मानव जाति का इतिहास गवाह है कि अच्छाई और बुराई एक साथ नहीं रह सकते, स्वतंत्रता और साम्राज्यवाद एक साथ नहीं रह सकते, अच्छी और बुराइयों से ग्रस्त सभ्यताओं में टकराव अवश्यंभावी है, इसे न कभी कोई टाल सका है और न ही कभी कोई टाल सकेगा| अच्छाई और बुराई हमेशा ही आपस में टकराये हैं| बुराई कुछ समय के लिए जगत पर छा गयी प्रतीत होती है पर उसे हराने के लिए अच्छाई पनप ही जाती है| साधारण मनुष्य अच्छाइयों और बुराइयों का मिश्रण है और जीवन भर उसके अपने अंदर इन् दो प्रवृत्तियों के टकराव चलते ही रहते हैं| ऐसे महापुरुष भी हर काल में होते आए हैं जिन्होने बहुत कम आयु में ही अपने अंदर अच्छाई को बढ़ावा दिया और जो अपने अंदर की बुराई को पराजित करते रहे|
इन महामानवों में भी सर्वश्रेष्ठ किस्म के मनुष्य हुए जिन्होने अपने अंदर की बुराई पर ही विजय प्राप्त नहीं की वरन जगत भर के मनुष्यों को अच्छाई की राह दिखाने के लिए बाहरी जगत में बेहद शक्तिशाली बुरी शक्तियों से टक्कर ली, नाना प्रकार के कष्ट सहे पर वे मनुष्यों के सामने अच्छाई को स्थापित करके ही माने| इन् सर्वश्रेष्ठ महामानवों में कुछ को ईश्वर का अवतार भी मनुष्य जाति ने माना| इनमें से जिन महामानवों ने ध्येय की प्राप्ति के लिए साधन की पवित्रता पर विशेष जोर दिया उनमें श्री राम का नाम बहुत महत्व रखता है| इसी नाते उन्हें मर्यादा पुरुषोतम राम कह कर भी पुकारा जाता है|
सदियों से हर काल में राम-कथा मनुष्य को आकर्षित करती रही है और भिन्न-भिन्न काल में भिन्न-भिन्न रचनाकारों ने रामकथा को अपने नजरिये से जांचा परखा और प्रस्तुत किया है| राम को ईश्वर मान लो और रामकथा को सार रूप में ग्रहण कर लो तो बात आसान हो जाती है कि राम तो ईश्वर के अवतार थे, सब कुछ स्क्रिप्टेड था और तब राम के जीवन से एक दूरी बन जाती है क्योंकि जन्म के क्षण से ही वे अन्य मनुष्यों से अलग समझ लिए जाते हैं और केवल भक्ति भाव से ही मनुष्य उनके जीवन के बारे में जानते हैं पर इन सबमें राम की वास्तविक संघर्ष यात्रा अनछुई और अनजानी ही रह जाती है|
पर वास्तविकता तो यह नहीं है, मनुष्य रूप में जन्मे राम को जीवनपर्यंत विकट संघर्षों और कष्टों से गुजरना पड़ा| किसी भी काल में सत्ता निर्ममता, क्रूरता और तमाम तरह के हथकंडों के बलबूते चलाई जाती रही है और जहां सत्ता के दावेदार एक से ज्यादा हों वहाँ हमेशा षड्यंत्र होते ही रहते हैं| राम के पिता दशरथ ने अपने जीवन को और अपने राज्य को जटिल समस्याओं में उसी वक्त बांध दिया था जब उन्होंने तीन विवाह किये और तीसरा विवाह अपने से बेहद कम उम्र की कैकेयी के साथ किया| इन् परिस्थितियों में अयोध्या का राजमहल षड्यंत्रों से परे रहा होगा यह मानना नासमझी का सबब ही बन सकता है|
राम कोई एक दिन में नहीं बन जाता, बचपन से उनका जीवन तमाम तरह के संघर्षों से गुजरकर निखरता रहा| अपनी खूबियों को निखारते हुए वे कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके ऐसे बने जिस रूप में कि दुनिया उन्हें जानती है|
किसी भी काल की “रामकथा” को “राम” के जीवन की संघर्ष यात्रा को दिखाते हुए उनकी सर्वकालिक प्रासंगिकता को स्थापित करना आवश्यक है अन्यथा न तो “रामकथा” के साथ न्याय हो पायेगा और न ही मानवता के साथ, जिसे प्रेरित करने के लिए हर काल में “रामकथा” की व्याख्या की जाती रही है| आधुनिक काल में अँधेरे की ओर तेजी से अग्रसर मानवता को राम जैसे एक प्रेरणादायक वैश्विक नेता के मार्गदर्शन की ही जरुरत है जो हर मुसीबत का सामना वीरता, संकल्प और बुद्धिमानी के साथ करे और जो लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधनों की पवित्रता से समझौते न करे और आदर्श के सच्चे और पवित्र रूप को स्थापित करे|
भ्रष्ट और उपभोक्तावादी राक्षसी सभ्यता को दुनिया भर की सिरमौर सभ्यता बनाने का संकल्प रखने वाले राक्षसराज रावण ने राम की पत्नी सीता का हरण किया इसलिए राम ने रावण के साथ युद्ध किया, ऐसी धारणा बहुत से लोग रखते हैं| जबकि मूल रामकथा स्थापित करती है कि अच्छाई की तलाश कर रहे राम का संघर्ष बुराई को जगत में स्थापित करते जा रहे रावण से होना ही था, चाहे वह किसी भी तरीके से होता| वनवास के तेरह सालों में “राम” एक एक कदम बुराई के खिलाफ उठा आगे बढ़ रहे थे| रावण का साम्राज्यवाद पनप ही नहीं सकता था राम के रहते| रावण को राम को अपने रास्ते से हटाना ही था अगर उसे पूरी दुनिया पर अपना राज कायम करना था|
ऋषि विश्वामित्र पृथ्वी पर अच्छाई और, और अच्छी, मानवीय और विकास वाली सभ्यता की स्थापना करने के अपने यज्ञ में कर्म की आहुति डालने के लिए पृथ्वी पर सर्वथा योग्य राम का चयन करते हैं और उनका सपना राम की प्राकृतिक प्रवृति से मिलकर राम के लिए एक ध्येय बन जाता है|
भारतीय सभ्यता में नेतृत्व के आदर्श उदाहरण हैं श्री राम !
…[राकेश]
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