Tickets2Tickets की एक खूबी है कि पूरी फिल्म ट्रेन के अंदर फिल्मायी गयी है और इसमें तीन कहानियों का समावेश है जो क्रमशः तीन अलग अलग निर्देशकों, Ermanno Olmi, Abbas Kiarostami और Ken Loach द्वारा निर्देशित की गयी हैं। तीनों कहानियों के चरित्र एक ही ट्रेन से एक साथ यात्रा कर रहे हैं। वे आपस में टकराते भी हैं। तीन निर्देशक तीन अलग अलग कहानियों को अपने अनुसार ढ़ालते हैं और जीवन में आ सकने वाले और आने वाले बहुत सारे भावों से दर्शकों को परिचित कराते हैं।

यह एक बहुत ही रोचक यात्रा है और बहुत ही अच्छा प्रयोग है। यह विचार Abbas Kiarostami का था कि तीन अलग अलग निर्देशकों को एक फीचर फिल्म पर काम करना चाहिये और निर्माताओं को विचार पसंद आ गया और Abbas Kiarostami के ही सुझाव पर Ermanno Olmi और Ken Loach भी प्रोजेक्ट में शामिल किये गये और उन्होने भी ऐसे आकर्षक विचार को शीघ्रता से स्वीकार कर लिया।

Ken Loach ने अपनी कल्पना के आधार पर फिल्म की रुपरेखा तैयार की एक ट्रेन यात्रा के रुप में और उन्होने पहली कहानी भी निर्देशित की, Abbas Kiarostami ने यात्रा में कुछ और चरित्र जोड़े और उनकी कहानी दिखायी, Ken Loach ने कुछ पात्र तो Ermanno Olmi की कहानी से लिये और उनके साथ अपने द्वारा गढ़े गये कुछ नये चरित्रों का टकराव किया और कहानी का अंत ऐसे किया कि उसमें Ermanno Olmi और Abbas Kiarostami द्वारा गढ़े गये मुख्य किरदार भी समा गये।

फिल्म बड़ी सहजता से एक कहानी से दूसरी कहानी पर स्थान्तरित हो जाती है। इसका एक कारण यह भी है कि कुछ बातें तीनों निर्देशकों में समान हैं। तीनों ही कहीं न कहीं Italian सिनेमा  के  Neorealism आंदोलन से प्रेरित रहे हैं।

टिकट को प्रवेश पाने का प्रमाणपत्र माना जा सकता है। समाज में समाजियों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में प्रवेश पाने के लिये व्यक्ति को टिकट खरीदना पड़ता है। जीवन भी एक यात्रा ही है जहाँ बहुत दफा कुछ पाने के लिये भी टिकट लेना पड़ता है। कोई भी यात्रा जीवन यात्रा का ही एक छोटा अंग होती है। बस या ट्रेन जैसे संचार माध्यमों में की गयी यात्राऐं जीवन के फैलाव को एक सीमित स्पेस में बाँध देती हैं और हरेक यात्री अपने अपने जीवन की विभिन्नता लेकर उस यात्रा को शुरु करता है और बाहरी जीवन की तरह कितने ही अलग अलग जीवन उस सीमित स्पेस में अपने अपने रंग लेकर आ जाते हैं। किसी का दुख साथ आता है तो किसी की खुशी। कोई सपनों में खोया हुआ आता है तो कोई कठोर सच के धरातल पर नंगे पाँव चलने से थके और ठुके हुए पैरों के साथ दर्द लिये आता है।

Ermanno Olmi द्वारा रची और निर्देशित किये गये पहले भाग में यात्रा शुरु होती है Austria (Österreich) के शहर Innsbruck के रेलवे स्टेशन से। मानव सामान्यतः समय को अपने दिमाग में खानों में बाँट कर रखता है और आगे की योजनायें बना कर रखता है। अगर किसी को पता है कि वह दो घंटे में एक षर से दूसरे शहर पहुँच जायेगा तो उसका दिमाग सिर्फ दो घंटे की यात्रा के लिये ही तैयार रहता है और उसी के अनुरुप उसके दिमाग में विचार भरे रहते हैं कि यात्रा के उन दो घंटों में वह क्या करेगा और पहुँचने के बाद क्या होगा वह क्या करेगा कैसे करेगा। पर अगर उसी व्यक्ति के सामने ऐसी अवस्था आ जाये कि फ्लाइट कैंसिल हो जाये और उसे ट्रेन से जाना पड़ जाये जो कि उसकी मंजिल तक पहुँचने में दर्जन भर घंटे लेगी तो उसकी मनोस्थिति थोड़ी उथल पुथल हो जाती है। कहानी के इस भाग के मुख्य पात्र हैं पचपन और साठ के मध्य किसी आयु वर्ग के एक प्रोफेसर की जो Austria से वापस जा रहा है। उसे ट्रेन में बैठाने आयी युवती, जो कि उससे कई साल छोटी है,  से लगाव हो गया है और सारे रास्ते वह उसके साथ बिताये गये लम्हों को याद करता रहता है और कुछ ऐसे संवादों की कल्पना भी करता रहता है जो वह कहना चाहता था पर कह नहीं पाया। वह उसे ई-मेल लिखना चाहता है पर कोई न कोई उलझन उसे ई-मेल पूरा करने से रोकती है। फिल्म का यह भाग यह भी दिखाता है कि चाहे स्टेशन पर प्रोफेसर से उसका पासपोर्ट माँगते पुलिस वाले हों या ट्रेन के कम्पार्टमेंट में आ गये आर्मी के जवान और उनके अफसर, इन वर्दी वाले लोगों के किसी भी जगह पहुँच जाने से वहाँ का माहौल एकदम तनाव से भर जाता है और सामान्य लोग सामन्य नहीं रह पाते।

जो प्रोफेसर अपने दिल की बात युवती से कह नहीं पाया और ई-मेल भी नहीं भेज पाया वह एक जीवित और संवेदनशील इंसान होने का सहज साहस दिखाता है जब वह एक शरणार्थी परिवार के नन्हे बच्चे के लिये दूध लेकर जाता है और ऐसा पूर्वाभास होने पर कि प्रोफेसर ऐसा करेगा उसकी सीट के सामने बैठा कठोर आर्मी अफसर अपने मुँह को अपने सिर के ऊपर लटकती अपनी जैकेट से ढ़क लेता है। इसी अफसर के पैर की ठोकर से बच्चे के दूध की बोतल गिर गयी थी और वह उन शरणार्थी परिवार को फर्स्ट क्लास के दरवाजे के पास वाली जगह से कहीं और जाने के लिये डाँट चुका था। इस भाग का फिल्माँकन जितना रोचक है उतना इस भाग में दिखायी गयी कहानी नहीं है। इस भाग की खासियत है प्रोफेसर के सोच विचार को दृष्यों के रुप में दिखाना और यह काम बड़ी कुशलता से किया गया है।

Abbas Kiarostami द्वारा निर्देशित दूसरा भाग लोगों के व्यवहार पर आधारित है और यहाँ मुख्य पात्र हैं एक प्रौढ़ महिला और उसके साथ यात्रा करता एक नवयुवक। यात्रा में लोग अपने व्यक्तित्व और आदतोम को भी साथ लेकर चलते हैं। महिला एक आर्मी जनरल की पत्नी है और अभी हाल ही में विधवा हुयी है। उसकी हेकड़ी दिखाने की आदत बरकरार है और वह सभी को अपने मातहत समझती है। उसे दूसरों की जगह हथियाने में कुछ अजीब नहीं लगता। उसे एडजस्ट करना नहीं आता और उसकी स्पष्ट मानसिकता है कि दूसरे उसकी जरुरतों के अनुसार एडजस्ट करेंगे।

फिल्म का यह भाग विरोधाभासी चरित्रों को दिखाता है और जहाँ महिला दादागिरी दिखाकर सब कुछ करती है वहीं एक अन्य व्यक्ति गलती से उस जैसी गलतियाँ करता है पर जल्दी ही अपनी गलती समझ जाता है। एक रोचक घटना में महिला के साथ चल रहे नवयुवक को उससे भी छोटी उम्र की दो लड़कियाँ ट्रेन में ही मिलती हैं जो उसे बताती हैं कि वे उसकी छोटी बहन की दोस्त हैं और उसे पहचानती हैं और उनके मिलने से नवयुवक दो तरफा माहौल में बँट जाता है। एक तरह तो ये लड़कियाँ हैं जिनके साथ वह बराबरी के स्तर की रोचक बातें करके समय बिता सकता है और दूसरी तरफ उसे अपनी साथी महिला के हर हुक्म की फौरन से पेश्तर तामील करनी होती है। महिला उसे एक गुलाम की तरह से नियंत्रित करती है। फिल्म का यह भाग स्पष्ट रुप से तानाशाही के विरुद्ध है। अंत में महिला के साथ चल रहा उसका नवयुवक साथी उसे छोड़ जाता है।

Tickets1फिल्म की तीसरी कहानी, जो कि Ken Loach द्वारा निर्देशित की गयी है, में तीन अन्य पात्र जुड़ते हैं जो पहले भाग में दिखाये गये शरणार्थी परिवार से टकराते है। यात्रा करने वाले प्रत्येक यात्री के लिये टिकट के मायने अलग होते हैं और उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत कुछ नियंत्रित करती है। तीन नये पात्र स्कॉटिश लड़के हैं जो अपनी फुटबॉल टीम का प्रदर्शन देखने रोम जा रहे हैं। वैसे तो समूह में लड़के हमेशा ही वाचाल हो जाते हैं और स्पोर्टस टीम के फैन्स की भीड़ तो वाचाल होती ही है पर फुटबॉल के स्कॉटिश फैन्स को देखना अपने आप में एक अनुभव होता है। जिसने एक बार भी किसी भी सार्वजनिक स्थल पर इनके दर्शन किये हैं वह इनकी ऊर्जावान वाचालता को कभी नहीं भूल सकता।

यात्री अपने संग अपने पूर्वाग्रह भी लेकर चलते हैं और फिल्म का यह भाग दिखाता है कि कैसे तीनों लड़कों में से एक मूलतः शरणार्थियों के खिलाफ है पर फिल्म यह भी दिखाती है कि कैसे इंसान विशिष्ट स्थितियाँ आने पर एक अलग ही व्यवहार कर जाता है जो उससे कभी भी अपेक्षित नहीं था। यात्रा की समाप्ति पर यह भाग फिल्म को एक ऊर्जावान क्लाइमेक्स देकर खत्म करता है।

तीनों भागों की खासियत है – कैमरे द्वारा दिखायी गयी फिल्म में दर्शक कैमरे के अस्तित्व को महसूस नहीं करता। कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि चरित्र कैमरे के लिये अभिनय कर रहे हैं और वे कैमरे की उपस्थिति के प्रति जरुरत से ज्यादा सजग हैं। एक सहजता पूरी फिल्म में मौजूद है।

निस्संदेह प्रयोगात्मक होने के साथ साथ Tickets एक रोचक फिल्म भी है।

…[राकेश]

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