लूला, लंगड़ा, टुंडा, गूंगा, बहरा, काना, अंधा

  कहकर गाली देते हैं,

अपमानित करने के लिए,

अपने ही जैसे पूर्ण देह वाले इंसानों को लोग|

पहले जिन्हें

अपंग, विकलांग आदि कहती थीं,

सरकारी परिभाषाएँ,

अब “अपूर्ण अंगों”

में किसी प्रकार की “दिव्यता” का दर्शन करते हुए

उन्हें ‘दिव्यांग’ कहने लगी हैं!

शरीर नश्वर है,

और

आत्मा –

अजर है

अमर है,

निराकार है,

शुद्धतम है,

निस्पृह है,

अस्पर्शनीय है ,

अदृश्य है,

आदि हुंकारने वाले,

चेतना और प्रबोधन को फलीभूत कर दिखाने वाले,

और अष्टावक्र सरीखे मनीषियों को जन्म देने वाले,

प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक के जन्मदाता

देश से पूछा तो जा ही सकता है

वास्तव में ये हैं कौन?

 

…[राकेश]

गुलज़ार की “कोशिश” उन सभी को शिक्षित करती है, जागरूक और संवेदनशील बनाती है, जिन्हें प्रकृति बिना किसी शारीरिक कमी या भिन्नता के साथ जन्म देती है| ऐसा कहा जरूर जाता है कि जब अपने अस्तित्व से शिकायत हो, अपने जीवन के कारण प्रकृति से, ईश्वर से शिकायत हो तो अपने से कमजोर को देखो और प्रकृति का, ईश्वर का अहसान मानो कि उसने ऐसा बेहतर जीवन दिया लेकिन असल में ऐसा करने वाले बहुत कम होते हैं| “कोशिश” बिना उपदेशक हुये यह बात दर्शक के दिल में गहराई से उतार देती है| बिना उपदेशक हुये यह अपने संदेश दर्शक के जेहन में पहुंचा देती है| फिल्म दर्शक को मानव जीवन की बहुत सी ऐसी बातों के प्रति संवेदनशील बना देती है जिन पर उसने पहले ध्यान नहीं दिया होता है|

सभी तरह के देशों में और वहाँ के समाजों में साधारणतया तो लोग अपने से भिन्न या कमजोर वर्ग के लोगों का उपहास ही उड़ाते हैं| उपहास उड़ाने का कारण निशाने पर लिए व्यक्ति की शारीरिक भिन्नता या कमी है तब यह उपहास बेहद भौंडा बन जाता है लेकिन उपहास उड़ाने वालों को यह एहसास नहीं हो पाता कि वे दूसरे का मज़ाक बनाने में मानव के साधारण स्तर से भी कितना ज्यादा नीचे गिर गए हैं| “कोशिश” ऐसे कई दृश्य दिखाती है जो न केवल उपहास उड़ाने वालों बल्कि ऐसे मामलों में उदासीन रहने वालों दोनों को चेताती है कि ऐसा उपहास उड़ाना कितनी घटिया मनोवृत्ति का परिणाम है और कितना घिनौना एवं घृणित कृत्य है|

कोशिश” किसी भी किस्म की शारीरिक भिन्नता या कमी से जूझ रहे लोगों के ऊपर डॉक्यूमेंटरी नहीं है| यह एक उच्च स्तरीय दर्शनीय फिल्म है जो मर्मस्पर्शी दृश्यों, जिसमें संवाद बहुत कम हैं, क्योंकि फिल्म के नायक नायिका मूक एवं बधिर हैं, के बलबूते दर्शक को भावनात्मक स्तर पर छूती है और फिर अंदर बसेरा करे ही रखती है|

जो बोल नहीं सकते, सुन नहीं सकते ऐसे नायक-नायिका के मध्य पहली भेंट से लेकर उनके मन में एक दूसरे के लिए प्रेम के अंकुरण, प्रेम के पौधे के पनपने और फिर उसके वृक्ष बन जाने की यात्रा को फ़िल्म इस खूबसूरती से दर्शाती है कि एकबारगी तो मन में प्रश्न उठने ही लगता है कि क्या प्रेम कहानियों के फ़िल्मी रूपान्तरण में संवाद की आवश्यकता होती भी है?

“शब्द तो शोर हैं तमाशा हैं मौन ही प्रेम की भाषा है|”

नायक हरी चरण (संजीव कुमार) जब नायिका आरती (जया भादुड़ी) के घर पर उसे ‘मूक एवं बधिर स्कूल’ में प्रवेश लेने के लिए फॉर्म आदि लाकर देता है और वह कागज को पढ़ने में व्यस्त है तब नायक द्वारा उसे लगातार देखे जाने से उसकी आँखों से टपकते प्रेम के अंकुरण को स्पष्ट देखा जा सकता है| तभी विश्वास होने लगता है कि निम्न पंक्तियाँ लिखने वाले ने प्रेम में कितने गहरे अनुभव की बात कही है|

जहाँ प्रेम हो वहाँ नीरवता कितनी सहज व सुखकर प्रतीत होती है। किसी से चुपचाप प्रेम किए जाने की बात हो तो शून्यता के इस भाव का कहीं कोई मुकाबला नहीं| फिर किसी को निहारते रहने के आनन्द के मध्य कुछ कहने सुनने की इच्छा भी कहाँ होती है”

समाज के बहुसंख्यक और यहाँ तक कि नायिका का अपना भाई जिस क्रूरता से उसके एवं नायिका के साथ व्यवहार करता है वह ऐसी भावनाएं जगाता है मानों निरीह जीवों पर अत्याचार करने में समाज कुछ सोचता विचारता नहीं है| इस वास्तविकता का बोध कराने के लिए फ़िल्म में बहुत से दृश्य हैं|

नायक द्वारा नायिका को सार्वजनिक स्थान पर प्रेम निवेदन किए जाने और नायिका द्वारा उसे इस नाते अस्वीकार किए जाने कि वे दोनों मूक एवं बधिर हैं और उनकी संतान भी ऐसी ही होगी और बाद की कुछ घटनाओं में नायक संग दुनिया के हिंसक अत्याचार से नायिका द्वारा स्वयं खड़ी की गई संयम की दीवार को ढहा कर नायक संग प्रेम में होने की स्वीकृति देना और वैवाहिक गठबंधन को सहमति देने के दृश्य अपने आप में एक महान लघु फ़िल्म निर्मित कर देते हैं, जिससे रूबरू होना दर्शक के सामने  कलेजा मुंह को आने वाली स्थिति आ जाती है|

इसी तरह पहले बच्चे के बोलने सुनने की क्षमता पर संदेह होने पर नायक नायिका के स्तब्ध रह जाने पर नायक का दौड़ कर डॉक्टर को बुला लाना, नायिका के भाई के आपराधिक कृत्य से उस बच्चे की मृत्यु हो जाने के दृश्य दर्शक को बेहद असहज बना डालते हैं|

शोले” में ठाकुर के परिवार में बच्चे की हत्या और उसके बाद जमीन पर पड़े सारे परिवार के मृत शरीरों को सीधे सीधे न दिखाकर जो प्रभाव उत्पन्न किया उससे तीन साल पहले गुलज़ार एक मास्टर निर्देशक की भांति बच्चे की मृत्यु के दृश्य को परदे पर इस कुशलता से दर्शाते हैं कि दर्शक अपने सारे बदन में कंपन महसूस करते हुये उसे देखता है और तब भी नकारना चाहता है|

इतनी संवेदनशील फ़िल्म एक थ्रिलर की तेजी से चयनित विषय को दिखाती है| कमरे में दीवार पर नायिका की फूलों की माला चढ़ी तस्वीर नायक के जीवन में हुये सबसे बड़े बदलाव की सूचना दे देती है क्योंकि अब फ़िल्म को या इसकी कथा को अपने चरित्रों के अब तक के गढ़े दर्शन को कसौटी पर कसना है|

नायक का बेटा अब बड़ा हो चुका है| नायक की कंपनी का मालिक बरसों से एक आस लगाए बैठा है और जब वह इसका खुलासा करता है तो नायक और उसके बेटे के जीवन में संघर्ष उत्पन्न हो जाता है|

अगर पिता की कंपनी के मालिक, जिसके उन पर बहुत अहसान हैं, की इच्छा के विरुद्ध नायक का बेटा अपने पहले विचार के साथ जाता है तो वह उन्हीं लोगों जैसा हो जाता है जो उसके माता-पिता के मूक एवं बधिर होने के कारण उनसे दूरी बनाकर रखते रहे, समय-समय पर उन्हें झिड़कते रहे, उन्हें दुत्कारते रहे, उनके सीमित क्षमताओं के जीवन को और जटिल बनाते रहे|

और अगर वह अपने पिता की इच्छा का सम्मान करता है तो वह उस यज्ञ में आहुती देने में अपने पिता का साथ देता है जो उसके पिता ने तब शुरू किया था जब पहले पहल उसकी माँ संग प्रेम में वे आए थे|

बेटे का पहला विचार कोशिश का अंत है…

बेटे द्वारा पिता की इच्छा संग जाना कोशिश की शुरुआत है…

 

यूं तो संजीव कुमार ने हमेशा ही गुलज़ार संग सिनेमा के परदे पर अविस्मरणीय काम ही किया है पर उन दोनों के साथ की सब फिल्मों में कोशिश ही ऐसी भी है जो संजीव कुमार के कम उम्र में ही चले जाने की कसक को दर्द बना डालती है| संजीव कुमार की अभिनय क्षमता के प्रशंसकों के लिए “कोशिश” उनसे बिछुड्ने की भावना को बेहद गहरी और तीव्र कर देती है और कुछ समय के लिए एक तड़प में बादल देती है|

जया भादुड़ी (अब बच्चन) ने “कोशिश” से बेहतर अभिनय शायद ही किया होगा|

कोशिश यह भी स्पष्ट रूप से जता देती है कि जया भादुड़ी की गहराई वाली फ़िल्मी जोड़ी संजीव कुमार संग ही थी| फिर चाहे वह लता मंगेशकर का गाया अविस्मरणीय रूमानी गीत – बाहों में चले आओ, का फिल्मांकन हो या कोशिश का हर फ्रेम में दिल को छू जाने वाला अभिनय, दोनों की जोड़ी पर्दे पर, जया की किसी भी अन्य अभिनेता (पति अमिताभ बच्चन समेत) के संग जोड़ी पर हमेशा भारी ही पड़ती दिखती है| जया भले ही इस बात को स्वीकार न करें|

सत्तर के दशक की अपनी कुछ अन्य  फिल्मों की तरह गुलज़ार असरानी को कॉमेडी की चार दीवारी से घिरी छवि को तोड़कर अभिनय करने का बहुत शानदार अवसर देते हैं और असरानी उस पर खरे भी उतरते हैं| जो काम हृषि दा भी नहीं कर पाये वह गुलज़ार ने असरानी के साथ कई बार करके दिखाया|

दीना पाठक ने मूक बधिर बेटी और लफंगे बेटे की माँ की भूमिका बहुत गहराई से निभाई| बेटी को लेकर माँ के भय, मूक बधिर स्कूल से सीख कर आकर घर में अक्षर “म” की ध्वनि में माँ को सुनने के बाद के माँ के भावों को प्रदर्शित करने में उन्होंने कमाल किया है|

ओम शिव पुरी आँखों की रौशनी खो चुके व्यक्ति की छोटी सी भूमिका में प्रभावी रहते हैं|

फ़िल्म में सबसे ज्यादा निराश करता है मदन मोहन का संगीत| दोनों ही गीत नीरस से लगते हैं और न तो गुलज़ार की ख्याति अनुरूप बैठते हैं न ही मदन मोहन की| यह तो स्वीकार करने में भी अजीब सा लगता है कि गुलज़ारमदन मोहन की जुगलबंदी से इतना साधारण संगीत रचा जा सकता है|

बाकी संवेदना के स्तर पर “कोशिश” हिन्दी सिनेमा की पहली ही ऐसी उच्च स्तरीय फ़िल्म है जो विषय के साथ भरपूर न्याय करती है| यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि “कोशिश” ने “स्पर्श” जैसी बेमिसाल फ़िल्म के लिए संवेदना की नींव का निर्माण किया|

कोशिश” यह भी स्थापित करती है कि एक निर्देशक के रूप में गुलज़ार ने जो काम हाथ में लिया फिर उसकी पूरे गहराई में जाकर ही जगत को प्रभावित करने वाली उच्च स्तरीय कला सृजित की| कभी भी फ़ौरी तौर पर विषय को नहीं निबटाया| उनकी फ़िल्मों के प्रदर्शन के वक्त घोर व्यावसायिक फिल्मों की चमक दमक में भले ही उनकी फ़िल्मों को वैसा ध्यान न मिला हो जिसकी की वे अधिकारी थीं, पर निर्देशक के रूप में उन्होंने जो रचा वह हिन्दी सिनेमा में मील के पत्थर स्थापित करता चला गया|

…[राकेश]