कोमल और प्रेममयी स्वर में टीचर : राजू तुम यहाँ क्या कर रहे हो?

किशोर लड़का : मैडम मैं सर के सामने कंफैशन कर रहा था, मैंने पाप किया है|

कहकर लड़का बाहर जाने लगता है जिससे उसे अपनी टीचर का सामना ना करना पड़े|

युवती आश्चर्य से : बच्चे पाप नहीं करते|

लड़का गुस्से में पलटता है और आँखों से चिंगारियाँ निकालते हुये कहता है : मैं बच्चा नहीं हूँ!

उपरोक्त दृश्य राजकपूर द्वारा आर के फिल्म्स में अभिनीत अंतिम फ़िल्म – मेरा नाम जोकर का एक बेहद महत्वपूर्ण दृश्य है| किशोर लड़के बहुत आए होंगे हिन्दी फ़िल्मों में पर इस दृश्य में इस लड़के- ऋषि कपूर द्वारा किये गए इंटेन्स अभिनय की बराबरी का नमूना ढूँढना मुश्किल है|  यह ऋषि की दूसरी ही फ़िल्म थी, कई बरस पहले ढाई तीन साल की उम्र में वे निर्देशक के रूप में अपने पिता की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म श्री 420 के एक गाने में अपने भाई और बहन के साथ कैमरे के सामने आए थे| मेरा नाम जोकर के तीन अध्यायों में पहला भाग ऋषि कपूर के अभिनय कौशल पर बहुत ज्यादा टिका हुआ था और सारी दुनिया में सिनेमाई समझ रखने वाले समीक्षकों, दर्शकों और सत्यजीत रे जैसे मास्टर फ़िल्म निर्देशकों के लिए भी पहला भाग कमाल का सिनेमा था|

अभिनय करते हुये कभी कभी अभिनेता उस क्षण के बहाव में बह जाते हैं और अपने ही अभिनय प्रदर्शन में कहीं खो जाते हैं| यह एक ऐसा ही क्षण था जब किशोर ऋषि कपूर ने अपने लंबे अभिनय जीवन का सर्वश्रेष्ठ दृश्य अभिनीत किया| शायद राज कपूर जैसे महान निर्देशक के निर्देशन के कारण ऐसा संभव हो पाया हो, पर उस क्षण ऋषि के अभिनय के सुर संगीत के साथ एकात्म हो गए थे|  राज कपूर ने अपनी जीवनी तो लिखी नहीं पर शायद किसी अपने करीबी से उस दिन जिक्र किया हो, इस दृश्य में बेटे ऋषि द्वारा किए जादू के बारे में| खुद शानदार अभिनेता होने के साथ साथ वे दिलीप कुमार के करीबी मित्र थे और अच्छा अभिनय क्या होता है यह उन्हे औरों से ज्यादा ही पता था| किशोरावस्था में किया गया वह अभिनय प्रदर्शन ऋषि कपूर के लिए प्रतिनिधि प्रदर्शन रहा|

संयोग से बरसों बाद प्रेमरोग के एक दृश्य की शूटिंग के वक्त वे ऋषि से अपनी जरूरत के मानिंद अभिनय प्रदर्शन नहीं पा पा रहे थे तब उन्होने कैमरे के पीछे से चिल्लकर कहा था,” चिंटू मुझे इस सीन में यूसूफ़ चाहिए”। ऋषि कपूर की समझ में कुछ पल बाद आया कि पिता और निर्देशक राज कपूर चाहते हैं की जिस शिद्दत से दिलीप कुमार इस दृश्य को निभाते वैसा उन्हे करना है|

मेरा नाम जोकर के प्रथम भाग को करते करते ऋषि ने “ऑन द जॉब” ट्रेनिंग के दौरान अभिनय के जो अध्याय राज कपूर के निर्देशन में सीखे उन्होने उन्हे एक मौलिक अभिनेता बना दिया वरना उस वक्त अभिनय के मामले में दिलीप कुमार की ही तूती बोलती थी, और बहुत से सितारों ने दिलीप कुमार से प्रेरणा लेकर ही अपने अभिनय को धार दी| उनके अपने परिवार में दादा पृथ्वीराज कपूर, पिता राज कपूर, चाचा शम्मी और शशि कपूर, मामा प्रेम नाथ और राजेन्द्र नाथ, भाई रणधीर कपूर, सभी तो अभिनेता थे| वे किसी की भी शैली से प्रेरणा ले अपनी पारी शुरू कर सकते थे| पर राज कपूर ने शायद अपने बेटे को सबसे बड़ा उपहार दिया अभिनय में उसकी मौलिकता का विकास करवा कर| इससे बेहतर क्या दे सकता है एक अभिनेता बाप अपने अभिनेता बेटे को?

इस मौलिकता और अगली फ़िल्म बॉबी के सुपर हिट होने का नतीजा रहा होगा की ऋषि ने सत्तर के दशक में आत्मविश्वास से भरकर  बहुत अच्छी और संगीतमय फिल्में प्रदान कीं| उनका आत्मविश्वास कमाल का रहा होगा, क्योंकि अमिताभ बच्चन के तूफानी दौर में कई फ़िल्मों में ऋषि ने अमिताभ के साथ भी काम किया और किसी भी फ़िल्म में उन्होने अपनी मौलिकता छोडकर अमिताभ की उस वक्त की शैली को टक्कर देने का प्रयास नहीं किया और अपनी ही धुरी पर टीके रहकर अभिनय किया और अपना स्टारडम बनाकर कायम रखा|

अभिनेता के रूप में ऋषि के आत्मविश्वास के बारे में सबसे अच्छा कथन रमेश सिप्पी की सागर में उनके सह अभिनेता रहे कमाल के अभिनेता कमल हासन  ने कहा था,” मैंने ऋषि के साथ रमेश सिप्पी की सागर में काम करने का भरपूर लुत्फ उठाया| मैं उस वक्त रमेश सिप्पी का बहुत चहेता था सो मुझे नहीं पता कि क्या ऋषि को भी मेरे साथ काम करके ऐसे ही आनंद आया| लेकिन जिस स्तर पर ऋषि ने मेरे साथ स्क्रीन साझा की वह आश्चर्यजनक था| जब मेरे दृश्य होते थे तो ऋषि चुपचाप पीछे खड़े हो जाते थे, सिगरेट पीते थे या मुझे अभिनय करते चुपचाप देखते थे और मुझे  दृश्य अभिनीत करने देते थे| वे असुरक्षित अभिनेता बिलकुल भी नहीं थे| उनसे मैंने इस बात को सीखा और जब मुझे अपने से जूनियर अभिनेताओं के साथ काम करने के मौके मिले तो मैंने भी ऋषि की तरह व्यवहार करने का प्रयास किया| आशा है मैं उस प्रण पर खरा उतरा|”

सागर में कमल हासन की भूमिका ऐसी थी कि उन्हे अंत में दर्शकों की ढेर सी सहानुभूति मिलनी तय थी| उनकी भूमिका में भावों की, भावनाओं की बहुत किस्में थीं और उन्हे त्याग और नायकत्व दिखाने के बहुत सारे मौके उस भूमिका में मिले थे| उस तुलना में ऋषि कपूर की भूमिका ऊपरी तौर पर एक प्रेमी की थी जो धनी है और गरीब युवती से प्रेम कर बैठता है| इस सीधी सपाट भूमिका में भी ऋषि ने एक सच्चे प्रेमी की तरह भरपूर निष्ठा से अभिनय किया है| परदे पर प्रेम उनकी आँखों से बहता देखा जा सकता है|

फ़िल्म में चाहे वह दृश्य हो जिसमें ऋषि सागर किनारे पहली बार डिम्पल को देखते हैं या वह दृश्य जिसमें कमल और डिम्पल शरारत में उनका मूर्ख बनाते हैं कि असल में कमल और डिम्पल तो बचपन से एक दूसरे से प्रेम करते हैं और ऋषि ही बीच में आ टपके हैं, ऋषि ने बेहद संतुलित हाव भाव और प्रतिक्रियाएँ दी हैं और एक उच्च स्तरीय अभिनय प्रदर्शन का नमूना प्रस्तुत किया है|
एक प्रेमी की भूमिका, चाहे वह मुखर प्रेमी हो जैसे वे सत्तर और अस्सी के दशकों में बहुत सी फ़िल्मों में नज़र आए, या प्रेम रोग के मूक प्रेमी हों, आँखों में ढेर सारा प्यार बसाकर सच्चाई से भावनाएं प्रदर्शित करके, उन्होने निभाई|

राज-देव-दिलीप की तिकड़ी ने परदे पर प्रेम करते प्रेमी की भूमिका को विश्वसनीयता प्रदान की| यदि वे परदे पर नायिका से प्रेम कर रहे हैं तो यह संबंध बेहद वास्तविक लगा| राजेश खन्ना ने परदे पर रोमांस के प्रदर्शन में अपना अतिरिक्त योगदान दिया और उसमें अपना चार्म भी जोड़ा| लेकिन यह भी तथ्यात्मक बात है कि ये सब परदे के प्रेमी परिपक्व पुरुष लगते थे| किशोरों और थोड़े से बड़े युवाववर्ग के और थोड़े से बड़े भाई किस्म के|

मेरा नाम जोकर ने अगर संभावनाओं से भरे एक किशोर अभिनेता को प्रस्तुत किया तो तीन वर्ष बाद प्रदर्शित बॉबी ने एक मौलिक प्रेमी नवयुवा प्रस्तुत करके एक मील का पत्थर स्थापित किया|  बॉबी द्वारा हिन्दी सिनेमा के परिदृश्य पर ऋषि कपूर के ठोस और सफल आगमन से हिन्दी सिनेमा को एक विश्वसनीय यौवन की प्राप्ति हुयी| हिन्दी सिनेमा अचानक से नवयुवा हो गया| ऋषि कपूर ने सत्तर के दशक में कॉलेज जाने वाले या किशोर वय के लड़कों का सच्चा प्रतिनिधित्व  हिन्दी सिनेमा में किया|

यूं तो ऋषि कपूर के बाद बहुत से सितारों के बेटों का आगमन हिन्दी सिनेमा में हुआ और उनमें से कुछ की पहली फ़िल्मों ने बॉबी से बड़ी सफलता प्राप्त की और वे कालांतर में ऋषि कपूर से ज्यादा सफल और बड़े सितारे भी बने लेकिन कोई भी ऋषि और डिम्पल द्वारा बॉबी में लाई गई सच्ची ताजगी के एहसास को परास्त नहीं कर सका| बॉबी बाद में फ़िल्म उद्योग में प्रवेश रखने वाले सितारा पुत्र और पौत्रियों के लिए आज तक प्रेरणा का काम करती है और सब एक उसे जैसी ताजगी से भारी प्रेम कहानी के माध्यम से ही फ़िल्मों में प्रवेश करना चाहते हैं|

ऋषि कपूर की परदे पर युवा प्रेमी की छ्वि को सच्चा नमन शेखर कपूर ने अपनी पहली फ़िल्म (निर्देशित) – मासूम में किया| फ़िल्म के एक दृश्य में शबाना की छोटी बेटी मिनी टीवी पर ऋषि कपूर को ओम शांति ओम गाने पर नाचते देख आनंद में मग्न है और बड़ी बेटी (बाल कलाकार उर्मिला मारतोंडकर) जलन से कुढ़ रही है क्योंकि उसे होम वर्क करना पड़ रहा है| वह शबाना से शिकायत कर रही है कि टीवी के शोर के कारण वह पढ़ाई पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर पा रही| शबाना जाकर टीवी बंद कर देती है तो छोटी बेटी चीखती है,”मम्मी, चिंटू का गाना आ रहा है”|

शबानाहाँ चिंटू तो तेरा मामा लगता है ना!
छोटी बेटी – हाँ

तभी नसीरुद्दीन शाह कमरे में प्रवेश करते हैं और छोटी बेटी शिकायत करती है,”पापा, मम्मी ने मुझे चिंटू का गाना नहीं देखने दिया”|

1973 से अस्सी के दशक के मध्य तक अमिताभ के अलावा ऋषि कपूर अर्थात चिंटू ही बच्चों और किशोर वय के दर्शकों के नायक रहे|

शुरू के दस साल ऋषि कपूर के लिए खासे ऊपजाऊ रहे और उन्हे अच्छे फिल्में मिलती रहीं और वे आज भी बड़े शौक से देखी जाती हैं| अस्सी के दशक में भी उन्हे प्रेम रोग, तवायफ, एक चादर मैली सी, हिना, चाँदनी और खोज जैसी अच्छी भूमिकाओं वाली फिल्में मिल गईं| अस्सी के दशक के अंत में हिना और चाँदनी में बहुत अच्छा अभिनय करने के बावजूद यह स्पष्ट हो चला था कि युवा प्रेमी की भूमिकाओं को अलविदा कहने का वक्त्त आ गया है| लेकिन या तो ऋषि स्वयं ऐसा करने की हिम्मत कर पाये या फिल्मी बाज़ार ने उन्हे ऐसा करने से रोका और अगले दस साल उन्होने युवा प्रेमी के चरित्र को कई फ़िल्मों में ढोया लेकिन उनके कठोर परिश्रम और पूर्ण निष्ठा के  बावजूद न तो उनकी उम्र और न उनका शारीरिक गठन इन भूमिकाओं को परदे पर न्यायोचित ठहरा पा रहा था|

युवा प्रेम की जिस ताजगी का प्रतिनिधि बनकर हिन्दी फ़िल्मों में ऋषि कपूर का पदार्पण हुआ था वही ताजगी उनकी नब्बे के दशक की फ़िल्मों से गायब थी| ज्यादतर अभिनेता अपनी उम्र के किसी पड़ाव पर अन्य पड़ावों से ज्यादा चमकते हैं| ऋषि कपूर भी श्रेष्ठ थे जब उन्हे कॉलेज में पढ़ रहे युवा वर्ग को या थोड़े से और बड़े युवा वर्ग, जिसकी भावनाएं अभी निराशा के गर्त में नहीं गई हैं, को परदे पर दिखाना होता था| लेकिन एक परिपक्व चरित्र के रूप में पनपने के लिए उन्हे और बहुत कुछ करने की जरूरत थी|

अस्सी के दशक के अंत में विजय सदाना ने मधुमती का रिमेक बनाया था – जनम जनम जिसमें ऋषि कपूर ने दिलीप कुमार वाली भूमिका निभाई| पूरी फ़िल्म ही मधुमती के समक्ष बोगस थी| हालांकि न तो अमरीश पुरी ही प्राण के जादू के समकक्ष ठहर पाये न डैनी जयंत के| ऋषि और दिलीप कुमार के अभिनय प्रदर्शनों में तुलना भी बेमानी है ऐसे हालात में क्योंकि किसी भी विभाग में फ़िल्म मधुमती का पासंग भर भी न थी|

यह रोचक बात है कि बॉबी की ताबड़तोड़ सफलता के बाद ऋषि कपूर ने फ़िल्म – जहरीला इंसान की थी| जिसमें वे एक गुस्सैल और हिंसक प्रेमी के रूप में अवतरित हुये थे| बहुत हद तक उस भूमिका को मौजूदा दौर की कबीर सिंह के नायक के चरित्र का पूर्वज कहा जा सकता है| हालांकि फ़िल्म में सुधारों की आवश्यकता नज़र आती थी पर ऋषि के प्रयास और कठोर परिश्रम दोनों भी साथ ही नज़र आते थे उनके अभिनय प्रदर्शन में| फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल न थी तो या तो ऋषि ने फिर लीक से हटकर किसी भूमिका के लिए कोई प्रयास ही नहीं किया या इसके बॉक्स ऑफिस पर प्रदर्शन से प्रभावित होकर ऐसे किसी प्रस्ताव को स्वीकृति ही नहीं दी| इस फ़िल्म को करके ऋषि ने सही दिशा में कदम उठाए थे क्योंकि एक अभिनेता के तौर पर परिपक्व होने के लिए उस पड़ाव पर उन्हे भांति भांति की भूमिकायेँ निभाने की आवश्यकता थी| सिनेमा ही ओढ़ने बिछाने वाले राज कपूर के पुत्र को शुरू से ही अलग अलग किस्म की फ़िल्में किए जाने की आवश्यकता थी| पर या तो मेरा नाम जोकर की भयंकर वित्तीय असफलता के कारण वे पहले वह अपना फ़िल्मी करियर बिलकुल सुरक्षित रास्ते पर चलाना चाहते थे जिससे वे एक स्टार बन कर सुगमता से जीवन जी सकें या उस वक्त उनमें उस दूरदर्शिता और आकांक्षा की कमी थी जो एक अभिनेता को नई से नई जमीन तलाशने के लिए उकसाती है|

यह भी रोचक है कि जब अभिनय की अपनी दूसरी पारी में वे भिन्न किस्म की भूमिकाएँ पा रहे थे और अपने अच्छे अभिनय प्रदर्शनों के लिए भरपूर सराहना पा रहे थे और जबकि उनका अपना बेटा रनबीर कपूर न केवल एक अच्छा अभिनेता के तौर पर प्रसिद्ध हो चुका बल्कि एक बड़ा स्टार भी बन चुका था, ऋषि कपूर रनबीर द्वारा जग्गा जासूस (अनुराग बसु) और बॉम्बे वेल्वेट (अनुराग कश्यप) किए जाने से खफा थे क्योंकि दोनों फ़िल्में बॉस ऑफिस पर असफल हो चुकी थीं| ऋषि ने पब्लिकली दोनों अनुरागों को कोसा कि उन्होने घटिया फ़िल्में बनाकर उनके बेटे की फिल्मोग्राफी में इतनी बड़ी असफल फ़िल्में जोड़ दीं|  दोनों फ़िल्में भले ही असफल हो गई हों पर दीर्घकाल में दोनों ही रनबीर की बेहतरीन अभिनय क्षमता और उनके चुनाव के कारण जानी जाएंगी| दोनों भिन्न और अच्छी फ़िल्में हैं| उस लिहाज से तो मेरा नाम जोकर भी प्रदर्शन के वक्त बॉक्स ऑफिस पर असफल थी और शायद राज कपूर की सबसे बड़ी फ्लॉप थी, बाद में भले  ही इसने क्लासिक फ़िल्म का दर्जा प्राप्त कर लिया हो| पचास के दशक में भी राज कपूर की आह बहुत बड़ी फ्लॉप थी, लेकिन आज भी वह देखी जाती है, उसका मधुर संगीत सराहा जाता है, प्राण की धनात्मक भूमिका के लिए याद की जाती है| शायद पिता के रूप में ऋषि कपूर रनबीर का भविष्य सुरक्षित करने की भावना के वशीभूत होकर इन दोनों फ़िल्मों को कोस रहे हों और तब पिता एक अनुभवी अभिनेता की सिनेमाई समझ पर हावी हो गया हो| ये एक घटित इतिहास बनकर उनके साथ चिपका ही रहेगा|

बहरहाल ऋषि के पाले में रोमांटिक और सामाजिक विषयों वाली फ़िल्में आयीं|  देव आनंद ने रोमांस को परदे पर अपने आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया और गीतों को परदे पर  प्रस्तुत करने के वे बादशाह रहे| लेकिन उनमें एक कमी थी कि वे नृत्य नहीं कर सकते थे| उनके बाद रोमांस के बादशाह करे जाने वाले सुपर स्टार राजेश खन्ना के साथ भी यह कमी खलती रही, जहां देव प्रयास ही नहीं करते थे, राजेश खन्ना अटपटे ढंग से प्रयास करके रोमांटिक गीतों में हास्य का पुट जोड़ देते थे| ऋषि कपूर ने वह कमी पूरी की और उनके इस गुण से उनके द्वारा प्रस्तुत गीतों में युवा सजीवता आ गई|

सत्तर और अस्सी के दशक की उनकी रोमांटिक फ़िल्मों का कोई सा गीत उठा लें और वह पूर्ण तन्मयता और आंतरिक आनंद के साथ उसे प्रस्तुत करते नज़र आएंगे| बहुत सी फ़िल्मों में उन्होने नायिका प्रधान भूमिकाओं से कमतर नायक की भूमिका निभाई, जैसे स्वयं उनके पिता की प्रेमरोग लेकिन अभिनय में सर्वश्रेष्ठ करने की उनकी निष्ठा में कहीं कोई कमी नज़र नहीं आती| परदे पर अपनी हम उम्र नज़र आने वाली नीतू सिंह, डिम्पल, टीना मुनीम, और पूनम ढिल्लों आदि ही नहीं बल्कि अपने से बड़ी दिखाई देने वाली राखी, मोशुमी चटर्जी, और रीना रॉय आदि के साथ भी रोमांटिक फ़िल्में कीं और विश्वसनीय प्रेमी बने रहे| दूसरा आदमी में वे नीतू सिंह और राखी दोनों के प्रेमी के तौर पर विश्वसनीयता बनाए रख पाये और इस फ़िल्म में प्रेमी के रूप में अपने अभिनय की रेंज का विस्तार प्रदर्शित कर पाये|

हालांकि नब्बे के दशक में अपने से कई बरस छोटी नायिकाओं से प्रेम दर्शाते हुये उनमें वो ताजगी नहीं दिखाई दी जो रोमांटिक फ़िल्मों के लिए उनका मुख्य गुण था| उनके अभिनय प्रदर्शन में कोई कमी न थी लेकिन परदे पर उनके शारीरिक हाव भाव अब दृश्यों की मांग पर फबते नहीं लगते थे| वैसे भी एक अभिनेता के जीवन में ऐसे पड़ाव आते ही आते हैं जब उसके हजार अच्छा करने के बावजूद उसके करने पर बहुत ध्यान नहीं दिया जाता क्योंकि वह पहले ही इस सब कुछ को करने के लिए सराहना पा चुका है और ये सब प्रदर्शन महज दुहराव लगते हैं| दर्शकों और समीक्षकों को अपेक्षा रहती है कि अभिनेता कुछ नया करे, बसीपन के वृत्त से बाहर निकाल आकर और अपनी अभिनय क्षमता का भरपूर उपयोग करे|

परदे पर शारीरिक उपस्थिती की गुणवत्ता किसी भी अभिनेता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है| बहुत से कलाकारों को अगर भीं भूमिकाएँ न मिलें तो उनकी प्रगति रुक जाती है| बाल सुलभ चेहरे वाले अभिनेताओं के साथ एक सीमा के बाद बहुत दिक्कतें आ जाती हैं और वे और ज्यादा परिपक्व नहीं हो पाते हैं क्योंकि उन्हे फ़िल्मी बाज़ार वैसी फ़िल्में प्रदान ही नहीं करता| अभिनेता सचिन के साथ यही दिक्कत थी| हॉलीवुड में देखें तो लियानार्डो द कैपेरियो ने बहुत मेहनत करके युवा चेहरे वाले अभिनेता की अपनी छवि की कैद से रिहाई हासिल की है और आज वे वहाँ के बड़े और बड़ी संभावनाओं वाले अभिनेताओं में सम्मिलित हो चुके हैं|

ऋषि कपूर से प्रभावित आमिर खान ने ऋषि कपूर की कमजोरियों और गलतियों से बहुत सीखा और अपने अभिनय जीवन के शुरू से ही विभिन्नता की महत्ता पर ज़ोर दिया| जहरीला इंसान की तर्ज पर आमिर खान ने भी कयामत से कयामत तक के बाद राख़ जैसी फ़िल्म की थी| राख़ भी फ्लॉप थी और युवा प्रेमी की भूमिकाओं से शुरू करके आमिर भी बीच में लड़खड़ाए जब वे अपनी भूमिकाओं में अलग अलग किस्म नहीं ला पा रहे थे| लेकिन भिन्न भूमिकाओं पर भरोसा बनाकर वे प्रयासरत रहे और सरफरोश ने उनके लिए बहुलता के दरवाजे खोल दिये| ऋषि कपूर को भी कुछ ऐसा ही करना था कम से कम अपने अभिनय जीवन के दूसरे दशक से| लेकिन वे इस वे इस चक्रव्यूह को नहीं तोड़ पाये| ऋषि कपूर ऐसा नहीं कर पाये| शायद पिता राज कपूर के असमय निधन के कारण भी उनका यह प्रोजेक्ट शुरू नहीं हुआ| राज कपूर होते तो वे वे उनकी उम्र के अनुसार ही फ़िल्म बनाते और उन्हे परिपक्वता हासिल करने का अवसर देते| लेकिन वे एक स्थापित अभिनेता थे अतः यह तर्क उन्हे सहारा नहीं दे सकता, वे बाहर की फ़िल्मों से ऐसा कर सकते थे, बाकी अभिनेता करते ही हैं|

आखिरकार बरसों अभिनय से अवकाश लेने के बाद और एक औसत फ़िल्म (आ अब लौट चलें) निर्देशित करने के बाद जब उन्होने अभिनय की अगली पारी एक चरित्र अभिनेता के रूप में शुरू की तो उनके हालात बेहतर नज़र आए| हम तुम, और फना आदि में वे खासे प्रभावी लगे| लक बाय चांस, लव आज कल और दिल्ली 6 ने सिद्ध किया कि अनुभवी अभिनेता के रूप में अब उनकी पारी बेहद रोचक और प्रभावशाली सिद्ध होने वाली है| अब वे अपने हम उम्र और अपने से बड़े अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, आदि किसी को भी परदे पर सशक्त चुनौती दे पाने में पूर्ण सक्षम थे| चिंटू जी ने उनकी अभिनय क्षमता और भूमिका चुनने और अपने पर ही हास्य व्यंग्य की दृष्टि डालने के लचीलेपन को उजागर किया|

सत्तर के अमिताभ, शत्रुध्न, धर्मेंद्र, विनोद खन्ना, शशि कपूर के काल में उन्होने अपना एक अलग ब्रांड बना लिया था  और वह अस्सी के दशक में एक छोर पर खड़े सनी, जैकी और अनिल कपूर और दूसरे छोर पर खड़े नसीर और ओम पुरी के मध्य भी अपनी नैया खेते रहे| यह उनका दुर्भाग्य रहा कि प्रेम रोग, तवायफ और एक चादर मैली सी से उपजे रास्ते पर कोई अन्य निर्देशक संभावना नहीं देख पाया|

प्रभावशाली अभिनेताओं के बड़े से खानदान से आने के बावजूद और उद्योग के बड़े अभिनेताओं से घिरे रहने के बावजूद बिना किसी की शैली को अपनाए बिना बिलकुल स्वाभाविक अभिनेता दिखने की अपनी मौलिक शैली विकसित करने का कठिन काम ऋषि कपूर ने शुरू में ही कर लिया था| इस नाते उनके अभिनय के गुण और कमियाँ उनकी अपनी हैं|

जैसे वे अपनी सभी नायिकाओं संग सहज दिखाई देते थे उसी तरह से परदे पर विभिन्न गायकों जैसे शैलेंद्र सिंह, किशोर कुमार, मोहम्मद रफी, सुरेश वाडेकर, अमित कुमार और महेंद्र कपूर की विभिन्न आवाजों को उन्होने बेहद सहजता से प्रस्तुत किया और उन्हे अपनी आवाज बनने दिया|

सत्तर के दशक में परदे पर उनकी उपस्थिती के लचीलेपन ने ही ऐसा संभव बनाया कि कभी कभी में वे अमिताभ के दामाद और नसीब में उनसे सालों छोटे भाई बन गये|

एक अभिनेता के तौर पर उनकी क्षमता ऐसे भी देखी जा सकती है कि पचास के दशक में लैला मजनूँ के साथ जो काम शम्मी कपूर न कर पाये, बाद में लव एंड गॉड में संजीव कुमार न कर पाये वह करिश्मा ऋषि ने सत्तर के दशक की लैला मजनूँ में कर दिखाया|

जैसे उनके पिता राज कपूर जो वाद्य यंत्र परदे पर अपने हाथ में लेते थे उसे ऐसा बना लेते थे मानों बरसों से बाजा रहे हों, ऐसे ही सरगम में ऋषि ने डफली अपने हाथों में ली तो ऐसा ही लगा कि वे बचपन से ही इसे बजाने में पारंगत हैं|

हाल के बरसों की फ़िल्मों जैसे बेशर्म, दो दूनी चार (हास्य), अग्निपथ और डी डे (हिंसा), मुल्क (राजनीतिक और सांप्रदायिक भेदभाव के पीड़ित), कपूर एंड संस और 102 नॉट आऊट (वृद्ध) आदि में वे भिन्न भिन्न किस्म के चरित्र निभाते नज़र आए और इस काल का भरपूर उपयोग करते दिखाई दिये| जिस तरह से वे अभिनेता के तौर पर आजकल प्रदर्शन और विकास कर रहे थे उससे भविष्य में उनसे बहुत पाने की उम्मीद तो आजकल सदैव ही बनी रहती थी|

हिन्दी फ़िल्मों के इतिहास में ऋषि कपूर का योगदान भी उल्लेखनीय रूप से याद किया जाता रहेगा| जब जब हिन्दी सिनेमा के परदे पर युवा ऊर्जा की उपस्थिति का, युवा प्रेम की अभिव्यक्ति का जिक्र होगा ऋषि कपूर को याद किया जाएगा| फ़िल्म कभी कभी को देख चुके लोग याद कर सकते हैं की जब जब परदे पर ऋषि कपूर का आगमन होता है कैसे ऊर्जा का विस्फोट होकर परदे पर चारों तरफ ऊर्जा फैल जाती है| यह ऋषि कपूर की ही उपस्थिति का कारण होगा कि सामान्यतः धीमे गीत बनाने वाले संगीतकार खय्याम ने तेरे चेहरे से नज़र नहीं हटती और चले छुरियाँ जैसे तीव्र गति और युवा ऊर्जा से भरपूर गीत फ़िल्म के लिए रचे|

एक कलाकार होने के नाते उनके साथ यह एक कसक रह सकती है कि महान राज कपूर के बेटे ने निर्देशन की बागडोर न संभाली और पिता के स्वप्न आर के स्टूडियो को अंततः उन्हे और उनके भाइयों को बेच देना पड़ा| उस लिहाज से राज कपूर की विरासत को आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी ऋषि कपूर के बेटे रनबीर कपूर पर आ जाती है|

अपनी पीढ़ी के हिन्दी फ़िल्मों के वे शायद अकेले ऐसे नुमाइंदे थे जो ट्विटर नामक खुले मंच पर किसी से भी भिड़ जाने में कोई हिचक महसूस नहीं करे थे| सामाजिक मसलों पर अपनी बेबाक टिप्पणियों से उन्होने अकसर ही विवादों को जन्म दिया लेकिन वे इससे घबराते या पीछे हटते दिखाई नहीं दिये|  उनकी स्पष्टवादिता ने बड़े बड़े खेल पिछले सालों में खेले| वे बड़े दिल वाले भी थे| एक फ़िल्मी अवार्ड फंक्शन में प्रस्तुतकर्ता ने उनके मद्यपान को लेकर उनका उपहास उड़ाते हुये उन पर टिप्पणी कर दी थी| मंच पर ऋषि कपूर ने इसे बेहद हल्के में लेते हुये प्रस्तुतकर्ता की हिमाकत को नज़रअंदाज़ किया और अपने मज़ाकिया अंदाज़ से माहौल को ठीक कर दिया|

ल्यूकेमिया के राक्षस से दो साल लड़ने के बावजूद उनकी जिजीविषा सराहने योग्य थी, और अब भारत लौटने पर निश्चित ही लगता था कि वे लंबी पारी खेलकर हिन्दी फ़िल्मों में उल्लेखनीय योगदान करते रहेंगे| पर एक दिन अचानक वे भी जगत को अलविदा कह गए|

हिन्दी फिल्मों के दर्शकों के लिए उनका हँसता हुआ खूबसूरत चेहरा भुलाना असंभव होगा|

 

…[राकेश]