JayaBinduउमा (जया भादुड़ी) अपने पति सुबीर (अमिताभ बच्चन) को घर ले जाने के लिये सुबीर की दोस्त चित्रा (बिन्दु) के घर आती हैं। उमा और सुबीर की शादी के स्वागत समारोह के बाद यह उमा और चित्रा की दूसरी ही मुलाकात है।

चित्रा पूछती हैं कि उमा को कैसे पता चला कि सुबीर यहाँ उसके घर होंगे?
उमा – बस मुझे पता था।
चित्रा उमा को सोफे पर बैठाती हैं और थोड़ी झिझक के साथ कहती हैं,” कहीं आप ऐसा तो नहीं समझतीं कि मैं सुबीर को बहका रही हूँ”?
उमा स्पष्ट कहती हैं,” नहीं मुझे पता है आप ऐसा नहीं करेंगी। जो प्यार करते हैं…”।

ऐसे कुछ संवाद और ऐसा दृष्टिकोण ह्रषिदा की अभिमान को एक आकर्षक फिल्म बनाते हैं। बल्कि साठ और सत्तर के दशक की हिन्दी फिल्मों के ढ़ाँचे से अलग कुछ प्रयोग करके ह्रषिदा चित्रा (बिन्दु) का चरित्र गढ़ते हैं और चित्रा और इस चरित्र में बिन्दु द्वारा किया गया अभिनय, दोनों एक अलग छाप छोड़ जाते हैं।

सुबीर की ज़िन्दगी में उमा के आने से पहले से ही चित्रा सुबीर से प्रेम करती है और उनके मध्य दोस्ती तो है ही।

सुबीर के मित्र चंदर (असरानी), जो सुबीर के बिजनेस मैनेजर का कार्य भी देखते हैं, चित्रा द्वारा सुबीर से नजदीकी बढ़ाने के प्रयासों को पसंद नहीं करते हैं और सुबीर को टोकते हुये वे एक बार कहते हैं,” सुबीर स्त्री और पुरुष के मध्य दोस्ती कैसी”?

अभिमान एक तरफ पुरुष की ऐसी पुरातनपंथी विचारधारा दिखाती है और दूसरी तरफ चित्रा के चरित्र द्वारा आदर्श गढ़ती है।

सुबीर अचानक ही उमा से शादी कर लेते हैं और बम्बई आने पर चंदर द्वारा आयोजित स्वागत समारोह में चित्रा आती हैं और सुबीर और उमा को गाते हुये सुनती हैं। सुबीर क्षमायाचना की मुद्रा में हैं पर एक अच्छे दोस्त की तरह किसी भी किस्म की शर्मिंदगी से सुबीर को मुक्त्त करते हुये चित्रा कहती हैं,” सुबीर मैं दुखी थी जब तुम्हारी शादी की बात सुनी। गुस्सा भी आया परंतु आज उमा का गाना सुनकर मुझे यही लगा कि वे ही तुम्हारी पत्नी बनने योग्य थीं। मैं उस स्थान पर शायद ठीक नहीं रहती”।

स्त्री सामने वाले को सिर्फ निगाह से ही पहचान सकती है। सुबीर द्वारा चित्रा का परिचय उमा से करवाये जाने के बाद उमा चित्रा का हाथ पकड़ कर अपने साथ ले जाती हैं।

अभिमान रिश्तों में आदर्श व्यवहार अपनाये जाने की वकालत करती है।

अभिमान, चंदर की सुबीर से दोस्ती के द्वारा भी कुछ सवाल खड़े करती है। क्या एक व्यक्त्ति द्वारा अपने ही मित्र के व्यवसाय में हाथ बंटाने के बाद और मैनेजर जैसी भूमिका निभाने के बाद भी दोस्ती कायम रह सकती है?

रह सकती है यदि आपसी सम्मान दोनों तरफ से बनाया रखा जाये।

पति-पत्नी के संबधों में आयी उलझनों और गिरावट पर तो कितनी ही फिल्में बन चुकी हैं। अभिमान खुद भी शुरु के तकरीबन एक घंटे तक जब तक कि यह चरित्रों को पेश करने और उन्हे स्थापित करने में लगी रहती है, एक सामान्य फिल्म की तरह ही विचरती रहती है और उमा और सुबीर की शादी के बाद भी जब तक उन दोनों के संबंध अच्छे रहते हैं तब तक कुछ प्रसंगों को छोड़कर फिल्म एक सामान्य स्तर की फिल्म ही रहती है। फिल्म बहुत सारे दृष्यों में कसी हुयी और अच्छी फिल्म होने की पटरी से उतरती रहती है कभी संवाद लाऊड हो जाते हैं कभी अभिनय लाऊड हो जाता है और कभी लगता है कि ऐसे दृष्य ह्रषिदा की फिल्म मे तो होने की उम्मीद दर्शक कम से कम ही करता है।

सुबीर द्वारा उमा को बार बार और बार बार होठों पर ऊँगली ले जाकर उन दोनों के बीच की शारीरिक नजदीकी की याद दिलाने के दृष्य ऊब जन्माते हैं और ऐसा लगने लगता है कि ह्रषिदा की प्रसिद्ध सम्पादन की कला को क्या हो गया था इस फिल्म को सम्पादित करते हुये?

सुबीर और उमा के मध्य का यह व्यक्तिगत जोक नुमा इशारा सिर्फ और सिर्फ एक बार रोचक लगता है जब घर में आयी धोबन अपने होठों पर सुबीर की तरह ऊँगली रखकर बैठ जाती है और तभी थोड़ा सा हास्य उत्पन्न होता है जिसके लिये ह्रषिदा माने जाते थे।

सचिन देव बर्मन दादा भी ह्रषिदा के साथ साथ दर्शकों के साथ मज़ाक करते हैं और देश के एक प्रसिद्ध गायक सुबीर के चरित्र के लिये थोड़े ही समय में अलग अलग गायक पार्श्व गायन करते हैं। परदे पर सुबीर कभी तो किशोर कुमार की आवाज में गाना गाते हैं कभी रफी उन्हे अपना गला उधार देते हैं और एक बार तो मनहर भी मैदान में कूद पड़ते हैं।

तब के नवोदित गायक मनहर को छोड़ भी दें पर अगर कोई गायक रफी और किशोर कुमार दोनों की आवाज में गाने गा दे तो वह देश का टॉप गायक बन ही जायेगा सो सुबीर कुमार भी देश के सबसे प्रसिद्ध गायक बन जाते हैं।

फिल्म के विषय में वापिस आयें तो फिल्म में वास्तव में जान पड़ती है डेविड के मैदान में उतरने के बाद और उससे भी ज्यादा तब जब वे उमा को सुबीर के साथ गाते हुये सुनते हैं और अपने साथी से कहते हैं कि अच्छा हो यदि सुबीर उमा को अपने साथ व्यवसायिक रुप से गाने के लिये विवश न करे।

amitabh jayaसाथी के पूछने पर कि इसमें खराबी क्या है।

वे कहते हैं,” देखते नहीं, उमा सुबीर से ज्यादा प्रतिभाशाली है और पुरुषों को बचपन से घुट्टी में पिलाया जाता है कि वे श्रेष्ठ हैं”

साथी लापरवाही से कहता है,” अरे साहब सारी प्रतिभा रसोईघर में और बच्चों को पालने में निकल जायेगी”।

डेविड कहते हैं,” यह तो और भी बुरा होगा”।

डेविड की चिंता जायज है, और आज भी प्रासंगिक है।

स्त्री की प्रतिभा का क्या हो मौटे तौर पर पुरुष द्वारा संचालित इस संसार में?

क्या एक पत्नी सिर्फ इसलिये अपनी प्रतिभा का गला घोट दे कि उसके खुलकर अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करने से उसके पति का समाज में स्थान उसकी शोहरत और प्रतिभा के सामने कम हो जायेगा?

जनक की सभा में हुये गार्गी याज्ञवल्क्य शास्त्रार्थ की विरासत सनातन काल से चली रही है और भले ही यह घटना भारत में घटी हो पर सत्य यह विश्व की सभी सभ्यताओं के संदर्भ में है।

अभिमान से कुछ ही साल पहले विजय आनंद ने दिखाया था कि कैसे राजू गाइड ने अभिमान के साथ गुस्से में हिकारत भरी दृष्टि से रोज़ी को देखते हुये कहा था कि तुम आज जो इतनी शोहरत और दौलत बटोर रही हो, यह और सारी तुम्हारी सफलता सब मेरी सूझबूझ और मेहनत का नतीजा है वरना तुम क्या थीं – अपने पति के व्यवहार से कुंठित होकर आत्महत्या का प्रयास करने वाली एक कमजोर औरत।

अभिमान में सुबीर खुद ही उमा को उनकी इच्छा के खिलाफ व्यवसायिक गायन में उतारते हैं और बाद में उमा द्वारा लगातार सफलता पाने के कारण मन ही मन कुंठा से भर जाते हैं। शुरु में वे अपनी कुंठा और उमा से जलन को वे दबाकर रखते हैं और चुपचाप उमा को सफलता की सीढ़ी चढ़ते हुये देखते रहते हैं।

स्त्री सूक्ष्म मनोभावों को भी समझ लेती है और उमा सुबीर के अंदर चल रही उथल-पुथल को भाँप कर कम से कम दो बार अपने द्वारा व्यवसायिक रुप से गाना न गाने और कहीं भी लोगों के सामने अपनी गायन प्रतिभा का प्रदर्शन न करने की मंशा का एलान कर देती हैं परंतु उनका ऐसा करना भी सुबीर को अपनी हार लगता है उन्हे लगता है कि अगर यह लोगों पर जाहिर हो गया कि वे अपनी ही पत्नी की सफलता से जलन रखते हैं तो उनकी छवि पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। इसी भय के कारण वे जोर देकर कहते हैं कि उमा को गाना गाना बंद नहीं करना चाहिये। उन लोगों का क्या होगा जिन्होने उमा के साथ करार किये हुये हैं?

मैं तंगदस्त हूँ ये गर राज़ खुल गया
मेहमान बनकर कोई मेरे घर न आयेगा

पर कुंठा और जलन बहुत दिनों तक तो दब कर रह नहीं सकतीं, ये तो वे विषबेलें है जो व्यक्ति को धीरे-धीरे इतना कटु बना देती हैं कि व्यक्ति अपने नजदीकी व्यक्तियों पर भी कटाक्ष करने से नहीं चूकता। जलन और कुंठा से भरा व्यक्ति जहर भरे बोल बोलने लगता है और यही सुबीर के साथ होता है।

ऐस व्यक्ति नितांत अकेला भी हो जाता है और अपना भला चाहने वाले नजदीकी व्यक्ति भी दुश्मन नजर आने लगते हैं।

सुबीर न केवल वैवाहिक संबंधों की मर्यादा को बल्कि दोस्ती की मर्यादा को भी तोड़ते हैं। वे उमा को अपमानित करते हैं। वे चंदर का अपमान करते हैं। उन्हे अपनी कला का घमंड है और अपनी कला के उमा से कमतर होने के कारण वे कुंठाग्रस्त भी हैं। कला उनके पास भी है और वे चाहें तो उसमे और निखार ला सकते हैं। वे चाहें तो उमा की सफलता में खुशी महसूस कर सकते हैं और अपने वैवाहिक, व्यक्तिगत और व्यवसायिक जीवन को संवार सकते हैं। आखिरकार उमा भी तो उनकी खातिर हर तरह का त्याग करने को तैयार हैं और सुबीर की सफलता से खुश भी होती हैं तो फिर सुबीर ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

क्या पुरुषों को दी जाने वाली सामंतवादी समझ – कि पुरुष हर मामले में स्त्री से श्रेष्ठ है- सुबीर को घेरे हुये है जिससे कि वे उमा को अपनी साथी नहीं बल्कि प्रतिद्वन्दी मानने लगते हैं?

व्यक्ति के अंदर इतने ऋणात्मक भावों के पनपने के बाद अच्छा होने के आसार कमतर होते चले जाते हैं और सुबीर के अंदर की कड़वाहट उसके वैवाहिक जीवन को चौपट कर देती है और मित्रता को भी घायल कर देती है।

राजा भरत की शकुंतला और अयोध्या के राम की सीता की तरह ही गर्भवती उमा को अपने पति का घर छोड़ना पड़ता है।

इतिहास अपने को दोहराता है ही हर युग में, हर दशक में बल्कि ऐसा हर साल-हर महीने-हर दिन-हर क्षण होता ही रहता है। मानव के लिये सीख किताबी ही होती है जब तक कि वह खुद भुगत न ले। वह उसके पूर्वज मानवों द्वारा की गयी गलतियाँ दोहराता ही चला जाता है।

सुबीर ने कभी अपने और उमा के भविष्य- उनकी संतान- के लिये खुशी से भरा एक गीत रचा था – तेरे मेरे मिलन की ये रैना नया कोई गुल खिलायेगी-
पर मिलन तो बहुत समय तक कायम न रह सका पर उन दोनों की जुदाई जरुर गुल खिलाती है पर गलत अर्थों में।

सुबीर का कुंठाग्रस्त अहंकार इतना बढ़ चुका है कि उमा के गर्भवती होने की सूचना उसे उमा और अपनी माँ समान मौसी के पास जाने के लिये प्रेरित नहीं करती।

ऐसे कठोर हालात में उमा के जीवन पर तुषारापात होता है और उसका अस्तित्व सर्द हो जाता है।

बदलाव आता है जीवन में। जब तक सुबीर को जीवन में आये दुख का अहसास होता है बहुत ज्यादा नुकसान उसके जीवन में हो चुका है। उमा जीती तो है, चलती फिरती तो है पर पत्थर की एक मूरत की तरह जिसे किसी भी तरह को कोई अहसास छूता नहीं है।

वक्त्त के गुजरने से जख्म तो भर जाते हैं
पर दिल से दर्द की एक ख़ालिश नहीं जाती

कैसी विडम्बना है कि पत्थर बनी उमा के लिये आँसू बहाना जीवन फिर से पाने का जरिया बन जाता है। सुबीर और उमा के शुभचिंतक बुजुर्ग संगीतकार (डेविड) ही सुबीर को सलाह देते हैं कि जिसने दर्द दिया है वही दवा भी देगा। जिस संगीत के कारण तुम जुड़े और फिर अलग हुये वही संगीत फिर से तुम्हे जोड़ेगा।

हालात सुबीर और उमा को एक बार फिर से- तेरे मेरे मिलन की ये रैना- युगल गीत गाने के लिये तैयार करते हैं पर अब तक बहुत ज्यादा पीड़ा का समावेश जीवन में हो चुका होता है।

जो गीत कभी हँसते खेलते जीवन का प्रतीक था अब वह आँसुओं से भरी आँखें लिये गाया जाता है।

तुलना कैसा विनाश व्यक्ति के जीवन में ला सकती है – इसे बहुत प्रभावी ढ़ंग से अभिमान में दिखाया गया है।

फिल्म स्थापित करती है इस अवधारणा को कि प्रतिभा और कला श्रेष्ठ होती हैं, स्त्री या पुरुष कला से बढ़कर नहीं होते, जीवन के उतार-चढ़ाव के साथ साथ उनके प्रदर्शन में भी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं पर यदि उनमें प्रतिभा है तो वे इन मुसीबतों का सामना करते हुये कला की साधना में लगे रह सकते हैं।

दुख और परेशानियों के आगमन के कथानक में प्रवेश करने के साथ ही फिल्म योग्यता के मामले में तुरंत ऊँची उड़ान भरने लगती है और फिल्म का स्तर बहुत ऊँचा हो जाता है। फिल्म के अब तक बीते भाग में लगभग सामान्य स्तर का अभिनय प्रदर्शन करने वाले अमिताभ बच्चन भी गहराई ला पाते हैं अपने अभिनय में। वैसे इस फिल्म में जया, बिन्दु और दुर्गा खोटे तीनों महिलायें उनसे बीस ही रहती हैं अभिनय की श्रेष्ठता के मामले में।

जया भादुड़ी अभिनय में अपनी रेंज का प्रदर्शन बखूबी करती हैं। अभिमान एक तरह से उनके अभिनय जीवन की प्रतिनिधि भी है। सत्तर के दशक में वे बहुत अच्छे फॉर्म में थीं और अगर शादी के बाद वे स्वैच्छिक रुप से फिल्मों में अभिनय करने से किनारा न कर लेतीं तो वे कुछ कालजयी फिल्मों की नायिका बन सकती थीं।

एक.के हंगल साब के बारे में क्या कहा जाये, वे तो इतनी ज्यादा विश्वसनीयता अपने चरित्र में ले आते हैं कि ज्यादातर ऐसा ही लगता है कि वास्तविक जीवन में जरुर उन्होने वे सब काम किये होंगे जो फिल्म में उनके चरित्र को करने हैं। गाँव में आ बसे ऐसे सेवानिवृत अध्यापक, जिन्हे हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत का बहुत अच्छा ज्ञान है, की छोटी सी भूमिका में वे अपने अभिनय कौशल का इस तरह से प्रदर्शन करते हैं कि उनकी उपस्थिति मात्र से ऐसा विश्वास हो जाता है कि वे संगीत के प्रकांड पंडित हैं और अपने चरित्र के दुखी और उदास पुत्री के दुखी पिता वाले भाग को भी वे बखूबी निभाते हैं।

ऐसा ही डेविड की उपस्थिति से भी होता है। ये दोनों और इनकी पीढ़ी के कुछ अन्य चरित्र अभिनेता कितनी ही फिल्मों में अक्सर फिल्म के नायक-नायिका के मुख्य किरदार निभाने वाले अभिनेताओं से ज्यादा अच्छा अभिनय करके दिखा चुके हैं। उनके अभिनय में एक सच्चाई होती थी।

उमा को एक गायिका दिखाया गया है और सचिन देव बर्मन इस बात का पूरा फायदा उठाकर लता की आवाज में बेहतरीन गाने रच गये हैं।

फिल्म के कथानक के अनुसार भी सिर्फ तेरे मेरे मिलन की ये रैना ही ऐसा गीत है जहाँ किशोर कुमार लता की बराबरी करते हैं वरना बाकी समय लता फिल्म के संगीत पर छाई रहती हैं।

अभिमान रिश्तों में आदर्श की भावना जगाकर और रिश्तों को समझ-बूझ और सभ्यता से निभाने की सीख देकर अपना एक गहरा असर दर्शक पर छोड़ जाती है। फिल्म यह भी सीख दे जाती है कि पति-पत्नी जैसे रिश्ते से व्यक्तिगत अहंकार को जहाँ तक हो सके दूर ही रखना चाहिये वरना जीवन में बड़ी हानि उठानी पड़ सकती है।

…[राकेश]

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