raavanतेरे इश्क की एक बूँद
इसमें मिल गयी थी
इसलिये मैंने उम्र की
सारी कड़वाहट पी ली
….( अमृता प्रीतम)

एक तो इश्क वह है जो किसी से कोई दूसरा करता है। जिसे यह इश्क मिलता है वह परिवर्तित तो होता ही है। भले ही इस बदलाव में समय लगे पर प्रेम बदलता ही बदलता है।

एक इश्क वह जो दूसरे के कारण अपने अंदर जन्मे या किसी और के न भी होने पर भी अपने ही अंदर जन्मे और विस्तार पाये। दोनों ही सूरतों में इश्क मानव को परिवर्तित करता ही करता है।

जापानी कुत्ते Hachikō की वफादारी का किस्सा दुनिया भर में मशहूर है। वह रोजाना अपने मालिक के साथ रेलवे स्टेशन जाता था और शाम को मालिक की ट्रेन के आने के समय वह फिर से अपने आप स्टेशन पहुँच जाता था और मालिक के साथ ही घर लौटता था। एक बार सुबह मालिक गया तो पर शाम को वापिस नहीं आया। अपने मालिक से अथाह प्रेम के कारण Hachikō बरसों स्टेशन पर नियत उस वक्त आकर इंतजार करता जब उसके मालिक की ट्रेन के आने का वक्त होता था। मालिक तो मर चुका था सो उसे आना न था पर अपने जीवन रहते Hachikō ने स्टेशन पर आकर इंतजार करना न छोड़ा। इंतजार का यह सिलसिला खत्म हुआ मालिक के मरने के लगभग नौ बरसों के बाद Hachikō की मौत के साथ। किताबें छपी हैं Hachikō की स्वामिभक्ति के ऊपर। जापान से लेकर हॉलीवुड तक फिल्में बनी हैं उसकी विशिष्ट वफादारी के ऊपर। उसका जीवन अब दंत कथाओं का हिस्सा बन चुका है।

Hachikō की तरह गंगा भी एक छोटे से रेलवे स्टेशन- अरग पर चौदह बरस उस व्यक्ति का इंतजार करती है जो कह कर गया था कि बस कल तक लौट आऊँगा और नहीं आया। आता भी कैसे?

रावण (गुलशन अरोड़ा) नाम का यह वहशी व्यक्त्ति, जिसे गंगा (स्मिता पाटिल) अपना सब कुछ समझती है, अपने और गंगा के बेहद करीबी हमदर्द कवि नंदू (विक्रम) की हत्या करके भागा हुआ है और पुलिस के हत्थे चढ़ चुका है और जेल में अपने किये अपराध की सजा भुगत रहा है। वास्तव में तो अगर वह जेल न भी गया होता तो भी वह गंगा के पास वापिस आने के लिये उसे स्टेशन पर छोड़कर नहीं गया था। वह तो चालाकी से उससे पीछा छुड़ाकर गया था।

रावण फिल्म की कहानी दंतकथाओं सरीखी है। अरग के पास के गाँव में दशहरे के अवसर पर रावण के पुतले का दहन नहीं किया जाता। ऐसा क्यों नहीं जाता इसके पीछे की कहानी ही फिल्म की कहानी है और यही गंगा की कहानी है और यही रावण की भी कहानी है। यह बुरे द्वारा अपनी बुराई को महसूस करके अपने अंदर बदलाव लाने की कहानी है। यह रावण दहन की नहीं बल्कि रावणियत के दहन की कहानी है।

रावण के गंगा के जीवन में प्रवेश करने से पहले गंगा बेहद गरीबी में जीवन का बोझ ढ़ो रही है। उसके सिर पर उसकी माँ और छोटे विकलांग भाई की देखभाल का जिम्मा भी है और काम कुछ है नहीं। भूख से बिलखते छोटे भाई का पेट भरने के लिये वह फल आदि भी चुराकर लाने की कोशिश करती है।

गरीब गंगा का भगवान पर अगाध विश्वास है। वह अक्सर चाँद के सहारे भगवान से बातें किया करती है। अपनी गरीबी से त्रस्त आकर वह भगवान श्रीकृष्ण को शिकायती पत्र लिखती है और भगवान का कोई पता तो है नहीं अतः वह अपने पत्र के ऊपर लिख देती है – भगवान को मिले– और बिना पता लिखे या टिकट लगाये उसे डाकखाने के बक्से में डाल देती है।

डाकिया और पोस्टमास्टर पत्र को खोलकर पढ़ते हैं और तरस खाकर उसके पते पर चंद रुपये मनीआर्डर से भेज देते हैं। रुपये पाकर गंगा फिर से भगवान को पत्र लिखती है और धन्यवाद के साथ शिकायत करती है कि भगवान ने तो शायद ज्यादा रुपये भेजे होंगे पर डाकिया बीच में ज्यादातर रुपये उड़ा गया होगा और उसे केवल कुछ ही रुपये मिले, और इस बार जब भगवान रुपये भेंजें तो डाक से न भेंजें, सीधे उसे ही दे दें।

गंगा का मदारी मामा उसकी मजबूरी का फायदा उठाकर उसकी माँ को कुछ रुपये देकर फुसला लेता है कि गंगा को उसके साथ मदारी का खेल दिखाने चलना चाहिये और वह हर महीने रुपये भेजता रहेगा। गंगा अपने क्रूर मामा की बंदी बन जाती है। मामा की मार-पीट से त्रस्त होकर गंगा चाँद के सहारे भगवान से वार्तालाप कर रही है और जब वह आँखें खोलती है तो अपने सामने विशालकाय रावण को खड़ा पाती है। चाँद उसके सिर के पीछे चमक कर उसे एक आभा दे रहा है। गंगा को लगता है कि भगवान ने किसी को भेजा है उसकी सहायता के लिये। गंगा की अगाध श्रद्धा बन जाती है रावण के प्रति।

रावण देख चुका है कि गंगा की गाने और बाँसुरी बजाने की प्रतिभा के कारण उसके मामा का खेल देखने ज्यादा भीड़ इकट्ठी हो जाती है और गंगा और उसके मामा की जोड़ी के सामने लोग उसका चाकू फेंकने वाला खेल देखने में रुचि नहीं दिखाते।

चालाक रावण, गंगा और उसके मामा का ट्रक लेकर भाग जाता है।

किस्से कहानियों जैसे राक्षसों जैसा क्रूर है रावण। उसके पास क्रोध, नफरत और जलन जैसी भावनाओं के अलावा और किसी किस्म की भावनाओं की कोई जगह नहीं है। नंदू उसके चाकू के सामने जान हथेली पर रखकर खड़ा रहता है ताकि रावण का खेल चलता रहे पर उसे नंदू की दोस्ती की कोई कद्र नहीं है।

रावण एक घुमक्कड़ आततायी है और जगह जगह घूम कर वह नंदू के शरीर के इर्द-गिर्द चाकू फेंकने का खेल दिखाया करता है और अपने रास्ते में आने वाले लोगों को बेरहमी से कष्ट देता जाता है।

उसके लिये गंगा और बाजार में बैठी वेश्या में कोई फर्क नहीं है और वह उसे भी ऐसे ही भोगना चाहता है जैसे वह वेश्याओं के साथ करता है। कवि ह्रदय नंदू गंगा को रावण की हवस से बचाता तो है पर उसकी गंगा के प्रति सहानुभूति रावण को एक आँख नहीं भाती और नंदू और गंगा को आपस में मेलजोल बढ़ाते देख और एक दूसरे के प्रति संवेदनशीलता दिखाते देख उसके अंदर नंदू के लिये नफरत बढ़ती जाती है। वह नंदू और गंगा दोनों को गाहे-बेगाहे पीटता रहता है।

नंदू को रावण की क्रूरता के बावजूद उस पर भरोसा है। ऐसा ही हाल गंगा का भी है पर रावण इन दोनों संवेदनशील लोगों की कल्पना से बहुत परे, हद दर्जे की क्रूरता का मालिक है। उसके पास सिर्फ इंसानी शरीर भर ही है, इंसानी गुण दूर-दूर तक उसके पास नहीं फटकते।

खेल दिखाते हुये अचूक निशाने वाला रावण जानकर अपना चाकू फेंककर नंदू के सीने में घोंप देता है और उसकी जान लेकर इस तरह से गंगा को लेकर वहाँ से भाग जाता है जैसे नंदू का अस्तित्व उसके जीवन में कभी था ही नहीं।

पुलिस से बचकर भागने वाले रावण के लिये गंगा की उसके प्रति श्रद्धा और आसक्त्ति पाँवों की बेड़ियाँ हैं और वह उसे भी धोखा देकर भाग जाता है।

गंगा के पास बचता है रावण के आने का इंतजार। एक अनजान स्टेशन पर वह रोज़ वहाँ रुकने वाली रेलगाड़ी का इंतजार किया करती है। उसे विश्वास है कि इसी से उसका रावण वहाँ आयेगा। उसे विश्वास है क्योंकि रावण उससे ऐसा कहकर गया था।

काफिले आये गये फिर भी कई बरसों से
जाने एक मोड़ क्यों बैठा है तन्हा कोई

इंतजार कब उसकी सांसों में बस जाता है उसे पता ही नहीं चलता। किसी तरह जिये जाना और और उस जिये जाने की हर घड़ी हर पल में इंतजार के नाम की साँसे लेना उसके लिये एक ही बात बन चुके हैं।

दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना
अज़मते इश्क है उल्फत में फना हो जाना

रावण, गंगा की हालत से बेखबर जेल में अपनी क्रूरता फैला रहा है। पर ऐसा कैसे हो सकता है कि गंगा इतनी अगाध श्रद्धा से उसका इंतजार कर रही हो और एक अंतहीन इंतजार में अपना जीवन होम कर रही हो और उसके यज्ञ की लपटें रावण तक उसकी आँच न पहुँचायें?

रावण अगर जेल से बाहर होता तो शायद उसकी घुमक्कड़ी जीवन शैली बहुत सारी बातें और बहुत सारी स्थितियाँ उसके दिमाग में घुसने ही न देती पर जेल के अंदर का स्थिर जीवन कभी तो कुछ करेगा ही उसके साथ। और ऐसा ही होता है और वह जीवन में पहली बार विचलित करने वाले सपने देखने लगता है। पहली बार उसके अंदर सोच-विचार जन्म लेने लगता है। पहली बार स्मृतियाँ उसके अंदर घर करने लगती हैं। गंगा और नंदू के प्रति किये उसके अत्याचार उसे याद आने लगते हैं। इन्ही सब विक्षोभों से लड़ते हुये एक दिन उसके मन की क्रूरता गिर जाती है और पश्चाताप उसके मन को छू जाता है और जीवन में पहली बार उसकी आँखें आँसुओं के नमकीन शोधक का स्वाद चखती हैं।

कैसे रो रो के पिघलते हैं गुनाहों के पहाड़
आके देखे तो सही ये भी नज़ारा कोई

अरग में चौदह सालों से हरेक दशहरे पर गंगा जाकर रावण के पुतले से चिपक जाती रही है जिससे कि कोई रावण के पुतले का दहन न कर पाये। गंगा की श्रद्धा के सामने स्टेशन मास्टर (ओम पुरी) तो पहले से ही नतमस्तक है, बाद में गाँव का मुखिया भी गंगा के तप का सम्मान करते हुये निश्चित करता है कि दशहरे पर केवल मेघनाद और कुम्भकर्ण के ही पुतले जलाये जायेंगे और रावण का पुतला ऐसे ही छोड़ दिया जायेगा। चौदह साल बाद मुखिया के बाद उसका पुत्र घोषणा करता है कि वह धर्म के मामले में एक पागल औरत को टाँग नहीं अड़ाने देगा और इस बार रावण का पुतला जलकर ही रहेगा।

गंगा के विलक्षण इंतजार की खबरें इधर-उधर के लोगों तक भी पँहुची हैं और एक पत्रकार गंगा की तस्वीरें खींच लेता है और उसके ऊपर एक कहानी बनाकर अखबार में छाप देता है। अखबार में छपी खबर जेल में रावण तक पँहुचती है और पहले से ही विचलित रावण के लिये यह स्थिति असहनीय हो जाती है। चौदह सालों के काल ने उसे बदल दिया है। उसे किसी भी तरह गंगा के पास पँहुचकर उसकी आत्मा का उपवास खत्म कराना है।

ज़िंदगी मेरी है टूटा हुआ शीशा कोई
काश मिल जाये मुझे आज मसीहा कोई
लड़खड़ाने लगे उखड़ी हुयी साँसों के चिराग
हाय किस वक्त मिला बन के उजाला कोई

उधर अरग में मुखिया के बेटे के निश्चय और गंगा के विश्वास के मध्य टकराव है। गंगा तुली है कि रावण का पुतला नहीं जलेगा और मुखिया का बेटा खम ठोके खड़ा है कि रावण तो जल कर रहेगा।

हालांकि निर्देशक जॉनी बक्शी ने अपनी फ़िल्म की रीढ़ की बुनियाद इटली के विश्व विख्यात निर्देशक Federico Fellini की प्रसिद्द फ़िल्म. – La strada (1954) से प्रेरित होकर गढी है और उनके पास दंतकथाओं सरीखी एक बहुत अच्छी कहानी भी थी पर तब भी वे अपनी कहानी को उतनी ही अच्छी ही फिल्म में परिवर्तित न कर पाये। कम बजट का असर फिल्म पर भरपूर दिखायी देता है।

अभिनेताओं में स्मिता पाटिल और ओम पुरी ने ही अभिनय का स्तर बनाये रखा है| विक्रम का चरित्र कायदे से उभर नहीं पाया। नंदू और रावण के रिश्ते की बात पढ़ने में तो अच्छी लगती है पर वह फिल्म में दृष्यों के मध्यम से स्थापित न हो पायी।

बाकी अन्य कलाकार नाटकीयता की ओर ज्यादा रहे।

रावण का चरित्र बहुत संभावनाओं वाला था और डील-डौल में तो गुलशन अरोड़ा खासे आकर्षित करते हैं पर बहुत संभावना वाली इस भूमिका को पाने के बावजूद भी इस फिल्म को वे अपने अभिनय के कारण यादगार न बना पाये। रावण की भूमिका के क्रूर रावण वाले भाग में वे बहुत नाटकीय होने के बावजूद ठीक लगते हैं पर वे बिल्कुल ही पटरी से उतर जाते हैं जब उनके चरित्र के परिवर्तन की बारी आती है। कैमरे के सामने जिस मनोविज्ञानिक और भावनात्मक प्रदर्शन की जरुरत थी वह सिरे से गायब मिलता है। ऐसी भूमिका अगर उस जमाने में नये नये पाँव जमाने की कोशिश करने वाले पवन मल्होत्रा को मिलती तो वे इस चरित्र को वाँछित गहराई दे सकते थे। यह भूमिका कमल हसन या नसीरुद्दीन शाह जैसे अभिनय में गहरे डूबे अभिनेता के लिये वाजिब थी।

समस्या यह है कि ऐसे छोटे बजट की फिल्मों में बहुत स्तरों पर समझौते करने पड़ते हैं और अगर यह निर्देशक की पहली फिल्म हो या शुरुआती फिल्मों में से एक हो तो सारा जोर इसी एक बात पर टिका रहता है कि किसी तरह अपनी पसंदीदा कहानी पर फिल्म बना पायें।

इस कहानी पर वास्तव में दंतकथाओं का माहौल रचने वाली बेहतरीन फिल्म बनायी जा सकती थी। फिल्म के पक्ष में जो बात जाती है वह यह है कि कमजोरियों की वजह से भी फिल्म का दर्शन गायब नहीं होता। अगर बजट और अन्य साधन देखें जायें तो हाल ही में बनी इस फिल्म से हजारों गुना ज्यादा बड़े बजट से बनी मणि रत्नम की रावण से ज्यादा प्रभावी यह फिल्म है।

इस रावण फिल्म को एक धार मिलती है सुदर्शन फाकिर के लिखे गीतों से और जगजीत सिंह के रचे संगीत के कारण। इस फिल्म का गीत-संगीत पहलू इस फिल्म के सभी पहलुओं में श्रेष्ठ है, दूसरा स्थान ग्रहण करती है फिल्म की कहानी।

स्मिता पाटिल और ओम पुरी जैसे बेहतरीन अभिनेताओं की सम्माननीय उपस्थिति से सुसज्जित से सजी यह फिल्म बहुत बहुत अच्छी हो सकती थी।

इस कहानी पर फिर से फिल्म बननी चाहिये। बुराई के प्रेम द्वारा सुधरने की प्रक्रिया में बहुत अच्छे सिनेमा की संभावना छिपी है।

…[राकेश]

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