flowers dancingअगर ईश्वर को मानें तो कहा जाता है कि मानव ईश्वर की श्रेष्ठ कृति है और प्रकृति की श्रेष्ठ रचना निरंतर ऊहापोह में रहती है अपने रचियता से अपने संबंध को जानने, पहचानने और परिभाषित करने के लिये।

अगर ईश्वर सिर्फ मनुष्य की कल्पना की उपज है तो यह मानव जीवन में कला का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। जिस किसी भी मानव ने सर्वप्रथम इस कल्पना को जन्माया उसकी कला और कल्पना पर लाखों टॉल्स्टोय कुर्बान किये जा सकते हैं। मनुष्य चाहे अपने को आस्तिक कहे या नास्तिक, वह ईश्वर से परे नहीं जा पाता है। ईश्वर को चाहे स्वीकार करो या अस्वीकार, मनुष्य का उससे नाता जुड़ा ही रहता है। उसकी मूर्तियाँ बना कर पूजो या उसे निराकार मान कर उसकी इबादत करो, मानव के लिये उसे नज़रअंदाज किया जाना नामुमकिन है। ईश्वर मानव जीवन में आनंद का सबब बन चुका है। वह दाता बन चुका है और मानव प्रतिपल उससे कुछ न कुछ माँगता ही रहता है।

सदियों से मानव ईश्वर और उसके अस्तित्व को महसूस करना चाहता है। कभी उसे आभास भी होता है कि कुछ है जो उसके साथ है पर उसकी समझ से परे है और अपने स्वभाव के कारण वह उसे जानना चाहता है। इतना तो उसे महसूस होता ही है कि वह प्रकृति के विशालकाय खेल का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है।

साधारण मानव सांसारिक जीवन छोड़कर सन्यासी जीवन की ओर गया अपनी इसी इच्छा को पूरा करने के लिये। एकदम साधारण मनुष्य हो या अध्यात्म के मार्ग पर कुछ दूरी तय कर चुकने वाला खोजी, सभी के दिमाग में ईश्वर को लेकर बहुत सारे प्रश्न होते हैं और अपनी अपनी आध्यात्मिक प्रगति के अनुरुप लोगों के प्रश्न होते हैं और इस क्षेत्र के बारे में समझ होती है।

सदियों से बुद्ध पुरुष अपने अपने तरीके से मानव जीवन में किसी ऐसी ऊँचाई पर पहुँचने की ओर इशारा करते रहे हैं जिसकी एक झलक तक एक समय में जीवित रहे असंख्य मनुष्यों को मिल ही नहीं पाती।

भिन्न भिन्न समय और काल में विभिन्न सभ्यताओं ने हजारों तरीके से ईश्वर से मानव जीवन का संबंध परिभाषित करने की कोशिश की है।

उपनिषद ज्ञान की परिकाष्ठा पर पहुँच जाते हैं। बीज के धरती के गर्भ में अंकुरित होने की प्रक्रिया से वनस्पतियाँ अस्तित्व में आती हैं पर अगर बीज को तोड़ो और असंख्य भागों में विभाजित कर दो तो उसके अंदर ऐसा कुछ नहीं मिलता जिसे प्रतिबद्ध बताया जा सके वनस्पतियों के जन्म के लिये।

जन्माने वाला तो पकड़ा नहीं जा सकता। जिसे पकड़ा जा सकता है वह उस अंजान का एक हिस्सा मात्र है जिसे मानव देख, जान और समझ सकता है।

भगवदगीता अपने ढ़ंग से इस संबंध को परिभाषित करती है। अन्य ग्रन्थ तमाम और तरीकों से ईश्वर और मानव के मध्य संबंध को स्थापित और परिभाषित करते रहे हैं।

पातंजलि बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से साक्षी और दृष्टा के उदाहरण के माध्यम से समझाते हैं कि कितना ही पीछे और कितना ही गहरे चले जाओ, दृष्टा जो देख पा रहा है वह वही दृष्य तो नहीं ही हो सकता! साक्षी स्वयं साक्ष्य नहीं हो सकता।

पहुँचे हुये हरेक खोजी ने सदैव इस बात पर जोर दिया है कि विभक्ति नहीं है वहाँ। प्रकृति और मानव अलग नहीं हैं। मानव की दृष्टि के कारण भेद हैं पर वह- जिसे ईश्वर कह लें या प्रकृति, मानवीय इंदियों एवम संभावना से परे के अस्तित्व हैं। वह होने और न होने, दोनों तरह के भावों से परे का है।

द्वैत और अद्वैत के चक्र एक ही समय में उपस्थित रहते हैं और मानव की समझ को भ्रम में डाले रखते हैं।

वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों तरह के मानव अज्ञात की खोज की ओर सहज ही उत्सुक रहते हैं पर दोनों की दृष्टि में एक बुनियादी भेद है। जहाँ वैज्ञानिक बहुत सारे प्रयोगों के बाद जब यह जान लेता है कि कुछ ऐसा है जिसे जाना नहीं जा सकता, कम से कम इस अवस्था में तो नहीं ही जाना जा सकता तो उसके अहं को ठेस लगती है और निराश हो जाता है, दुखी हो जाता है, कुंठित हो जाता है जबकि बहुत प्रयासों के बाद आध्यात्मिक मानव को यह अहसास होता है कि अंजान उससे अंजान ही रहेगा तो इस हार के बावजूद भी वह आनंदित हो जाता है। उसे इतना तो विश्वास हो गया है कि कुछ है जिससे उसका चिरंतन साथ है पर वह परम उसकी पकड़ से बाहर है और वह अंजान ही रहेगा यह अहसास उसे निराशा के गर्त में नहीं भेजता क्योंकि यहाँ तक की यात्रा में कहीं उसके अहं की मौत हो चुकी है और अब वह आनंद को जान गया है, पहचान गया है। अब वह ईश्वर की खोज में भी नहीं है और होने और न होने के भेद से परे चला गया है।

sufi2दुनिया का कोई नशा इस आनंद को नहीं ला सकता।

मानवीय जीवन के आध्यात्मिक क्षेत्र में भ्रमों को प्रस्तुत किया है नाज़ ख्यालवी ने अपने कलाम में।

नाज़ ख्यालवी के कलाम में खुदा की वजह से दुनिया में उत्पन्न विरोधाभासों के कारण उत्पन्न गिले-शिकवे हैं, शिकायतें हैं पर यह सभी प्रेम के अतिरेक भाव में उत्पन्न हो रहे हैं। ईश्वर पर न्यौछावर होकर ये गिले-शिकवे किये जा रहे हैं। जैसे जिससे गहन प्रेम हो उसकी बातें बताते हुये, भले ही वे उसकी किन्ही कमजोरियों की बातें ही क्यों न हो, मानव को अत्याधिक आनंद की प्राप्ति होती है। ऐसी स्थिति भी प्रेम में ही संभव है जहाँ गाली भी शहद सरीखी मिठास लिये हुये दी जाती है, प्रेम इतने अतिरेक भाव में बहता है कि विभोर होकर मानव अपने प्रेमी को निष्प्रभावी गाली देता है।

खुदा की आसक्त्ति में डूबे अंदाज़ में नुसरत फतेह अली खान साब ने इस कलाम को गाया है।

इस कव्वाली नुमा गीत में नुसरत साब की गायिकी इस बात का पूरा इंतजाम कर देती है कि श्रोता इतना खो जाये कि समय के पार चला जाये। नाज़ ख्यालवी द्वारा उपयोग में लाये गये कुछ क्लिष्ट शब्द समझ से परे हो सकते हैं परंतु नुसरत साब की आवाज कभी भी सुनने वाले का साथ नहीं छोड़ती और वह श्रोता को अपने साथ बहाती चली जाती है। श्रोता पर उनकी गायिकी बहुत सारे स्तरों पर कार्य करती है।

एक तो उनकी सम्मोहक गायिकी का असर रहता है, दूसरा उनके द्वारा गाये गये शब्दों के अर्थ श्रोता को मोहित करते हैं और अर्थों को जानकर उसका अंतर्मन उछलने लगता है कि बस यही तो मेरा भी भ्रम है, तीसरे नुसरत साब द्वारा अलग अलग शब्दों को प्रमुखता के साथ ज्यादा जोर देकर या धीरे से गाना गायिकी और शाब्दिक अर्थ के नये आयाम खोलता है।

हर हाल में यह कव्वाली नुसरत साब की जादू भरी गायिकी का जीवंत परिचय देती है।

कभी यहाँ तुम्हें ढूँढा, कभी वहाँ पहुँचा,
तुम्हारी दीद की खातिर, कहाँ कहाँ पहुँचा,
ग़रीब मिट गए, पामाल हो गए, लेकिन
किसी तलक ना तेरा आज तक निशां पहुँचा,
हो भी नहीं और हर जां हो…
तुम एक गोरखधंधा हो… तुम गोरखधंधा हो…

ईश्वर को खोजने के लिये मनुष्य क्या नहीं करता, खोज में मिट भी जाता है पर उसे साक्षात उस रुप में नहीं पा पाता जिस रुप में अपेक्शा करके वह अपनी खोज शुरु करता है। शायद मानव जीवन की सबसे बड़ी विड्म्बना यही है कि वह ईश्वर को अपने जैसे ही रुप में देखना और महसूस करना चाहता है और ऐसी कल्पना इस खोज को सीमितता प्रदान करती है और मनुष्य एक वर्तुलाकार गति में उलझा रह जाता है।

हर ज़र्रे में किस शान से तू जलवा नुमा है
हैरां हैं मगर अक्ल के कैसा है तू क्या है
तुम एक गोरखधंधा हो… तुम गोरखधंधा हो…

इतना तो मनुष्य मान लेता है कि कण कण में ईश्वर का ही वास है पर तब भी उसका अपने अस्तित्व की रुपरेखा और समझ उसे ईश्वरीय अस्तित्व को ऐसे ही देखने की चाह रखने के लिये विवश करती है जैसे वह दर्पण में अपने को देखता है, दूसरों को अपनी आँखों से देखता है।

तुझे दैर-ओ-हरम में मैने ढूंढा तू नहीं मिलता
मगर तशरीफ फर्मा तुझको अपने दिल में देखा है
तुम एक गोरखधंधा हो… तुम गोरखधंधा हो…

ढूँढ़े नहीं मिले हो न ढूँढ़े से कहीं तुम
और फिर ये तमाशा है जहाँ हम हैं वहीं तुम
तुम एक गोरखधंधा हो… तुम गोरखधंधा हो…

इधर-उधर ढ़ूँढ़ने से तो वह नहीं मिलता पर उसका दिल गवाही देता रहता है कि वह है और मनुष्य के अंदर ही नहीं वरन वह हर जगह है। इसी बात को अकबर इलाहाबादी ने कुछ इस तरह से बयां किया था

हर ज़र्रा चमकता है अनवर-ए-इलाही से
हर साँस ये कहती है हम हैं तो खुदा भी है

मनुष्य का अपना वजूद भरपूर गवाही देता है कि खुदा का भी अस्तित्व है।

जब बजूज तेरे कोई दूसरा मौजूद नहीं
तब समझ में नहीं आता तेरा परदा करना
तुम एक गोरखधंधा हो… तुम गोरखधंधा हो…
हरम-ओ-दैर में है जलवा-ए-पुरखन तेरा
दो घरों का है चराग पुर्ख-ए-रोशन तेरा
तुम एक गोरखधंधा हो… तुम गोरखधंधा हो…

मनुष्य को बड़ी कोफ्त होती है कि जब हर रुप में ईश्वर ही है, जब दोनों जहां उसके ही तेज से रोशन हैं तब वह रहस्य की परतों के पीछे क्यों छिपा रहता है?

जो उल्फत में तुम्हारी खो गया है
उसी खोए हुए को कुछ मिला है
न बुतखाने ना काबे में मिला है
मगर टूटे हुए दिल में मिला है
अदम बन कर कहीं तू छुप गया है
कहीं तू हस्त बन कर आ गया है
नहीं है तू तो फिर इंकार कैसा
नफीदी तेरे होने का पता है
मैं जिसको कह रहा हूँ अपनी हस्ती
अगर वो तू नहीं तो और क्या है
नहीं आया ख्यालों में अगर तू
तो फिर मैं कैसे समझा तू खुदा है
तुम एक गोरखधंधा है…तुम एक गोरखधंधा है…

जिसने अपना अहं नहीं खोया उसे ईश्वर की झलक मात्र तक तीर्थों और इबादतगाहों में नहीं मिल सकती। अपने को खोना तो पहली और आवश्यक शर्त है इस यात्रा पर चलने की। मनुष्य को ऐसा भी लगता है कि अगर ईश्वर न होता तो उसे उसके अस्तित्व के अहसास का ख्याल ही क्यों कर आता। जब वह है तभी तो यह विचार भी मानव को सूझा होगा।

हैरान हूँ इस बात पे तुम कौन हो क्या हो
हाथ आओ तो बुत
हाथ ना आओ तो खुदा हो
तुम एक गोरखधंधा हो…तुम एक गोरखधंधा हो…

अक्ल में जो घिर गया ला-इंतहा क्यों कर हुआ
जो समझ में आ गया फिर वो खुदा क्यों कर हुआ
तुम एक गोरखधंधा हो…तुम एक गोरखधंधा हो…

फलसफी को बहस के अंदर खुदा मिलता नहीं
डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं
तुम एक गोरखधंधा हो…तुम एक गोरखधंधा हो…

मानव मूर्ति और निराकार रुप में ईश्वर की परिकल्पना करता रहा है। वह इस बात को भी समझता है कि अगर ईश्वर उसकी समझ में आ गया तो फिर वह ईश्वर कैसे हो सकता है। ईश्वर तो मानव से परे की बात है। दर्शनशास्त्री और तर्क शास्त्री लाख बहस कर लें पर वे सिर्फ शब्दों की परिपाटी को ही पीट रहे हैं सदियों से। वह अपने हथियारों से लैस होकर चल तो पड़ता है पर यह दूरी मानव द्वारा ज्ञात दूरियों से असंख्य गुना ज्यादा बड़ी है। यह इतनी बड़ी है जिसकी कल्पना भी मनुष्य की क्षमता से परे की बात है।

पता यूं तो बता देते हो सबको ला-मकां अपना
ताज्जुब है मगर रहते हो तुम टूटे हुए दिल में
तुम एक गोरखधंधा हो…तुम एक गोरखधंधा हो…

जब के तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा, ऐ खुदा क्या है?
तुम एक गोरखधंधा हो…तुम एक गोरखधंधा हो…

छुपते नहीं हो सामने आते नहीं हो तुम
जलवा दिखा के जलवा दिखाते नहीं हो तुम
दैर-ओ-हरम के झगड़े मिटाते नहीं हो तुम
जो अस्ल बात है वो बताते नहीं हो तुम
हैरां हूँ मेरे दिल में समाए हो किस तरह
हालांकि दो जहां में समाते नहीं हो तुम
ये माबद-ओ-हरम ये कलीसा-ओ-दैर क्यूं ?
हरजाई हो जबीं तो बताते नहीं हो तुम
तुम एक गोरखधंधा हो… तुम एक गोरखधंधा हो…

द्वैत-अद्वैत के विरोधाभासों के द्वंद में फंसा मनुष्य बाज मर्तबा खुदा की कारीगरी से हैरान भी हो जाता है कि वह हाँ और ना को एक साथ प्रस्तुत करता है, वह होने-न होने को एक संभावना एक ही समय प्रस्तुत करता है। वह दर्शनीय और अदृष्य होने के विरोधाभासी तत्व एक साथ उत्पन्न कर देता है। वह सूक्ष्मतम और विशालतम जैसे दो विरोधी रुप एक साथ दिखाता है। न समाये तो सारा जगत उसके लिये छोटा पड़ जाये और चाहे तो वह मनुष्य के दिल में आराम से बसता है।

मनुष्य को शिकायत है कि खुदा उसके साथ शरारत करता रहता है।

दिल पर हैरत ने अजब रंग जमा रखा है
एक उलझी हुई तस्वीर बना रखा है
कुछ समझ में नहीं आता कि ये चक्कर क्या है
खेल क्या तुमने अज़ल से ये रचा रखा है
रुह को जिस्म के पिंजरे का बना कर क़ैदी
उस पे फिर मौत का पहरा भी बिठा रखा है
देके तदबीर के पंछी को उड़ाने तूने
ताम-ए-तकदीर में हर सिम्त बिछा रखा है
करके आरायशी कोनैन की बरसों तुमने
ख़त्म करने का भी मंसूबा बना रखा है
लामकामी का भी बहरहाल है दावा भी तुम्हें
नाम-ए-अकरब का भी पैग़ाम सुना रखा है
ये बुराई, वो भलाई, ये जहन्नुम, वो बहिश्त
इस उलटफेर में फरमाओ तो क्या रखा है
जुर्म आदम ने किया और सज़ा बेटों को
अदलो इंसाफ का मियार भी क्या रखा है
देके इंसान को दुनिया में खिलाफत अपनी
इक तमाशा सा जमाने में बना रखा है
अपनी पहचान की ख़ातिर है बनाया सबको
सबकी नज़रो से मगर खुद को छुपा रखा है
तुम एक गोरखधंधा हो… तुम एक गोरखधंधा हो…

ईश्वर ने मनुष्य को जीवन तो दिया पर उसके सिर पर मौत की धारधार भारी तलवार भी रख दी जो धीरे-धीरे मनुष्य को काटती रहती है और एक दिन वह पूरा कट जाता है। एक तरफ तो मनुष्य को फौलादी इरादे दिये कि वह जो चाहे कर सकता है पर दूसरी तरह भाग्य की रेखायें खींचकर उसे एक वृत्त के अंदर बाँध दिया।

मनुष्य को यह भय है कि उसके कर्मों के कारण उसे सजा मिलती रहती है और उसके इसी भय ने स्वर्ग, नरक, अच्छाई-बुराई के विभाजन उसके सामने किये हैं और उसके मानस को विषयागत बना दिया है और वह भावातीत, या किसी भी विषय से परे जाने में दिक्कत महसूस करता है। मनुष्य यह शिकायत करता है कि जीवन के शुरु में गलती तो पहले मानव ने की थी तो उसके कर्मो की सजा आज के मानव को क्यों दी जाती है। उसे ईश्वर का यह खेल भी समझ नहीं आता कि उसने इसी जगत में ईश्वर विरोधी मानव भी जन्माये हैं। मनुष्य को लगता है कि खुदा ने अपने मनोरंजन के लिये मानव को भाँति भाँति की स्थितियाँ दी हैं जिससे मानव उलझा रहे और ईश्वर का मनोरंजन होता रहे।

नित नए नक्श बनाते हो मिटा देते हो
जाने किस जुर्म-ए-तमन्ना की सज़ा देते हो
कभी कंकड़ को बना देते हो हीरे की कनी
कभी हीरों को भी मिट्टी में मिला देते हो
ज़िंदगी कितने ही मुर्दों को अता की जिसने
वो मसीहा भी सलीबों पे सजा देते हो
ख्वाहिशे दीद जो कर बैठे सर-ए-तूर कोई
तूर ही बरक-ए-तजल्ली से जला देते हो
नार-ए-नमरुद में डलवाते हो खुद अपना खलील
खुद ही फिर नार को गुलज़ार बना देते हो
चाहे किन आन में फेंको कभी माहे इन आन
नूर याकूब की आंखो का बुझा देते हो
लेके यूसुफ को कभी मिस्त्र के बाज़ारों में
आख़िरेकार शहेमिस्त्र बना देते हो
जज़्बे मस्ती की जो मंज़िल पर पहुंचता है कोई
बैठ कर दिल में अनलहक की सदा देते हो
खुद ही लगवाते हो फिर कुफ्र के फतवे उस पर
खुद ही मंसूर को सूली पे चढ़ा देते हो
अपनी हस्ती भी वो एक रोज़ गवां बैठता है
अपने दर्शन की लगन जिसको लगा देते हो
कोई रांझा जो कभी खोज में निकले तुमकर
तुम उसे झंग के बेले में रुला देते हो
जूस्तजू लेके तुम्हारी जो चले कैस कोई
उसको मजनूं किसी लैला का बना देते हो
जोत सस्सी के अगर मन में तुम्हारी जागे
तुम उसे तपते हुए थल में जला देते हो
सोहनी गर तुमको महिवाल तस्सवुर करले
उसको बिफरी हुई लहरों में बहा देते हो
खुद जो चाहो तो सर-ए-अर्श बुला कर मेहबूब
एक ही रात में मेहरोज करा देते हो
तुम एक गोरखधंधा हो…तुम एक गोरखधंधा हो…

आप ही अपना पर्दा हो…आप ही अपना पर्दा हो…
तुम एक गोरखधंधा हो…तुम एक गोरखधंधा हो…

मानव नहीं समझ पाता कि ईश्वर किस बात के पक्ष में है। इसी जगत में मसीहा मानव द्वारा सताये और मारे जाते हैं। पहले ईश्वर मानव के मन में आध्यात्मिक प्रगति करने का विचार डालता है और जब वह उस स्थिति में पहुँच जाता है जहाँ वह घोषणा कर सके कि उसने सत्य जान लिया है और वह पार चला गया है सब तरह के द्वंदों से तब वह ऐसी स्थितियाँ रचता है कि जानने वाले मानव को नारकीय स्थितियों से गुजरकर जान देनी पड़ती है। ईश्वर सच्चा प्रेम करने वालों को भी नहीं बख्शता और उन्हे भी तमाम तरह के दुखों से गुजरना पड़ता है।
मानव को शिकायत है कि ईश्वर बहुत ज्यादा अपनी मर्जी से ही काम करता है और उसके लिये मानव इच्छा का कोई मोल नहीं है और वह अगर चाहे तो मानव को जन्मों-जन्म भटकाये और चाहे तो पल में उसे सारा सत्य दिखा दे।

जो कहता हूं माना तुम्हें लगता है बुरा सा
फिर भी है मुझे तुमसे बहरहाल गिला सा
चुपचाप रहे देखते तुम अर्शे बरीं पर
तपते हुए कर्बल में मोहम्मद का नवासा
किस तरह पिलाता था लहू अपना वफा को
खुद तीन दिनों से वो अगरचे था प्यासा
दुश्मन तो बहर तौर थे दुश्मन मगर अफ़सोस
तुमने भी फराहम ना किया पानी ज़रा सा
हर जुर्म की तौफीक है जालिम की विरासत
मज़लूम के हिस्से में तसल्ली ना दिलासा
कल ताज सजा देखा था जिस शख्स के सर पर
है आज उसी शख्स के हाथों में ही कांसा
ये क्या है अगर पूछूं तो कहते हो जवाबन
इस राज़ से हो सकता नहीं कोई शनासा
बस तुम एक गोरखधंधा हो…तुम एक गोरखधंधा हो…

हैरत की एक दुनिया हो
तुम एक गोरखधंधा हो…

मानव को इस बात से सबसे बड़ा भ्रम होता है कि बेहद अच्छी आत्माओं वाले मानव भी बड़ा कष्टपूर्ण जीवन जीते हैं। शायर अपनी यह शिकायत कर्बला में इमाम हुसैन के माध्यम से प्रस्तुत करता है। हुसैन के दुश्मन तो जाहिर थे ही पर ईश्वर ने भी उनकी किसी तरह से न तो सहायता ही की और न ही किसी किस्म की सहानुभूति ही दिखायी और उन्हे कष्ट से गुजरने के लिये छोड़ दिया। मानव के साथ यह उलझन हमेशा रही है कि जिन्हे अच्छे और सच्चे मानव समझा जाता है वे अपने जीवन में बड़े बड़े कष्टों से क्यों गुजरते हैं जबकि उनके समकालीन खलनायक सरीखे मानव, जो भिन्न भिन्न तरीके की बुराइयों से घिरे नज़र आते हैं, तरह तरह के सुख और ऐश्वर्य से भरे जीवन जीते हुये दिखायी देते हैं। इन सब बातों से मानव इस भ्रम में पड़ जाता है कि क्या अच्छाई का रास्ता बेकार है?

मानव को यह बात हैरान करती है कि एक दिन राजा की तरह रह रहे व्यक्त्ति के जीवन में ऐसा दिन भी सकता है जब वह भिखारी सरीखा हो जाये। ऐसा क्यों होता है यह जानने के लिये मनुष्य उत्सुक तो सहज ही रहता है पर वह ऐसा महसूस करता है कि उसे ऐसा संदेश दिया जाता है कि ऐसे बहुत सारे रहस्य वह जान नही सकता।

हर एक जां पे हो लेकिन पता नहीं मालूम
तुम्हारा नाम सुना है, निशां नहीं मालूम
तुम एक गोरखधंधा हो…

दिल से अरमां जो निकल जाए तो जुगनू हो जाए
और आंखो में सिमट आए तो आंसू हो जाए
जांपेयां हू का बे हू करे जो हू में खो कर
उसको सुल्तानियां मिल जाएं वो बा हू हो जाए
बाल बींका ना किसी का हो छुरी के नीचे
हल्क-ए-असगर में कभी तीर तराज़ू हो जाए
तुम एक गोरखधंधा हो…

किस कद्र बेनियाज़ हो तुम भी
दास्ताने-दराज़ हो तुम भी
तुम एक गोरखधंधा हो…

यूँ तो खुदा हर जगह है पर तब भी वह किसी एक भी वस्तु में निश्चित तौर पर नहीं मिलता या दिखायी देता। मनुष्य ऐसे करिश्मे रोज़ देखता है कि कहीं तो बेहद खतरनाक परिस्थितियों में भी मनुष्य बच जाता है और कभी ऐसी परिस्थितियों में उसकी जान चली जाती है जहाँ से श्वेत धवल रुई बिना मैली हुये सरकती चली जाये।

इस भाग के बाद नुसरत साब के आलाप से स्पष्ट होता है कि इसी भाग से सुधीर मिश्रा की प्रसिद्ध फिल्म हज़ारो ख्वाहिशें ऐसी के प्रसिद्ध गीत – मन ये बावरा …- की धुन का जन्म हुया है।

आह-ए-तहक़ीक़ में हर ग़ाम पे उलझन देखूँ
वही हालात-ओ-खयालात में अनबन देखूँ
बन के रह जाता हूँ तसवीर परेशानी की
ग़ौर से जब भी कभी दुनिया का दर्पण देखूँ
एक ही ख़ाक़ पे फितरत के तज़ादात इतने!
इतने हिस्सों में बँटा एक ही आँगन देखूँ!
कहीं ज़हमत की सुलग़ती हुई पतझड़ का समां
कहीं रहमत के बरसते हुए सावन देखूँ
कहीं फुँकारते दरिया, कहीं खामोश पहाड़!
कहीं जंगल, कहीं सहरा, कहीं गुलशन देखूँ
ख़ून रुलाता है ये तकसीम का अन्दाज़ मुझे
कोई धनवान यहाँ पर कोई निर्धन देखूँ
दिन के हाथों में फ़क़त एक सुलग़ता सूरज
रात की माँग सितारों से मुज़य्यन देखूँ
कहीं मुरझाए हुए फूल हैं सच्चाई के
और कहीं झूठ के काँटों पे भी जोबन देखूँ!
शम्स की खाल कहीं खिंचती नज़र आती है
कहीं सरमद की उतरती हुयी गर्दन देखूँ
रात क्या शय है, सवेरा क्या है?
ये उजाला, ये अंधेरा क्या है?
मैं भी नायिब हूँ तुम्हारा आख़िर
क्यों ये कहते हो के -तेरा क्या है?
तुम इक गोरखधंधा हो…

देखने वाला तुझे क्या देखता
तूने हर-हर रंग से पर्दा किया है
तुम इक गोरखधंधा हो…

प्रकृति में इतनी विभिन्नता है कि परस्पर विरोधाभासी बातें एक ही साथ घटित होती रहती हैं और प्रकृति की विशालता और विभिन्नता मनुष्य को भ्रमित किये रखती है और एक तरफ तो प्रकृति की विभिन्नता और खूबसूरती उसे मोहे रखती है और उसी समय प्रकृति के सामने उसे अपने सीमित अस्तित्व का अहसास होता है और यह अहसास उसे कचोटता है। वह भी अंग बनना चाहता है इन सब परिवर्तनों का। वह अपनी हिस्सेदारी चाहता है राज की इन बातों के घटित होने को जानने में। वह इतना समझता भी है कि ईश्वर जीवन के हरेक रुप में छिपा हुआ है और इसीलिये उसे पकड़ा नहीं जा सकता।
Krishna1
वह एकत्रित भी है और हर जगह बिखरा हुआ भी है। इस द्वैत को कैसे साधेगा मनुष्य? मानवता में विश्वास रखने वाले मानवों को इस बात से बहुत परेशानी होती है कि एक धरती को तरह तरह के बहानों से अलग अलग देशों, सभ्यताओं में बाँट दिया गया है और ये बँटे हुये आंगन अपनी क्षुद्र इच्छाओं की पूर्ति के लिये आपस में लड़ते रहते हैं। जब एक ही वह शक्ति है, मानव भी एक ही तरह का तब यह झगड़ा किसलिये?

मस्ज़िद मंदिर ये मयख़ाने
कोई ये माने कोई वो माने
सब तेरे हैं जानां आशाने
कोई ये माने कोई वो माने
इक होने का तेरे कायिल है
इंकार पे कोई माईल है
असलियत लेकिन तू जाने
कोई ये माने कोई वो माने
इक खल्क में शामिल करता है
इक सबसे अकेला रहता है
हैं दोनो तेरे मस्ताने
कोई ये माने कोई वो माने
सब हैं जब आशिक तुम्हारे नाम के
क्यूं ये झगड़े हैं रहीम-ओ-राम के
बस तुम एक गोरखधंधा हो….

मानव मानता है कि भिन्न मनुष्य अपने अपने तरीकों से ईश्वर की खोज में व्यस्त हैं पर उसे यह बात हैरान करती है कि जब सभी एक ही अहसास की खोज में हैं तो उनमें आपस में झगड़े क्यों हैं?

दैर में तू हरम में तू
अर्श पे तू जमीं पे तू
जिसकी पहुँच जहाँ तलक
उसके लिये वहीं पे तू
बस तुम एक गोरखधंधा हो….

हर एक रंग में यक्ता हो
तुम एक गोरखधंधा हो…

ईश्वर की यह खूबी कि मनुष्य की जितनी समझ हो वह उसी समझ की परिधि में भी अपने होने का अहसास दे जाता है। वह किसी भी हालत में मनुष्य से दूर नहीं है। हाथ बढ़ाने की देर है वह पकड़ने को तैयार है।

मरकज़-ए-जूस्तजू आलम-ए-रंग-ओ-बू
दम बदम जलवागर तू ही तू चार सू
टूटे माहौल में कुछ नहीं इल्लाहू
तुम बहुत दिलरुबा तुम बहुत खूबरू
अर्श की अज़मतें फर्श की आबरु
तुम हो कोनैन का हासिले आरजू
आंख ने कर लिया आंसुओं से वजू
अब तो कर दो अता दीद का एक सुगुं
आओ परदे से तुम आँख के रुबरु
चंद लम्हे मिलन दो घड़ी गुफ्तगू
नाज़ जबता फिरे जाबंज़ा कू-ब-कू
वाहदा-हू वाहदा-हू
ला-शरीक-आ-ला-हू ला-शरीक-आ-ला-हू
अल्लाहू अल्लाहू अल्लाहू अल्लाहू

मानव एक ऐसी अवस्था में जा पहुँचता है जहाँ वह रो रोकर प्रार्थना करता है और सोचता है कि उसके आँसू उसकी शुद्धतम अवस्था के द्योतक हैं और अब वह तैयार है ईश्वर के रुबरु दर्शन को और अब तो ईश्वर को रहस्य की परतें पार करके उसके सामने आ जाना चाहिये जिससे कि वह उससे मुखातिब हो सके। पर शायद यह भी मानव की एक स्थिति मात्र है।

भावनाओं का यह समुद्र भी सूख जाता है और कुछ मानव ईश्वर को लेकर अंतर्द्वन्दों के अखाड़े में वापिस आ गिरते हैं और कुछ इस अवस्था से पार हो जाते हैं और ईश्वर की खोज की साधना के अगले पड़ाव की ओर चल देते हैं।

मनुष्य ईश्वर की खोज में भी आनंद उठाता है। इस खोज में ऐसी स्थितियाँ आ जाती हैं जहाँ उसे अपनी हार का अहसास ही नहीं होता बल्कि उसे यह भी ज्ञात हो जाता है कि हालाँकि उसकी यात्रा पवित्र थी पर उसके लक्ष्य भ्रम और नासमझी के कारण उत्पन्न हुये थे और ईश्वर ऐसे प्राप्त नहीं हो सकता है और इस स्पष्टता के बाद उनका एक अलग किस्म का संबंध ईश्वर से बन जाता है।

नाज़ ख्यालवी ने खुदा के प्रति मानव की आराधना को एक नये रुप में प्रस्तुत किया है। यहाँ शिकायतें और उसकी स्तूति एक साथ चलते हैं।

तुम एक गोरखधंधा हो… ईश्वर प्रेम में डूबने के बाद मैत्री भाव पनप जाने से उत्पन्न हुआ गीत है।

जो आनंद लेने के लिये तैयार हो, जो समय के रुकने को महसूस करना चाहता हो, जो अपने अंतर्मन को नृत्य करते महसूस करना चाहता हो, उसके लिये नाज़ ख्यालवी और नुसरत फतेह अली खान का यह गीत सर्वदा उचित सामग्री प्रस्तुत करता है।

…[राकेश]

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