holi1984होली (1984) नये फिल्मकारों के लिए एक बहुत अच्छी गाइड है और यह नवोदित निर्देशकों और तकनीकी लोगों, खासकर कैमरा निर्देशकों और कैमरा ऑपरेटर्स को बहुत कुछ सिखा सकती है| होली के निर्देशक केतन मेहता, FTII पुणे के छात्रों के साथ एक वर्कशॉप कर रहे थे और उसी वर्कशॉप की परिणति “होली” फिल्म के रूप में हुयी|

जिस तरह एक लकड़हारा या कारपेंटर मनोवांछित परिणाम पाने के लिए लकड़ी पर अपनी दक्षता का उपयोग करने से पूर्व अपनी कुल्हाड़ी और अन्य औजारों की धार को पनपाने में बहुत समय और ऊर्जा को निवेशित करता है, उसी तरह होली भी एक बेहद ठोस और योजनाबद्ध तैयारी का परिणाम है|

फिल्म की शूटिंग से पहले ही कायदे का पूर्वाभ्यास (रिहर्सल) कर लिया जाये और तैयारी पूरी हो तो न केवल समय और पैसे की बचत होती है बल्कि फिल्म का स्तर भी बढ़ता है और फिल्म से जुड़े लोगों के प्रदर्शन का स्तर भी| यदि फिल्म में काम करने वाले कलाकारों के पास पूर्व में काम करने का अनुभव न हो या बहुत कम अनुभव हो तो रिहर्सल की महत्ता कई गुना बढ़ जाती है| नवोदित कलाकारों के पास ऊर्जा, लगन और समय की कमी भली ही न हो पर क्राफ्ट की गुणवत्ता पर अधिकार में कमी हो सकती है और रिहर्सल उन्हें अंतिम शूटिंग के समय बेहतर प्रदर्शन करने के लिए तैयार करती है और रिहर्सल फिल्म निर्माण के आर्थिक पहलू का भी ध्यान रखती है|

धन फिल्म निर्माण का बेहद महत्वपूर्ण पहलू होता है और किसी नवोदित फिल्म निर्देशक के लिए यह अति आवश्यक होता है कि वह सीमित बजट में अच्छी गुणवत्ता की फिल्म बना कर दिखाए ताकि फिल्म को सफल बनाने की संभावना में कमी न रहे| आर्थिक मजबूरियाँ अक्सर फिल्म निर्देशकों और उनकी तकनीकी टीमों को मजबूर और प्रोत्साहित करती हैं कि वे अपनी कल्पना का सहारा लेकर कार्य पूरा करने के लिए वैकल्पिक साधनों को अपनाएँ|

कहते हैं कि चालीस के दशक में द्वतीय विश्वयुद्ध के समय विख्यात फिल्म निर्माता-निर्देशक वी. शांताराम को फिल्म के स्टॉक की कमी पड़ गयी| फिल्म बाहर से आयात की जाती थी, और युद्ध के कारण उसकी आपूर्ति बाधित थी| शांताराम को फिल्म पूरी करनी थी और वे 75-80% से ज्यादा शूटिंग निबटा चुके थे| किसी तरह उन्हें फिल्म का थोड़ा सा स्टॉक मिला| उन्होंने गणना की कि अगर एक इंच भी फिल्म जाया न की जाए तभी वे अपनी फिल्म की शूटिंग उस उपलब्ध फिल्म स्टॉक में पूरी कर सकते हैं| उनके पास उनकी इच्छानुसार परफेक्ट शॉट्स पाने तक रि-टेक्स को वहन और सहन करने की लक्जरी नहीं थी| उन्होंने निश्चित किया कि वे गहन रिहर्सल के बाद एक ही टेक में बची हुयी फिल्म के हिस्सों को शूट करेंगे| उन्होंने अपने साथी कलाकारों के साथ जम कर रिहारासल करके उन्हें फाइनल टेक के लिए तैयार किया और कैमरा एक जगह फिक्स कर दिया गया और कलाकार फ्रेम में आते गये और अपना भाग निभाते रहे और बिना किसी ब्रेक के शांताराम ने 15-20 मिनट लंबे सिक्वेंस फिल्माए और अपनी समस्या को अपने निर्देशकीय और तकनीकी कौशल और चातुर्य से सुलझा लिया|

होली में ऐसे दृश्यों की भरमार है जो बिना किसी अंतराल के लगातार 5-6 मिनटों की शूटिंग से जन्में हैं| उनमें कहीं कोई एडिटिंग नहीं की गई है और वे अनवरत शूटिंग के उत्पाद हैं| अगर कोई सीक्वेंस ऐसा है जिसमें इनडोर से आउटडोर के दृश्य जुड़े हुए हैं तो कैमरे को कक्ष के दरवाजे पर इस तरह निश्चित किया गया है कि पहले कक्ष के अंदर की सभी वांछित गतिविधियां कैमरे में पकड़ ली गईं और फिर कलाकार बाहर आते हैं और कैमरा उनका पीछा करते हुए या उनसे आगे रहते हुए अनवरतता को कायम रखते हुए बाहर भी उनकी गतिविधियों को पकडता चला गया| इतने लंबे टेक्स के लिए बहुत महीन योजना और एक पूर्णता को प्राप्त रिहर्सल की आवश्यकता होती है ताकि कैमरा ऑन होने के बाद फाइनल टेक में कोई गलती न हो|

इस तरह की शूटिंग में कैमरामैन का काम बहुत मुश्किल हो जाता है क्योंकि उसे बिना गलती किये अपनी पूरी दक्षता के साथ प्रदर्शन करना होता है और अगर उसे स्थिर न रहकर यहाँ वहाँ चरित्रों के साथ विचरण करना हो और कैमरे को भिन्न कोणों पर चलायमान रखना हो तब उसकी मुश्किल और उसकी दक्षता के स्तर का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है| निर्देशक और कैमरा निर्देशक/कैमरा मैं के मध्य बहुत ही गहरा तालमेल आवश्यक है और होली में निर्देशक केतन मेहता और कैमरा संभाल रहे जवाहर चौधरी की जोड़ी ने कमाल का तारतम्य दिखाया है|

होली के दृश्यों को देखकर जिज्ञासा उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि जाना जाए कि केतन मेहता और जवाहर चौधरी ने किस तरह फिल्म को शूट किया| क्या उन्होंने उस वक्त हाथों में कैमरे को रखकर फिल्म शूट की? क्या उनके पास उस वक्त

steadycam rigs की सुविधा थी? क्या उनके पास ऐसे यंत्र उस वक्त थे जिन्हें शरीर पर पहनने से चलायमान तरीके से कैमरे को उपयोग में लाने पर कैमरे को लगने वाले झटकों से बचा जा सकता था? होली फिल्म के दृश्य फिल्म शूटिंग से सम्बंधित तकनीकी जिज्ञासाएं और प्रश्न उठाते हैं|

होली में कैमरे की कलाकारी की खूबसूरती देखने के लिए एक बेहद उम्दा सीक्वेंस है| एक दृश्य है जिसमें हॉस्टल की इमारत के बाहर एक बहुत बड़ा पेड़ जमीन पर गिर गया है, और छात्रों को उस विशाल वृक्ष के ताने और उसकी डालियों पर चलते हुए दिखाया गया है, और कैमरा बिना किसी कट के न केवल वृक्ष के धराशायी पड़े शरीर को दिखाता है बल्कि इसके विभिन्न भागों पर विचरण कर रहे छात्रों की गतिविधियों को भी दिखाता है, और इस क्रम में कैमरा इधर उधर ही नहीं जाता बल्कि जमीन पर पड़े पेड़ के तने के नीचे से भी गुजर कर दूसरी ओर जाता है और सब कुछ बिना किसी कट के और बिना किसी किस्म के झटके के आभास के सम्पन्न हुआ दिखाई देता है|

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होली, महेश एलकुंचवार के लिखे नाटक पर आधारित है और फिल्म का स्क्रीनप्ले भी उन्होंने ही लिखा है| फिल्म के कथानक में कैम्पस के जीवन की मस्ती, शैक्षिणिक संस्थानों के प्रबंधन के भ्रष्टाचार, यूटोपिया, वैचारिक अंतर और आदर्शवाद से मोहभंग होने जैसे तत्वों का भरपूर समावेश है|

एक दृश्य में होस्टल की छत से कालेज की इमारत को देखते हुए एक छात्र अपने साथी से पूछता है,” कैसा दिखता है कालेज यहाँ से?”

दूसरा छात्र गहरी साँस लेकर दर्शन बघारता है,” क्लर्क और गुलाम पैदा करने वाली फैक्ट्री की तरह”|

एक अन्य दृश्य में एक छात्र हड़ताल कर रहे कर्मचारी से पूछता है कि वह कालेज में हड़ताल क्यों कर रहा है तो कर्मचारी उसे जमीनी सच्चाई से वाकिफ कराते हुए कहता है,” इधर और उधर में बड़ा फर्क है एक बार नौकरी में आ जाओ तब पता चलेगा”|

पुरुष वर्चस्व से ग्रसित एक आवासीय शैक्षणिक परिसर में होली आधारित है| परिसर में पुरुष वर्चस्व इस कदर हावी है कि गिनी चुनी छात्राएं ही यदा कदा किसी दृश्य में दिखाई देती हैं और कैंटीन में समय काट रहे पुरुष छात्रों के झुण्ड के पास से जब एक छात्रा जा रही होती है तो एक उद्दंड छात्र उसकी स्कर्ट उठाकर छात्रा का जेंडर निश्चित करने का प्रयास करता है और एक अन्य छात्र कैंटीन में ही सबके सामने एक आन्दोलनकर्ता छात्रा से कहता है कि वह परमाणु हथियारों के विरोध में जारी होने वाली अपील पर हस्ताक्षर कर देगा अगर वह उसे एक चुम्बन देगी| | छात्र तो छात्र एक अध्यापक भी नई भर्ती हुयी अध्यापिका के ऊपर दबाव डालता रहता है कि उसे सैक्स और अध्यात्म से जुडी किताब पढनी चाहिए|

होली, शैक्षणिक संस्थानों पर काबिज निजी ट्रस्टों और प्रबंधनों के लालच को उजागर करती है| देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उग आयीं इन शैक्षणिक संस्थाओं को शिक्षा की फैक्ट्रियां कहना ज्यादा मुनासिब होगा क्योंकि इनके प्रबंधकों का मुख्य उद्देश्य अच्छी शिक्षा प्रदान करना नहीं बल्कि इन संस्थानों से अधिक से अधिक आर्थिक मुनाफ़ा कमाना होता है| यदि कामर्स में अधिक विधार्थी आ रहे हों तो प्रबंधन को कोई दिक्कत नहीं होती आर्ट्स और विज्ञान विषयों के संकायों को बंद कर देने में| लालची प्रबंधकों को कठपुतली प्रिंसिपल चाहिए होते हैं जो उनके आदेश पर उठे, बैठे, नाचे और किसी भी हालत में उनकी इच्छाओं को संस्था में लागू करे|

होली कुप्रबंधन, और भ्रष्ट माहौल से घिरे एक शैक्षणिक परिसर की एक दिन की कहानी है और वह दिन संयोग से होली का दिन है| प्रबंधन के कुछ निर्णयों के कारण परिसर में तनाव व्याप्त हो गया है और इस तनाव के कारण कुछ दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं घटित होती हैं|

जबकि पूरा देश रंगों के उत्सव होली का आनंद उठाने की तैयारी में है, इस शिक्षण संस्था में अध्ययनरत छात्रों को होली की छुट्टी नहीं दी जाती और एक तुगलकी फरमान के तहत उन पर कालेज के मालिक के पिता की बरसी के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में शिरकत करने का दबाव डाला जाता है|

छात्र, प्रबंधन के परीक्षाओं को इसलिए टालने के निर्णय से भी नाराज हैं क्योंकि गैर-अध्यापकीय स्टॉफ हड़ताल पर चला गया है| छात्र प्रबंधन के निर्णयों का विरोध करने का विचार बनाते हैं और ऑडिटोरियम में प्रबंधक के पिता की स्मृति में आयोजित समारोह को बिगाड़ने की योजना बनाते हैं| लेकिन यह एक कदम छात्रों के भाग्य को प्रभावित कर देता है| हर जगह प्रबंधन “फूट डालो और राज करो” की विभाजक नीति का पालन करता है| प्रबंधन छात्रों में उस एक छात्र को तोड़ने की कोशिश करता है जो उन्हें समारोह को बिगाड़ने की साजिश करने वालों के नाम दे सके|

चरित्रों में ज्यादातर छात्र हैं और उन्हें निभाने वाले कलाकार नवोदित कलाकार ही थे| उस समय तक अनुभवी अभिनेता बन चुके नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी के परदे पर आते ही फिल्म में अभिनय का स्तर सहसा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है| दोनों की भूमिकाएं बड़ी नहीं हैं लेकिन उनके अभिनय प्रदर्शन की गुणवत्ता उतनी ही अच्छी है जितनी उस दौर की उनकी सार्थक सिनेमा की फिल्मों में हुआ करती थीं| दोनों परदे पर जादू रच देते हैं|

ओम पुरी ने चापलूसी पसंद और स्वंय भी प्रबंधन की चापलूसी में रत प्रिंसीपल की भूमिका निभाई है और नसीर ने आदर्शवादी अध्यापक की, जो कि संयोग से लड़कों के होस्टल का वार्डन भी है| नसीर का चरित्र भ्रष्टचार से लोहा लेते हुए छात्रों के हितों के लिए काम करना चाहता है| वह निर्भीकता से प्रिंसीपल और प्रबंधक के सम्मुख उनकी चापलूसी न करते हुए छात्रों के हितों की बात करता है लेकिन अपने और अपने परिवार के अस्तित्व की रक्षा के लिए उसके सम्मुख व्यवहारिक मजबूरियाँ भी हैं| अन्य चरित्रों की तुलना में नसीर के चरित्र में बहुत से परतें उपस्थित हैं| नसीर ने अपनी भूमिका के गर्व और आदर्शवाद को बखूबी अपने शारीरिक हावभाव में उतार दिया है और जब भी छात्रों के हित और प्रबंधन के मसले सामने आते हैं एक नियंत्रित गुस्सा नसीर सामने ले आते हैं| चरित्र की व्यावहारिक विवशताओं को उन्होंने आँखों के माध्यम से बेहद ख़ूबसूरती से व्यक्त किया है|

दीप्ती नवल, परेश रावल, मोहन गोखले, और ड़ा. श्रीराम लागू, आदि को छोटी छोटी भूमिकाओं में देखा जा सकता है

31 साल गुजरने के बाद यह देखना रोचक है कि नौजवान अभिनेताओं की भीड़ में आमिर खान ने 1984 में अपनी पहली वयस्क फिल्म में यह संभावना जगा दी थी कि आने वाले सालों में वे कुछ खास करके दिखाएंगें| अभिनेताओं की भीड़ में उपस्थित बहुत से नौजवान बाद में अभिनय करने से अलग हट गये जबकि आमिर  खान अभिनेता के रूप में अपने व्यवसाय में शीर्ष पर पहुंचकर अभी तक एक बड़ेसितारे बने हुए हैं| नसीर के चरित्र के अलावा आमिर के चरित्र में कई परते हैं| यूं तो वह सभी साथी छात्रों के साथ दोस्ताना व्यवहार रखता है पर उसके रूममेट तक को नहीं पता कि कालेज की ही एक छात्रा उसकी गर्लफ्रेंड है| जबकि सारे छात्र कालेज प्रबंधन दवारा आयोजित समारोह को बिगाड़ने के काम में मशगूल हैं तब आमिर का चरित्र प्रेमालाप के लिए चोरी छिपे लड़कों के होस्टल स्थित अपने कमरे में अपनी गर्लफ्रेंड को ले आता है और जहां अकस्मात ही उसका रूममेट वापिस आ जाता है और रूम में आमिर की गर्लफ्रेंड को देखकर स्तब्ध रह जाता है|

ऐसे छोटे छोटे रोचक प्रसंग फिल्म को रोचकता प्रदान करे रखते हैं|

रजत ढोलकिया, जिन्होने गिनी चुनी फिल्मों में ही संगीत दिया है, ने अच्छा संगीत होली के लिए रचा|

कैम्पस आधारित फिल्मों में होली एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है| प्रयोगात्मक प्रकृति के होने के नाते सिनेमेटोग्राफी और अन्य तकनीकी क्षेत्रों के छात्रों के लिए होली एक अवश्य ही देखी जाने वाली फिल्म है जो कि उन्हें बहुत कुछ सिखा सकती है|

…[राकेश]

 

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