
ज़िन्दगी रोज नये रंग में ढ़ल जाती है
कभी दुश्मन तो कभी दोस्त नज़र आती है।कभी छा जाये बरस जाये घटा बेमौसम
कभी एक बूँद को रुह तरस जाती है
ज़िन्दगी रोज नये रंग में ढ़ल जाती है।
जब कोई अपना चला जाये छुड़ाकर दामन
दिल के अरमानों पर तलवार सी चल जाती है
टूट जाते हैं बिखर जाते हैं मोती सारे
प्यार की माला कहीं से भी जो कट जाती है।
मेरे मांज़ी पे न जा मेरे गुनाहों को न गिन
कौन है जिससे कभी भूल न हो पाती है।
ज़िन्दगी रोज़ नये रंग में ढ़ल जाती है।
© …[राकेश]
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