निर्देशक Quentin Tarantino की फ़िल्म Kill Bill के दोनों भाग, एक के तुरंत बाद दूसरा, देखने के लिए दर्शक के पास अगर लगभग 4 घंटे और 10 मिनट न हों, तो इसे तभी देखने का प्रयास करना चाहिए जब इतना समय अवश्य ही हो, और जब यह निश्चिंतता निश्चित रूप से साथ हो कि इतने समय में उसके फ़िल्म देखने में कोई बाधा नहीं डालेगा|

मार्शल आर्ट के हैरतअंगेज़ कारनामों से भरी हिंसा, जिसे देखकर बेहद हिंसक मानी जाने वाली हिन्दी फ़िल्म एनीमल भी शर्माने लगे, का जो सिनेमाई रूप परदे पर आता है वह दर्शक में हिंसक भाव नहीं जगाता| नरमुंडों की माला पहने राक्षसों का संहार करती देवी काली का उन्मत रूप इसमें अभिनेत्री Uma Thurman ने अपनाया है| उनका योगदान अभिनय के अलावा इस फ़िल्म के लेखन में भी है|

है तो यह एक नारी द्वारा प्रतिशोध की कहानी लेकिन इसमें निर्देशक ने हिंसा का जो विकट रूप जिस तरीके से दिखाया है, वह दर्शक के ऊपर हिंसक हमले नहीं करता, और दर्शक अपने ही जैसे लड़ाकू अपने पुराने साथियों को एक एक करके मारती जा रही स्त्री की हिंसक यात्रा के दर्शन दूर से करता है, उसके साथ साथ नहीं लड़ता| शारीरिक लड़ाई के दृश्य इतने परफेक्ट किस्म के हैं कि दर्शक हिंसा के सिनेमाई रूपांतरण के आकर्षण में भौचक्का होकर देखता रह जाता है|

जापान में चारों और फ़ैली बर्फ की मोटी चादर के ऊपर आकाश से गिरती रुई के फाहों जैसी बर्फ और इस श्वेताम्बरी वातावरण में तलवार से एक दूसरे की जान लेने को उतारू दो लड़ाकू स्त्रियाँ और श्वेत बर्फीली चादर पर टपकती उनके लहू की लाल बूंदे मानों हिंसा के ऊपर कविता गढ़ रही हों|

दर्शक की उत्सुकता यहाँ हिंसा के प्रदर्शन से ज्यादा फ़िल्म के शीर्षक में छिपे रहस्य की खोज में है|

किल बिल?

बिल को कैसे मारेगी यह स्त्री?

कब मारेगी?

बिल तक पहुँचने से पहले उसे अपने ही पूर्व गिरोह के बेहद खतरनाक कई लड़ाकू कातिलों से निबटना है|

और बिल से उसकी दुश्मनी ही क्यों हुयी?

हिंसक यात्रा में फ्लैश बैक में स्त्री की यात्रा भी सामने आती है कि आज जो वह कर रही है इसके पीछे कारण क्या रहे हैं|

बिल महोदय भी पीछे की स्टोरी में सामने आते हैं|

रंगीन फ़िल्म में श्वेत श्याम फोर्मेट में एक चर्च में एक 8-9 महीने की गर्भवती स्त्री विवाह की रीति निभाने जा ही रही है कि बांसुरी की आवाज उसे रोक देती है|

वह बाहर आती है, जिसका उसे भय था वही बात हो गयी है|

और उसकी दुनिया बदल जाती है, कई साल कोमा में बिताने के बाद उसकी प्रतिशोध की यात्रा शुरू होती है|

इस यात्रा में एक पुरुष को छोड़ उसका युद्ध अपने ही जैसी कई लड़ाकू स्त्रियों से ही होता है|

एक दूसरे को मार डालने को तत्पर घायल स्त्री लड़ाकू एक की 4-5 साल की बेटी के स्कूल से घर आ जाने के कारण अपनी लड़ाई रोक देती हैं| बेटी के आ जाने के कारण उसकी माँ की आँखों में याचना के भाव निर्देशक ने जैसे दिखाये हैं, और उस संकेत को स्वीकार करके प्रतिशोध के लिये उतारू स्त्री जिस तरह से तुरंत तैयार हो जाती है, उससे निर्देशक के सिनेमा के उच्च स्तर का पता लगता है, अगर उसका जीवन सामान्य रहने दिया जाता तो आज उसकी संतान भी इसी उम्र की होती|

जब फ़िल्म के दोनों भाग एक के बाद एक तुरंत देखे जाते हैं तब दूसरा भाग देखते हुए भी दर्शक को पहले भाग की स्मृति के प्रति आकर्षण के पनपने का एहसास लगातार होता रहता है क्योंकि अब उसके सामने कई ऐसे भागों के रहस्य खुलते जा रहे हैं जो पहले भाग में अजनबी लगे थे|

सारी कातिलाना बाधाओं को पार करके जब स्त्री और बिल का आमना सामना होता है, तो उसके बाद का फ़िल्मी समय न केवल इस फ़िल्म का बल्कि सिनेमा का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाता है|

इतनी हिंसा की परिणति में जब मुख्य स्त्री-पुरुष सारी कहानी का सार एक दूसरे से कहने सुनने और दर्शक को दिखाने एवं समझाने बैठते हैं तो दर्शक को पता चलता है ऐसा सिनेमा उसने पहले नहीं देखा|

पुरुष को लगता था कि वह इस स्त्री के बारे में सब कुछ जानता है, उसके जीवन पर उसका पूर्ण नियन्त्रण है और जो हुआ उसके इसी भाव के कारण हुआ|

उसे नहीं पता था कि उसकी कठपुतली स्त्री उससे दो बहुत बड़े राज छिपा गयी थी|

एक के जाहिर होने की तड़पन से सारा बखेड़ा फैला और दूसरा राज पुरुष को तब पता चला जब रहस्य और इसके जान लेने के बीच कोई अंतर ही नहीं बचता|

आश्चर्यचकित होने के बावजूद उसकी स्वीकृति सिनेमा को बहुत उंचाई पर ले जाती है|

स्त्री के संसार से युद्ध चला जाता है तो उसके अन्दर से उभर कर माँ बाहर आ जाती है!

दर्शक भी इसके बाद ही एक गहरी सांस ले पाता है|

…[राकेश]


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