yatharthएक चाण्डाल अपनी पुत्री और दामाद की चिता की ठंडी होती राख के पास बैठा बिलख रहा है। इस समय वह केवल एक बाप है।

हे भोलेनाथ तूने ठीक किया जो मेरी बिटिया को बुला लिया। वह कैसे जीती और अगर वह न मरती तो मैं कैसे मरता

शमशान घाट पर दूसरों की चिता को जलाने का इन्तज़ाम करने वाले चाण्डाल को भी क्या उतना ही दुख होता होगा जब उसका अपना कोई मरता होगा? या वह इन बातों से ऊपर उठ गया होता है? क्या उसकी जीवन और मौत के बारे में समझ वह हो जाती है जो एक पहुँचे हुये साधु की हो जाती है? या वह बस एक साधारण सा मनुष्य भर ही रहता है जो किसी तरह अपना काम कर रहा है जिससे कि उसका और उसके परिवार का पेट भरा जा सके?
उसका मौत से वही सम्बन्ध नहीं होता जो एक आम आदमी का होता है।

दूसरों की मौत पर मगन होकर नाचने वाली चाण्डाल की पुत्री क्या उस समय भी नाच पायेगी जब उसका कोई अपना मुर्दा रुप में शमशान भूमि में लाया जायेगा?

मुरदों के आगमन पर उसका मीरा जैसा नृत्य क्या शिव के ताण्डव जैसा नृत्य जैसा नहीं हो जायेगा?

फ़िल्म यथार्थ ऐसे ही प्रश्नों को एक चाण्डाल बुधई और उसकी पुत्री के जीवन के माध्यम से खंगालती है।  निर्देशक राजेश सेठ ने एक अच्छी कहानी  चुनी और इस पर फ़िल्म बनाना निस्संदेह एक साहस का काम है।

अक्सर लोग कहते पाये जाते हैं

राम जी की माया
कहीं धूप कहीं छाय

फिल्म भी कहीं जीवन कहीं मृत्यू कहीं धूप कहीं छांव की झलकियां साथ-साथ प्रस्तुत करती आगे बढ़ती है|

समाज में व्यापार में तो लाभ हानि का मामला इस कदर स्वीकार्यता पा चुका है कि वहाँ नैतिकता के प्रश्न बेमानी लगते हैं। एक आदमी के दीवाले के बलबूते दूसरा आदमी अपने घर में  मना सकता है और ये लेन देन एक सामान्य बात समझी जाता है। सब भाग्य के खेल समझे जाते हैं।

व्यापार की तरह जीवन और मृत्यु भी किसी के घर लाभ और किसी के घर हानि लेकर आते हैं। एक आदमी के घर में शादी की शहनाई बज रही हो सकती है या नवशिशु के जन्म के अवसर पर मंगल गीत गाये जा रहे हो सकते हैं और उसी समय ठीक उसी व्यक्ति के पड़ोस में किसी की मौत का मातम मनाया जा रहा सकता है। मानव जीवन ऎसी ही विड्म्बनाऒं और विसंगतियों से भरा हुआ है।

भारतीय समाज में इतनी ज्यादा ऊँच नीच और सामाजिक और आर्थिक अन्तर व्याप्त है कि कभी कभी कोई घटना, कोई कहानी देखने सुनने और पढ़ने वालों को झकझोर देती है कि कहीं न कहीं समाज अमानवीय बुराईयों से भर चुका है। दुखद बात ये है कि समाज इन बुराइयों की तरफ़ आँख उठा कर नहीं देखना चाहता उन्हे ठीक करने का प्रयास करना तो दूर की बात है । पचास  सौ सालों में कभी कोई संत कोई समाज सुधारक इन सब सामाजिक बुराईयों को सुधारने की बात करता है पर या तो अक्सर समाज के ठेकेदार उसे मार डालते हैं या उसके रहते तो कुछ आशा की किरण दिखायी देती है पर उसके मरने के बाद स्थितियाँ फ़िर से वैसी की वैसी हो जाती हैं और समाज फ़िर से अपने पुराने ऊँच नीच के ढ़र्रे पर चलना शुरु कर देता है।

इस ऊँच नीच भरे समाज में एक चाण्डाल अपना जीवन यापन कैसे करेगा? वो भी एक गाँव में जहाँ आबादी ज्यादा नहीं होती कि रोज़ कोई न कोई मर रहा है और उसे रोज़ कुछ न कुछ मिल रहा है जिससे वह भी एक सामान्य आदमी की भाँति जीवन व्यतीत कर सकता है। उसे अन्य कार्य करने नहीं दिये जाते क्योंकि वह एक अछूत है। वह विवश है दूसरों के घर में मौत के आगमन का इन्तज़ार करने को।

कोई हैरत की बात नहीं कि एक छोटे से गाँव पिपरिया  की सीमाओं से बाहर रहने वाला चाण्डाल बुधई अपनी चार साल की बेटी, बिजुरिया, जो कि दो दिनों से भूखी है, से कहता है कि उसे दो दिन धैर्य रखना चाहिये क्योंकि गाँव में एक वृध महिला की शीघ्र ही मृत्यु होने वाली है और तब खाने को अच्छा खाना, मिठाई और पहनने को नये कपड़े मिलेंगे। सामान्य दिनों में बुधई को एक रोटी देने में भी गाँव वाले आनाकानी करते हैं और उसे दुत्कारते रहते हैं।

बिजुरिया एक साल की थी जब उसकी माँ गुजर गयी थी और बुधई ने अकेले ही उसे पाला पोसा है। नन्ही और मासूम बिजुरिया इन घटनाओं से मतलब निकाल लेती है कि जब किसी के घर कोई मरता है तभी लोग उसे और उसके बापू, जिसे वह बुधई नाम से ही बुलाती है, को कपड़े और खाना आदि देते हैं। नासमझ बिजुरिया आशा करती है कि रोज़ कोई न कोई मर जाये। यहाँ तक कि अर्थी को देख कर उस पर खुमार चढ़ने लगता है और वह उसी खुमारी में वह दीवानी मीरा की तरह नाचती और गाती है। अर्थी को कँधा देते गमगीन लोग, जो राम नाम सत्य है का उच्चारण करते चलते हैं जिससे कि किसी भाँति वे अपनी व्यक्तिगत क्षति के अहसास को दर्शनशास्त्र की सहायता से कुछ कम कर सकें, शमशान घाट पर अपने आप में मगन बिजुरिया के नाच गाने को देखकर क्रोधित हो जाते हैं कि वे तो अपने सम्बंधी की मृत्यु के कारण शोकगृस्त हैं और चाण्डाल की लड़की खुशी से नाच रही है।

ऐसे ही गरीबी से लड़ते लड़ते बिजुरिया किशोरावस्था को प्राप्त हो जाती है और उसकी दुनिया बुधई और अपने से कुछ साल छोटे गाँव के एक लड़के रघु के इर्द गिर्द सिमटी रहती है। बुधई बिजुरिया का इतना ख्याल रखता है कि उसे गाँव की तरफ़ भी नहीं देता ताकि अछूत होने के कारण कोई उसका अपमान न कर दे। पर इस तरह लगभग अकेले पलने के कारण बिजुरिया की मानसिक वृद्धि बहुत कम गति से बढ़ती है और किशोरावस्था में भी वह एक छोटी बालिका की भाँति ही सोचती और व्यवहार करती है।

ऐसी लड़की के पिता होने के नाते बुधई की मुश्किलें बहुत हैं। उम्र के साथ प्रकृति को नारी के शरीर में बदलाव लाने होते हैं और बिजुरिया समझ नहीं पाती कि उसके शरीर में ऐसे परिवर्तन क्यों हो रहे हैं और बुधई के लिये अपनी नादान पुत्री को ये सब कुछ समझाना मुश्किल लगता है।

पिपरिया गाँव के सवर्ण अछूत बुधई और उसकी लड़की की छाया से भी दूर रहते हैं पर उन्ही में से बहुत सारे लोगों को बिजुरिया की खूबसूरती लुभाती है । कामवासना उनके मन के अन्धेरे कोनों में घर करके बैठी हुयी है और और वे बिजुरिया को पाना चाहते हैं। बिजुरिया चूँकि अतिनिर्धनता से जुझ रहे एक चाँडाल की पुत्री है अतः कामुक लोगों के लिये बिजुरिया एक आसानी से उप्लब्ध हो सकने वाली एक शिकारमात्र है जिसे वे जब चाहें जहाँ चाहें दबोच सकते हैं।

प्रौढ़ावस्था को प्राप्त हुआ गाँव का दुष्ट प्रवृति का साहुकार, जो काफ़ी सालों से विधुर है और जो बिजुरिया के किशोरावस्था को प्राप्त होने के समय से ही उस पर आँखे लगाये हुये है, इतना आगे बढ़ जाता है कि पहले तो बह बुधई को पैसा उधार देकर अपनी मुट्ठी में करना चाहता है और बाद मेइन बुधई के सामने प्रस्ताव रखता है कि वह बिजुरिया को अपनी रखैल बनाने को तैयार है और वह बुधई के पास ही रह सकती है और वह लोगों की नज़र बचा कर खुद ही बिजुरिया के पास आ जाया करेगा और बुधई और बिजुरिया के जीवनयापन का इन्तज़ाम करता रहेगा और गाँव में किसी को कुछ भी पता नहीं चलेगा।

गाँव के कामपिपासू लोगों की बिजुरिया के ऊपर पड़ी बुरी नियत से बुधई के दिन का चैन और रातों की नींद उड़ जाती है। मुश्किल से जीवन बसर करने वाले गरीब बुधई को अपनी पुत्री का जवान होना सुहाता नहीं है। वह अपनी ही पुत्री को मारता पीटता है कि क्यों वह इतनी सुन्दर है और क्यों उसका रंग इतना गोरा है? वह सबकी निगाहों से बिजुरिया को छुपाकर रखना चाहता है।

सैंकड़ों वर्ष पहले भारत में छुआछुत की स्थिति पर कबीर कह गये हैं,

हिन्दु अपनी करे बड़ाई गागर छुअन न देई
वेश्या के पायन तर सौवे यह देखो हिन्दुआई

आज भी स्थितियाँ बदली नहीं हैं। छुआछुत को हद से ज्यादा तवज्जो देने वाले समाज में लोग अपनी कामवासना की पूर्ती के लिये किसी भी हद तक गिरने को तैयार रहते हैं। कामवासना के सामने महिला की जाति या सामाजिक स्थिति कुछ भी मायने नहीं रखती। सामान्यत: जिस महिला की परछाई से भी लोग दूर रहते हैं उसी से अपनी कामाग्नि बुझाने में उन्हे कोई संकोच नहीं होता और इसके लिये वे उस पर बलात्कार करने की हद तक जा सकते हैं।

बुधई की छाया से भी दूर रहने वाले लोग उसकी पुत्री की खूबसूरती का भोग करने को तत्पर रहते हैं और गाँव के सरपंच का बेटा और उसके दोस्त तो बिजुरिया का अपहरण करने की कोशिश करते हैं और मामला पंचायत के पास जाने पर वे बुधई और उसकी पुत्री को ही दोषी ठहराने की कोशिश करते हैं।

स्थितियाँ कुछ इस तरह बदलती हैं कि बुधई अपनी पुत्री का विवाह उससे कई साल बड़े एक मुसाफ़िर ट्र्क ड्राइवर, जो कि उसका शुभचिन्तक है, से कर देता है।

बिजुरिया का जीवन बदल जाता है और वह एक परिपक्व महिला होने की तरफ़ कदम बढ़ाती है पर नियति अपने खेल खेलती रहती है। साहुकार जैसे गाँव के कामपिपासु लोग बिजुरिया को न पा सकने की कुंठा में जलते रहते हैं और बदला लेने की फ़िराक में रहते हैं।

समय सबको जाँचता रहता है। नवविवाहित बिजुरिया को समय ऐसी पटखनी देता है कि उसे साँस लेने की गुंजाइश भी दिखायी नहीं देती।
फ़िल्म बिजुरिया के दुखद अन्त के माध्यम से मानव के मौत के सामने विवश खड़ा रहने को दिखाती है। जब दूसरे पर बीतती है तो आदमी कुछ भी दर्शन बखार सकता है पर क्या वह यही दर्शन और विद्या उस समय भी दिखा सकता है जब उसका अपना कोई करीबी व्यक्ति मरता है?

बुधई घटनाक्रमों से भौचक्का रह जाता है। सारी उम्र दुख झेलकर अब वह दुख की परकाश्ठा झेल रहा है।

वर्तमान में हिन्दी सिनेमा में बहुत कम ऐसे एक्टर हैं जो कि किसी भी फ़िल्म को अपने कंधों पर उठा सकते हैं और सिर्फ़ अपनी परफ़ोर्मेन्स के बलबूते ही उसका स्तर उठा सकते हैं। रघुवीर यादव एक ऐसे ही विलक्षण कलाकार हैं जिनकी फ़िल्म में उपस्थितिमात्र  ये दर्शाने के लिये काफ़ी होती है कि दर्शकों को विश्व स्तर का  अभिनय देखने को मिलेगा । वे इतनी सहजता से किसी भी किरदार को निभाते हैं कि लगता है जैसे उन्होने वास्तव में अपने वास्तविक जीवन में उस किरदार जैसा जीवन जिया होगा । उनके अभिनय में उच्च्स्तरीय विश्वसनियता हमेशा उपस्थित रहती है।

फ़िल्म में एक दृश्य है जहाँ वे गाँव के डाक्टर के पास दवा लेने के बहाने से जाते हैं और जब वह बताने लगता है कि एक वृध महिला बेहद बीमार है और मुश्किल से एक दो रोज़ निकाल पायेगी। वहाँ वे एक रोगी की हैसियत से डाक्टर के सामने खड़े हैं पर एक व्यक्ति की सम्भावित मौत की खबर उनके मन में लड्डू फ़ोड़े दे रही है पर उन्हे अपनी खुशी को डाक्टर के सामने जाहिर भी नहीं होने देना है। इतने सन्तुलित तरीके से रघुवीर यादव ने इस बेहद कठिन दृश्य में अभिनय किया है कि दर्शक उनकी अभिनय क्षमता का कायल हुये बिना नहीं रह सकता।

जब भी उन्हे अच्छा और चुनौतीपूर्ण चरित्र दिया है उन्होने अपनी अप्रीतम अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया है। रघुवीर यादवका अद्भुत अभिनय इस फ़िल्म- यथार् का भी सबसे महत्वपूर्ण भाग बन गया है।

मिलिन्द गुनाजी ने भी अपने चरित्र को अच्छॆ ढ़ंग से निभाया है। फ़िल्म बेहद अच्छी हो सकती थी यदि बिजुरिया के चरित्र को निभाने के लिये किसी बेहद सक्षम अभिनेत्री को फ़िल्म में लिया जा सकना संभव हो सकता था। रघुवीर यादव के अतिरिक्त पूरी फ़िल्म बिजुरिया के इर्द गिर्द ही घूमती रहती है और इस चरित्र में काफ़ी सम्भावनायें थीं।

कुछ अन्य किरदारों पर और ध्यान दिया जा सकता था। कुछ और स्पष्ट दिखायी देने वाली खामियों को दूर किया जा सकता था। मसलन बिजुरिया के बालसखा रघु की उम्र पूरी फ़िल्म में वही रहती है जबकी बिजुरिया कई साल बड़ी हो जाती है।

गीत संगीत साधारण होने के कारण फ़िल्म की गति को बाधित करता हुआ लगता है और फ़िल्म को कहीं से भी सहयोग प्रदान नहीं करता।

अमिताभ बच्चन की बेहद प्रभावी आवाज़ भी एक सूत्रधार के रुप में फ़िल्म को इसका परिचय दर्शकों को देने के लिए मिली है।

…[राकेश]

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