के रूप में तीन देवियाँ का यही गीत- लिखा है तेरी आँखों में, प्रमुखता से सामने आया प्रतीत होता है|

साठ के दशक में हिन्दी फिल्मों का संगीत पचास के दशक के संगीत से अलग हो चला था और सभी बड़े गायकों ने भी अपने गाने के तौर तरीकों में मुनासिब बदलाव कर लिए थे|

पचास के दशक में किशोर कुमार द्वारा गाये गीत और अंदाज़ में गाये गीत हैं और जहां उनकी आवाज़ और गाने का अंदाज़ दोनों ही अलग किस्म के थे। सचिन देव बर्मन के संगीत निर्देशन में ही किशोर कुमार को पचास के दशक में इस तरीके के गीत गाने को मिले जिनमें से अगर योडलिंग तत्व को निकाल दिया जाये तो उनके सभी गीत हेमंत कुमार भी गा सकते थे पर साठ के दशक में ” तीन देवियाँ” के गीत ऐसा उद्घोष करते हैं कि अब किशोर कुमार के गाने का अंदाज़ इस कदर बदल गया था कि उनके गीतों को उसी अंदाज़ में हेमंत कुमार नहीं गा सकते थे। अब किशोर कुमार बेहद खुले गले से गायन करने लगे थे, उनका अंदाज़ आधुक दौर में प्रवेश कर गया था| परदे पर आधुनिक और तत्कालीन चरित्रों के लिए उनकी गायन शैली बेहद माफिक बैठने लगी थी|

गायिकी में लता अपने स्तर का सर्वश्रेष्ठ मुकाम पचास के दशक में ही हासिल कर चुकी थीं| और पचास और साठ के दशकों के दौर के उनके गायन में हर तरह से उत्कृष्टता दिखाई देती है और उनके गाये हुए अच्छे गीत बेहद आनंद प्रदान करने वाले हैं| पार्श्व गायक के क्षेत्र में लता की गायिकी एक तरह से मानक सिद्ध होने लगी थीं|

इस गीत – ” लिखा है तेरी आँखों में ” में किशोर कुमार ने स्वर दर स्वर एंड नोट दर नोट लता की गायिकी से अपनी गायिकी मिलाई है अब चाहे वह बोलों को गाने का मसला हो या फिर वातावरण में चारों तरफ ” अरे…ओ…ओ…ओ ” की गूंजती हुयी तान का सुर मिलाने का मसला हो, और इसीलिये किशोर की गायिकी इस गीत के द्वारा यह सत्यता बखूबी स्थापित करती है कि एक गायक के तौर पर वे भी अपना सर्वश्रेष्ठ स्तर इस गीत को गाने के दौरान पा चुके थे और बाद में वे इस मुकाम को बरकरार रखने में भरपूर कामयाब रहे और उन्होंने तीन देवियाँ के बाद एक से बढकर एक गीत संगीत संसार को दिए|

भले ही आराधना के गीत ” मेरे सपनों की रानी कब आयेगी तू ” और अन्य गीतों ने उन्हें सुपर स्टार गायक का दर्जा ला दिया हो पर एक गायक के नाते गायिकी में आधुनिकता के नए बदले माहौल वे इनके बराबर या इनसे अधिक गुणवत्ता के गीत कुछ बरस पहले तीन देवियाँ में गा चुके थे|

पार्श्व गायन के क्षेत्र में किशोर कुमार की संगीत यात्रा के एक बेहद महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में उभर कर आये इस युगल गीत की फ़िल्म में भी बेहद महत्वपूर्ण उपस्थिति है|

देव (देव आनंद) के जीवन में आने वाली सबसे पहली युवती नंदा (नंदा) जो उसके जीवन में तब से है जब वह एक बेरोजगार युवक के रूप में बम्बई में उसी लॉज में ठहरा था जहा नंदा पहले से ठहरी हुयी थी|
देव और नंदा में समय के साथ नजदीकियां बढ़ने लगती हैं पर इसी के साथ साथ देव की पहचान दो अन्य युवतियों, कल्पना (कल्पना) और सिमी (सिमी ग्रेवाल) से भी हो जाती है और वे दोनों भी देव के बेहद करीब आ जाती हैं| देव तीनों के ही नजदीक है पर उसका ध्यान एक कवि के रूप में अपने को स्थापित करने में ज्यादा है जबकि तीनों ही युवतियां चाहती हैं कि देव उनसे प्रेम-निवेदन करे|

आर्थिक रूप से नंदा ही सबसे कमजोर है और वह यही समझती रही है कि उसी जैसी आर्थिक पृष्ठभूमि वाला देव उसी से प्रेम करता है और उसे ऐसा भी कोई संकेत नहीं मिलता देव से कि उसका ऐसा सोचना गलत है| वह देव के प्रेम निवेदन न करने से परेशान हो जाती है और व्याकुलता में एक पिकनिक पर देव के साथ जाती है यह सोचकर कि वहाँ तो देव उसके प्रति प्रेम का इजहार कर ही देगा|

देव से वह किसी न किसी बहाने से उसके दिल की बात पूछना चाहती है और जब बातचीत में देव अपने दिल की बात नंदा से नहीं कहता तब यह गीत शुरू होता है जिसमें नंदा पूछ रही है कि देव के मन में किसी के प्रति प्रेम है तो सही और यह उसकी आँखों से झलकता है पर वह कौन है जो उसके मन और आँखों में बसी हुयी है|

लिखा है तेरी आँखों में किसका अफसाना

देव, नंदा की इस बात को इस तरह से मजाक के रूप में बदल देता है जैसे उसके लिए भी यह एक नयी खबर हो और वह भी गाता है कि अगर नंदा को पता चल जाए तो वह उसे भी बता दे|

अगर इसे समझ सको मुझे भी समझाना

नंदा हार न मानते हुए फिर से देव को सत्य दिखाना चाहती है कि उसके अंदर कुछ है पर दिक्कत यही है कि अंदर किसी के बसे होने का आभास तो मिलता है पर अभी वह भी पूरा पूरा देख नहीं पा रही है| भुट्टा खाते और नज़र बचाते देव को छेड़ते हुए नंदा गाती है

जवां बसा किसी तमन्ना का, लिखा तो है अधूरा सा

देव फिर से इस नए आक्रमण को भी खुद को ऐसा ही आधा-अधूरा बताते हुए टाल जाता है|

कैसे न हो मेरी हर बात अधूरी अभी हूँ आधा दीवाना

अभी भी इथालाकर चलटी नंदा के दुपट्टे के एक सिरे को अपनी पैंट की जेब में खोंस कर चलने में देव को कोई गुरेज नहीं है और देव की ऐसी ही भरमाने वाली हरकतें देख नंदा का धैर्य कुछ चूकता नज़र आता है और वह बात को सीधे सीधे व्यक्तिगत बनाकर पूछ ही लेती ही कि अगर देव के मन में नंदा के लिए कोई भावनाएँ नहीं हैं तो वह फिर क्यों उसके करीब बना रहता है और क्यों उससे नजदीकियां बनाए रखता है?

जो कुछ नहीं तो ये इशारे क्यों ठहर गये मेरे सहारे क्यों

ऐसा गाते गाते वह देव को अपने दुपट्टे को पूरी तरह से देव के इर्द-गिर्द लपेट देती है और उसके दुपट्टे में खुशी खुशी लिपटा हुआ देव अभी भी बात को नंदा के साथ विशेष होने से बचाता है और उसके दुपट्टे के पीछे अपने मुख को छिपाते हुए अभी भी मजाक के स्वर में ऐसा करने को अपने व्यक्तित्व का एक साधारण तत्व बताते हुए कहता है कि ऐसा करना उसकी आदत में शुमार है और उसका ऐसा व्यवहार सिर्फ नंदा के ही साथ नहीं है |

थोड़ा सा हसीनों का सहारा लेकर चलना है मेरी आदत रोज़ाना

नंदा इससे आगे शायद नहीं बढ़ सकती और अब जब वह पहले से हलके स्वर में एक तरह से अंतिम डाव के रूप में देव से पूछती है कि उसकी आँखों में किसका अफसाना लिखा हुआ है तो देव उससे दूर जाती नंदा का दुपट्टा उसके पास फेंककर वही चुनौती भरा राग अलापता है कि अगर नंदा को पता चले तो वह उसे भी बताए|

पास से दौडकर जाते घोड़े के पीछे नंदा चली जाती है तो अकेला रह गया देव अपने भीतर के भाव को कुछ कुछ बाहर लेकर आता है और पहली बार गीत में अपने आप ही सक्रियता दिखाता है|

उसके अंदर से हल्की सी उदासी लिए भाव उमड़ते हैं इस बात की गवाही देते हुए कि उसके अंतर्मन में भी इस प्रेम वाले मसाले को लेकर मंथन चलता रहता है| पर बहुत शीघ्र ही वह संभल जाता है और अपने दिल को आवारा की तरह से इधर उधर भटकने वाला बता कर वह तुरंत ही उसे निर्दोष रूप से बेचारा दर्शाता है|

यहाँ वहाँ फिज़ां में आवारा अभी तलक ये दिल है बेचारा

इस पंक्ति के बाद किशोर कुमार ने अरे … ओ …ओ …ओ की जो गूंजती हुयी तान साधी है वह उनके उस समय तक सारे गायन की सर्वश्रेष्ठ और हर लिहाज से अद्भुत गायिकी का उदाहरण है| इस तान को बेहद सधा हुआ सुरीला गला ही गा सकता है और यही घोषणा कर देता है कि एक परिपक्व और उच्चतम श्रेणी के गायक के रूप में किशोर कुमार का आगमन हो चुका है|

नंदा भविष्य के किसी और क्षण पर बात को टालते हुए बात को संभालती है यह कह कर कि उसके इस यहाँ वहाँ विचरण करते दिल को समझना बहुत मुश्किल है वह तो बस उसे जानती है और पहचानती है|

दिल को तेरे हम खाक न समझे तुझी को हमने पहचाना

सचिन देब बर्मन ने जैसा वाद्य यंत्रों के सयोजन का प्रयोग इस गीत में किया है वह काबिलेतारीफ है| विभिन्न वाद्य यंत्र और विशेष रूप से ढोलक, तबला और ड्रम परिवार के सदस्य जब- तब और गीत में यहाँ वहाँ बजते हुए एक गजब का उर्जावान संगीतमयी माहौल गीत में जन्मा देते हैं|

सचिन देब बर्मनतीन देवियाँ” के संगीत के साथ न केवल अपने संगीत को बल्कि हिन्दी फिल्म संगीत को पचास के दशक के संगीत संसार से अलग ले जाकर एक नए युग में प्रवेश करा देते हैं|

मजरूह सुल्तानपुरी ने फ़िल्म की सिचुएशन पर एकदम फबने वाला गीत लिखा है|

इस गीत और तीन देवियाँ के अन्य गीतों के फिल्मीकरण को देखकर एक बात स्पष्ट होती है कि देव आनंद के नवकेतन की गीतों के फिल्मीकरण के मामले में गुणवत्ता का एक स्तर और तरीकों के बारे में सिद्धांत तय हो चला था और उन्ही बातों का पालन करते हुए गानो का फिल्मीकरण किया जाता था अब चाहे निर्देशक कोई भी हो| इस फ़िल्म के गीत कहीं से भी ऐसा संकेत नहीं देते कि निर्देशक की कुर्सी पर चेतन या विजय आनंद नहीं बैठे हुए हैं |

…[राकेश]

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