amanबोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्म है तेरा
बोल कि जाँ अब तक तेरी है
देख के आहंगर की दुकां में
तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन
खुलने लगे क़ुफ़्फ़लों के दहाने
फैला हर एक ज़ंजीर का दामन
बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है
जिस्म-ओ-ज़बां की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहने है कह ले

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फिल्म पचास के दशक के शुरुआती सालों के इजिप्ट के राजनीतिक और सामाजिक परिदृष्य की उथल पुथल को अपनी पृष्ठभूमि बनाती है। यह वह दौर था जब क्रांतिकारी नेता अब्दुल नासर और उनके साथियों ने ब्रिटिश राज के साम्राज्यवाद, जो कि स्वेज नहर को कब्जे में करने के लिये प्रयासरत था, के साथ साथ देश में उपस्थित राजशाही के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा रखा था। जब 1961 में फिल्म प्रदर्शित हुयी तो तब तक नासर को इजिप्ट का राष्ट्रपति बने हुये पाँच साल हो चुके थे और वे वैश्विक राजनीति में नेहरु और टीटो के साथ गुट-निरपेक्ष आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे।

इजिप्ट में हाल ही में तानाशाह होस्नी मुबारक के खिलाफ उठे जन विद्रोह को ध्यान में रखते हुये पचास साल पुरानी इस फिल्म का महत्व बढ़ जाता है। पचास के दशक के जन विद्रोह को जन नेता बन सकने की संभावना रखने वाले अब्दुल नासर और कुछ अन्य व्यक्त्तियों के नेतृत्व ने प्रेरित किया था।

राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल की पृष्ठभूमि में यह फिल्म के प्रेम कहानी और ऐसे आंदोलनों के दौरान मानव-मानव के बीच निरंतर बदलते रिश्तों की कहानी दिखाती है और यही इस फिल्म की खासियत है कि यह विस्तारपूर्वक दर्शाती है कि कैसे सामान्यजन परिवार के हितों की खातिर क्रांति में शामिल होने के लिये अपने अंदर उठ रहे भावों को नियंत्रित करते हैं। कुछ कमजोर लोग हमेशा सत्ता के साथ रहते हैं क्योंकि वे ऐशो-आराम के बगैर ज़िंदगी व्यतीत नहीं कर सकते और ऐसा करने के लिये सत्ता की चापलूसी जरुरी है।

कुछ थोड़े मजबूत लोग गुप्त रुप से तानाशाही और साम्राज्यवाद की मुखालिफत कर रहे लोगों का साथ देते हैं। उनका जोर इस बात पर रहता है कि वे साथ तो देंगे पर उन पर कोई आँच नहीं आनी चाहिये। इनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जो मौका पड़ने पर सत्ता और सत्ता विरोधी, दोनों पक्षों के साथ हो जाते हैं।

कुछ और ज्यादा मजबूत लोग भले ही गुप्त रुप से इन क्रांतिकारियों की सहायता करें पर वक्त्त आने पर वे क्रांति दूतों के साथ गद्दारी नहीं करेंगे और जन उन्हे लग जायेगा कि अब सत्ता पक्ष की नज़रों में वे भी विद्रोह से जुड़ चुके हैं तो वे एक से बढ़कर साहसी कार्य कर सकते हैं।

सबसे मजबूत वे लोग हैं जो साम्राज्यवाद और तानाशाही का विरोध किसी भी कीमत पर करते हैं और ऐसा करते हुये उन्हे किसी भी किस की हानि से भय नहीं लगता। उनका उद्देश्य गलत बात का विरोध करने का होता है।

लोगों की मानसिकता की ऐसी वास्तविकता को देखते हुये महात्मा गाँधी के नेतृत्व की खूबी की सराहना अपने आप सामने आ जाती है। उन्होने भार्त के करोड़ों लोगों को ब्रितानी हुकुमत के साम्राज्यवादी रुप का विरोध करने के लिये प्रेरित कर दिया। अगर राजाओं के भरोसे छोड़ दिया जाता तो ब्रिटेन आज भी भारत पर राज कर रहा होता क्योंकि गिनी चुनी रियासतों को छोड़कर बाकी सभी राजा ब्रितानी हुकुमत के झण्डे की दासता स्वीकार करके आम जनता का शोषण करते रहते।

इस फिल्म को देखते हुये कभी कभी रमेश सहगल द्वारा निर्देशित हिन्दी फिल्म शहीद (1948), जिसमें दिलीप कुमार और कामिनी कौशल ने मुख्य भूमिकायें निभायी थीं, की भी यादें ताज़ा हो जाती हैं।

इजिप्शियन फिल्म उस दौर की है जब फिल्म में नायक – इब्राहिम, की भूमिका निभाने वाले अभिनेता Omar Sharif विश्व प्रसिद्ध अभिनेता नहीं बने थे। डेविड लीन की विशाल फलक वाली फिल्म Lawrence of Arabia अभी आनी बाकी थी।

विश्वविद्यालय में पढ़ने वाला इब्राहिम (Omar Sharif), स्वतंत्रता के लिये लड़ रहे एक क्रांतिकारी गुट का सदस्य हो जाता है और संघर्ष को मजबूती देने के लिये प्रधानमंत्री की हत्या कर डालता है। वह पकड़ा भी जाता है परंतु किसी तरह वह बीमार होकर अस्पताल में भर्ती होकर मौका पाकर अपने साथियों की सहायता से वहाँ से भाग निकलता है।

इब्राहिम को पता है कि पुलिस उसे दोस्तों और रिश्तेदारों एवम क्रांति से सहानुभूति रखने वाले लोगों के घर से आसानी से ढ़ूँढ़ निकालेगी इसलिये वह विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले एक छात्र मोही के घर पहुँच जाता है क्योंकि मोही का प्रत्यक्ष रुप से कोई भी राजनीतिक रुझान कभी भी दिखायी नहीं दिया हैं और उसका रिकार्ड साफ होने के कारण पुलिस कभी भी उस पर शक नहीं करेगी।

मोही अंदर ही अंदर उत्तेजित भी है इब्राहिम को देखकर पर वह भयभीत भी है कि वह पुलिस के चक्कर में पड़ जायेगा। वह अंदर से तो इब्राहिम को अपने घर रखकर अपने एड्वेंचर के भाव को पूरा करना चाहता है पर उसके अंदर ऐसा करने का साहस भी नहीं है।

बात मोही के पिता के पास तक पहुँचती है जो अंतर्मन से तो क्रांतिकारियों के साथ हैं पर उन पर अपने परिवार की जिम्मेदारी भी है और वे नाहक ही अपने परिवार के लिये परेशानियाँ मोल नहीं लेना चाहते। वे धर्म-भीरु भी हैं पर शुरु में उनके भय उनके देशभक्त्ति पर हावी रहते हैं। वे इब्राहिम से क्षमा माँगते हुये उसे अपने घर में पनाह देने में अपनी असमर्थता जाहिर कर देते हैं। पर इब्राहिम के घर से चले जाने के बाद उनका ज़मीर उन्हे कचोटने लगता है और कुछ देर पशोपेश में रहने के बाद वे मोही से कहते हैं कि उन्हे इब्राहिम को घर में पनाह देनी चाहिये।

इबारिम टिक जाते हैं और जल्दी ही वे घर के सदस्य जैसे बन जाते हैं। मोही की छोटी बहन नवल पहले तो इब्राहिम के क्रांतिकारी विचारों एवम कृत्यों के कारण उसके प्रति आकर्षित होती है और फिर उनके दिलों में प्रेम के अंकुर फूटने लगते हैं। इब्राहिम असमंजस में फँस जाता है क्योंकि वह वहाँ कुछ ही समय के लिये ठहरा हुआ है और जीवन की अनिश्चितता उसे प्रेम में आगे न बढ़ने की सीमाओं में बाँध देती है। जिस परिवार ने उसे जोखिम उठाकर पनाह दी अपने कारण वह उन्हे और ज्यादा मुश्किल में नहीं डालना चाहता।

इब्राहिम और नवल के अंतर्द्वंदों को फिल्म प्रभावी ढ़ंग से दिखाती है। इब्राहिम और मोही के परिवार के मध्य पनपे संबंध से उनके जीवन में होने वाली उथल-पुथल ही इस फिल्म की जान है। इन रिश्तों की बदौलत ही मोही के परिवार के सदस्यों के व्यक्तिगत, राजनीतिक और सामाजिक चेतना के विचार उभर कर सामने आते हैं और इन्ही रिश्तों के कारण इब्राहिम के भीतर का द्वंद भी सामने आता है और उसकी समझ हकीकत से टकराकर और ज्यादा परिपक्व और नुकीली होती है।

नवल के प्रति पनपा प्रेम इब्राहिम को व्यक्तिगत जीवन की ओर खींचता है और देशप्रेम दूसरे कर्त्तव्यों की ओर। तानाशाही कानून इब्राहिम के पीछे है और देर सवेर वह पकड़ा जा सकता है। और इस भय में इज़ाफा करता है मोही का दूर के रिश्ते का भाई, अब्दुल हमीद, जो कि नवल की बड़ी बहन से शादी करना चाहता है। मोही के परिवार के किसी भी सदस्य को हमीद पसंद नहीं है और उनकी इब्राहिम को छिपा कर रखने की भरपूर कोशिशों के बाद भी हमीद उसे देख लेता है और ब उसके पास मोही परिवार को ब्लैकमेल करने का नुस्खा मिल गया है। वह इस राज को छिपाये रखने की कीमत चाहता है नवल की बड़ी बहन से शादी कर पाने की रज़ामंदी पाने के रुप में।

जो परिवार शुरु में इब्राहिम को कुछ दिनों के लिये पनाह देने में भय महसूस कर रहा था वह इस मामले में इतना गहराई में शामिल हो चुका है कि मोही के पिता हमीद को चुप रखने के लिये उसे आश्वासन देते हैं कि इब्राहिम के सुरक्षित वहाँ से निकल जाने के बाद उसकी शादी उनकी बड़ी बेटी से हो जायेगी।

फिल्म नवल की बड़ी बहन और हमीद के ह्र्दय परिवर्तन की भी है। बड़ा अजीब मसला है इंसान के दिल का। किसी चाह पूरी करने के लिये यह कई तरह के परिवर्तनों से गुजर सकता है और कालांतर में इन बदलावों के दौरान उसकी मानसिकता भी पूरी तरह बदल सकती है और उसके सरोकार भी बदल सकते हैं।

जिंदा कौमें हाथ पर हाथ रखकर तानाशाही को सहन कर करके दास नहीं बन जाती हैं। वे जनतंत्र के लिये निरंतर संघर्ष करती रहती हैं। वे चल रहे जनतंत्र में से भी प्रदुषण हटाने के लिये अनवरत रुप से प्रयास करती रहती हैं। वे चल रहे जनतंत्र का पतन होते हुये देख कर खामोश नही बैठा करतीं। वे उठ खड़ी होती हैं गलत का विरोध करने के लिये और तब तक चैन की साँस नहीं लेतीं जब तक कि जनतंत्र फिर से पटरी पर न आ जाये।

कितने ही स्वतंत्रता के उपासक इन अभियानों में शहीद हो जाते रहे हैं पर इनकी शहादत की नींव पर ही सभ्य समाज की इमारतें दुनिया भर में खड़ी रहती है।

Henry Barakat की यह फिल्म मानव की स्वतंत्र रुप से जीने की इच्छा की राह में आयी बाधाओं को पार करने के दौरान किये संघर्ष की गाथा दिखाती है।

…[राकेश]

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