परदे पर जिसे किशोरावस्था से युवा होने के काल के बीच का नायक कहा जा सके वे ऋषि कपूर पहले ही थे हिंदी सिनेमा में| उनसे पहले के जितने भी अभिनेताओं ने नायक के रूप में अपनी पारी शुरू की वे सब भरपूर वयस्क या परिपक्व युवा ही दिखाई देते थे परदे पर|
बॉबी में जब ऋषि कपूर परदे पर दिखाई दिए तो वे एक ऐसे विश्वसनीय अभिनेता लग रहे थे जो किशोरावस्था छोड़कर वयस्क होने के कगार पर बस पहुंचा ही है| और अगले पांच साल उन्होंने अपनी सिनेमाई उपस्थिति में भरपूर ताजगी बरकरार रखी|
ऋषि कपूर के युवापन में एक यह भी लचीलापन था कि वे भारत में जड़े जमा चुके किसी भी सम्प्रदाय के युवक आसानी से और पूरी विश्वसनीयता के साथ प्रतिनिधित्व परदे पर कर देते थे|
वे बहुत सालों तक लवर बॉय की भूमिकाएं करते रहे लेकिन शुरू के दस सालों में उनकी किसी भूमिका में उन्हें देखकर नहीं लगता कि वे अति कर रहे थे और रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों ही कर रहे थे| उनका हिंदी सिनेमा में सफल होना और लगातार जमे रहना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना, अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, जीतेंद्र और शशि कपूर जैसे लम्बे कद के सफल बड़े सितारों के काल में भी वे अपने छोटे कद के साथ सफलता प्राप्त करते ही रहे और अक्सर ही उन्होंने उपरोक्त सितारों के साथ काम कर रही अभिनेत्रियों के साथ भी नायक की भूमिकाएं निभाईं और जब जब उन्होंने इन बड़े सितारों के साथ बहु सितारा फिल्मों में काम किया तो इनके सामने भी वे समान रूप से चमके उन फिल्मों में| कभी कभी में अमिताभ और शशि कपूर के रहते हुए भी जब जब ऋषि कपूर परदे पर आते हैं फ़िल्म में एक अलग ही युवा ऊर्जा छा जाती है| अमर अकबर एंथोनी में दर्शकों को अमर और एंथोनी के साथ अकबर का भी इंतज़ार रहता है कि वह परदे पर आये और मनोरंजन करे|
ऋषि कपूर के लम्बे अभिनय जीवन से दस प्रतिनिधि फ़िल्में चुनना हो तो सफलता के पैमाने से अलग ऐसी फ़िल्में चुनना उनकी अभिनय कला के प्रति न्यायोचित ठहरेगा जो उनकी अभिनय कला के पक्ष को ज्यादा मुखरता से सामने लाती हों|
- मेरा नाम जोकर (1970)
तीन अध्यायों में बंटी फ़िल्म का पहला अध्याय नायक राजू के बचपन पर टिका है और दुनिया भर में इस एक अध्याय को अद्भुत और वाजिब सराहना मिलती रही है और फ़िल्म की इस उपलब्धि में ऋषि कपूर के द्वारा किया गया सटीक अभिनय भी एक महत्वपूर्ण तत्व है| इस फ़िल्म के अभिनय प्रदर्शन को उनके अभिनय जीवन का सिरमौर अभिनय प्रदर्शन माना जा सकता है|
2. बॉबी (1973)
इस फ़िल्म के नायक के रूप में ऋषि कपूर से पहले हिंदी सिनेमा के दर्शकों ने उनके जैसी आकर्षक युवा नायक की उपस्थिति नहीं देखी थी| केवल गीतों की प्रस्तुती में ही नहीं बल्कि भावनाओं के प्रदर्शन में भी उन्होंने बेहद प्रभावशाली प्रदर्शन इस फ़िल्म में किया| नायक के चरित्र के जितने पहलू थे एक के प्रदर्शन में भी ऋषि कपूर पल भर के लिए भी कमजोर या अक्षम अभिनेता नहीं दिखाई दिए| फ़िल्म हालांकि नायिका प्रधान थी और शीर्षक ही फ़िल्म की नायिका पर था पर ऋषि कपूर ऐसे चमके कि उस साल प्रदर्शित होने वाली ज़ंजीर से चमकने वाले कहीं बड़े और वयस्क अमिताभ बच्चन के साथ चारों ओर छा गए|
3. ज़हरीला_इंसान (1974)
कन्नड़ फ़िल्म के हिंदी रीमेक में क्रूद्ध और कुंठित नायक की भूमिका निभाना बॉबी जैसी लव स्टोरी से चर्चित हुए अभिनेता के लिए आसान नहीं रहा होगा लेकिन उन्होंने हिम्मत दिखाकर इस फ़िल्म को किया| फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही लेकिन ऋषि कपूर का अभिनय इसमें खरे सोने जैसा सच्चा और प्रभावशाली है| अपनी प्रतिक्रियाओं के कारण समाज में गलत बनती जा रही छवि से जूझते नायक की भूमिका में ऋषि कपूर को देखने के लिए इस फ़िल्म को अवश्य ही देखा जाना चाहिए और इस नाते भी कि अपने अभिनय जीवन के बिलकुल शुरू में ही उन्होंने ऐसा प्रयास किया था कि हर बार कुछ नया करें, लेकिन बॉक्स ऑफिस ने फिर उन्हें बरसों यह मौका दिया नहीं|
4. दूसरा आदमी (1977)
रमेश तलवार निर्देशित इस जटिल से कथानक पर आधारित फ़िल्म में ऋषि कपूर को बीच बीच में शशि कपूर से मेल खाता अभिनय भी करना था क्योंकि फ़िल्म में उस पर मोहित बड़ी उम्र की महिला (राखी) को उसमें अपना दिवंगत पति दिखाई देता है| अपने एहामुम्र प्रेमिका (नीतू सिंह) संग अपने स्वंय के प्रेम और बड़ी उम्र की महिला के उसके प्रति ओबसेशन के बीच फंसे युवक की भूमिका में ऋषि कपूर अच्छा अभिनय कर गए|
5. प्रेम रोग (1983)
यह पुनः नायिका प्रधान फ़िल्म थी और उन्होंने एक गाँव के गरीब पुजारी के माता-पिता के साए से वंचित भांजे , जिसे गाँव के जमींदार की पौत्री (पद्मिनी कोल्हापुरे) से प्रेम हो जाता है, की भूमिका निभाई| उनके प्रेम में तीन बड़ी बाधाएं हैं, नायिका बहुत अमीर और बड़े घराने की बेटी है, उनकी जाती अलग है, और तीसरे परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं कि नायिका विधवा हो जाती है और अपने घर जब वह विधवा रूप में वापिस आती है तो वह अपने जेठ द्वारा किये गए शोषण के कारण रेप विक्टिम भी है| ऋषि कपूर का काम बहुत कठिन है क्योंकि उसे नायिका से शब्दों में प्रेम का प्रदर्शन करने के बदले मूक रहकर उसे अपने र्प्रेम से संभालना है और उसे पुनः जीवन में वापिस लाना है| एक भी कदम वह गलत नहीं उठा सकता| मूक प्रेमी, जो अंत में ही समय आने पर दुनिया से भिड जाता है अपने प्रेम की खातिर, की भूमिका में ऋषि कपूर को देखना अच्छे अभिनय को देखने के इच्छुक किसी भी दर्शक के लिए एक ट्रीट है|
6. दिल्ली6 (2009)
राकेश मेहरा की इस फ़िल्म में वहीदा रहमान, ओम पुरी, पवन मल्होत्रा, प्रेम चोपड़ा, दिव्या दत्ता के शानदार अभिनय और ए आर रहमान के बेहतरीन संगीत के साथ साथ ऋषि कपूर का चरित्र और उसमें उनके असरदार अभिनय की चमक निराली है| चांदनी चौक के पुराने रईस खानदान के बाशिंदे, जो फ़िल्म के युवा नायक की माँ के प्रेमी हुआ करते थे पढ़ाई लिखाई के दिनों में, की भूमिका में जब तक ऋषि कपूर परदे पर रहे फ़िल्म एक अलग ही संसार में पहुँच गई| इस तरह से फ़िल्म के उन भागों को अपने वश में कर लेने वाला अभिनेता फ़िल्म में कितना रच बस कर अभिनय करता है, इसका पाता इस फ़िल्म से लगता है|
7. चिंटू जी (2009)
फ़िल्मी व्याकरण के हिसाब से यह एक अनूठी फ़िल्म इस मायने में है कि इसमें ऋषि कपूर को ऋषि कपूर एक फ़िल्मी सितारे की भूमिका निभानी थी और अपने जैसे एक चर्चित सितारे की सनक, स्टारडम खोते जाने के उसके भय, उसकी कुंठाएं, अन्य सितारों से उसकी स्पर्धा, और अपने परिवार वालों के लिए एक सितारे की महत्ता और उनकी मह्त्वाकांक्षाओं की पूर्ती के लिए उसके सितारे बने रहने की उनकी जरुरत, सभी को ऋषि कपूर ने बड़ी बारीकी और गहराई से प्रस्तुत किया| और जब फ़िल्म में वे मेरा नाम जोकर में अभिनय कर चुकी रूसी अभिनेत्री से उसके वृद्धावस्था में मिलते हैं तो उस दृश्य को करने से वे अभिनय का इतिहास रच देते हैं क्योंकि यह क्षण फ़िल्मी और वास्तविक जीवन का संगम था और उन दोनों अभिनेताओं ने इस सिनेमाई क्षण को अमर कर दिया|
फ़िल्म में जो एक फ़िल्म बन रही है उसमें एक जिब्रिश गीत है जिसके बोलों में दुनिया के नई फ़िल्म निर्देशकों के नाम डांसर ले रहे हैं और उस फ़िल्म के उस दृश्य में नायक एक विदेशी है, ऋषि कपूर उसमें कबीले के सरदार बने हैं, गीत में जब विदेशी निर्देशकों के नाम पर नाम आते चले जाते हैं तब ऋषि कपूर का चरित्र अपनी कुर्सी से उछलकर चिल्लाता है “सत्यजीत रे“| इस गीत में उनका पूर्ण ऊर्जा से सम्मिलित होना देखने लायक दृश्य है|
8. अग्निपथ (2012)
इस फ़िल्म में ऋषि कपूर पहली बार एक खौफनाक हिंसक चरित्र को निभाते हैं और वे कहीं से ऐसा कोई संदेह नहीं उठने देते कि यह अभिनेता अभी कुछ ही साल पहले रोमांटिक और रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों का नायक हुआ करता था| मरखने भैंसे की तरह से सिर से टक्कर मार कर एक्शन दृश्य देने से ही नहीं बल्कि शक्ति, हिंसा और गुरुर और बुराई ऋषि कपूर की आँखों से टपकती रहती है फ़िल्म में| फ़िल्म में संजय दत्त जैसे हिंसा की अभिव्यक्ति के सिद्धहस्त अभिनेता हैं लेकिन ऋषि कपूर का रऊफ लाला का चरित्र अंगद की तरह पाँव जमा कर खड़ा हो जाता है दर्शक द्वारा फ़िल्म की संचित यादों में|
9. D_Day (2013)
विदेशी ट्रिप पर एक बार भारत से भागे हुए दाऊद इब्राहिम ने एक बार ऋषि कपूर से भेंट की थी, यह 1993 के मुंबई धमाकों से पहले की घटना है| तब तक दाउद इब्राहिम का नाम भारत में इस तरह से तिरस्कृत नहीं था और वह एक कुख्यात माफिया तस्कर और डॉन के रूप में ही जाना जाता था| कालांतर में मुंबई विस्फोटों के बाद उसकी छवि भारत में आतंक फैलाने वाले एक मुस्लिम डॉन की हो गयी| और ऐसे माहौल में निखिल अडवाणी ने अपनी फ़िल्म में दाऊद इब्राहिम की भूमिका निभाने के लिए ऋषि कपूर को अपनी फ़िल्म में ले लिया| यह एक असाधारण निर्णय था और इस फ़िल्म से पहले विजय मौर्या अनुराग कश्यप की ब्लैक फ्राइडे में बड़े विश्वसनीय ढंग से दाऊद इब्राहिम की भूमिका निभा चुके थे लेकिन ऋषि कपूर ने फिर से अपनी अभिनय क्षमता से चौंकाया|
10. मुल्क (2018)
ऋषि कपूर वास्तविक जीवन में बेहद मुखर रहे हैं, और कभी ट्विटर के माध्यम से उन्होंने अपनी प्रतिक्रियाओं से देश में बड़ी बड़ी बहसों को जन्म दिया है| उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में कभी कोताही नहीं बरती| ऐसे व्यक्ति को मुल्क फ़िल्म में मुराद जैसा चरित्र निभाने को दिया गया जिसे खामोश रहकर अपना प्रतिरोध जताना है| रजत कपूर, कुमुद मिश्र, आशुतोष राणा, नीना गुप्ता और मनोज पाहवा जैसे समान्तर सिनेमा के प्रतिभाशाली अभिनेताओं की भीड़ में ऋषि कपूर व्यावसायिक फिल्मों के बरसों के अनुभव से गए अभिनेता थे लेकिन एक भी दृश्य ऐसा नहीं जहाँ उन्होंने ऐसा मौका दिया हो कि ये समर्थ कलाकार ऋषि कपूर पर भारी पड गए|
ऋषि कपूर की लम्बी अभिनय पारी में लोगों की पसंदीदा फिल्मों की सूची अलग हो सकती है यह सिर्फ एक ऐसा प्रयास था जिससे उनके अभिनय की विविधता का परिचय मिल सके|
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