Drishyam-001जिसने ‘दृश्यम’ फिल्म का मूल मलयाली संस्करण (मोहन लाल अभिनीत) और कमल हसन अभिनीत तमिल संस्करण नहीं देखे हैं उनके लिए फिल्म का अजय देवग्न अभिनीत हिंदी संस्करण एक अच्छे थ्रिलर देखने का आनंद प्रस्तुत करता है और मूल मलयाली और उसके बाद का तमिल संस्करण भी देखने के लिए प्रेरित करता है|

सब कुछ दर्शक की आँखों के सामने होता है पर तब भी दर्शक तनाव महसूस करते हुए तन कर बैठा रहता है उत्सुकता के साथ देखने के लिए कि आगे क्या होने वाला है? एक अंतिम चाल को छोड़कर फिल्म दर्शक से कुछ भी नहीं छिपाती पर तब भी दर्शक के अंदर से फिल्म का अंतिम दृश्य आने तक तनावग्रस्त उत्सुकता समाप्त नहीं हो पाती|

जिन्होने मूल मलयाली और और उसके बाद बना तमिल संस्करण देखें हैं उनके लिए भी हिंदी संस्करण में रोचकता है और यह तुलनात्मक विश्लेषण करने का अवसर तो है कि कैसे समर्थ अभिनेतागण एक ही कथानक पर बनी फिल्म में अपनी निजता लेकर सामने आते हैं और हर संस्करण में दर्शक को प्रभावित करते हैं| हर संस्करण की गुणवत्ता की मात्रा कम ज्यादा हो सकती है और किसी संस्करण में कुछ और दूसरे संस्करण में कुछ और अच्छा हो सकता है|

इस कथानक से पहली बार हिंदी दृश्यम के माध्यम से परिचित होने वाले दर्शक को फिल्म की स्पष्ट कमियों के बावजूद एक रोचक थ्रिलर देखने के एहसास में कोई कमी महसूस नहीं होती|

एक निर्देशक फिल्म रचता है और उसकी और उसकी फिल्म की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि कितने एकुशालता से वह दर्शक को उस संसार में ले जाता है और उस संसार में दर्शक का विश्वास कायम करवाता है जिसे उसने फिल्म में रचा है| दृश्यम में बात कुछ आगे के कदम की है| यहाँ एक व्यक्ति स्क्रीन से बाहर के वास्तविक जीवन में ऐसी लीला रचता है कि उस लीला में अंजाने शामिल किये गये लोग ही नहीं विश्वास रखते कि जो कुछ वे कर रहे हैं या कह रहे हैं वह सच का हिस्सा है बल्कि जिनके लिए या जिनके सामने लीला रची गई है वे इस संदेह को रखने के बावजूद कि लीला वास्तविक नहीं है बल्कि रचाई गई है, उस पर विश्वास करने के लिए विवश हैं क्योंकि उनके पास कोई सुबूत नहीं है कि लीला नकली है जबकि लीला की सच्चाई के पक्ष में ढेरों सुबूत हैं|

फिल्म की पृष्ठभूमि की बात करें तो गोवा में विजय सालगांवकर (अजय देवग्न) केबल टीवी का छोटा सा व्यापार चलाता है| विजय फिल्मों का हद दर्जे का रसिया है और सारी सारी रात अपने ही केबल पर फ़िल्में देखता रहता है और सुबह होने पर ही घर जाता है| फिल्मों का रसिया वह इस हद तक है कि उसने लगभग सारी बुद्धिमत्ता फिल्मों से ही सीखी है| शिक्षा के नाम पर वह चौथी कक्षा भी उत्तीर्ण नहीं कर पाया था| अतः सिनेमा ही उसका अध्यापक रहा है और फ़िल्में ही उसकी किताबें रही हैं| फिल्मों ने ही उसे शातिर दुनिया से जूझने से पार पाने के नुस्खे सिखाये हैं जिन्हें वह अपने दैनिक जीवन में लागू भी करता रहता है| मसलन उसके इलाके के पुलिस स्टेशन के बेहद भ्रष्ट सब-इन्स्पेक्टर गायतोंडे के अत्याचार से ग्रसित एक वृद्ध दंपत्ति के यह कहने पर कि गायतोंडे ने उनके बेटे को एक प्राइवेट फाइनेंस कम्पनी, जो गायतोंडे का भाई चलाता है, के कर्जे की अंतिम किस्त समय पर न देने के कारण गैर-कानूनी रूप से उठवा लिया है और उसका कोई अता-पता नहीं है, विजय अपनी देखी किसी फिल्म से याद करके उन्हें सलाह देता है कि उन्हें कोर्ट में अपने बेटे की बरामदी के लिए Habeas corpus की याचिका दायर करनी चाहिए तब कोर्ट पुलिस को आदेश देगा कि उनके बेटे को कोर्ट में प्रस्तुत किया जाए और गायतोंडे कुछ भी नहीं कर पायेगा|

गायतोंडे और विजय का आपस में छत्तीस का आँकड़ा है और गायतोंडे विजय को सबक सिखाने की फिराक में रहता है पर विजय के चातुर्य और वाक्पटुता से हमेशा मुँह की खाकर अपमान का घूँट पीकर रह जाता है|

विजय अपनी पत्नी नंदिनी (श्रेया सरन) और दो बेटियों, बड़ी अंजू (इशिता दत्ता) जो कालेज में पढ़ती है और छोटी बेटी अनु, जो कि सात-आठ साल की है, के साथ एक हँसी खुशी वाला वैसा घरेलू जीवन बिता रहा है जहां लोग छोटी छोटी बातों में खुशियाँ हासिल करके संतोषी जीवन व्यतीत करते हैं|

पर विजय के परिवार के इस हँसी खुशी से चलते जीवन में अचानक एक भूचाल आ जाता है, जब सैम, नामक एक अमीर बिगडैल लड़का एक ग्रहण बन कर विजय के परिवार को ग्रसित करने आ धमकता है|

सैम एक परिभाषित अपराध अंजू के खिलाफ कर चुका है, और उस अपराध की सामग्री के आधार पर वह अंजू और उसकी माँ के सामने आपत्तिजनक प्रस्ताव रखकर उन्हें ब्लैकमेल कर रहा है कि या तो अंजू या उसकी माँ उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए अन्यथा वह अंजू की जिंदगी बर्बाद कर देगा| दर्शक की आँखों के सामने सब कुछ हो रहा है और निस्संदेह हर दर्शक की सहानुभूति अंजू और नंदिनी के साथ होनी तय है, छीना झपटी में हादसा होता है और अंजू और नंदिनी के बिना चाहे सैम की मौत हो जाती है| एक घरेलू से परिवार की लड़की और उसकी माँ, क़ानून की नजरों में सैम की हत्यारिनें हैं, पर दर्शक की नजरों में? दर्शक ने सब देखा है, अतः उसकी नज़र में यह एक हादसा है| घरेलू, सीधे सादे लोग ऐसी स्थिति में क्या करेंगे? पुलिस के नाम से ही उनकी रूह कांपने लगती है| घबराहट में नंदिनी और अंजू सैम को अपने बगीचे में, खाद बनाने के लिए खोदे गये गड्ढे में दफ़न कर देते हैं और उन दोनों की इस हरकत को न केवल दर्शक बल्कि नंदिनी की छोटी बेटी अनु भी देखती है| जब तक विजय घर पहुंचे यह सब हो चुका है|

विजय क्या करेगा? कोई भी क्या करेगा? विजय के लिए उसका परिवार ही सब कुछ है| उन्हें बचाने के लिए वह कुछ भी करेगा पर एक लड़के की मौत हुयी है और अंजू यह कह कर विस्फोट करती है कि सैम गोवा की पुलिस की आई.जी मीरा देशमुख (तबू) का बेटा था|

पुलिस अपने आई.जी के लापता बेटे की तलाश में है, जिसकी कार उन्हें एक विवादास्पद स्थल पर उपस्थित झील से मिलती है| सच्चाई केवल विजय, उसकी पत्नी और उसकी दोनों बेटियों को पता है| पुलिस और विजय के बीच एक कड़ी है गायतोंडे, जिसने विजय को सैम की कार में बैठते देखा था, पर गायतोंडे की विजय से दुश्मनी जगजाहिर है और पुलिस के लोकल अधिकारी भी इस बात से वाकिफ हैं तो गायतोंडे के विजाप को केस में लपेटने के प्रयास को उसकी निजी खुन्नस समझा जाता है पर चूँकि पुलिस के पास कोई और रास्ता नहीं है तो शक की सुईं विजय के ऊपर ही अटका कर पुलिस छानबीन शुरू करती है| अब फिल्म दो लोगों के बीच का टकराव है| अगर मीरा देशमुख जीतती है तो विजय और उसका परिवार जेल जायेगा और अगर विजय जीत जाता है तो वह अपने परिवार को सुरक्षा दे पायेगा| एक आई.पी.एस अधिकारी और एक चौथी फेल आम आदमी की दिमागी जंग को फिल्म इस तरीके से प्रस्तुत करती है कि दर्शक के लिए यह तनाव एक रोचक सामग्री लेकर आता है|

मीरा देशमुख सही काम को करने के लिए गैर-कानूनी तरीके अपनाने में हिचक महसूस नहीं करती और यही हरकतें उसके चरित्र के साथ दर्शक की सहानुभूति कभी भी नहीं पनपने नहीं देते| उसके चरित्र के बरक्स उसके पति, महेश (रजत कपूर) के व्यवहार, और उसकी तार्किक समझ के कारण दर्शक के अंदर शुरू से ही उसके लिए अच्छी भावनाएं रहती हैं| यह बड़ा रोचक मामला है कि क़ानून की रक्षक, राज्य की सबसे बड़ी पुलिस अधिकारी के साथ दर्शक न होकर एक आम आदमी के साथ होते हैं जिसके परिवार को आत्म रक्षा में एक व्यक्ति की मौत का हिस्सेदार होना पड़ा है| क्या कानूनी रूप से सही या गलत है और क्या नैतिक आधार पर सही और गलत है, फिल्म इस बात को उठाती नहीं पर यह द्वंद बना रहता है| जांच कर रहे पुलिस बल में अच्छे अधिकारी भी हैं जो मानवीय व्यवहार करते हैं, तर्क की बात करते हैं, परन्तु मीरा देशमुख और गायतोंडे के सोच विचार और काम करने के तरीके से फिल्म कभी भी पुलिस के साथ सहानुभूति उत्पन्न होने नहीं देती| मीरा देशमुख तो एक स्थिति में आकर फिल्म की विलेन लगने लगती है|

मोबाइल युग में मोबाइल एक बहुत बड़ा सुबूत बन जाता है क्योंकि इसकी काल्स डिटेल्स और इसकी स्थिति जानकर इसके मालिक के बारे में बहुत कुछ पता लगाया जा सकता है| सैम की कार और सैम का मोबाइल ये दो सुबूत हैं जिनकी बिना पर पुलिस को विजय की इस केस में संलिप्तता को साबित करना है और विजय साबित करने पर तुला है कि जिस दिन सैम के गोवा में होने की बात कही जा रही है उस दिन वह गोवा में न होकर पणजी में था|

कौन जीतेगा? क्या विजय का परिवार प्रोफेशनल पुलिस वालों के सामने टिक पायेंगें? उन चारों में से कोई तो कमजोर कड़ी होगा जो पुलिस के टार्चर के समक्ष टूट कर सच बता देगा| आखिर इस परिवार में एक साथ-आठ साल की बच्ची भी है|

इन सवालों को फिल्म बिल्कुल अंत तक ऐसे खींचती है कि दर्शक दम साधे स्क्रीन की ओर देखता रहता है|

पुलिस की जांच संबंधी थ्रिलर होने के नाते फिल्म में तीन आपतिजनक कमियां दिखाई देती हैं|

(1) पुलिस जांच दल के अधिकारी, स्वयं आई. जी समेत कभी भी इस बात को नहीं उठाते कि झील से पाई गई सैम की कार से फिंगर प्रिंट्स के नमूने लें ताकि स्पष्ट हो सके विजय कार चला रहा था या नहीं| पानी में बीस दिन डूबे होने के बावजूद फोरेंसिक साइंस इस बात को नज़रअंदाज नहीं करेगी कि कार के अंदर उपस्थित प्लास्टिक, दरवाजों के मेटल, कार की चाभी,  और शीशे पर विजय की उँगलियों के निशान उपस्थित हो सकते हैं या नहीं| भले ही दुर्लभ हों पर एक सप्ताह से ऊपर पानी में डूबी कारों पर से निशान उठाये गये हैं| कम से कम पुलिस दल को इस बाबत एक संवाद दिया जाना चाहिए ऐसी कहानी में| पुलिस लाई-डिटेक्टर टेस्ट की बात कर सकती है तो फोरेंसिक जांच तो उससे पहले का स्टेप है जांच का|

(2) पुलिस जांच दल जब स्कूल में अंजू से पूछताछ करता है तो वह पुलिस के बिना पूछे ही बता देती है कि दो और तीन अक्टूबर को वे लोग गोवा में थे ही नहीं| जबकि पुलिस उससे सिर्फ इतना पूछ रही थी कि सैम उससे मिलने गोवा आया था या नहीं| यह एक बड़ा संदेह पुलिस के मन में उठना था पर नहीं उठता| यह संदेह उठता है नंदिनी के भी ऐसा ही कहने से जिसकी काट विजय आसानी से कर देता है क्योंकि अब उसके पस स्कूल की प्रिंसिपल के फोन का सुरक्षा कवच है|

(3) विजय कभी भी सैम के फोन से लिए गये वीडियो की बात अपने परिवार से नहीं करता| जैसे सिम कार्ड बचा है वैसे मेमोरी कार्ड भी तो बचा रह सकता है| हो सकता है वह मोबाइल के टूटने में नष्ट हो गया हो पर उसका जिक्र उसे अंजू और नंदिनी से अवश्य ही करना चाहिए था किसी संवाद में| खासकर तब जब वे आउट हाउस की सफाई कर रहे थे|

कौन सही है? यह प्रश्न उठना वाजिब है और जैसा कि नंदिनी विजय से कहती है कि सैम के मरने के बाद उन्हें घबराहट में उसे जमीन में दफनाना नहीं चाहिए था बल्कि पुलिस को सब सच बता देना चाहिए था, ऐसा ही भाव दर्शक के अंदर उठना स्वाभाविक है| विजय नंदिनी को जवाब देता है कि अंजू की जिंदगी बर्बाद हो जाती|

मीरा देशमुख के क्रियाकलापों को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि उसके दबाव में पुलिस इस बात को साबित होने देती कि आत्मा रक्षा में अंजू और नंदिनी के हाथों सैम मारा गया और सैम के किये अपराध के सुबूत को जरूरी नहीं कि केस में दर्ज भी किया जाता| किसी भी दृश्य में, यहाँ तक कि बिल्कुल अंत में भी मीरा देशमुख के किसी भी अंदाज से ऐसा नहीं लगा कि वह वही करती जो कानूनी और नैतिक दृष्टि से सही था| एक हद तक आकर उन्हें अपने बेटे के बारे में काफी कुछ पता लग जाता है पर न मीरा देशमुख न उसका पति अपने बेटे की करतूत पर कोई भी अफसोस जाहिर नहीं करते| ऐसे में यह एक पुलिस अधिकारी की ताकत और एक आम आदमी के दिमाग की ताकत का खेल बन जाता है जैसा कि विजय भी नंदिनी से कहता है कि अब यह एक खेल है जिसमें जीत भी हो सकती है और हार कर वे सब कुछ गँवा भी सकते हैं पर वे लोग अंत तक डट कर मुकाबला करेंगें|

वैसे इस फिल्म का एक दूसरा भाग भी संभव है जहां नंदिनी और अंजू पुलिस को भी सूचित करती हैं और तब विजय अपनी सिनेमाई मास्टरी की बदौलत अदालत में मीरा देशमुख के गैर-कानूनी और पक्षपाती पुलिसिये रवैये को टक्कर देता है और कानूनी जंग जीतता है|

यह फिल्म भी ‘अग्ली’ और कुछ अन्य फिल्मों की तरह स्थापित करती है कि कैसे पुलिस का व्यवहार अलग होता है वी.आई.पी मामलों और आम आदमी से जुड़े मामलों को लेकर| यहाँ मीरा देशमुख पुलिस की आई.जी है तो उसके बेटे की तलाश के लिए सारा पुलिस विभाग सिर के बल खड़ा होकर काम करता है और मनमुताबिक परिणाम पाने के लिए कानूनी और गैर-कानूनी तौर तरीकों की भी परवाह नहीं करता|

अभिनय की जिस गहराई के लिए तबू की एक अभिनेत्री की ख्याति है वह इस फिल्म में पूरी तरह नजर नहीं आती| जिस दृश्य में तबू का प्रवेश फिल्म में होता है उस दृश्य में वे इतने अप्रभावी ढंग से अभिनय करती हैं कि अपनी भूमिका में मिसफिट लगती हैं| गायब बेटे की तलाश में एक माँ के भाव तो वे बखूबी दर्शा देती हैं पर एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में वे संतुलन नहीं ला पाईं| उनके अभिनय को देख दर्शक एक संतुष्टि के भाव से भर जाया करते हैं जैसा उन्होंने हाल में हैदर फिल्म में दिखाया पर यहाँ वे ऐसा नहीं कर पायीं| उनके चरित्र के पति की भूमिका में रजत कपूर एकदम सटीक चुनाव लगते हैं और बेहद असरदार अभिनय करते हैं|

अजय देवग्न की शारीरिक उपस्थिति परदे पर इस भूमिका के लिए एकदम उपयुक्त लगती है| एक तरफ आम, छोटे व्यापार वाले घरेलू आदमी की मांग को अपने आह्व-भाव से पूरा कर पाते हैं दूसरा उनको देखकर दर्शक को यह भरोसा रहता है कि यह आदमी पुलिस बल से टक्कर ले सकता है| उन्हें निर्देशक और सेट-डिजायनर से इस बात की चर्चा अवश्य करनी चाहिए थी कि उनके चरित्र के आर्थिक स्तर के अनुसार उन्हें बहुत बड़ा घर दे दिया गया है रहने के लिए|

भिन्न-भिन्न भूमिकाएं निभाने की उत्सुकता ने उनके अभिनय जीवन को दीर्घकालिकता और रोचकता प्रदान की है| चालू किस्म की भूमिकाएं करते करते वे बीच बीच में कुछ भिन्न करते रहे हैं|

श्रेया सरन और उनकी बेटियों की भूमिकीयें निभाने वाली इशिता दत्ता और बाल कलाकार ने अजय देवग्न के किरदार का अच्छा साथ निभाया है क्योंकि इन चारों की आपस में ट्यूनिंग का फिल्म में महत्वपूर्ण स्थान है और वे एक ऐसा परिवार दिखाई दिए जिसके सदस्य आपस में बेहद करीब हैं और संकट काल में एक बड़े पारिवारिक राज को अपने सीने में सुरक्षित छिपा कर रख सकते हैं और एक दूसरे के लिए कष्ट सह सकते हैं|

सब इन्स्पेक्टर गायतोंडे की भूमिका निभाने वाले अभिनेता का काम शानदार है|

सहायक भूमिकाओं में नज़र आने वाले अभिनेतागण भी प्रभावशाली हैं|

विशाल भारदवाज ने अच्छा संगीत रचा है और ‘कार्बन कॉपी’ गीत खासा लुभाता है खासकर उसमें जिस तरीके से सीटी की धुन का उपयोग किया गया है वह बेहद कर्णप्रिय है|

 …[राकेश]

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