humnedelhiरूप, स्पर्श, स्वर, स्वाद और गंध पांच ऐसे विषय हैं जिनके सम्मोहन से मनुष्य जीवन आदिकाल से बंधा हुआ है और अनंत काल तक, या जब तक धरती पर मनुष्य जीवन उपलब्ध है, बंधा ही रहेगा| यह सिद्ध रूप में कहा जा सकता है कि इन पाँचों बोधों की स्मृति मानव के जेहन में एक छाप बनाए रखती है और इनके पुनः संपर्क में आते ही व्यक्ति की स्मृति में इनसे सम्बंधित इतिहास की पूरी कुंडली खुल जाती है| मनुष्य जीवन के इन पांच महत्वपूर्ण विषयों में से एक गंध को गीतकार गुलज़ार ने खामोशी फिल्म के इस खूबसूरत गीत के मुखड़े में इस तरीके से पिरोया कि अपने आप में मुखड़े का कोई अर्थ नहीं है परन्तु सुनने वाले को लगता है कि यह एक एहसास है जिससे वह अपरिचित भी नहीं क्योंकि मुखड़े के सारे शब्दों से वह भली भांति परिचित है और सामूहिक रूप से एक ठोस अर्थ भले ही मुखडा न उकेरता हो पर इन्ही शब्दों के इस ताने बाने में कहीं न कहीं एक ऐसा अर्थ भी छिपा है जिससे वह परिचित है या होना चाहता है|

 

हमने देखी हैं उन आँखों की महकती खुशबू

हाथ से छू के इसे रिश्तों का इलज़ाम न दो

अब कोई खुशबू को देख नहीं सकता पर उस प्रक्रिया को महसूस कर सकता है जिसमें खुशबू उसके सूंघने के क्षमता को प्रभावित करके उसके मानस पटल पर छा जाती है और उसके अस्तित्व को सुगन्धित कर जाती है| हम आँखों से झलकती प्रसन्नता को देख सकते हैं, उसमें समाई उदासी से उदास हो सकते हैं, मानव जीवन में बसने वाले समस्त भाव मानव की आँखों से व्यक्त हो सकते हैं और सामने खड़ा मानव उन्हें देख सकता है, पर कोई कैसे आँखों की महकती खुशबू को देख सकता है? कोई भी किस तरह संसार के सबसे सुगन्धित फूल की सुगंध को देख सकता है| वह यह देखता है कि इस फूल से यह दिव्य सुगंध आ रही है और नाक और आँखों के माध्यम से वह फूल और उसकी सुगंध के बीच एक संबंध बना लेता है| इसी संबंध को देखना कहा जा सकता है, क्योंकि अगर व्यक्ति के पास देखने की क्षमता न हो तो वह फूल की सुगंध का आनंद तो ले सकता है पर वह उस सुगंध का उसके जनक फूल के साथ रिश्ता नहीं परिभाषित कर सकता| वह ऐसा तब कर सकता है जब कोई देख सकने वाला मानव उसे यह बताए कि इस फूल से यह सुगंध आ रही है और न देख सकने वाला व्यक्ति स्पर्श करके फूल के अस्तित्व को महसूस करे| पर सुगंध का आनंद लेने मात्र के लिए सुगंध का उसके स्त्रोत से रिश्ता कायम करने की आवश्यकता है नहीं, मानव की ज्यादा से ज्यादा जानने की उत्कट अभिलाषा ही उसे हर बात को रिश्ते में बाँधने की प्रवृत्ति की ओर ले जाती है और इस प्रक्रिया में बहुधा वह विशुद्ध आनंद के रस में सराबोर होने से वंचित रह जाता है और बुद्धि के जाल में अटका रह जाता है|

इस खूबसूरत गीत के मुखड़े का आनंद इसे समझने में नहीं वरन यह मुखडा समझने का प्रयास भी न करते हुए आनंद लेने वाली रचना है| अटपटे अर्थहीन मुखड़े में अपना एक अलग रस है और इस गीत को पसंद करने वाला इस मुखड़े में बिना अटके, बिना दिमाग की ऊर्जा को जाया किये गीत का आनंद उठाता जाता है| मैंने उस सुगंध को सूंघा है मुझे याद है में कवित्व नहीं पर मैंने उस खुशबू को देखा है में एक नई बात लगती है| गीत में जो गुण हैं, उन्ही के बल पर यह गीत पिछले 46 सालों से हिंदी फ़िल्मी गीतों के रसिकों के मध्य जीवित है और लगातार सुना और देखा जाता रहा है|

सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो

हमने देखी हैं उन आँखों की महकती खुशबू

हाथ से छू के इसे रिश्तों का इलज़ाम न दो

धरती पर जन्मा हर कवि, हर रचनाकार, हर कलाकार प्रेम को अपने तईं परिभाषित जरुर करना चाहता है और रोमांटिक कवि की रचनाएं तो इस प्रयास के इर्द गिर्द बार बार लौटती रहती हैं| गुलज़ार भी इस गीत में विशुद्ध प्रेम को परिभाषित करने का प्रयास करते हैं| एक आदर्शवादी प्रेम की परिकल्पना का सुगन्धित फूल का अस्तित्व वे इस गीत में गढते हैं| प्रेम पर एक बेहतरीन बात टैगोर ने कही …

प्रेम एक अंतहीन रहस्य है,

क्योंकि उसे समझने के लिए

उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है|

प्रेम को सिद्धांतों और हजारों पन्नों की व्याख्याओं के बलबूते नहीं समझाया जा सकता, प्रेम को समझने के लिए प्रेम में डूबना पड़ता है, बिना प्रेम को जीवन में जिए प्रेम को न तो जाना जा सकता है न समझा| बल्कि यह भी सत्य है कि प्रेम को जीने के बावजूद भी इसे समझना अबूझी पहेली ही रह जाता है|

तभी शायर ने इश्क के बारे में कहा है

ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजिए

इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

प्रेम बड़ी बात है, बड़ी घटना है पर बहुत बड़े और बहुत सूक्ष्म और महीन को हम मानव देख नहीं पाते, समझ नहीं पाते सो हर बात को हम अपनी समझ के दायरे में लाने के लिए उस आकार और आकृति में सीमितता प्रदान कर देना चाहते हैं जहां हम उस समझ के स्वामी बन जाएँ और बात हमें इस मूल बात की तकलीफ न दे कि हमसे कुछ अनसुलझा रह गया| मानव और ईश्वर (मानव निर्मित परिकल्पित) का संबंध इस प्रक्रिया का श्रेष्ठ उदाहरण है| भांति भांति के जीव जंतु और वनस्पतियां होने के सत्य बोध होने के बावजूद मानव यही समझता है और स्वीकारता है कि सारे संसार को रचने वाला ईश्वर मानव जैसा ही दिखाई देता होगा| यह सिद्धांत हर बात को अपने ही तरीके से समझने की जिद से उपजा है|

प्रेम भी ईश्वर है और प्रेम भे ईश्वर तक ले जाने का मार्ग है, इसे सदियों से जानने वालों ने, और बोध को प्राप्त हो चुके संतों ने बार बार कहा है| कबीर ने कहा

प्रेम गली अति संकरी, तामें दाऊ न समाई

जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाहीं

भारत भूमि पर सदियों से प्रेम को बड़ी महत्ता प्रदान की गई है| प्रेम में अहंकार नष्ट हो जाता है, अहंकार है तो प्रेम पनप नहीं सकता और प्रेम है तो अहंकार जागा नहीं रह सकता, इसे सुप्तावस्था में जाना ही पड़ता है| सो प्रेम को लेकर दर्शन गढना भारत के न केवल साहित्यिक जीवन की निरन्तर चली आ रही परम्परा रही है बल्कि इस देश के अध्यात्मिक परिवेश में भी प्रेम एक ऐसी सान रही है जिस पर चढ़कर मानवों ने परम सत्य के बोध के क्षणों को जिया है|

हर सत्य शब्दों में व्यक्त नहीं हो सकता क्योंकि शब्द सीमितता प्रदान कर देते हैं और सत्य विराट हो सकता है या अति सूक्ष्म| ऐसा ही प्रेम के साथ भी है| गुलज़ार इसीलिए बुद्धिमत्ता का सहारा लेकर प्रेम को परिभाषित करने का प्रयास नहीं करते इस गीत में बल्कि यह संकेत करते हैं कि प्रेम क्या नहीं है और क्या नहीं हो सकता|

प्यार कोई बोल नहीं प्यार आवाज नहीं

एक खामोशी है सुनती है कहा करती है

न ये बुझती है न रुकती है न ठहरी है कहीं

नूर की बूँद है सदियों से बहा करती है

प्यार एक खामोशी है …सुनती है …कहा करती है, क्या खामोशी सुन सकती है कह सकती है? ऐसा होता है और प्रेम और (घृणा जो प्रेम का एकदम उलट है) में ऐसा बहुधा होता है जब खामोशी बोलती है सुनती है| गीत की इन पंक्तियों को उलटबासियों की परम्परा का माना जा सकता है जहां पानी में आग लगा करती है|

शब्द तो शोर हैं तमाशा हैं

मौन ही प्रेम की भाषा है

प्रेम में तो खामोशी का बहुत बड़ा स्थान है, गहन प्रेम में मौन उतरता है| संगीत भी गायक के बोलों या वाद्य यंत्रों से निकले स्वरों में नहीं वरन स्वरों के मध्य बसे मौन में होता है|

प्रेम में नीरवता कितनी सहज एवं सुखकर प्रतीत होती है, ये जानने के लिए प्रेम से उपयुक्त माध्यम कोई नहीं है| और जहां प्रेम हो वहाँ कुछ कहने सुनने की इच्छा ही कहाँ होती है|

प्रेम हृदयों में गहरा जाए तो भले ही वह शब्दों के माध्यम से सम्बंधित प्रेमियों दवारा व्यक्त न हो पर वह मौन रह हाव भावों से या उन्हें भी अनुपस्थित करके प्रदर्शित किया जा सकता है| ह्रदय से विकरित प्रेम समबन्धित ह्रदय तक पहुच ही जाता है, इसे किसी बाहरी माध्यम की दरकार नहीं होती|

तुम मुस्कराए

तुमने मुझसे कोई बात न की

पर मैंने महसूस किया कि

इसी के लिए मैं लम्बी प्रतीक्षा पर था|

जब पहले पहल किसी मानव के ह्रदय में प्रेम का प्रस्फुटन हुआ होगा प्रेम का अस्तित्व तो उससे पहले भी था बस मानव जीवन में इसके प्रकाश की ज्योति जलने का बोध तब से हुआ|

न ये बुझती है न रुकती है न ठहरी है कहीं

नूर की बूँद है सदियों से बहा करती है

प्रेम प्रकाश की वह बूँद है जो आदि काल से बह रही है और जो कोई भी मानव इसकी छुअन के सर्वथा योग्य बन जाता है यह उसे प्रकाशित कर देती है| समय समय पर प्रेम के प्रकाश स्तंभ भी जन्मते रहते हैं जो प्रेम के पवित्र, गहरे और ऊँचे अस्तित्व का उदाहरण मानव के सम्मुख करते हैं| कृष्ण और राधा का प्रेम, मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम, प्रेम के ऐसे ही शिखर हैं| प्रेम के प्रकाश की वही बूँद धरा पर मानव जीवन में बह रही है जिसने कभी  राधा कृष्ण  को प्रकाशित किया या मीरा को आभामयी बनाया, बात सदैव उस योग्य बनने की है जहां ह्रदय में विशुद्ध प्रेम का वास हो सके| पर साधारण जीवन में प्रेम अन्य किस्म की गर्द के आवरणों में लिपट कर ढक जाता है और सतह पर जो रह जाता है वह प्रेम के नाम ढकोसला होता है और कथित प्रेमी फिर हिंसक हो उठते हैं कि क्या यही प्यार है या था जिसके लिए इतने पापड बेल रहे थे|

प्रेम से सराबोर व्यक्ति भीड़ से अलग व्यक्ति हो जाता है| वह भीड़ में भी अकेला हो जाता है और नितांत अकेलेपन में भी अकेला नहीं होता| मानसिक संतुलन खोये व्यक्ति ही अपने आप से बातें नहीं किया करते प्रेम में जी रहे व्यक्ति को भी बाकी दुनिया इसीलिये दीवाना कहती है क्योंकि वह उन जैसी साधारण जीवन शैली से बंधा नहीं रह पाता| वह आनंद में है और अपने प्रेम से कभी भी मुखातिब हो जाता है|

मुसकराहट सी खिली रहती है आँखों में कहीं

और पलकों पे उजाले से झुके रहते हैं

होंठ कुछ कहते नहीं, कांपते होठों पे मगर

कितने खामोश से अफ़साने रुके रहते हैं

सिर्फ एहसास है ये रूह से महसूस करो

प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो

हमने देखी हैं उन आँखों की महकती खुशबू

हाथ से छू के इसे रिश्तों का इलजाम न दो

हमने देखी हैं …

 

प्रेम में जी रहे व्यक्ति के चेहरे पर एक अलग ही आभा पसरने लगती है उसकी आँखों से एक अलग ही रस बरसने लगता है, उसके होठों पर अलग किस्म के भाव हमेशा उपस्थित रहने लगते हैं| लगता है जैसे कुछ कह रहे हों या कहना चाहते हों या कुछ है जिसे होंठ कहना चाहते हैं पर जिन्हें कहने से रोका जा रहा है| अहं ब्रह्मास्मि और अनहलक के उद्घोष की भांति प्रेम में जी रहा व्यक्ति भी कभी प्रेम की उद्घोषणा करना चाहता है पर यह जरूरी नहीं वाणी से उच्चारित हो, यह उसके मौन स्वरूप से भी विकरित होती है|

प्रेम में तो वह अवस्था भी आ जाती है जहां प्रेम कहने को प्रेरित हो जाता है

I shall ever try to keep my body pure

Knowing that thy loving touch upon all my limbs…

गीत को कायदे से देखा जाए तो यह एक पुरुष प्रेमी के उदगार हैं और फिल्म में भी इसे नायक (राजेश खन्ना) ने लिखा है और जिसे उसकी उस समय की प्रेमिका रेडियो पर गाती है जब वह कालेज में पढ़ा करता था और एक रचनाशील और संतुलित दिमाग का मालिक था|

हेमंत कुमार ने इसे मधुर धुनों में ढ़ाला है और लता मंगेशकर ने इसे बेहद खूबसूरत अंदाज में गाया है| पर काश इस गीत के इस स्वरूप के अलावा इसके मूल स्वरूप के अनुसार इसे पुरुष गायक के स्वर में भी गढा जाता|

…[राकेश]

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