Jai Ho Democracyभारत- पाकिस्तान के बीच तनाव का आलम ऐसा है कि बिना आग भी धुआँ उठ सकता है और बिना मुददे के भी दोनों देश लड़ सकते हैं, इनकी सेनाएं जंगे-मैदान में दो –दो हाथ न करें तो क्रिकेट के मैदान को भी दोनों देश की टीमें. कमेंटेटर्स, विशेषज्ञ और दर्शक जंग के मैदान में परिवर्तित कर देते हैं|

ऐसे माहौल में जब रंगमंच के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर लेखक निर्देशक रंजीत कपूर की फिल्म जय हो डेमोक्रेसी दिखाती है कि भारत-पाक सीमा पर “नो-मैंस लैंड” में एक मुर्गी की वजह से युद्ध जैसी स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं तो इस स्थिति पर अचरज नहीं होता| न राजनेताओं को कुछ पता है कि किसी मामले को कैसे सुलझाया जाए और न ही मामलों की रिपोर्टिंग कर रहे मीडिया को अनुमान है कि जिस बात की रिपोर्टिंग वह सनसनीखेज अंदाज में कर रहा है उस मसले का अर्थ असल में है क्या? मीडियाकर्मियों को तो यह तक नहीं पता कि भारत-पाक सीमा है कहाँ?

फिल्म की शुरुआत में जब अब्राहम लिंकन, और महात्मा गांधी के सार्थक कथनों, और माओ त्से तुंग और ओसामा बिन लादेन की मार्फ़त काल्पनिक लिपियों में कथन परदे पर आते हैं तो इतना आभास तो हो ही जाता है कि दर्शक एब्सर्डिस्तान – निरर्थकता से भरे संसार, में प्रवेश करने जा रहे हैं|और बाद में फिल्म में टीवी स्क्रीन्स पर चलती “Saving Private Hen” जैसी उक्ति इस बात पर मुहर लगा देती है कि इस फिल्म से सही संबंध जोड़ना है तो निरर्थकता में सार्थकता खोजनी होगी|

फिल्म में तीन अलग भाग हैं जो आपस में जुड़े भी हैं और अलग अलग भी हैं| एक भाग है राजनीति से सम्बंधित और दूसरा है मीडिया से सम्बंधित, और दोनों क्षेत्रों पर फिल्म कटाक्ष के बाण चलाती है, और तीसरा भाग है भारत-पाक सीमा पर तैनात दोनों देशों की सेना से सम्बंधित जहां स्टीरियो टायप बातों पर फिल्म कटाक्ष करती है पर यहाँ संभावनाएं ढूँढ कर मानवता के बीज रोपती है| सैनिकों को भी रोबोट न मानकर मानवीय रूप देकर उनके मध्य मर्मस्पर्शी दृश्य पनपाये गये हैं| इन तीन भागों के मिश्रण के कारण फिल्म दर्शक को रोचकता प्रदान करती है|

जो लोग हास्य-व्यंग्य के जादूगर लेखक हरि शंकर परसाई और शरद जोशी की कलमों से उपजे हास्य-व्यंग्यों की धार के कायल रहे हैं और जिन्हें सआदत हसन मंटों की कालजयी कहानी – “टोबा टेक सिंह” में निरर्थकता और मानवीय सरोकारों के घालमेल ने हमेशा ही प्रभावित किया है उनकी पसंद का तारतम्य रंजीत कपूर की फिल्म – “जय हो डेमोक्रेसी” के सुर-ताल से तुरंत हो जायेगा, पर चकाचौंध से भरपूर हिंदी फिल्मों के नशे में डूबे दर्शकों और फिल्म समीक्षकों को फिल्म के कैनवास और ट्रीटमेंट से जुड़ने के लिए दिमाग को निष्पक्ष ढंग से खुला रख कर फिल्म को देखना पड़ेगा तभी वे इसका आनंद ले पायेंगें|| जैसी हिंदी फ़िल्में हफ्ते दर हफ्ते प्रदर्शित होती रहती हैं उनके नियमित दर्शकों के लिए 90 मिनट के आसपास की जय हो डेमोक्रेसी एक छोटी अवधि की फिल्म है और छोटी अवधि के कारण पैसा वसूल न हो पाने की ग्रंथि से ग्रसित दर्शकों को फिल्म के सरोकार भी छोटे ही लगेंगें|

वर्गीकरण की ही बात करें तो स्टेनली कुब्रिक की विश्व प्रसिद्द फिल्म – “ड़ा. स्ट्रेंजलव” को एक धारा का सबसे चमकदार प्रतिनिधि मान लें तो “जय हो डेमोक्रेसी” उसी धारा के क्लब में शामिल होने का संक्षिप्त प्रयास है|

निरर्थकता को साधकर यह फिल्म अपनी बात कहती है| सभी जानते हैं और सभी मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान जैसे देशों के नेता कितने काबिल और देश हित के मसलों के प्रति कितने गंभीर होते हैं और यह फिल्म नेताओं को इस हद तक विदूषक, शातिर, समझौतापरस्त और अहंवादी दिखाती है कि दर्शक को लगने लगता है कि ये उथले चरित्र के नेताओं के कैरीकेचर मात्र हैं जिनमें कोई गहराई नहीं हैं, कोई परत ही नहीं है| पर कोई परत हो भी नहीं सकती इनके चरित्र चित्रणों में|

रंजीत कपूर दशकों से रंगमंच के दिग्गज निर्देशक रहे हैं और नेताओं की समिति की बैठक वाले प्रसंग के दृश्यांकन को उन्होंने रंगमंच के एक प्रहसन की तरह ही निर्देशित किया है जो कि वाजिब लगता है क्योंकि नाटकीयता से भरे ऐसे क्षेत्र पर कटाक्ष उसी अंदाज में किया जा सकता है| |

भारत की संसद के दोनों सदनों और देश की विभिन्न विधानसभाओं की कार्यवाहियों के प्रसारण बरसों से होते आए हैं और देश ने बहुत बार सांसदों और विधायकों को आपस में गाली गलौज, लात-घूसों, से लड़ते और माइक आदि तोड़कर सदन के अंदर विध्वंस करते देखा है| विभिन्न दलों से आए इन माननीय जन-प्रतिनिधियों को मिलाकर कोई कमेटी किसी मसले पर नियुक्त कर दी जाए तो क्या वहाँ इनमें आपस में ऐसे ही झगडे नहीं होंगे जैसे सदन के भीतर होते रहे हैं? जय हो! डेमोक्रेसी हमारे जनप्रतिनिधियों के असंसदीय और असभ्य व्यवहार का उपहास उड़ाने की हद तक चित्रण करती है और कहीं न कहीं ऐसे दृश्यों को देखते हुए मन में यह प्रश्न तो उठा ही है कि हमने अपना जीवन और देश का वर्तमान और भविष्य पूरी तरह से राजनेताओं के हाथों में गिरवी रख छोड़ा है, जो कि एक स्वस्थ स्थिति तो नहीं ही है|

फिल्म लगभग हर जमी जमाई संस्था का उपहास उडाती है जिसमें सेना भी शामिल है जिसे संयुक्त रूप से नहीं पता कि क्यों कथित दुश्मन देश की सेना से उसे लड़ना पड़ रहा है|

संस्थाओं के शिकंजे से मुक्त एकल व्यक्ति की स्वतंत्रता को यह फिल्म स्थापित करती है|

जब सेना एक संस्था के रूप में अपने ही एक जवान, जो कि मूल रूप से सेना में कुक है और जिसका काम लड़ना नहीं है वरन सैनिकों के लिए खाना पकाना है, को पहले तो बहला फुसला कर “नो मैंस लैंड” में भेजना चाहती है यह कह कर कि अगर वह वहाँ मर गया तो उसे शहीद का दर्जा मिलेगा और वीरता का पुरस्कार मिलेगा पर उसके इंकार करने पर उसे जबरन “नो मैंस लैंड” एरिया में धकेल दिया जाता है और वह दो दिन वहाँ भूखा प्यासा पड़ा रहता है तो पाकिस्तान की ओर से सेना की संयुक्त शक्ति को धता बताते हुए उस ओर का हेड कुक भारतीय कुक के लिए खाना और पानी लेकर “नो मैंस लैंड” में घुस जाता है|

हास्य-व्यंग्य के बेहद स्पष्ट प्रदर्शन के मध्य मानवीय दृष्टिकोण और एकल व्यक्ति और उसकी स्वतंत्रता के महत्व को फिल्म उकेरती है और एक भोली सी आशा प्रदर्शित करती है कि अगर भारत-पाकिस्तान के मध्य से कुत्सित राजनीति हट जाए तो दोनों देश के सामान्य नागरिकों को आपस में जुड़ने से कोई नहीं रोक सकता|

बीती सदी में नब्बे के दशक के अंत में जब भारत और पाकिस्तान अपने अपने परमाणु अभियानों क्रमश: “शक्ति” और “गौरी” की आँच से तप रहे थे तो भारत-पाक तनाव के एक और चरम दौर में दोनों देशों के कलाकारों ने दोनों देशों के मध्य सौहार्दपूर्ण संबंध कायम रखने के लिए अपनी रचनाधर्मिता का उपयोग करते हुए प्रयास किये थे|

ग़ालिब के दो सदी बाद मनाये जाने वाले जयंती समारोह “अंदाज-ए.बयां” की मार्फत मशहूर पाक शायर मरहूम अहमद फराज़ साब ने कहा था…

गुजरे कई मौसम, कई रातें बदलीं
उदास तुम भी हो यारों उदास हम भी हैं
फक़त तुम्ही को नहीं रंज-ए-चाक-दामानी
सच तो ये है कि दारीदाने-लिबास हम भी हैं…

तुम्हे भी जिद है कि मश्के-सितम रहे जारी
हमें भी नाज़ कि ज़ोरो-जफ़ा के आदी हैं

तुम्हे भी जाम कि महाभारत लड़ी तुमने
हमें भी नाज़ कि कर्बला के आदी हैं।

ना खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के पड़ाव
ना शाखे अमन लिये कोई फाख्ता आयी…

तो अब ये हाल है दरिंदगी के सबब
तुम्हारे पाँव सलामत रहे ना हाथ मेरे

ना जीत तुम्हारी ना कोई हार मेरी
ना साथ तुम्हारे कोई ना कोई साथ मेरे…

तुम्हारे देस में आया हूँ दोस्तों अब के
ना साज़ो-नग्मों की महफिल ना शायरी के लिये

अगर तुम्हारी आना ही का सवाल है तो
चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिये।

और इन बढ़े हाथों के स्वागत में भारत के शायर अली सरदार जाफरी  ने कहा था …

जो हाथ तुम ने बढ़ाया है दोस्ती के लिये
मेरे लिये है वो एक ग़म गुसार के हाथ

खुदा करे कि सलामत रहे ये हाथ अपने
अता हुये हैं जो जुल्फें संवारने के लिये

करें अहद के औजार-ए-जंग है जितने
उन्हे मिटाना है और खाक में मिलाना है

करें ये अहद के अरबाबे-जंग है जितने
उन्हे शराफत-ओ-इंसानियत सिखाना है

तुम आओ गुलशन-ए-लाहौर से चमन बरदोश
हम आये सुबह बनारस की रोशनी लेकर
और उसके बाद ये पूछें कि कौन दुश्मन है?

 

रंजीत कपूर की फिल्म “जय हो! डेमोक्रेसी” को उसी “डोव-टॉक” का एक भाग माना जा सकता है|

जब सारी बंदिशें तोड़कर दोनों देशों के सैनिक “नो-मैंस लैंड” में घुसकर उत्सव मनाते हैं और वडाली भाइयों की गजब की गायिकी माहौल को गुलज़ार करने लगती है तो यही एक भाव तो उठता है कि काश ऐसा ही तो हो!

हो सकता है इस आशावादी दृष्टिकोण का उपहास उड़ाया जाए पर एक कलाकार की इतनी स्वतंत्रता तो वाजिब है कि वह ऐसा सोच सके और उसे अपनी फिल्म का हिस्सा बना सके|

भारतीय कुक दवारा हीर की कुछ पंक्तियों को गाते सुन कर पाक सेना का एक जवान कहता है क्या उधर के लोगों का गला भी इतना सुरीला हो सकता है? एक अन्य सैनिक कहता है – ओए अपनी हीर गा रहा है| और पहला सैनिक कहता है – पर गा कितना मीठा रहा है|

निरर्थक विवादों में ऐसी सार्थक बात स्थापित करती है फिल्म|

वडाली भाइयों द्वार्रा गाये गजब के गीत और फिल्म के बहुत ही अच्छे पार्श्व संगीत के बलबूते यह बात तो सिद्ध होती है कि रंजीत कपूर श्रेष्ठ संगीत के उम्दा पारखी हैं| किस दृश्य में पार्श्व में कौन सा वाद्ययंत्र बजेगा इसका संयोजन प्रभावशाली तरीके से हुआ है|

फिल्म की अवधि कम है और बहुत सी रोचक बातों के कारण ऐसा भाव आता है कि काश फिल्म की सामग्री को थोड़ा और विस्तार दिया जाता, पर सफलता और असफलता के दौर से दूर हट जाने के बाद के दौर में बिना किसी अपेक्षा के दर्शक इन्हे देखते हैं तभी ऐसी फिल्मों का वास्तविक मूल्यांकन हो पाता है| क्योंकि अक्सर तो धूम-धडाके वाली फिल्मों से तुलना करे बिना दर्शक और समीक्षक का दिमाग मानता नहीं और ऐसी तुलना असंगत हो जाती है| अब किसी फिल्म की सफलता की जीवनी कुछ अरसे बाद सिनेमाघरों में प्रदर्शन, डीवीडी, और टीवी पर प्रदर्शन के संयुक्त उपक्रम को ध्यान में रखकर ही लिखी जा सकती है| इनमें से हर माध्यम के दर्शक अलग होते जा रहे हैं और किसी फिल्म का पूरा प्रदर्शन तीनों माध्यमों के दर्शकों के औसत जुड़ाव से ही मापा जा सकता है|

सिनेमाघरों के प्रदर्शन से इतर (जो बहुत सारे अन्य तत्वों पर निर्भर करती है) डीवीडी और टीवी पर इसकी आयु लम्बी प्रतीत होती है| और सिनेमाघरों में भी ऐसी अच्छी संभावना वाली फिल्मों को प्रोत्साहित किया ही जाना चाहिए|

भारत-पाक एकता के सन्दर्भ में यह एक महत्वपूर्ण फिल्म साबित होगी|

 

…[राकेश]

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