बहुत प्यार पाया बहुत प्यार खोया
बहुत मुस्कराया बहुत बार रोया
मगर ज़िंदगी से शिकायत नहीं की।

जिसे चाहता था वही खो गया
किसी और का वो कहीं हो गया
मगर एक बिरवा मुझे दे गया
आकाश पीड़ा का वह बो गया

सीने में मीठी सौगात लेकर
उसे याद करता रहा उम्र भर
जागते हुए ही हर रात सोया
मगर ज़िंदगी से अदावत नहीं की।

कड़ी धूप में भी थी छाया बहुत
यश और अपयश भी पाया बहुत
असमतल थीं राहें मगर मैं चला
रोते हुए भी है गाया बहुत

अश्कों से अपना चेहरा भिगोया
मगर ज़िंदगी से बगावत नहीं की।

आग रहती छिपी वो दिखती नहीं
क़िस्मत भी खुलकर कुछ लिखती नहीं
आदमी ही लड़ता मुकद्दर से है
मगर रोशनी है कि टिकती नहीं

बोझ जी भर उठाया कंधे पे ढोया
मगर भागने की हिमाकत नहीं की।

बहुत प्यार पाया बहुत प्यार खोया
मगर ज़िंदगी से शिकायत नहीं की।

 

~ © कृष्ण बिहारी 


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