थप्पड़ : (बस इतनी सी बात), निर्देशक अनुभव सिन्हा की सामाजिक मुद्दों पर टीका टिप्पणी वाली श्रंखला की अगली कड़ी है जिसमें व्यावसायिक करियर के अपने स्वप्न पर अपने ऑफिस द्वारा नियंत्रण करने से बेहद नाराज़ युवक अपने ही घर में आयोजित पार्टी में अपने बॉस पर भड़का हुआ है, उसके सहयोगी मित्र, उसकी पत्नी का छोटा भाई और कुछ अन्य उसे रोकना चाहते हैं पर वह गुस्से में सबको अलग हटाकर अपने बॉस के ऊपर आग बबूला हुआ रहता है, तभी उसकी पत्नी शोर सुन उधर आती है और बांह पकड़ कर पति को दूर ले जाना चाहती है| पति, उससे बांह छुड़ाकर बॉस को धमकाने में व्यस्त है, पत्नी पुनः उसकी बांह पकड़ उसे खींचकर वहाँ से दूर ले जाने लगती है| गुस्से और कुंठा से भरा पति धाड़ से भरपूर शक्ति का एक झापड़/थप्पड़ पत्नी के गाल पर टिका देता है या उससे लग जाता है और इस अचानक घटी हिंसा के कारण सब जड़वत हो जाते हैं|

इस दृश्य से पहले फ़िल्म, बहुत सी आधुनिक फ़िल्मों की भांति बेहद बोरियत भरे अंदाज़ में इस दृश्य के लिए सैटिंग तैयार करती रहती है और फ़िल्म आगे आने वाले चरित्रों को दर्शकों से परिचित करवाने के लिए प्रस्तुत करती रहती है| फ़िल्म में ये विस्फोटक दृश्य आकर फ़िल्म की नायिका, अमृता (तापसी पन्नू) की शांत और नियमित रूप से चल रही ज़िंदगी में बर्फ़ीला तूफान जन्मा देता है जहां उसके पति विक्रम (पावेल गुलाटी) और सास (तन्वी आज़मी) के साथ रिश्तों पर बर्फ़ की मोटी परतें चढ़ जाती हैं और उसके अपने अन्तर्मन में सार्वजनिक रूप से पति द्वारा पार्टी में सबके सामने, उसके अपने माता पिता और भाई के सामने अनपेक्षित रूप से थप्पड़ मारे जाने के कारण उत्पन्न तूफान घोर बेचैनी और अशांति फैला रहा है| सतह पर वह पति के घर के अपने सारे उत्तरदायित्व निभाती रहती है पर गहरे में अंदर से वह उस घटना को पचा पाने में असमर्थ रहती है और शीघ्र ही अपने पिता के घर चली जाती है|

अब ऐसी स्थिति में पति पत्नी संबन्धित कोई भी कहानी, जब किसी भी कारण से पति और पत्नी के रिश्ते में दूरियाँ आ गई हों, दोराहे पर आ खड़ी होती है| या तो दोनों में सुलह हो जाये या दोनों स्थायी और कानूनी रूप से एक दूसरे से अलग हो जाएँ| पर थप्पड़ शॉर्ट फ़िल्म तो है नहीं सो यह नायिका को भरपूर भ्रम में रखकर उसकी कहानी को खींचती रहती है| जबसे सवाक फ़िल्मों का दौर आया पति पत्नी के मतभेदों पर बहुत सी फ़िल्में बनीं हैं जिन्होंने इस स्थिति के तमाम कोणों को खंगाल लिया है लेकिन सभी में या तो दोनों पक्ष क्षमा, और दूरी के कारण परस्पर प्रेम के सही स्वरूप को महसूस करने के बाद  की समझदारी विकसित करके सुलह की और बढ़े और पुनर्मिलन की तार्किक परिणति पा गए या फिर  वे एक दूसरे से अलग हो गए और अपने अपने रास्ते चले गए या कि चाहते हुये भी साथ न निभा पाये और भारी मन से अलग हो गए| पर अनुभव सिन्हा की फ़िल्म – “थप्पड़”, कमाल के रास्ते पर चलती है| इसके पास विवाह में पुरुष द्वारा की गई हिंसा के कई उदाहरण हैं और अमृता, उसकी होने वाली भाभी, उसकी वकील नेत्रा, और उसकी ससुराल की घरेलू सहायिका के साथ पुरुष द्वारा की गई स्पष्ट हिंसा कहानी को भरपूर मसाला देते हैं बल्कि अमृता की माँ के रूप में बेहद बारीक और न दिखाई देने वाली पति पत्नी के रिश्ते में पुरुष की हिंसा का उदाहरण भी है जहां अमृता की माँ अपने पति से शिकायत करती है कि जैसे वे पति से अलगाव के बाद अपनी बेटी द्वारा स्वयं के लिए कुछ करने के लिए उसे प्रेरित कर रहे हैं वैसे ही उनके पिता भी तो उसे रेडियो पर गायिका बनाना चाहते थे पर शादी के बाद घर की जिम्मेदारियों के कारण उसने अपने मन को मारा ही| पति द्वारा पूछने पर कि पर उसने तो कभी गाने से नहीं रोका वह यह कह कर पति को निरुत्तर कर देती है कि पति ने कभी उसे प्रेरित भी नहीं किया बस चुपचाप उसे अपने शौक को दफन करने दिया क्योंकि ऐसा करने से उसके वैवाहिक जीवन में सब कुछ आराम से चलता रहता और चलता रहा|

फ़िल्म “थप्पड़” का सामाजिक संरचना में कोई कामयाब योगदान है तो नायिका अमृता के माता-पिता के मध्य का यह वार्तालाप है जो इस बारीक मुद्दे पर ध्यान देता है जिसे अक्सर पुरुष और स्त्रियाँ दोनों  नज़रअंदाज़ कर देते हैं|

बाकी ऐसा प्रतीत होता है कि फ़िल्म में वैवाहिक हिंसा का मुद्दा उठाने के बाद न तो लेखकों के टीम और न निर्देशक को ही चेतन आभास रहा कि फ़िल्म क्या कहना चाह रही है, किस दिशा में जा रही है?

अमृता को पहले उसकी वकील समझाती है कि कोर्ट में मामला जाने से उसे और उसके पति दोनों पक्षों को असहज स्थितियों का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि वहाँ मामले को वकील प्रस्तुत करेंगे और जीत के लिए लगाए गए दाव पेंच उसके और पति के मध्य के रिश्ते को पूरा खराब कर सकते हैं| बाद में विक्रम का वकील भी अमृता को आगाह करता है और कोर्ट से बाहर समझौते की बात कहता है| अंततः अमृता के मानने के कारण ऐसा ही होता है और विक्रम का वकील अमृता पर कई किस्म के झूठे आरोप लगाता है|

बीच बीच में अमृता और विक्रम के मौके मौके पर मिलने के दौरान उनके मध्य झड़पें होती रहती हैं| इतनी सब कड़वाहट के बाद भी विक्रम की माँ के मधुमेह की रोगी होने के नाते घर में बेहोश होकर गिर जाने के बाद घरेलू सहायिका द्वारा सूचित करने पर अमृता ही उन्हे अस्पताल ले जाती है|

अमृता की शिकायत क्या है?

मूल शिकायत है कि विक्रम उस पर हाथ उठा ही नहीं सकता था| यह सच है कि उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था| पर अगर कुछ ऐसा हो जाये जो नहीं होना चाहिए तो अब आगे क्या? क्या जीवन उससे समाप्त हो गया? अमृता देखती है कि थप्पड़ मारने के बाद विक्रम की माँ उससे यह कहने आई कि वह बाहर पार्टी में चले मेहमान क्या सोचेंगे| उन्होंने विक्रम को कुछ नहीं कहा| अमृता से कुछ नहीं कहा| अगले दिन भी वे यही मान कर रहीं कि पति पत्नी के बीच कुछ गिले-शिकवे की बातें होने के बाद सब ठीक हो जाएगा| वे विक्रम से अमृता को किन्ही बाबा जी के पास ले जाने के लिए कहती हैं| विक्रम ने न तो थप्पड़ वाली रात अमृता से क्षमा मांगी न अगले रोज़, बस खेद प्रकट करके रह गया| यह सब बहुत गलत था और इन सब घटित को अमृता के ऊपर बुरा असर डालना ही चाहिए| लेकिन बात वहीं अटक जाती है कि क्या जीवन को इसी एक बिंदू पर अटक जाना चाहिए? जो नहीं होना चाहिए था वह हो गया पर अब होने के बाद क्या किया जाना चाहिए?

अमृता गर्भवती होने की खबर सबसे पहले विक्रम को देने उसके घर पहुँचती है और विक्रम समझता है अब सब ठीक हो जाएगा पर आम स्त्री के उलट “थप्पड़” की नायिका इस स्थिति को भी समझौते की बुनियाद नहीं बनाती और विक्रम से अलग होने की अदालती कार्यवाही चलाती रहती है|

बाद में फ़िल्म के सबसे भावुक दृश्य, जिसमें अपने और विक्रम के बीच चल रही कड़वी अदालती कार्यवाही के बाद भी अमृता विक्रम के घर उसकी गोद भरने की खुशी में होने वाली पूजा में सम्मिलित होती है और अपनी सास से कहती है कि उन्होंने उसे बेहद प्यार दिया लेकिन थप्पड़ वाली घटना के बाद उसे यह स्पष्ट हो गया कि वह प्यार विक्रम की पत्नी के लिए था उसके लिए नहीं| और कि वह उन्हे कभी माफ नहीं कर पाएगी क्योंकि न वे थप्पड़ के बाद उसके पास आईं जानने के लिए कि उस पर क्या बीत रही है और न उन्होंने विक्रम को कुछ कहा, ऐसी स्थिति में वह उनके साथ तो रह नहीं पाएगी पर मिलने आती रहेगी|

अमृता की सास भी भावुकता के क्षणों में कहती है कि उनका अधिकार भी नहीं है उसे रोकने का, वह जहां रहे खुश रहे|

फ़िल्म में अभी भी दिशा का कुछ पता नहीं चलता कि यह कहाँ जा रही है? अमृता को विक्रम से शिकायत थी कि न तो उसने क्षमा मांगी और उसे अधिकार तो था ही नहीं अमृता के ऊपर हाथ उठाने का| एक बार आवेश में विक्रम उससे कहता भी है कि अमृता चाहे तो उसे पीट ले ताकि हिसाब बराबर हो जाये| फ़िल्म के अंत से पहले अदालत में तलाक के अंतिम निर्णय से ठीक पहले वह वे सारी बातें दिल से कहता है जो अमृता सुनना चाहती रही है पर फ़िल्म अभी भी सुलह की दिशा नहीं पकड़ पाती और उनका कानूनी रूप से संबंध विच्छेद हो जाता है|

इस लड़ाई में सिर्फ़ एक बार अमृता अपने पिता से पूछती है कि क्या वह सही कर रही है जिस पर उसके पिता पूछते हैं कि अगर उसे अंदर से लग रहा है कि ठीक कर रही है तो सही ही होगा| जहां अमृता की माँ चाहती है कि अमृता अपने पति से संबंध ठीक कर ले, उसके पिता उसके ऊपर छोड़ देते हैं और उसके साथ बने रहते हैं|

अमृता की सास उससे कहती है कि उसकी माँ की गलती है जिन्होंने उसे चुप रहना सिखाया| अमृता की लड़ाई, उसकी घरेलू सहायिका को हिम्मत देती है कि वह अपने संग मारपीट करते शराबी पति से जूझ कर उसे मारपीट से रोक सके| अमृता की वकील नेत्रा हिम्मत पाती है कि वह अपने पति, जो धनी है और एक शक्तिशाली जज का बेटा है, को छोड़ सके, हालांकि उसके साथ रहते वह अपने पूर्व प्रेमी संग घूमती है पर पति से संबंध तोड़ने के बाद वह उसे भी फोन करके आगे भविष्य में कभी न मिलने की बात कहती है|

मानो सभी स्त्रियों के एकल रहने में ही सामाजिक उन्नति फ़िल्म देखती हो| ऐसा बिलकुल संभव है कि स्त्री अपने जीवन में अपने सपनों को पूरा करे, एकल रहे और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के साथ जीवन को चलाये, किसी से प्रेम हो तो ऐसे मिले जैसे प्रेम संबंध होने के दौरान प्रेमी मिलते हैं और अपने अपने जीवन में लौट आते हैं| विवाह में हरदम साथ रहने की बात संभवतः प्रेम को ऋणात्मक रूप से प्रभावित करती हो, न केवल स्त्री बल्कि पुरुष की भी एकल प्रगति में बाधक सिद्ध होती हो| ऐसे गठबंधन में नए सामाजिक समीकरण उभरेंगे| पर फ़िल्म ऐसा कोई समाधान नहीं सुझाती| फ़िल्म स्त्री स्वतन्त्रता की बात तो करती है, पर बिना कोई दिशा उन्हे दिये| अमृता और उसकी वकील अपने अपने पतियों से अलग हो जाती हैं| अमृता की घरेलू सहायिका अपने पति को रास्ते पर लाने के बाद घर में अकेली नाचती है, शायद अपनी स्थिति से बेहद खुश है| अमृता की सास भी कई बरस से अपने पति अलग अपने छोटे बेटे विक्रम के साथ रहती आई है| अंत में वह वापिस अपने पति के घर चली जाती हैं, पति उनका ख्याल रखने लगते हैं, उनके लिए सब ठीक होता दिखाई देता है| अमृता की माँ के पति, अमृता के पिता तो पहले से ही नारी को सम्मान देने वाले पुरुष हैं अब वे अपनी पत्नी के लिए एक हारमोनियम भी ले आते हैं जिससे वे अपने गाने का शौक पूरा कर सकें|

इन सबके मध्य विक्रम की पड़ोसन शिवानी (दिया मिर्ज़ा) भी है जिसके पति का देहांत कुछ बरस पहले हो चुका है| वह पुनर्विवाह में रुचि नहीं रखती और अपने पति की मीठी स्मृतियों संग वह अपनी बेटी की परवरिश कर रही है| हो सकता है भविष्य में जीवन में किसी प्रेममयी पुरुष के आगमन से उसके विचार बदलें|

अमृता की माँ, उसकी होने वाली भाभी, उसकी सास और घरेलू सहायिका चारों “बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ” के परंपरागत सिद्धान्त को मानती दिखाई देती हैं| वकील नेत्रा की प्रैक्टिस का उज्जवल भविष्य है वह उसमें अपने को खपा सकती है, वह कानूनन अपने पति से अलग नहीं हुयी है और मौके मौके पर लकवे के शिकार अपने ससुर से मिलने जाती है| अभी तो उसकी पति से साक्षात बात ही नहीं हुयी, हो सकता है उनमें सुलह हो जाये हो सकता है वह तलाक की अर्जी अदालत में डाले| फ़िल्म इसे मुक्त्त छोड़ देती है|

अमृता पर वापिस आयें तो उसे क्या करना है? जीवन यापन के लिए गर्भावस्था में तो उसे कुछ करते दिखाया नहीं गया| फ़िल्म स्पष्ट तो नहीं दिखाती पर संभवतः पिता के घर के सामने उसने घर लिया है| शीघ्र ही माँ बनने के बाद बच्चे का लालन पोषण कैसे होगा? माता-पिता सदैव तो उसके साथ रहेंगे नहीं| वह अपनी सास से कहती है कि वह तो अपने बच्चे को प्यार करेगी ही विक्रम उससे भी ज्यादा करेगा| कैसे उसे विश्वास है कि विक्रम उनके बच्चे को उससे ज्यादा प्रेम करेगा? वह भी तब जबकि वह बच्चे को लेकर विक्रम से अलग रहेगी| तलाक के बाद वह अपने बच्चे के साथ रहेगी पर विक्रम हो सकता है दूसरी शादी कर ले, हालांकि पछतावा प्रकट करते हुये अदालत में वह कहता है कि अब वह उसके योग्य बनकर अमृता को पाने का प्रयास करेगा| पर जीवन का क्या भरोसा?

फ़िल्म तो यही दिखाती है कि जिन बातों के लिए अमृता अपनी जिद पर अड़ी हुयी थी उन बातों के पूरा होने के बाद भी वह अपनी स्थिति से पीछे नहीं हटती और अदालत उसका और विक्रम का संबंध विच्छेद कर देती है|

अमृता और विक्रम के बच्चे के बचपन का जिम्मेदार कौन होगा? जो बचपन से अपने माँ और पिता के अलगाव की स्थिति में पलेगा उसके कोमल मन पर हुयी हिंसा का जिम्मेदार कौन होगा? अनुभव सिन्हा की फ़िल्म इस कोण पर विचार नहीं करती| जो उन्होंने सोच लिया बस हिंसा वही है उनके रचे किरदार जो हिंसा करने वाले हैं वह हिंसा नहीं है?

मारना तो बच्चों को भी नहीं चाहिए| बच्चों के प्रति हिंसा के विरुद्ध आवाज उठाती अच्छी फ़िल्म – “तारे ज़मीं पर” बनी| “थप्पड़” के तर्क से चलें तो क्या बच्चों को कभी अपने माता पिता से पिटने के बाद घर से चले जाना चाहिए? अपने माता-पिता से संबंध तोड़ लेने चाहियेँ?

फ़िल्म, पत्नी को रोज़ पीटने वाले घरेलू सहायिका के पति वाले कोण में तो पति पत्नी को साथ दिखा देती है पर जिसने एक बार हिंसा की और जो अंत में नायिका के मन मुताबिक पश्चाताप और क्षमा की स्थिति में आ पहुंचा उसे पत्नी से संबंध विच्छेद सहना पड़ा|

अभिनय की बात करें तो कुमुद मिश्रा, रत्ना पाठक शाह और तन्वी आज़मी और कुछ हद तक दिया मिर्ज़ा जितना खामोश रहकर भी अभिव्यक्त कर जाते हैं उसका आधा भी तापसी पन्नू और अन्य युवा अभिनेता भारी भरकम संवाद और दृश्य पाकर भी नहीं कर पाते| तापसी को बहुत से अच्छे दृश्य मिले लेकिन तनाव और दुःख भरे दृश्यों में भावों को व्यक्त करने के लिए उनके पास हर फ़िल्म में वही दो चार एक्सप्रेशंस नज़र आते हैं और ऐसे दृश्यों में उनके अभिनय की सीमा बेहद स्पष्ट हो चली है| विक्रम के घर पूजा में आई अमृता की भूमिका में सास तन्वी आज़मी के सम्मुख बैठी तापसी उस भाव को नहीं दर्शा पाती जितना उन्हे दिये संवादों को जरूरत थी जबकि उसी दृश्य में खामोश बैठी तन्वी और रत्ना पाठक शाह अपनी आँखों से ही तापसी से कई गुना ज्यादा भाव अभिव्यक्त कर देती हैं|

फ़िल्म में बहुत से दृश्य ऐसे हैं जो भाव सम्प्रेषण में सफल नहीं| इसी पूजा में घरेलू सहायिका दो हजार का नोट एक मूर्ति के पास रख देती है, इसका क्या अर्थ दर्शकों तक पहुंचा?

अदालत में एक बेंच पर अमृता और विक्रम बैठ जाते है और कुछ पल की खामोशी के बाद विक्रम अपनी भावनाएं व्यक्त करना शुरू करता है पर न विकर्म का दर्द और न अमृता का दुःख, सब कुछ दर्शकों से अछूता रह जाता है| इसकी तुलना में इज़ाजत फ़िल्म के बिलकुल ऐसी ही स्थिति का दृश्य याद करना अच्छा रहेगा जहां रेलवे स्टेशन पर आरामगृह के बाहर बनी बेंच पर बैठी रेखा के पास नसीर आकर बैठ जाते हैं और उसे वह सब बताते हैं जो रेखा के उनके जीवन से दूर जाने के बाद उनके साथ घटित हुआ| उस दृश्य के दुःख से फ़िल्म को दर्जनों बार देख चुके दर्शक का अन्तर्मन भी पुनः भीग जाता है पर यहाँ दृश्य ऐसे लगते हैं मानो पांडित्य दिखा रहे हों कि हम सामाजिक समस्या का झण्डा बुलंद कर रहे हैं हमें देखो और सराहो!

पूरी “थप्पड़” फ़िल्म पर राजेश खन्ना और शबाना आज़मी की फ़िल्म – “थोड़ी सी बेवफाई” का गीत “ हजार राहें जो हमने मुड़ कर देखीं” भारी है| “थप्पड़” जबरिया विवाह प्रथा जैसा जबरन प्रयास लगता है|

 

इसमें मानवीय पहलू एकतरफा रुख के साथ रखे गए हैं| प्रायश्चित, क्षमा, और अपने में लगातार सुधार की अनवरत प्रक्रिया के भारतीय संस्कृति की इसमें आँखें मूँद कर अवहेलना की गई है संभवत: इस स्वयंजनित अहंकार में कि स्त्री स्वातंत्र्य पर हम सबसे आधुनिक और सटीक दृष्टिकोण दे रहे हैं|

महेश भट्ट की अर्थ, विकास बहल की क्वीन में नायिका अपने स्वार्थ (स्व अर्थ) की खोज में निकल पड़ी नायिकाएँ हैं|

पर हफ्ते दो हफ्ते में माँ बनने वाली “थप्पड़” की अमृता किस खोज में है? बस इतनी सी बात दर्शक को भी पता चल जाती!

 

…[राकेश]