uninvited guestस्पेनिश भाषा में 2004 में बनी फिल्म का शीर्षक El habitante incierto था। यूरोप में इसे The Uncertain Guest शीर्षक से रिलीज किया गया और DVD पर इसे The Univited Guest नामक शीर्षक दिया गया है। यह एक ऐसा थ्रिलर है जो देखने के दौरान तो आपको हिलने नहीं देता बल्कि देख चुकने के बाद भी आपको बहुत समय तक याद रहता है और कुछ दर्शकों को तो सताता भी रहता है।

भय एक ऐसा भाव है मानव जीवन में कि इससे ग्रसित मानव अपने ही साये से भी डरने लगता है। अकेले चलते हुये ज़रा सी आहट भी उसे अंजानी आशंका से भयभीत कर देती है। मान लीजिये किसी आदमी ने कोई अपराध कर दिया है और लोगों को अपराध का तो पता चल गया है पर अभी उन्हे अपराधी का पता नहीं है और अपराधी की तलाश जारी है। उस अपराधी को भीड़ में भी डर लगेगा। अपनी ओर देखते हर आदमी में उसे पुलिस के जासूस की छवि दिखायी देगी। वह चैन से सो पायेगा न चैन से रह पायेगा। हर आहट उसे दुश्मन मालूम पड़ेगी। हर साया उसे डरा जायेगा।

जिसे भूत-प्रेत जैसे अस्तित्व में विश्वास है उसकी हालत की कल्पना करें जबकि वह रात के अंधेरे में किसी सुनसान जगह से पैदल गुजर रहा हो। पास के पेड़ों के पत्तों की हल्की सी खड़खड़ाहट भी उसे अंदर तक कंपा जायेगी। पेड़ों पर पड़ रही रोशनी में हर आकृति उसे ऐसी लगेगी मानो भूत प्रेत पेड़ से उलटे लटके हुये हैं। ज़रा सी छन छन उसे प्रेतनी के पायल की झंकार लगेगी और वह तेजी से चलने बल्कि दौड़ने लगेगा।

भय में ऐसी स्थिति भी आ जाती है जब आदमी इसे और ज्यादा सहन नहीं कर सकता और वह पलट कर खड़ा हो जाता है और हवा में गाली बकने लगता है और अदृष्य शक्त्ति को सामने आने की चुनौती देने लगता है। इस अवस्था के लिये ही प्रेमचंद ने कभी लिखा था –

भय की चरम सीमा ही दुस्साहस है।

धरती पर ऐसा कोई बिरला ही मनुष्य होगा जिसे जीवन में नितांत अकेलेपन की स्थितियों में कभी ऐसा अनुभव न हुआ हो कि कोई उसके साथ है या इर्द-गिर्द है पर देखने से उसे कोई दिखायी नहीं देता। ऐसा कोई मानव आज तक न जन्मा होगा जिसे जीवन में कभी भी अकेलेपन की स्थितियों में आवाजों और आहटों ने कुछ हद तक भयभीत न किया होगा। ऐसा चाहे बचपन में ही क्यों न हुआ हो पर ऐसा घटता जरुर है मानव के जीवन में।

इस फिल्म की कहानी भी मानव भय को आधार बनाकर आगे बढ़ती है। क्या कोई आदमी किसी के घर में उसकी उपस्थिति में इस तरह से रह सकता है कि घर के मालिक को उसके रहने का पता न चले? घर का मालिक यह महसूस तो करे कि कोई है पर वह उस कोई को देख न पाये। जबकि वह साये की तरह उसके साथ बना रहे या उसके पीछे लगा रहे?

Félix (Andoni Gracia) एक आर्किटेक्ट है। हाल ही में उसकी प्रेमिका – Vera (Mónica López) उसे छोड़ गयी है और अब वह अपने विशाल घर में अकेला रहता है। अकेलापन उसे सताने लगा है। प्रेमिका से दूरी उसे प्रभावित करने लगी है। वह सामान्यावस्था से कुछ कुछ असामान्य होता जा रहा है। उसे आशा है कि Vera वापिस आ जायेगी। ऐसे ही अकेले बैठे बैठे जब उसे घर की कॉलबेल सुनायी देती है तो उसे लगता है कि Vera आ गयी है और वह दौड़कर दरवाजा खोलता है। पर वहाँ वह एक अजनबी को खड़ा पाता है।

अजनबी उससे प्रार्थना करता है कि अगर उसके पास टेलीफोन है तो उसे एक फोन करने दे क्योंकि बाहर पब्लिक बूथ वाला फोन खराब हो गया है और फोन करना उसके लिये नितांत आवश्यक है।

कुछ हिचक के बाद Félix अजनबी को अंदर आने देता है। अजनबी उसके घर की तारीफ करता है। Félix को आश्चर्य होता है पर वह इसे सामान्य बातचीत मानकर उससे पूछता है कि क्या उसे घर पसंद आया? अजनबी उससे आगे पूछता है कि क्या उसके घर में बेसमेंट है? इस सवाल पर Félix को और ज्यादा आश्चर्य होता है, पर वह हाँ में जवाब देकर फोन के पास ले जाता है।

Félix उसे फोन के पास छोड़कर किचन में आ जाता है ताकि अजनबी प्राइवेसी में बात कर सके।

दर्शक को भी अजनबी की बातें अजीब और बोरिंग लग सकती हैं। पर हरेक बात के पीछे कुछ न कुछ रहस्य है और यह फिल्म के आने वाले भागों से स्पष्ट हो जाता है।

कुछ देर बाद Félix किचन से कमरे में फोन के पास आता है तो अजनबी गायब मिलता है। वह उसे इधर-उधर खोजता है पर वह कहीं नहीं मिलता। वह ऊपरी मंजिल पर जाकर देखता है, बेसमेंट में जाकर देखता है पर अजनबी का नामोनिशान नहीं पा पाता। वह घर से बाहर पब्लिक फोन बूथ में जाता है और पाता है कि फोन तो एकदम ठीक है। उसे विश्वास हो जाता है कि अजनबी ने उससे झूठ बोला था। वह घर वापिस आता है और उसे ऐसा लगता है कि अजनबी घर में ही कहीं है। वह भयभीत हो जाता है।

वह रात को ढ़ंग से सो नहीं पाता, उसे कुछ न कुछ आहट सुनायी देती रहती है। वह कार में आकर सोता है। घर में उसे बहुत सारे ऐसे चिन्ह मिलते हैं जिससे उसे विश्वास हो जाता है कि अजनबी उसके घर में ही छिपा हुआ है।

अपनी पड़ोसन के जिस कुत्ते से उसे नफरत थी अब वह उसे देवदूत लगने लगता है और उसे लगता है कि कुत्ता जरुर छिपे हुये अजनबी को ढ़ूँढ़ निकालेगा। वह पुलिस की मदद भी लेता है पर उन्हे कोई भी आदमी उसके घर में मिलता। यहाँ तक कि उसकी परेशानी देखकर घर आयी प्रेमिका से वह सुलह करना चाहता है और सुलह जैसा वातावरण भी उनके बीच पनप जाता है। Félix अपनी याददाश्त के बलबूते अजनबी का चित्र बनाता है।

अभी तक की फिल्म की यह खूबी है कि फिल्म ऐसा वातावरण बनाती है जहाँ दर्शक को भी पता नहीं चल पाता कि क्या वास्तव में अजनबी Félix के घर में छिपा हुआ है या यह उसके दिमाग का वहम है और वह किसी मानसिक व्याधि का शिकार बनता जा रहा है या बन चुका है।

Félix के दिमाग में घर कर गया भय उसे ऐसा प्रतीत करा देता है मानो Vera उस अजनबी से मिली हुयी है। वह उसे आरोपित करता है। और एक झगड़े के बाद वह घर से चली जाती है।

अकेले Félix के दिमाग में भय की सांद्रता बढ़ती जाती है और रात को आहट होने पर वह अपने होश एकदम खो देता है। उसे लगता है कि कोई बेसमेंट में है। और यह सच भी है। कोई वहाँ वाकई है। दर्शक को लगता ही नहीं वरन दिखायी भी देता है कि कोई वहाँ है। भय से उपजे क्रोध से ग्रसित Félix बेसमेंट का दरवाजा बंद करके अंधाधुँध गोलियाँ चलता है और घर की बिजली और टेलीफोन सेवायें नष्ट करके घर लॉक करके कार में बैठकर घर से कुछ दूर आ जाता है। उसने देखा है कि जो भी अंदर छिपा हुआ था उसे गोली लगी है और फर्श पर पड़ा खून उसने देखा ही था। उसका ख्याल है कि घायल अजनबी कुछ समय में मर जायेगा।

अगर फिल्म इस बात तक सीमित रहती कि – Félix के घर में घुस कर छिप कर रह रहे अजनबी का पता उसे चल गया है तो फिल्म यहाँ खत्म हो जाती है। पर ऐसा है नहीं। फिल्म में रहस्य रोमांच का एक पूरा दौर अभी बाकी है।

कार में आराम कर रहे Félix के हाथ से उस अजनबी का चित्र उड़ जाता है और वहाँ से गुजर रहे दो बच्चे उस चित्र को देखकर Félix को बताते हैं कि यह चित्र तो यहीं पास में रहने वाले Martín (Agustí Villaronga) का है। Félix के मन में उत्सुकता जागती है कि वह Martín के घर में जाकर देखे कि वह क्यों अपना घर छोड़कर उसके घर में छिपा हुआ था। वह छिपकर Martín के घर में प्रवेश कर जाता है।

उसके आश्चर्य की सीमा नहीं रहती जब वह अपनी प्रेमिका की हमशक्ल Claudia (Mónica López) को व्हीलचेयर पर बैठे देखता है।

Claudia क्या वाकई Vera की हमशक्ल है या कि Félix को ही ऐसा दिखायी देता है क्योंकि वह अपनी प्रेमिका से अलगाव से पीड़ित है। फिल्म यह रह्स्य बनाये रखती हैं।

ऐसी परिस्थितियाँ बनती हैं कि Félix, Claudia के घर में छिपकर रहने लगता है। अपनी करतूतों से उसे ऐसा विश्वास हो जाता है कि इसी तरह से Martín उसके घर में छिप कर रहता रहा है। उसे यह भी पता चलता है कि Martín कुछ दिनों से गायब है।

सच्चाई क्या थी? क्या वाकई ऐसा ही था या भ्रम के कारण Félix के सामने एक मायावी संसार उत्पन्न हो गया था।

Claudia के घर में समय व्यतीत करते हुये Félix भिन्न तरह के भावों से गुजरता है। परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं। यहाँ तक कि उसे ऐसे छिपकर रहना अच्छा लगने लगता है वह भूल जाता है कि अपने घर में एक अजनबी की उपस्थिति की आशंका से वह कितना भयभीत रहता था।

फिल्म का अंत एक सन्नाटा छोड़ जाता है। जीवन में सच, भ्रम, भय और अन्य भावों के कारण उत्पन्न मायावी जगत के बारे में बहुत सारे प्रश्न उठ खड़े होते हैं।

90 मिनट की फिल्म दो भागों में बँटी हुयी है और दोनों भाग दर्शक को बाँधे रखते हैं। दूसरा भाग पहले भाग को दर्पण दिखाता है। पहला भाग दूसरे भाग की छवि लगने लगता है पर फिल्म अंत तक पहुँचते-पहुँचते बहुत सारी कलाबाजियाँ खाती है और दर्शक को रहस्य रोमांच से भरे वातावरण से बाहर नहीं निकलने देती।

कैमरा सब कुछ दिखाता है पर दर्शक फिल्म के अंत तक पूरी बात समझ नहीं पाता और केवल अंत में ही उसे कहानी के रहस्य समझ में आते हैं।

पर फिल्म खत्म होने के बाद भी कुछ कड़ियाँ रह जाती हैं जिन्हे वह फिल्म को पुनः याद करके ही जोड़ सकता है। फिल्म के समाप्त होने के बाद ही वह सोच सकता है कि ऐसा कहा गया था और ऐसा हुआ था तो उन सबका तात्पर्य क्या था और कैसे सब घटित आपस में जुड़े हुये थे।

फिल्म में दो कमियाँ खटकती हैं। फिल्म का एक बहुत मह्त्वपूर्ण मोड़ आता है जब Félix अपने घर में बेसमेंट में छिपे हुये व्यक्त्ति पर गोली चलाता है। ऐसा संशय उठता है कि गोली लगने वाला शख्स चिल्लाता क्यों नहीं?

ऐसा संभव है कि चूँकि फिल्म का कैमरा कई बार चरित्र की तरफ से फिल्म के भागों को दिखाता है तो भय और गुस्से से पागल Félix गोली के शिकार की आवाज सुन ही नहीं पाता।

दूसरी कमी फिल्म के क्लाइमेक्स से जुड़ी हुयी है और उसकी चर्चा नहीं की जा सकती।

बहरहाल इन दो मुद्दों के बावजूद निर्देशक Guillem Morales की यह फिल्म एक अच्छे थ्रिलर का भरपूर आनंद देती है। और यह आसानी से भुला सकने वाली फिल्म नहीं है।

फिल्म में कैमरा, लाइट और साऊंड के माध्यम से ऐसा वातावरण रच दिया गया है कि दर्शक आँखें फाड़े स्कीन पर चल रहे घटनाक्रमों में खो जाता है।

 …[राकेश]

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