dustola1दस तोला फिल्म की ज्यादा चर्चा नहीं हुयी पर गुलज़ार साब द्वारा इस सीधी सादी कहानी वाली रोचक फिल्म के लिये ऊँचे स्तर वाले लिखे गये गीत भरपूर ध्यान माँगते हैं। संदेश शांडिल्य ने आकर्षक धुनों से गीतों को ध्वनियाँ दी हैं और इन गीतों को स्वर देने में गायकों ने भी भरपूर योगदान दिया है।

वर्तमान दौर की हिन्दी फिल्मों में उपस्थित संगीत में जहाँ बीट ने संगीत के बाकी सब रुपों को पार्श्व में भेजते हुये सबसे आगे की जगह पर अपने डिस्कोथेक का निर्माण कर लिया है और बहुतायत में गीतों का अक्सर फिल्म की कहानी और सिचुऎशन्स से कोई मतलब नहीं होता और वे आइटम गीतों की तरह ही अलग से रचे, बुने और धुने जाते हैं, ऐसे माहौल में गुलज़ार साब ने दस तोला की कहानी, पृष्ठभूमि और फिल्म में उपस्थित सिचुएशन्स को मद्देनज़र रखते हुये इसके गीतों की रचना की है और अपने अलंकृत शब्दों से चरित्रों एवम कथानक की स्थितियों को भावाभिव्यक्त्ति प्रदान की है। गुलज़ार के बोल हरेक गीत में प्रमुखता से उभर कर आते हैं और श्रोता को शब्दों पर और उनके अर्थों पर ध्यान देने के लिये स्वतः ही प्रेरित करते हैं।

न मेरी चली
ना दिल की चली
जो चले सो चलती है
आग़ाज़ वही अंजाम वही
ये किस की गलती है

ऐसा होता था ऐसा होता है ऐसा ही होता है|

मोहित चौहान द्वारा गाये गये इस गीत से ही फिल्म की शुरुआत होती है और यह फिल्म में उपस्थित शंकर (मनोज बाजपेयी) और सुवर्णलता उर्फ सुवर्णा उर्फ सोनू (आरती छाबड़िया) के प्रेम सम्बंध में आये चढ़ाव और उतार की कथा का सारांश बयान कर देता है और प्रकृति के वृहद स्वरुप के सामने इंसान के अपने ही जीवन पर सीमित नियंत्रण की बात दर्शाता है। कुछ-कुछ भाग्यवादी दर्शन इस गीत में है। अपने को तो व्यक्त्ति कुछ हद तक नियंत्रित कर सकता है पर जहाँ दूसरा भी सम्मिलित हो वहाँ क्या हो सकता है?

धूप चढ़े जो दीवार पर
याद जो आये तो क्या करे
लोग तो उठ के चल दिए
साया न जाये तो क्या करे

बहुत ही महीन तुलनात्मक रुपक गुलज़ार साब ने इन पंक्त्तियों में उपयोग में किये हैं।

अक्सर कहा जाता है कि रात के एकांत में ही यादें सताती हैं पर कभी कभी दिन के समय भीड़ में भी व्यक्त्ति अपनी यादों के साथ अकेला रह जाता है। जीवन में लोग तो दूर चले जाते हैं पर उनकी यादें साथ छोड़कर जाने से इंकार कर देती हैं।

व्यक्त्ति दूरी नहीं चाहता पर दूरियाँ आ जाती हैं। बहुत लोगों के साथ प्रेम में ऐसा हो चुका है कि प्रेमियों को जुदाई सहनी पड़ी है। कब से ऐसा होता आया है पर तब भी हर प्रेमी यही समझता है कि उसके साथ ऐसा नहीं होगा और उसका प्रेम अवश्य ही विवाह की परिणति तक पहुँच कर सफल होगा। एकदम मौत जैसा मामला है, हरेक को लगता है कि दूसरे मर रहे हैं पर मैं तो जीवित हूँ और बहुत साल तक रहूँगा। मौत सौ तोले सच है पर कोई इसे मानना नहीं चाहता, ऐसा ही प्रेम में भी है। उन प्रेमियों में जिनके साथ आर्थिक और समाजिक मजबूरियाँ जुड़ी हुयी हैं, जुदाई का भय हमेशा रहता है पर वे प्रेम की ऊर्जा के वशीभूत होकर इसे अनदेखा किये रखते हैं। कुछ प्रेमी इस बाधा को पार कर जाते हैं और कुछ का प्रेम इन बाधाओं से टकराकर चकनाचूर हो जाता है। अपनी कोई भी गलती न होने के बावजूद प्रेम, जीवन की इन मजबूरियों की भेंट चढ़ जाता है।

दो बदन दो रूहें थी
एक ज़माने में एक थे
हां वफ़ा में कोई दोष था
बेवफा तो सारे नेक थे
नज़र का तार कोई तोड़ ले
तो चोट सी लगती है
आग़ाज़ वही अंजाम वही
ये किस की गलती है
ऐसा होता था ऐसा होता है ऐसा ही होता है

प्रेमी-प्रेमिका तो उस समय भी दो अलग शरीर और रुह थे जबकि वे एक दूसरे के साथ प्रेम में होने की प्रक्रिया से गुजर रहे थे। प्रेम ही वह साझा बिंदु था जहाँ आकर उनके अलग अलग अस्तित्व एकाकार होने का अर्थ महसूस करते थे।

इस फिल्म के संदर्भ में सुवर्णा गाँव वालों की भीड़ के सामने शंकर के प्रेम के दावे को झूठा कह देती है और शंकर जग-हँसाई का पात्र बन जाता है।

किसकी वफा में दोष था?

धन का लालच और शंकर की गरीबी, दो ऐसे तत्व हैं जो सुवर्णा को शंकर को प्रेम में धोखा देने के लिये प्रेरित करते हैं।

पर ऐसे धोखा देने के बाद क्या सुवर्णा को जीवन में सुख मिला। उसके पिता ने धन के लालच में दुबई में रहने वाले रवि से उसका विवाह किया यह सोचकर कि वह धन-सम्पत्ति में खेलेगी।

दशकों पहले गुरुदत्त की प्यासा में माला ने अपने गरीब प्रेमी विजय के प्रेम को छोड़कर अमीर प्रकाशक से विवाह कर लिया था पर क्या इससे उसका जीवन भरपूर सुख-शांति से भर गया था। खर्च करने के लिये धन जरुर मिल गया था पर जीवन में और तरह के कष्टों ने प्रवेश कर लिया था।

यही सुवर्णा के साथ भी होता है और उसे तो विवाह के बाद धनी जीवन भी नहीं मिलता।

ऐसा भी जीवन में ही होता है और यह भी सच ही है। मार्ग बदल जाने से जीवन में दिक्कतें आनी बंद नहीं होतीं। उनका स्वरुप जरुर बदल सकता है।

गरीब सुनार शंकर के सामने जब उसके पड़ोस में रहने वाली प्रेमिका सुवर्णा यह प्रस्ताव रखती है कि यदि किसी तरह वह दस तोले सोने का मंगलसूत्र बनाकर उसके गले में डाल दे तो उसके पिता इस विवाह का विरोध नहीं कर पायेंगे।

अपने प्रेम को पाने के लिये शंकर कुछ भी कर गुजरने के लिये तत्पर है पर दस तोले सोने का हार उसके आर्थिक हालात के समक्ष बहुत मंहगा सौदा है और वह शंका प्रकट करता है कि यदि हार लेने के बाद भी सुवर्णा के पिता ने उन दोनों को शादी करने की मंजूरी न दी तो?

सुवर्णा बड़े बड़े बोल बोल कर शंकर को याद दिलाती है कि प्रेम का आधार विश्वास होता है। प्रेम में डूबा हुआ शंकर, सुवर्णा के लिये दस तोले सोने का मंगल सूत्र बनाने का संकल्प लेकर इस काम में जुट जाता है और तब सुखविंदर सिंह द्वारा गाया यह गीत फिल्म में आता है।

लाल लाल आग हुआ पत्ता चनार का
माटी कुम्हार की सोना सुनार का

प्रेम के लिये किये गये संकल्प की ऊर्जा से भरे हुये प्रेमी द्वारा लक्ष्य को अंजाम देने के लिये एक साधना की तरह इस काम में जुटे रहने के दौरान उसकी मनोस्थितियों का वर्णन यह गीत बखूबी करता है। बसंत में प्रकृति में एक अलग ही ऊर्जा दिखायी देती है और चारों तरफ भिन्न-भिन्न किस्म के रंग अपनी छ्टा बिखेरने लगते हैं।

प्रकृति को जैसा आनंद ऐसा सृजन करने में आता होगा वैसा ही आनंद उस कलाकार को भी आता है जो कुछ भी रचनात्मक सृजित करता है। हाथ से किये जाने वाले सभी काम कलाकारी के ही नमूने हैं। इस बात को आज के मशीनी युग में भले ही भुला ही दिया गया हो पर जैसा तारतम्यपूर्ण ध्यान मन लगाकर कोई भी कार्य अपने हाथों से करने में लगता है वैसा ध्यान धन देकर मंहगे आश्रमों में सिखायी गयी ध्यान की विधियों का प्रयोग करने से भी नहीं लगता।

गिन गिन गिन गिन दिन दिन इंतज़ार का
रेज़ा रेज़ा पलछिन पल काटने हैं
हाथ की लकीरों के बल छांटने हैं

पर लक्ष्यहीन आनंदपूर्ण ध्यान के उलट यहाँ प्रेमी के सामने एक लक्ष्य भी है और उसे इस बात की जल्दी भी है कि शीघ्र ही वह हार बनाने का काम निबटा ले तो उसके सुवर्णा से शादी करने का रास्ता साफ हो जायेगा। एक तरफ वह मन लगाकर हार को खूबसूरत बनाने में जुटा है और दूसरी तरफ उसके ऊपर इस बात का दबाव भी है कि उसके भाग्य खुलने का रास्ता इसी हार से होकर जाता है।

रत्ती रत्ती माशा माशा तोला है न तोलना है
अंखियों में बंद है वो पलकों से खोलना है
लाल लाल आग में है दाना अनार का

प्रेम को पाने के संकल्प के सामने शंकर अपने सुनारी के व्यवसाय की बारीकियाँ आड़े नहीं आने देना चाहता। लेनदेन की बात नहीं करता प्रेमी। प्रेम व्यापार नहीं है उसके लिये। वह थकता है पर उसकी आंखों में प्रेम का सपना तैर रहा है और इसे साकार करने के लिये वह फिर से श्रम में डूब जाता है।

हीरे की कन्नी है न पन्ने का पानी
सोने में सोएगी गाँव की रानी
अरे गीली सीली झुग्गियों में सावन गुज़ारा
बूंद-बूंद मटके में भादों उतारा
अरे इंच इंच घूमता है
चक्का इंतज़ार का चक्का इंतज़ार का

प्रेमी के पास हीरे-पन्ने जड़ने के लिये धन-सम्पत्ति नहीं है, वक्त्त गरीबी में गुजर रहा है पर तब भी वह उसे सोने का हार देने के लिये प्रयासरत है। सावन में गीलेपन से सीली हुयी झौंपड़ी में वक्त्त गुजारना और भादों के माह में पानी के लिये तरसते रहते हुये इंतजार के पल काटने जैसे रुपक प्रेमी की कठिन स्थितियाँ का बखान करते हैं। कठिन समय को प्रेमी इस आशा में व्यतीत करता है कि बाद में उसका प्रेम सफल परिणति को प्राप्त होगा।

पर शंकर को सुवर्णा को हार देने के बाद भी प्रेम में धोखा खाना पड़ता है। हालाँकि गाँव भर के सामने झूठा ठहराये जाने से आहत प्रेमी कह तो देता है कि जिस लड़की का दिल एक हार के लालच में बदल जाये ऐसी धोखेबाज लड़की और उसका प्रेम उसे नहीं चाहिये पर एकदम से उत्पन्न हुयी वितृष्णा के वशीभूत होकर बड़े बोल कह देना और बात है और दिल में से प्रेमिका की याद को मिटा देना एकदम दूसरी बात है। एकांत में प्रेमी को अपने दिल में बसी प्रेमिका की यादों से लड़ना है। धोखा प्रेम में धोखा खाने के बाद एकांत में प्रेमी के दुखी ह्र्दय से उदगार फूटते हैं।

तुमसे क्या कहना है
सोनू तुमसे क्या अब सुनना
छोड़ दिया अब चाँदनी रात में मैंने सपने बुनना
मैं अपनी तन्हाई से अब सब कह लेता हूँ
तुम बोलो न बोलो तुम बोलो न बोलो

उसे पता है कि अब प्रेमिका से मिलन नहीं हो पायेगा। यह ऊहापोह की स्थिति है उसके लिये। प्रेमी अपनी भूतपूर्व प्रेमिका को दोष भी देना चाहता है, प्रेम में खायी चोट से उबरना भी चाहता है, दिल को तसल्ली भी देना चाहता है और अपने को मजबूत भी दिखाना चाहता है।

वह कहता जरुर है कि अब वह स्थिति आ गयी है जब तुम रहो न रहो कोई फर्क नहीं पड़ता पर वास्तविकता में वह इस स्थिति से ऊपर उठ नहीं पाया है। उसकी स्थिति – न निगला जाये न उगला जाये – वाली हो गयी है। प्रेमी-प्रेमिका एक धागे से बँधे हुये थे और प्रेमिका ने तो अपनी तरफ से धागे को काट दिया पर दूसरी तरह प्रेमी के हाथ में रह जाने वाले धागे का बचा खुचा सिरा अभी भी प्रेमिका की तरफ ही जाता है। चूँकि प्रेमी ने अलग होने का निर्णय नहीं लिया है और उस पर यह निर्णय उसकी प्रेमिका द्वारा थोपा गया है अतः प्रेमी को तो समय लगेगा इस धागे को अपने से दूर फेंकने में।

रात को जब चाँद पूछेगा
वो कैसी लग रही थी
चाँद से कह दूँगा
मुझको तेरे जैसी लग रही थी
उस में भी एक दाग़ निकला
तू भी तो घटता है बढ़ता है
देर सवेर से चढ़ता है
तेरा सोना कब खरा था
सिर्फ अशर्फी की तरह था
जब तुम मिलो कहना उसे
ज़रूरी नहीं है
तुम बोलो न बोलो

प्रेमिका की बेरुखी से जले हुये दिल के भाव प्रेमी को चाँद से शिकायत करने के लिये भी उकसाते हैं। चमकते चाँद की चाँदनी अब उसे शीतलता नहीं देती, रोमांटिक ख्याल नहीं देती वरन उसकी उपस्थिति उसे चिढ़ाती है। चाँद ने गुलज़ार साब के बहुत सारे गीतों और कविताओं को प्रेरित किया है पर इससे पहले कभी उन्होने चाँद का उपयोग इस तरह से नहीं किया था जैसा वे इस गीत में करते हैं। प्रेमी उस अवस्था में है जहाँ अगर कोई उससे सहानूभूति दर्शाने के लिये उसकी भूतपूर्व प्रेमिका का जिक्र उससे करे तो उसका रुख क्या होगा यह अनपेक्षित है। वह उस व्यक्त्ति को भी उसकी कमियाँ याद दिला सकता है, उसकी सूरज और प्रकृति के दूसरे अन्य तत्वों पर निर्भरता को याद दिलाता है और इन कमियों को उसके दुख से जोड़ना चाहता है। प्रेमी मूलतः एकांतवास चाह रहा है। एकांतवास में खुद से साक्षात्कार ही उसे इस दुख से उबारेगा। पर चाँद को कोसते हुये उसे अभी भी आशा है कि शायद उसका रुदन प्रेमिका तक पहुँच जाये और वह फिर से उसके भावों को समझने लगे। वह इसी चाँद से कहता है उससे मिलो तो कहना कि मैं मजबूत हूँ और अब उसका मुझसे बोलना न बोलना मायने नहीं रखता।

प्रेमिका को बेवफा कहते हुये भी दिल में कहीं उम्मीद बनी रहती है कि शायद वह पुनः वफा की ओर लौट आये।

मेरी आदत में नहीं है
कोई रिश्ता तोड़ देना
मेरे शायर ने कहा था
मोड़ देकर छोड़ देना
अजनबी फिर अजनबी है

गुलज़ार शब्दों और भावों का एक जड़ाऊ हार बनाकर अपने प्रिय शायर साहिर लुधियानवी की स्मृति को भेंट करते हैं। बहुत साल पहले साहिर की कलम ने लिखा था- चलो एक बार फिर से अजनबी बन जायें हम दोनों… जो अफसाना अंजाम तक पहुँचाना न हो मुमकिन उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना अच्छा -।

गहने बहुत पहनोगे
याद का जेवर नया है
दर्द जो घुलते नहीं है
रंग वो धुलते नहीं है
सारे गिले बाकी रहे
मगर याद है

तुम बोलो न बोलो

सुवर्णा और उसके माता-पिता ने गरीब शंकर के प्रेम को ठुकराकर धनी दिखने वाले रवि से नाता जोड़ा है। दुखी प्रेमी को यकीन है कि प्रेमिका को कभी तो पुराने प्रेम की याद सताया करेगी। प्रेम में जुदाई के बाद यह स्थिति भी बन पड़ी है जहाँ प्रेमी प्रेमिका का बुरा तो नहीं चाहेगा पर उसके ह्र्दय से ऐसी भावनायें जरुर विसरित हो रही हैं जिससे उसे धोखा देने वाली प्रेमिका को समय ऐसा सबक सिखाये जिससे कि उसे कभी तो अपने किये पर पछतावा हो और उसके घायल प्रेम को न्याय मिले।

सोनू निगम ने भावों पर बहुत ज्यादा जोर देकर इस गीत को गाया है।

जीवन करवट लेता है। पतझड़ के बाद बसंत फिर से आना है। किसी दूसरी जगह से वहाँ रहने आयी नृत्य प्रशिक्षिका गीता के दिल में शंकर के लिये प्रेम के अंकुर फूटने लगते हैं। गीता को शंकर के प्रेम में असफल होने और उसका शिकार होकर दुखी होने के बारे में सब पता है। वह शंकर के साथ प्रेम में होना चाहती है। वह उसका भावनात्मक सहारा बनना चाहती है। उस स्थिति के लिये यह गीत रचा गया है।

जी न जलइयो जलइयो न रसिया
जी न जलइयो रे जिया में जान बसी है रे

गीता उस अवस्था में है जब किसी तरह से प्रेमी या प्रेमिका एक दूसरे को किसी तरह से अपने ह्रदय के भावों को मौन रहकर दूसरे तक उन्हे संकेत रुप में पहुँचाना चाहते हैं।

गीता के अंदर तो प्रेम का प्रस्फुटन हो चुका है और यह स्थिति उसके लिये कसक लेकर आती है, इन स्थितियों में कह न पाने की पीड़ा के बावजूद प्रेम में होना मात्र ही एक नशा दिलो दिमाग के ऊपर चढ़ाये रखता है। गीता भी इस स्थिति का आनंद लेती है। वह प्रेम की इस मौन अवस्था से गुजर रही है जहाँ वह अंदर से धीरे धीरे सुलग रही है पर अभी उसमें इतना खुलापन नहीं है कि शंकर के पास जाकर सीधे-सीधे कह दे कि वह उससे प्रेम करती है। शंकर को वह चोरी से देखती है, एकांत में उसके ख्यालों में गुम रहती है, उसकी याद में अपने अंदर उमड़ रहे भावों को गीत के द्वारा प्रदर्शित करती है। प्रेम की यह आरम्भिक अवस्था बहुत नशीली है और व्यक्त्ति को अपने मोहपाश में ऐसा जकड़ लेती है कि उसके दिन-रात, उसके रहने का ढ़ंग और उसकी सोच आदि सब कुछ बदल जाता है। प्रेम ने गीता के नृत्य को भी बदल दिया है और अब बच्चों को नृत्य सिखाते हुये उसमें एक नयी उमंग का संचार हुआ है। उसके जीवन के बाकी दुख अब उतने बड़े नहीं रहे और वह इनके भार से एक तरह से मुक्त्ति पा चुकी है या इतनी मजबूत बन गयी है कि संघर्षपूर्ण जीवन जीने के बावजूद वह खुली आँखों से सपने देख सकती है और मन को हल्का करके कल्पनाओं में उड़ सकती है।

सुनिधि चौहान ने बहुत अच्छे ढ़ंग से इस गीत को गाया है।

गुलज़ार के लिखे गीतों के कारण दस तोला का संगीत आजकल की फिल्मों में एकदम अलग ढ़ंग का और एक विशिष्टता लिये हुये लगता है।

…[राकेश]

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