MASAAN-001मसान’ में बहुत कुछ ऐसा है जो लगभग सभी देखने वालों को बेहद पसंद आएगा| अच्छी फिल्मों में जो सामने दिखता है, जो भले ही अलग – अलग प्रतीत होता है, उसके पार्श्व में दिखाई न दे सकने वाले परन्तु महसूस हो सकने वाले एक अदृश्य तत्व का अस्तित्व भी होता है जो न केवल पूरी फिल्म को एक सूत्र में बांधता है बल्कि जो दर्शक की आँखों और उसके समझने और ग्रहण करने के भाव से होता हुआ उसके ह्रदय में उतरता जाता है| ‘मसान’ में यह अदृश्य तत्व भरपूर मात्रा में उपस्थित है और फिल्म एकत्रित रूप में दर्शक को लुभाती है|

विच्छेदन करने पर फिल्म के कुछ तत्व ऐसे प्रतीत हो सकते हैं, और होते हैं कि अच्छी से महान फिल्म बनने की ओर बढते कदम इसलिए आगे नहीं बढ़ पाते क्योंकि मामला गहरे पानी नहीं बैठता बल्कि सतह पर ही कतरा कर दूसरी ओर निकल जाता है| पर निर्देशक की पहली फिल्म होने के नाते यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है और संभावना दिखाने के बाद तो छूने को असीम आकाश सामने है और ऐसी निर्देशकीय संभावना सुखद अहसास जगाती है कि हिंदी सिनेमा में इसी तरह प्रतिभावान निर्देशक अपने मन-मुताबिक़ फ़िल्में बनाते रहे तो इस फिल्म उधोग के गुणात्मक विकास की संभावना को जड़ता के घुन से दूर रखा जा सकता है|

कुछ ऐसा है ‘मसान’ में जिसे पहली बार छुआ गया है जबकि विगत में बनी फ़िल्में इससे कतरा कर निकल जाती थीं| मसलन इम्तियाज अली की ‘जब वी मैट’ को ही लें| उसमें एक दृश्य है जहां शाहिद कपूर और करीना कपूर के चरित्र एक सस्ते बजट के होटल में ठहरे हुए हैं और वहाँ पुलिस की रेड हो जाती है और दोनों वहाँ से भाग जाते हैं| निर्देशक ने उस घटना को हास्य का पुट देकर बात को रफा दफा कर दिया जबकि यह ऐसी समस्या है जिसका भारत में बहुत भयंकर अस्तित्व है| ‘मसान’ इस स्थिति की भयंकरता को इसके नग्न रूप में दर्शाती है और फिल्म निस्संदेह इसके लिए साधुवाद की पात्र है|

भारत भर के किसी भी शहर, छोटे या बड़े, में चले जाईये, युवा प्रेमियों के ऊपर पचास तरह की बंदिशें दिख जायेंगीं| कहीं पुलिस, कहीं गुंडे और कहीं तीसरे जेंडर के लोग उनसे शान्ति से बैठे रहने के एवज में पैसे उगाहते दिखाई दे जायेंगें| भारत का सर्वोच्च न्यायालय ‘लिव-इन’ रिलेशनशिप को मान्यता देता है फिर ऐसा क्यों है कि देश भर में पुलिस का एक भटका हुआ तबका कम आय वर्ग से आने वाले युवा प्रेमियों को क़ानून के शिकंजे का डर और घर वालों की बदनामी करने का डर दिखा कर ब्लैकमेल कर पाता है? दो वयस्क लोग स्वेच्छा से अगर शारीरिक संबंध बनाना चाहते हैं या बना रहे हैं तो इसमें पुलिस कहाँ से आ जाती है क्यों पुलिस इसे वेश्यावृत्ति का रूप देकर लड़की और लड़के को फंसाना चाहती है| देश भर में पुलिस की बेहद कमी है और ज्यादातर पुलिसकर्मी आम जनता की सुरक्षा में न लग कर अति-महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा में लगे रहते हैं और बाकी बचे लोग देश की संस्कृति के नाम पर ऐसे कामों में लगे रहते हैं| देश में क़ानून व्यवस्था बिगड़े न तो क्या हो?

मसान’ ऐसे मामलों को सच रूप में दिखाने का साहस करती है, जब बनारस की रहने वाली देवी पाठक (ऋचा चड्ढा) अपने प्रेमी – पीयूष अग्रवाल (सौरभ चौधरी) के साथ एक बजट होटल के कमरे में शारीरिक संपर्क बनाने में सलंग्न है और पुलिस छापा मारकर दोनों को कब्जे में ले लेती है और पुलिस इन्स्पेक्टर मिश्रा (भगवान तिवारी) अपने व्यक्तिगत मोबाइल से अर्धनग्न देवी का वीडियो बनाता है| देवी का प्रेमी डर कर बाथरूम में जा छिपता है और अंदर से दरवाजा बंद कर लेता है| पुलिस इन्स्पेक्टर अपने क्रूर अंदाज में देवी का गैर-कानूनी वीडियो बनाते हुए उसे धमकाता है कि अब तो उसकी ज़िंदगी बर्बाद हो ही गई समझो और उधर वह देवी के प्रेमी को बाथरूम के बाहर से ही धमकाता है और उसके पिता का विवरण उसके घर के पते के समेत उसे सुनाता है| इससे साफ़ जाहिर है कि पुलिस को इनके बारे में सब कुछ पता है| किसी पार्क या सार्वजनिक स्थल पर चले जाईये, पुलिस के मुखबिर युवा प्रेमियों के इर्द-गिर्द घूमते नज़र आ जाते हैं और पार्कों में नियमित आने वाले प्रेमियों की डायरी पुलिस के पास बनती रहती है और खास वक्त पर पुलिस इन प्रेमियों को दबोच कर अपने मन मुताबिक़ मामलों को संभालती है| ‘मसान’ स्पष्ट दर्शाती है कि कैसे पुलिस ऐसे मामलों का निबटारा करती है|

आम जनता के समक्ष पुलिस कितनी बलशाली है या जनता कितनी असहाय है भयंकर बलशाली पुलिस के सामने, इसका उदाहरण ‘मसान’ में दिखता है| पुलिस इन्स्पेक्टर मिश्रा के डराने धमकाने से घबराकर देवी का प्रेमी बाथरूम में ही अपनी जान लेने की कोशिश करता है और बाद में अस्पताल में वह मर भी जाता है| देवी का प्रेमी देवी के कारण नहीं बल्कि पुलिस की ज्यादतियों के कारण मरा है, पर जब यही सच्चाई देवी के पिता – विद्याधर पाठक (संजय मिश्रा) पुलिस इन्स्पेक्टर से कहते हैं कि पीयूष ने तो पुलिस के डराने –धमकाने से घबरा कर आत्महत्या की तो इन्स्पेक्टर मिश्रा गाली-गलौज करके देवी के पिता को धमकाता है कि ज्यादा चतुराई दिखाई तो देवी का विडियो वह यू-ट्यूब पर अपलोड कर देगा और मीडिया को दे देगा| देवी के पिता घबराकर इन्स्पेक्टर मिश्रा के हाथों ब्लैकमेल होने लगते हैं| देवी के जीवन में घटित में विस्तार की इतनी संभावनाएं हैं कि कथा के केवल इसी भाग पर एक मुकम्मल फिल्म बन सकती थी और बातें गहराई में जा सकती थीं, पर फिल्म इस भाग को बहुत ज्यादा नहीं खंगालती और फिल्म के दूसरे चरित्रों की ओर बढ़ जाती है| कथा के तौर पर इतना सोचना वाजिब है कि अगर पीयूष जीवित रहता तो वह देवी की तुलना में ज्यादा अमीर था और इन्स्पेक्टर उससे और उसके पिता से भी पैसे ठगता| उसकी मौत से कहानी का वह कोण अनछुआ रह गया|

कालेज में पढ़ रहे उन्नीस-बीस-इक्कीस साल के विधार्थियों की हरकतों से इस भाग की शुरुआत होती है जहां चाट-पकोड़ी-भुजिया का स्वाद लेने के लिए तत्पर खड़ी दो लड़कियों के पास दो लड़कों का आगमन होता है जिसमें एक लड़के के हाथ में टेडीबेयर है जिसे वह दोनों में से एक लड़की पूजा (वैशाली) को उसके जन्म दिन के मौके पर उपहार में देना चाहता है और वहीं सड़क पर हैपी बर्थडे गाकर उपहार दे भी देता है जिसे पूजा ले भी लेती है पर उसकी चपल मित्र शालू गुप्ता (श्वेता त्रिपाठी) लड़के से सवाल जवाब करने लगती है और इस बातचीत में भी चाट वाले से अपनी पसंद की चटनी तैयार करने के बारे में हिसाब किताब करने में मशगूल रहती है| देवी की कथा के सच्चे रूपांतरण के बरक्स इस भाग में सब कुछ शुरू में फ़िल्मी रूप में आगे बढ़ता है और लगता है कि फिल्म किशोरों और नौजवानों की कथित प्रेम कहानी के घिसे पिटे फार्मूले में फंस कर न रहे जाए, पर इस भाग में भी कुछ गहराई आती है थोड़ा आगे जाकर|

वैसे यह भाग उतना विश्वसनीय नहीं लगता जितना देवी वाला भाग है| चाट की दुकान पर जा पहुंचे दो लड़कों में से एक हैं दीपक चौधरी (विकी कौशल) जिनकी पसंद शालू पर जा अटकती है और थोक के भाव कथित युवा प्रेम पर बन हिंदी फिल्मों की तरह शालू और दीपक की प्रेम कथा परवान चढती है बस इसमें कवि दुष्यंत, बशीर बद्र, ग़ालिब, और चकबस्त आदि के नाम और उनकी कविताओं और शायरी का जिक्र भी होता रहता है| चरित्र चित्रण के हिसाब से इसका विश्लेषण हो सकता है कि इतने भारी नामों के रचनात्मक कामों के साथ उठने बैठने वाली शालू के चरित्र के अंदाज से यह सब मेल खाता है या नहीं…पर यह सब इतना नहीं खटकता कि ध्यान फिल्म के प्रवाह से अलग हट जाए|

इस नई प्रेम कहानी की गाड़ी पहला हिचकोला खाती है जब दीपक का मित्र उसे टोकता है,- ‘लड़की अपर कास्ट है दोस्त, ज्यादा सेंटी वेंटी मत होना…बताया होगा न अपने बारे में| अमां बता दो फिर आगे बढ़ो, जरूरी नहीं कि शहर में सब समझदार ही मिलें तुमको’| प्रेम रस में डूबकर इसकी खुमारी में उनींदे हो कर जी रहे दीपक को पहला झटका मिलता है और वह मिमियाये हुए स्वर में अपने मित्र को आश्वस्त करता है – ‘हाँ बता देंगें बस’| उसके अबकी अन्य मित्र उसे बढ़ावा देते हैं कि यह सब तो बाद की बात है| दीपक यदि मुस्लिम होता तो इसे कट्टर हिन्दुत्ववादी ‘लव-जेहाद’ का रंग देते, जहां उसने शुरुआत में अपनी जाति (वहाँ सम्प्रदाय) की असलियत लड़की पर जाहिर न होने दी|

दीपक डोम जाति से आता है| आरक्षण को मद्देनजर रखते हुए अपने विषय में जिस तरह का कुशाग्र विधार्थी दीपक है उसमें आसानी से फिल्म के लेखक उसे पॉलीटेक्निक का विधार्थी न दिखाकर इंजीनियरिंग कालेज का विधार्थी भी दिखा सकते थे, क्योंकि इस बुद्धि के साथ उसे वहाँ एडमिशन मिल गया होता| तब उसकी शालू के साथ प्रेम कथा में शुरू में ज्यादा विश्वसनीयता लगती, उसके अपने आत्मविश्वास का स्तर भी अन्य होता| बहरहाल दीपक के ऊपर अपनी जातिगत सच्चाई को लेकर एक दबाव आ चुका है और उसकी इस कुंठा को फिल्म बखूबी दर्शाती है| जिंदादिल शालू के यह पूछने पर कि वह कहाँ रहता है- दीपक पर आए दबाव से उसके व्यवहार में आए महीन बदलाव को दर्शक तो देख और समझ पाते हैं क्योंकि वह सच्चाई से अवगत हैं पर शालू अनभिज्ञ है और उसकी छेड़छाड़ ही दीपक की कुंठा को गुस्से के रूप में बाहर निकलवाने में सहायक सिद्ध होती है| शालू और दीपक की जातियों में बड़ा अंतर है पर शालू इस अंतर को आंच में कूद कर झुलसने के लिए तैयार है|

इस प्रेमकथा में संघर्ष जातिगत रूप में सामने नहीं आता, जो कि फिल्म को अन्य दिशा में ले जाता और दीपक की शालू की प्रेम कथा भी अपने आप में एक पूरी फिल्म की सामग्री परोसती है पर फिल्म जातिगत संघर्ष की ओर ना जाते हुए इस कथा में दुख और तरीके से लाती है|

बनारस के किसी बाशिंदे से मिल लीजिए, मंदिर-मस्जिद, गंगा, घाट, और जीवन – मृत्यु के सबंध में वह तुरंत दार्शनिक की भूमिका में आकर जीवन के क्षण-भंगुर होने और बनारस में विभिन्न घाटों पर जल रही चिताओं को देख मृत्यु से साक्षात्कार करके एक नई दृष्टि पनपने और जीवन में स्थितप्रज्ञ होने के बारे में ऐसे गंभीर होकर भाषण देगा कि लगता है कि बनारस की गलियों में हर घर में पहुंचे हुए योगियों का वास है| ‘मसान’ धीरे से और सलीके से उन्हें दर्पण दिखाती है|

अपने पिता और भाई और अपने वर्ग के अन्य लोगों के साथ रोजाना चिताओं को जलाने में सहयोग देने वाले और अंतिम कर्मकांड को अंजाम देने और नजदीक से देखने वाले दीपक को देख कर जीवन मृत्यु के संबंध में बड़ी बड़ी बातें करने वालों को कुछ देर ठहर कर सोच विचार कर लेना चाहिए कि क्या वे व्यक्तिगत रूप से सच को जानते हैं? दीपक खुद भी शालू पर गुस्से और कुंठा में भड़कते हुए यही सब कहता है कि जिसे वह देख भी नहीं सकती वह रोजाना वही काम करता है| उसे भी शायद यह गुमान है कि अंतिम संस्कार को देख देख कर बड़ा होने के कारण वह इन बातों से ऊपर उठ चुका है|

पर जीवन की सच्चाई उसके समक्ष आती है अपने प्रिय की मृत्यु देख कर| दूसरे के दुख में ग्रंथों में पढ़ी बातें तोते की तरह उच्चारित कर देने और प्रिय को अब कभी जीवित न देख पाने की आग में झुलसकर उत्पन्न हुयी सच्चाई में जमीन आसमान का अंतर होता है| रोजाना कई मुर्दों शरीरों को चिता की मसान पर रखकर अग्नि में जलते देखने वाले और मृतक के जीवित सम्बन्धियों को रोता बिलखता देख कर इन सबसे विरक्त हो चुके डोम को भी उसके प्रिय के मरने का उतना ही दुख होता है जितना किसी और इंसान को| जैसे प्रेम को पढ़ कर, सुन कर या देख कर नहीं जाना जा सकता, उसे केवल जीकर ही जाना जा सकता है, उसी प्रकार मृत्यु से साक्षात्कार का भी मामला है|

मसान’ यह बड़ा सच धीरे से सामने ले आती है|

देवी की कहानी में उसके पिता भी उतने ही भागीदार हो जाते हैं और उनका और खासकर देवी का जीवन भस्म न हो जाए इस चिंता की चिता में जलने लगते हैं|

देवी और उसके पिता के मध्य के दृश्य प्रभावी हैं| विद्याधर पाठक संस्कृत महाविद्यालय में अध्यापक रहे हैं और उनके कथानानुसार देवे की खातिर उन्होंने नौकरी छोड़ कर घाट पर कर्मकांड का सामान बेचने की दुकान खोल ली, क्योंकि देवी की माँ का देहांत तब हो गया था जब देवी मात्र छह बरस की ही थी| देवी को लगता है पिता की लापरवाही के कारण उसकी माँ बीमारी से जूझ नहीं पाई और मर गयी| पिता को परीक्षा की कापियां जांचनी थी इसलिए उन्होंने उसकी माँ को समय पर अस्पताल में नहीं दिखाया| पिता का बयान यह कि उन्होंने समझा मामूली बुखार था और काम निबटा कर वे उसकी माँ को अस्पताल ले गये पर तब तक देर हो चुकी थी| वे देवी को कहते हैं कि उन्होंने उसकी माँ को नहीं मारा जैसा कि वह समझती है… उसके जवाब में देवी भी उससे जवाब तलब कर रहे पिता उसे कहती है कि उसने भी पीयूष को नहीं मारा, वह अपने आप मरा, अपने भय के कारण मरा|

देवी जुझारू है और निडर भी, जो कि पीयूष नहीं था| देवी अपनी समस्या से जूझती है और जीवन को आगे ले जाना चाहती है| वह अपने पिता की तरह इन्स्पेक्टर की धमकियों से उतना भयभीत नहीं है| वह अपने पिता से कहती भी है – आप चिंता मत कीजिये हम जेल नहीं जायेंगें|

वास्तव में देवी की कथा एक पूरी फिल्म का मसविदा प्रस्तुत करती है जहां देवी इन सब बाधाओं से जूझ कर पार होती और गैर कानूनी ढंग से उसे और उसके पिता को ब्लैकमेल कर रहे इन्स्पेक्टर की कारगुजारियों का सामना करके पुलिस के इस कृत्य को उजागर करती और अपने जीवन को आगे ले जाती|

मसान’ एक बहुत प्रभावी दृश्य दिखाती है| इन्स्पेक्टर मिश्रा देवी के पिता को पैसे के लिए धमका रहे हैं कि देवी का वीडियो यू-ट्यूब पर डाल देंगें तभी इन्स्पेक्टर की बेटी वहाँ आती है और अपने पिता से चलने के लिए कहती है| ऐसे दृश्य का यही एक अर्थ है कि इन्स्पेक्टर को अभी नहीं पता कि भविष्य के गर्भ में क्या छिपा हुआ है, अगले कुछ सालों में जब उसकी खुद की बेटी बड़ी होगी, और बहुत संभावना है कि किसी युवक के प्रेम में भी पड़ेगी, जहां यह निश्चित नहीं कि उसका प्रेमी उसी की जाति का होगा, तब इन्स्पेक्टर की दरिंदगी उसका साथ कैसे देगी? समय उसे अपनी लाठी से पीटेगा जरुर और यह पिटाई उसकी बेटी की मार्फ़त होनी है|

मूँछ झुकी कैसे है आलम
बेटी  के बाप बने हैं क्या   (रफत आलम)

बेटी की चिंता की चिता की आग में झुलस रहे विद्याधर पाठक, जो कि अपने बनाए विचारों पर कायम रह कर जीवन जीते रहे हैं, की समझ पर बहुत बड़े बड़े आक्रमण होते हैं| उनके साथ घाट पर काम करने वाले और उनकी देख रेख में पल रहे बालक – झोंटा (निखिल साहनी) , को वह डपट देते हैं जब वह उनसे घाट पर बच्चों के गंगा में कूद कर सिक्के निकाल कर लाने वाले सट्टा रूपी खेल में हिस्सा लेने वाली बात कहता है| वे उसे कहते हैं – जुए में भाग लेने दें तुम्हे?

पर परिस्थितियाँ और आर्थिक विवशताएं सुरसा की तरह उनके सामने मुँह बाए खड़ी रहती हैं कि वे इस जुए में हिस्सा लेने लगते हैं इस आशा में कि उनका अलगाया पैसा कई गुना होकर उन्हें मिलेगा| संस्कृत का आदर्शवादी अध्यापक बेटी की सलामती की खातिर न केवल जुए में हिस्सा लेता है बल्कि नौ-दस वर्षीय बच्चे की जान जोखिम में डालने के लिए भी तैयार हो जाता है| विपत्तियां और मजबूरियाँ इंसान के व्यवहार में बहुत बड़े बड़े बदलाव ले आती है और ‘मसान’ इसे प्रभावी ढंग से दिखाती है पर ‘मसान’ आशावाद की रुमानियत को भी बरकरार रखती है जब झोंटा के जीवन पर ही कुठाराघात होते देख पाठक जी, उसे अपने सीने से लगाए भागते हैं उसका जीवन बचाने और उसके ऐसा कहने पर कि उसने उनके पैसे गँवा दिए, विवशता के आंसू बहाकर, झोंटा के बच जाने की मुस्कान के साथ उसे गले से लगा लेते हैं| इस दृश्य में गजब की संभावनाएं थीं और संजय मिश्रा ने दिखा दिया कि वे अदभुत अभिनेता हैं और एकदम विपरीत भाव वे आँखों और चेहरे से एक साथ दर्शा सकते हैं| अपने अभिनय से वे फिल्म को अभिनय के क्षेत्र में गहराई के स्तर पर बनाए रखते हैं|

बनारस से देवी और दीपक की कहानियां शुरू होती हैं और तकरीबन एक साथ प्रयाग/इलाहाबाद पहुँचती हैं| देवी के हिस्से को एक कहानी के रूप में एकत्रित किया जाए तो वह साहित्यिक कहानी का रूप ले सकती है, जिसे बस इस बात को समझाना पड़ेगा कि क्यों देवी पीयूष के माता-पिता से मिलना चाहती है? उनसे मिलकर अभी तक मजबूती से रोका गया दुख का बांध क्यों भरभरा कर टूट जाता है?

दीपक का हिस्सा अच्छी साहित्यिक कहानी का रूप नहीं ले पायेगी क्योंकि वहाँ फ़िल्मी संयोग की भूमिका बहुत बड़ी है|

देवी और दीपक की राहें प्रयाग में आपस में टकराती हैं जहां दोनों एक ही नाव में सवार होकर संगम विहार के लिए जाते हैं| दोनों के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से जल कर भस्म हो चुके हैं और शायद उनकी भस्मी संगम में प्रवाहित हो जाए और भावनाओं और आशाओं का पुनर्जन्म हो!

2007 में भावना तलवार ने अपने निर्देशन की शुरुआत एक बेहद अच्छी फिल्म – धर्म से की थी जो बनारस में गंगा और घाट और पंडितों के जीवन पर ही केंद्रित थी| ‘मसान’ भी बनारस की पृष्ठभूमि पर एक अच्छी फिल्म बन कर सामने आई है| हो सकता है ‘धर्म’ के पहले बने होने के कारण बहुत सी संभावनाओं को इसलिए फिल्म का हिस्सा न बनाया गया हो कि यह वहाँ के जीवन की पुनरावृत्ति लगेगी|

अभिनय के स्तर पर किसी कलाकार का काम हल्का नहीं लगता और ऋचा चड्ढा, संजय मिश्रा, विकी कौशल, पंकज त्रिपाठी, भगवान तिवारी और निखिल साहनी एवं श्वेता त्रिपाठी, अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं| श्वेता त्रिपाठी के हाव भाव और बोलने का सामंजस्य ‘उड़ान’ (दूरदर्शन का धारावाहिक) की निर्देशक और नायिका कविता चौधरी से इतना ज्यादा लगता है कि दोनों को देख चुके लोगों को ऐसा न लग पाना कठिन है|

इस बात को कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि इंडियन ओशन बैंड के पास धुनों की मात्रा बेहद सीमित है और इसे चाहे उनकी जिद कह लें कि वे अपना हस्ताक्षर दिखाने के लिए लगभग उन्ही धुनों में अपने सारे गीत रचते हैं| नयापन उनके संगीत में सुनाई नहीं देता|

फिल्म के दौरान भी और अंत में भी असित सेन की राजेश खन्ना अभिनीत सफर फिल्म में किशोर कुमार का गाया गीत “ज़िंदगी का सफर है ये कैसा सफर” याद आता रहता है| जैसे उस गीत में ‘मसान’ फिल्म का सारांश छिपा है|

 

ऐसे जीवन भी हैं जो जिए ही नहीं

जिनको जीने से पहले ही मौत आ गई

फूल ऐसे भी हैं जो खिले ही नहीं

जिनको खिलने से पहले खिज़ा खा गई

पहली फिल्म, और वह भी छोटे बजट की फिल्म, में निर्देशक के पास अपनी इच्छापूर्ति के बहुत अवसर (विकल्प , साधन) नहीं होते, इन सब सीमितताओं को देखते हुए मसान एक महत्वपूर्ण प्रयास है, और उल्लेखनीय फिल्म है|

देवी, पीयूष की मृत्यु के बाद उसके घरवालों से संपर्क क्यों साधती है यह फिल्म स्पष्ट नहीं कर पाती लेकिन जब इलाहाबाद में वह पीयूष के घर जा पहुँचती है तो कैमरा घर के बाहर ही रह जाता है और दर्शक सिर्फ अंदर हो रहे घटित को अंदर से बाहर आ पा रही चंद आवाजों से कल्पित कर पाते हैं, जहां पीयूष के पिता देवी को पीयूष की आतमहत्या के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं| कैमरे का इस मुलाक़ात को दृश्यात्मक रूप से न पकड़ना अलग अलग दर्शकों में अलग अलग व्याख्याएं जगायेगा पर इससे यह तो निश्चित ही है कि निर्देशक ने यूं ही नहीं कुछ भी रख दिया फिल्म, बल्कि एक योजना के तहत काम किया|

निर्देशक नीरज घायवान के समक्ष एक सुनहरा रचनात्मक भविष्य बाहें फैलाए खड़ा है|

अनुराग कश्यप फिल्म्स लिमिटेड की फिल्मों के हिसाब से देखें तो ‘मसान’ इस प्रोडक्शन हाउस की भारतीयता के सबसे करीब की फिल्म है|

मसान’ ऐसे फिल्म नहीं है कि हिंदी सिनेमा के नियमित दर्शक इसे न भी देखें तो उन्हें खलेगा नहीं| इसे उन्हें अवश्य ही देखना चाहिए|

…[राकेश]

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