angoorकरीब सवा चार सदी पहले विश्व प्रसिद्ध लेखक विलियम शेक्सपियर द्वारा रोपे गये अंगूरों के बाग (  Comedy of Errors) से बीसवीं सदी के अस्सी के दशक में अंगूर लेकर गुलज़ार ने अपनी लेखकीय, निर्देशकीय और हास्य-बोध की प्रतिभा के मिश्रण की सहायता से विशुद्ध हास्य की ऐसी शैम्पेन तैयार की जो इसका सेवन करने वाले को सुरुर में ले जाये बिना मानती ही नहीं। गुलज़ार ने अपनी मधुशाला का नाम रखा – अंगूर

वही है बेखुदे नाकाम तुम समझ लेना
शराबखाने से जो होशियार आयेगा

गुलज़ार की हास्य-मधुशाला – अंगूर में कोई जाये और हास्य से सराबोर होकर न आये तो उसके दिमाग में हास्य को समझने वाले तंतुओं के सिस्टम में ही कुछ गड़बड़ है और उस पर अब शायद किसी भी तरह के मधु या सोम का कोई असर न होगा।

बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला,
दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।

अंगूर तो ऐसी मधुशाला है जो बड़ी नफासत से लोगों को प्रसन्नता के नशे में डूबो देती है और प्रसन्नता का जीवन में महत्व समझा देती है।

जुड़वा भाइयों के दो जोड़ों के जीवन पर बनी गुलज़ार की अंगूर हास्य के क्षेत्र में एक उच्च कोटि की फिल्म है।

साठ के दशक के अंत में बिमल रॉय के प्रोडक्शन के लिये उन्होने इसी विषय पर बनी फिल्म – दो दूनी चार, में अपनी लेखनी का योगदान दिया था परंतु इस विषय पर उनकी समझ और पकड़ अपनी परिणति पर पहुँचती है अंगूर के रुप में।

अंगूर में संजीव कुमार और देवेन वर्मा ने जुड़वा भाइयों के दो जोड़ों की भूमिकाओं में पूर्णता के साथ डबल रोल निभाकर बाकी सभी अभिनेताओं के लिये यह काम बहुत मुश्किल बना दिया है।

गुलज़ार ने अपने निर्देशन में इस बात को संभव कर दिखाया है कि पूर्णतः काल्पनिक कथानक में ऐसी परिस्थितियाँ रचें और अपने अभिनेताओं से ऐसा नाटकीय लेकिन दर्शकों को वास्तविक अहसास देने वाला अभिनय करवायें जिससे कि दर्शकों का विश्वास फिल्म में घट रही घटनाओं के प्रति बना रहे। ऐसी विश्वसनीयता ही अंगूर को हास्य-फिल्मों में एक उल्लेखनीय स्थान दिलवाती है। यह एकदम विदूषक प्रकृत्ति वाली हास्य फिल्म नहीं है। फिल्म ऐसा माहौल रचती है जिसमें दर्शक को ऐसा विश्वास सहज ही हो जाता है कि हाँ ऐसा हो सकता है और हो रहा है।

जुड़वा बच्चों के खोने के बाद कई साल बाद उनके वयस्क होने के बाद रचे गये पहले ही दृष्य से ऐसा विश्वसनीय माहौल रचने में फिल्म सफल रहती है। इस दृष्य में अशोक (संजीव कुमार) अपनी पत्नी सुधा (मौशुमी चटर्जी) और सुधा की छोटी बहन तनु (दीप्ती नवल) के साथ अपने घर में ताश खेलने में व्यस्त है। तीनों पात्रों का आपस में सम्बंध व वार्तालाप बहुत ही प्रभावी ढ़ंग से न केवल तीनों चरित्रों की प्रवृत्ति बल्कि फिल्म की प्रकृत्ति को भी जता देते हैं।

अशोक के यह कहने पर कि पिताजी मरने से पहले एक दिन जिंदा थे, यह बात स्थापित हो जाती है कि किस तरह का नफीस हास्य फिल्म दर्शकों के सामने परोसने वाली है।

फिल्म दोनों अशोक (संजीव कुमार) और दोनों बहादुर (देवेन वर्मा) की भूमिकाओं के बीच सूक्ष्म अंतर रखती है। यह अंतर न केवल दोनों भूमिकाओं के सोचने में है बल्कि उनके व्यवहार में भी है।

एक अशोक शादीशुदा हैं और दूसरे कुंवारे हैं। शादीशुदा अशोक कुछ संजीदा किस्म के हैं और उन्हे गुस्सा जल्दी आ जाता है। कुंवारे अशोक को जासूसी उपन्यास पढ़ने का जबरदस्त शौक है। शादीशुदा अशोक को नसवार सूँघने की आदत है तो कुंवारे अशोक को भौंहों को उमेठते रहने की। एक जैसी शक्ल के अलावा दोनों अशोक एक और बात में समानता रखते हैं और वह है उन दोनों के ही अंदर मालिक होने के भाव होना। दोनों बहादुर बचपन से ही दोनों अशोकों के साथ ही पले बड़े हुये हैं परंतु दोनों अशोक दोनों बहादुरों को पूरी ईमानदारी से अपने नौकर ही समझते हैं और उन्हे अपने बराबर नहीं समझते, सो इस बात का पता लगाया जाना थोड़ा मुश्किल है कि कौन सा अशोक किस बहादुर के साथ है।

लेकिन गुलज़ार दोनों बहादुरों के व्यवहारों में भी भेद रखते हैं। एक बहादुर अपने मालिक अशोक को कभी कभी हड़का भी देता है और माँजी से शिकायत करने की धमकी दे देता है। दूसरा बहादुर भावुक किस्म का है और वह अपने मालिक अशोक से काफी डरता है। वह अशोक की पत्नी सुधा से अपनी बड़ी बहन के माफिक लगाव रखता है और उसके दुख से दुखी हो जाता है। सुधा भी अपने वाले बहादुर को घर के सदस्य की तरह ही मानती है। सुधा के पिता ने ही अशोक और बहादुर की परवरिश की है। यह बहादुर भी शादीशुदा है और उसकी पत्नी का नाम प्रेमा (अरुणा ईरानी) है।

कुंवारा अशोक और उसका बहादुर दूसरे शहर से उस जगह आ जाते हैं जहाँ शादीशुदा अशोक अपनी पत्नी सुधा और साली तनु के साथ रहता है। हमशक्लों के दो जोड़ों के एक ही शहर में एक ही साथ उपस्थित होने से कैसी अफरा-तफरी मचती है वही सब अंगूर की विषयवस्तु है।

शक्ल सूरत की समानता से मचे घमासान में गलतफहमियाँ उत्पन्न होनी स्वाभाविक हैं और पहचान की गफलतों के कारण कुंवारा अशोक ले जाया जाता है सुधा के घर उसके पति के रुप में और पीछे पीछे उसका बहादुर भी पहुँच जाता है। दोनों बहादुर शादीशुदा और कुंवारे अशोकों के मध्य स्थानंतरित होते रहते हैं, उन्हे तो पता नहीं है कि उनके अशोक कभी बदल जाते हैं और कभी मूल रुप में रहते हैं, वे तो इस बात से परेशान होते रहते हैं कि उनके वाले अशोक का व्यवहार इतना बदला हुआ कैसे है?

गुलज़ार की फिल्म के दृष्य एक अशोक से दूसरे अशोक पर जम्प कट्स के द्वारा कूदफाँद करते रहते हैं और दर्शक तो हमशक्ल चरित्रों की किन्ही खास आदतों को कुछ क्षणों बाद पहचान लेते हैं परंतु फिल्म के अन्य चरित्र तो जुड़वा चरित्रों के अस्तित्व से अनभिज्ञ हैं सो वे परेशान होते रहते हैं और गलतियाँ करते रहते हैं।

शादीशुदा अशोक को जड़ाऊ हार अपनी पत्नी को देना है और हार पँहुच जाता है कुंवारे अशोक के पास जो कि जासूसी संसार के काल्पनिक लोक में विचरण करने वाला व्यक्त्ति है और उसे लगता है कि कोई गैंग है जो उसके और उसके एक लाख रुपयों के पीछे पीछे पड़ा हुआ है जो कि वह अंगूरों के बाग को खरीदने के लिये अपने साथ लाया है।

कुंवारे अशोक पर जासूसी किताबों का इतना असर है कि जब स्टेशन से बाहर निकलते समय टिकट चैकर उसे शादीशुदा स्थानीय अशोक समझ कर बात करता है तो कुँवारा अशोक उससे कह कर जाता है,”बड़े चालू आदमी हो”।

कुंवारा अशोक इस कदर चौकन्ना रहता है कि टैक्सी ड्राइवर (राम मोहन) के यह पूछने पर कि वे लोग कहाँ जायेंगे, वह झट से प्रत्युत्तर में प्रश्न दाग देता है,” क्यों बतायें तुमको”।

बहादुर के समझाने पर कि इसे तो बताना ही पड़ेगा कि हमें जाना कहाँ हैं, वह बात को घुमाफिरा कर कहता है,” फलाँ होटल चलो पर हम वहाँ ठहरने वाले नहीं हैं, वहाँ से कहीं और जायेंगे”।

होटल पहुँचने के बाद कुँवारे अशोक और कुँवारे बहादुर के मध्य दर्शक को ठहाका लगाकर हँसने के लिये विवश कर देने वाले दृष्य गुलज़ार ने रचे हैं।

सुधा, तनु, शहर के पुलिस अधिकारी (कर्नल कपूर), सुनार छेदीलाल (सी एस दूबे) और उसकी दुकान पर काम करने वाला कर्मचारी मंसूर (युनूस परवेज़), हीरे आदि रत्नों की कंटाई आदि करने वाला गणेशीलाल (टी पी जैन) आदि सभी हमशक्लों की जोड़ियों की अदलाबदली से परेशान हो जाते हैं। जिसे वह समझते हैं कि वह उनका परिचित है कभी वह वही होता है और कभी दूसरा वाला जो कि इन सब लोगों से अंजान है।

शादीशुदा अशोक एक बहादुर को बाजार से रस्सी लाने भेजता है कि जाकर सुधा को दे दे ताकि वह आत्महत्या कर ले और उस बहादुर से जब दुकानदार पूछता है कि रस्सी क्यों चाहिये तो वह कहता है आत्महत्या के लिये। इस बहादुर को रस्सी मंहगी लगती है और वह दुकान छोड़कर चला जाता है तो दुकानदार बड़बड़ाता है,” कंजूस मरते समय भी पचास पैसे बचाना चाहता है”।
उसी समय दूसरा बहादुर चने खाते हुये वहाँ पहुँच जाता है और पहले बहादुर के मोलभाव से भन्नाया हुआ दुकानदार उससे पूछ्ता है,” एक बात बताओ, जो आदमी मरने जा रहा हो, वह पचास पैसे बचा कर क्या करेगा?”

इस बहादुर को तो कुछ पता है नहीं दूसरे बहादुर और इस दुकानदार के बीच घटी बातचीत का सो शांति से हँसकर कहता है,” जब मर ही जायेगा तो पचास पैसे किस काम के”।
दुकानदार कहता है,: यही तो मैं कह रहा हूँ अच्छा चल तू कम पैसे ही दे दे और रस्सी ले जा”।

बहादुर हैरत में पड़ जाता है और उसे डाँटकर चला जाता है। अब दुकानदार हैरत में पड़ जाता है कि जो आदमी अभी कुछ मिनट पहले मोलभाव कर रहा था अब सस्ते दामों पर भी रस्सी खरीद कर नहीं गया।

ऐसी बहुत सारी गलतफमियों के कारण चरित्र तो आपस में उलझे रहते हैं पर दर्शकों को भरपूर मनोरंजन मिलता है।

फिल्म में श्रेष्ठ हास्य उत्पन्न करने वाले दृष्यों को छाँटा जाये तो वे बहुत ज्यादा हैं। लगभग हर दस मिनट में हंसी के फव्वारे छुटवाने वाले दृष्य परदे पर आते हैं।

कुंवारे अशोक और अंगूर के बगीचे में काम करने वाले एक व्यक्त्ति के बीच का दृष्य और संवाद, दोनों ही अनूठे हैं और उस दृष्य के बहाने गुलज़ार, इनकम टैक्स, बैंक और सरकार को भी हास्य के लपेटे में ले लेते हैं।

अंगूर ऐसी फिल्म है जो हँसने को स्वस्थ रहने का मंत्र और साधना मानने वाले लाफिंग क्लब्स के लिये श्रेष्ठ साधन है। इसे देखकर हास्य स्वतः ही दर्शक के अंदर से उमड़ने लगता है और हँसी उसकी शिराओं में रक्त्त का प्रवाह बढ़ा देती है।

गुलज़ार साब ने निर्देशक के तौर पर केवल एक ही ऐसी फिल्म बनायी है को पूर्णरुपेण कॉमेडी फिल्म है और उनका इकलौता प्रयास हिंदी सिनेमा को एक अनूठी हास्य फिल्म दे गया है।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।

संजीव कुमार और देवेन वर्मा ने तो गजब की अदाकारी प्रस्तुत की ही है मौशुमी चटर्जी भी इस फिल्म में विश्वसनीय तरीके से हास्य रचने में अपना योगदान करती हैं। संजीव कुमार ने वॉयस मॉडयूलेशन की इतना ज्यादा प्रयोग किसी और फिल्म में नहीं किया होगा जैसा कि वे इस फिल्म में करते हैं।

सहायक भूमिकाओं में दीप्ती नवल, सी एस दूबे, टी पी जैन, युनूस परवेज़, कर्नल कपूर, राम मोहन, अरुणा ईरानी,शम्मी और उत्पल दत्त अपनी तरफ से फिल्म को गुणवत्ता प्रदान करते हैं।

अंगूर एक अविस्मरणीय फिल्म है और ऐसी फिल्म है जो कभी बासी नहीं होती और पुरानी शराब की तरह इसकी मूल्यता बढ़ती जाती है।

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
गुलज़ार साकी बनकर आया है भरकर हास्य का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
दर्शकगण हैं पीनेवाले, फिल्म मेरी मधुशाला।

…[राकेश]

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