TGKS1अगर ‘तेरे घर के सामने’ को हिंदी सिनेमा की सर्वश्रेष्ठ रोमांटिक कॉमेडी ड्रामाटिक फिल्म न भी माना जाए तो इस श्रेणी की सर्वश्रेष्ठ पांच फिल्मों में इसे शुमार किया जाना किसी भी तरह के संदेह से परे हैं| ‘तेरे घर के सामने’ में रोमांस. कॉमेडी और ड्रामा का सर्वोचित मिश्रण है| न तो हास्य भोंडेपन से भरी जोकरी में शरण लेता है और न ही रोमांस अतिनाटकीयता की ओर जाकर उस वक्त आंसुओं के सैलाब में डूब जाता है जब प्रेमीगण कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे हैं और जुदाई को सहन कर रहे हैं| फिल्म दर्शकों की भावनाओं का शोषण करने का प्रयास नहीं करती|

तेरे घर के सामने’ सर्दियों की नर्म धूप जैसी आंच और स्पर्श दर्शकों को देती है| सर्दियों के आगमन के समय और जब सर्दियों के जाने पर बसंत ऋतु का आगमन होता है तब इस शानदार फिल्म की याद आना स्वाभाविक से बात है| भारत जैसे सामान्यतः गरम देश में साल के ये दो समय लोगों को अच्छा मौसम देते हैं और उन्हें खुशगवार बनाते हैं, धूप के साथ उनकी मैत्री हो जाती है, चरों तरफ फूलों की बहार आने लगती है, खाने की वस्तुओं में भांति-भांति की किस्में समाहित हो जाती हैं|

1963 में फिल्म के प्रदर्शन के वक्त इसकी सार्थकता देश में उस वक्त के माहौल से भी बढ़ जाती है|

भारत 1962 में चीन का आक्रमण झेल कर उससे सैन्य युद्ध हार चुका था और देश का मनोबल इस हिंसक हमले से घायल और टूटा हुआ था| देश इस बात से भी दुखी था कि देश के प्रधानमंत्री के भारत-चीन संबंधों पर इतना जोर देने और पंचशील के सिद्धांतों को गढ़ने के बावजूद चीन ने भारत और नेहरु को धोखा दिया और एक अहिंसक राष्ट्र भारत पर आक्रमण कर दिया| फिल्म भी पंचशील सिद्धांतों का सन्दर्भ छेड़ती है|

1962 की त्रासदी झेल चुके देश में 1963 में ‘तेरे घर के सामने’ जैसी फिल्म दर्शकों को मानसिक अवसाद से छुटकारा दिलवा कर तनावरहित क्षणों में आनंद प्रदान करवाने वाली और पड़ोसियों से मेल-मिलाप से रहने के सिद्धांत पर भरोसा कायम करवाने वाली थी|

फिल्म के चरित्रों के लिए, राकेश (Dev Anand) और मदन (Rashid Khan) को छोड़ कर, फिल्म में एक रहस्य बरकरार रहता है और नायक राकेश, नायिका सुरेखा (Nutan) पर भी अपना राज फिल्म के लगभग अंतिम समय में ही जाहिर करता है| दर्शकों के लिए रोमांच इस बात का है कि कैसे राकेश और सुरेखा के माता-पिता पूरी स्थिति को लेते हैं जहां कि व्यापार और सामाजिक परिवेश में वे न केवल एक दूसरे के प्रतिद्वंदी हैं बल्कि एक दूसरे को सख्त नापसंद भी करते हैं और ऐसे लोगों की संतानों का आपस में प्रेम हो जाता है| दर्शक फिल्म के अंत का अंदाजा तो लगा सकता है पर उसे उस लक्ष्य तक पहुँचने के मार्ग की भनक नहीं लग पाती और उसके लिए उस राह को देख पाना ही रोचक है|

संक्षेप में फिल्म की पृष्ठभूमि ऐसी है –

राकेश (देव आनंद) एक आर्किटेक्ट है जो अमेरिका से पढकर भारत वापिस आया है पर अपने पिता (ओम प्रकाश) के पुरातनपंथी विचारों से उसकी पटरी नहीं खाती सो वह अपने पिता का घर छोड़ (उसके पिता ने भी उसे घर से निकाल रखा है, सो उसका घर छोड़ना और घर से निकाला जाना दोनों एक साथ की घटनाएं हैं जिन्हें पिता-पुत्र अपनी सुविधानुसार याद कर सकते हैं) राकेश की माँ (मुमताज़ बेगम) अलबत्ता राकेश के घर से अलग रहने से दुखी रहती है, दुखी पिता भी है पर अपने अहंकार के समक्ष इस भाव को जाहिर नहीं होने देता|

बहरहाल राकेश की आर्किटेक्ट फर्म उसे एक रईस (हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय) के घर भेजती है, जहां वह अपने सहायक मदन (राशिद खान) के साथ जाता है और वहाँ उन दोनों की मुठभेड़ हो जाती है सुलेखा (नूतन) से, जो कि उन्हें आवारा समझ घर से भगा देती है| सुलेखा को विश्वास है कि जैसा बागला वह और उसके पिता बनवाना चाहते हैं वैसा कोई अनुभवी आर्किटेक्ट ही बनवा सकता है, और राकेश को वह नातजुर्बेकार आर्किटेक्ट समझती है| खैर थोड़ी नोकझोंक के पश्चात राकेश को काम मिल जाता है और उसके और सुलेखा के मध्य सुलह भी हो जाती है|

राकेश को यह पता नहीं है कि उसके पिता और सुलेखा के पिता एक दूसरे को सख्त नापसंद करते हैं और एक तरह से एक दूसरे के दुश्मन हैं और दोनों एक दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते| राकेश के बदकिस्मती से उसके पिता और सुलेखा के पिता अडोस पड़ोस के दो प्लॉट खरीद लेते हैं और दोनों ही राकेश को काम सौंप देते हैं कि वही वहाँ उनके बंगले बनवाएगा और प्रत्येक का बांग्ला ऐसा बनना चाहिए जिससे कि दूसरा बांग्ला उसके बंगले के सामने घटिया लगे| राकेश के पिता और सुलेखा के पिता को नहीं पता कि राकेश के पास दोनों बंगलों का काम है| इस बीच राकेश और सुलेखा में आपस में प्रेम पनप जाता है| सुलेखा को भी नहीं पता कि पड़ोस वाले प्लॉट क मालिक असल में राकेश के पिता ही हैं| राकेश किसी से भी सच्चाई बयान नहीं कर सकता| न वह अपने पिता से कह सकता है कि वह सुलेखा के पिता का बांग्ला भी बनवा रहा है, न ही वह सुलेखा और उसके पिता से अपनी असली पहचान बता सकता है कि वह किसका बेटा है|

एक तरह उसके पिता एवं सुलेखा के पिता के मध्य दुश्मनी है और दूसरी तरफ उसका और सुलेखा का प्रेम है| वह दुधारी तलवार पर चल रहा है, या नत की भांति दो बहुत ऊंची इमारतों की छतों से बंधी रस्सी पर चल रहा है जहाँ संतुलन के लिए उसके पास बांस तक नहीं है|

राकेश किस गति को प्राप्त होगा, यही फिल्म का रहस्य है|

यह पहली फिल्म होनी चाहिए जहां नायक, नायिका से कहता है,

” हमारे माता-पिता ने हमें पालपोस कर बड़ा किया है, हमें ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जिससे उन्हें ठेस लगे| हम घर से भाग कर अपने माता-पिता पर बदनामी के दाग नहीं लगा सकते और हम उनके आशीर्वाद से ही आपस में शादी करेंगें और हम तब तक इंतजार करेंगें जब तक कि उनका आशीर्वाद हमें न मिल जाए|”

बाद में बहुत से हिंदी फिल्मों में इस संवाद को दुहराया गया|

फ़िल्में केवल इसलिए नहीं बनतीं कि जो समाज में हो रहा है उसे दिखा दें, बल्कि कुछ फ़िल्में ये भी बता सकती हैं कि क्या होना चाहिए? कभी-कभी चरित्र या चरित्रों में उपस्थित आदर्शवाद फिल्म में जान डाल देता है| अलग कहानी में अलग किस्म के चरित्र कुछ और राह अपना सकते हैं जो वहाँ फबता हुआ जान पड़े किन्तु यहाँ इस फिल्म की कथा में इसके चरित्रों का यह रुख विश्वसनीय दिखाई देता है|

फिल्म की अपील बड़ी व्यापक है और फिल्म किसी भी आयु वर्ग के दर्शक को आनंदित कर सकती है| इस फिल्म में ऐसा बहुत कुछ है जो हर किस्म की फिल्म देखने वालों को अपनी ओर आकर्षित करता है|

निस्संदेह फिल्म का कलेवर शहरी है| फिल्म का ट्रीटमेंट ऐसा है कि यह दर्शक को हल्के फुल्के मूड में रखता है और फिल्म समाप्त होने के बाद भी दर्शक के मुख पर मुस्कान छोड़ जाता है| फिल्म शुरू से ही छोटे छोटे प्रसंगों, जिनका संबंध आम जन को जीवन से जुड़ा लगता है, के मध्यम से फिल्म दर्शक से जुड़ाव बना कर उसे आनंदित करना प्रारंभ कर देती है और पूरी फिल्म में एक भी बोझिल क्षण ऐसा नहीं आता जबकि दर्शक बोरियत महसूस करे और ध्यान फिल्म से कहीं और भटक जाए|

फिल्म के चरित्र ऐसे लगते हैं जैसे हम अपने जीवन में देखते हैं लेकिन अभिनेताओं ने उन्हें अपनी उपस्थिति एवं बेहतरीन अभिनय से इतना रोचक बना दिया है कि वे भरपूर आकर्षक चरित्र लगते हैं|

फिल्म में बहुत सी अच्छाइयां हैं| इस खूबसूरत रोमांटिक कॉमेडी में निर्देशक विजय आनंद के पसंदीदा तत्व, रहस्य का पुट भी मिश्रित है|

TGKS2कथा और पटकथा दोनों बेहद प्रभावशाली हैं| देव आनंद और नूतन की तो बात ही क्या, उन्होंने परदे पर जादू बिखेरा है| परदे पर देव आनंद और नूतन के मध्य के दृश्य बेहद विश्वसनीय लगते हैं| देव आनंद की अधिकतर फिल्मों में नारी से उनके रिश्ते, भले ही वह परदे पर अपने चरित्र की माँ, बहन, प्रेमिका या पत्नी, बेटी या सहकर्मी के साथ हों, बेहद विश्वसनीय लगते रहे हैं|

अन्य सभी अभिनेताओं ने भी जबर्दस्त अभिनय का प्रदर्शन किया है| हर उस अभिनेता का काम उल्लेखनीय है जिसने भी पांच मिनट से ज्यादा परदे पर अपनी उपस्थिति दिखाई है| ओम प्रकाश, हरेन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय, राजेन्द्र नाथ, प्रतिमा देवी, मुमताज़ बेगम, और राशिद खान सभी चरित्र अभिनेताओं ने फिल्म में उच्च कोटि का अभिनय करके फिल्म में जान डाल दी है|

जब राजेन्द्र नाथ एक बेहद लाउड कामेडियन के रूप में प्रसिद्ध और टाइप-कास्ट होने लगे थे, तब इस फिल्म ने उन्हें एक अलग किस्म की भूमिका दी और विजय आनंद ने उनकी उछल कूद करके हास्य करने की शैली पर पूरी तरह अंकुश लगवा कर उनसे चरित्र की सीमाओं में रहकर अभिनय करवाया|

एस.डी.बर्मन दवारा रचा संगीत बेहतरीन है और गायकों ने भी अपनी पूरी कला गीतों में समर्पित कर दी है| अगर रफ़ी ने अपनी दैवीय गायिकी प्रतिभा का इस्तेमाल करके दिल का भंवर और तू कहाँ ये बता, दोनों गीतों में जादू भरा है तो लता मंगेशकर और आशा भोसले ने भी अपनी गायिकी से गीतों में कर्णप्रिय मिश्री घोलकर श्रोताओं के लिए गीतों में भरपूर आनंद भर दिया है|

यह आश्चर्य का विषय है कि इतनी बढ़िया रोमांटिक कथा, पटकथा और संवाद लिखने वाले विजय आनंद ने वास्तव में कहानियां लिख कर छपवाई नहीं| जो लेखक इतने बढ़िया रोमांटिक दृश्य गढ़ सकता है उसकी कल्पना अवश्य ही बेहतरीन कहानियां साहित्य को देती| विजय आनंद के पास रोमांटिक दृश्य रचने और प्रेमियों या संभावित प्रेमियों के मध्य बेहद जीवंत वार्तालाप रचने और प्रेमियों के इर्दगिर्द एक सजीव वातावरण रचने की अदभुत क्षमता थी|

फिल्म में एक प्रसंग है :-

राकेश (देव आनंद) सुलेखा (नूतन) को लेकर दिल्ली के पास किसी गाँव में जाता है और वहाँ वे गाँव की एक वृद्धा की झोंपडी के बाहर बैठ कर वृद्धा दवारा परोसे गये भोजन का लुत्फ़ उठा रहे हैं| राकेश को भोजन बेहद स्वादिष्ट लगता है और वह वृद्धा के खाना बनाने की तारीफ़ करते हुए कहता है,

” माँ, ऐसा तीखा अचार मैंने जीवन में कभी नहीं खाया| माँ तेरे बच्चे जियें और तरक्की करें|”

वृद्धा पूछती है कि क्या राकेश और सुलेखा का अभी विवाह हुआ है|

राकेश सुलेखा की ओर देख कर पूछता है,” बताओ क्या कहूँ?”

सुलेखा मुस्करा कर चिड़ाने के अंदाज में कहती है,”बको, बातें बनाने और झूठ बोलने में तो महारत हासिल है तुम्हे|”

राकेश कहता है, “माँ अभी तक शादी नहीं हुयी, पर अगर मेरे माता पिता ने चाहा और इसके माता पिता ने चाहा और हम सबके माता पिता ने चाहा तो बहुत जल्दी हमारी शादी हो जायेगी|”

भोजन समाप्त करके राकेश हाथ धोता है और वृद्धा को कुछ रूपये देने का प्रयास करता है| वृद्धा रूपये लेने से इंकार कर देती है| राकेश सुलेखा के पास जाता है और गरीब वृद्धा की दरियादिली की तारीफ़ करता है और वापिस आकर वृद्धा से कहता है,

” माँ ये पैसे तेरे लिए नहीं है, जो दिया तू जलाती है ना पूजा के लिए उसमें तेल डालने के लिए हैं…”

ऐसा विलक्षण दृश्य सिर्फ विजय आनंद ही रच सकते थे और अपने चरित्र से अंजान एक वृद्ध स्त्री के साथ ऐसा जादू परदे पर सिर्फ देव आनंद ही जगा सकते थे|

जादू आगे भी कायम रहता है|

राकेश की इच्छा है कि वह सुलेखा के सामने विवाह का प्रस्ताव रखे और उसकी मनोकांक्षा भांप कर सुलेखा की इच्छा उससे छेड़छाड़ करने की है|

राकेश कहता है,”लेख अब हमें शादी कर लेनी चाहिए|”

सुलेखा कहती है,”क्यों अचानक ये ख्याल क्यों?”

राकेश गंभीरता से कहता है,” शराफत का तकाजा है कि मैं इससे आगे तभी बढूँ जब मैं तुमसे शादी कर रहा हूँ|”

सुलेखा भी गंभीर मुद्रा बना कर कहती है,” तुम पिता जी से बात कर लो|”

राकेश कुछ असहज हो कर कहता है,” तुम नहीं कर सकतीं?”

सुलेखा बात टालने के अंदाज में कहती है,” नहीं, मैं उनका सामना नहीं कर सकती|”

राकेश धैर्य खोकर कहता है,” पर मेरा साथ तो दे सकती हो|”

सुलेखा लापरवाही से कहती है,” नहीं बाबा, मैं पिता जी के सामने नहीं जाऊंगीं| तुम उनका गुस्सा नहीं जानते|”

राकेश आश्चर्य से कहता है,”तो तुम मेरा साथ नहीं दोगी|”

सुलेखा अपना निर्णय दुहराते हुए,”नहीं|”

राकेश खीज कर दुखी स्वर में,” तो मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ, चला क्यों नहीं जाता?”

सुलेखा इस अंदाज में जैसे उसे राकेश के जाने की कोई परवाह नहीं, कहती है,” चले जाओ, रोका किसने है?”

एक व्यक्ति, जो अपने प्रेमी के समर्थन की आस लगाए बैठा है, ऐसे ठंडे जवाब पाकर कुंठित और क्रोधित हो जायेगा और राकेश भी ऐसी मनोदशा में वहाँ से जाने लगता है|

कैमरा सुलेखा के चेहरे को पकडता है जो राकेश की कुंठा पर मंद मंद मुस्करा रही है|

विजय आनंद जैसे काबिल निर्देशक के लिए यह एक आदर्श स्थिति है एक मनभावन गीत परदे पर उतारने के लिए और वे ऐसा करते भी हैं आर दर्शक – ये तन्हाई हाय रे हाय, गीत का लुत्फ़ उठाते हैं|

यह पूरा प्रसंग, भोजन करने से लेकर इस गीत तक, फिल्म का सबसे बेहतरीन प्रसंग है और यकीनन ऐसा प्रसंग विजय आनंद और देव आनंद की किसी फिल्म में ही पाया जा सकता है| जिन्होने फिल्म नहीं देखी वे इस प्रसंग को देखे बिना इससे प्राप्त हो सकने वाले आनंद की कल्पना पूरे तौर पर नहीं कर पायेंगें| इसके रसपान के लिए इसे देखा जाना जरूरी है|

यह प्रसंग, लेखकों, अभिनेताओं, कैमरामैन, एडिटर, संगीत निर्देशक, गायकों, एवं निर्देशक की टीम की अनूठे प्रतिभा का परिणाम है| यह प्रसंग भारतीय सिनेमा की उच्च स्तरीय फिल्म की झलकी भी देता है, ऐसा प्रसंग जो कि अदभुत कल्पनाशक्ति का फल है और भारतीयता में पगा हुआ भी है|

देव आनंद के नवकेतन बैनर्स की ‘तेरे घर के सामने’ न केवल इस प्रतिष्ठित बैनर की बल्कि समूचे हिंदी सिनेमा की एक क्लासिक फिल्म है जिसकी आयु कालातीत है| इसे नहीं देखा तो रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों की फेहरिस्त में बेहद महत्वपूर्ण नाम तो छूट ही गया|

…[राकेश]

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