1991 में प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के काल में देश के सामने विदेशी मुद्रा का संकट आ गया था और यह चार माह के लिए प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर और उनकी सरकार के कारण तो आया नहीं था, यह पहले की सरकारों की गलत आर्थिक नीतियों के कारण ही आया होगा और चंद्रशेखर सरकार के सामने इस विकराल संकट से निबटने की समस्या अवश्य आ खड़ी हुयी|
गर्वनर फ़िल्म इस राजनीतिक कोण से बचाव कर निकल जाती है| यह तथ्यों से पहली छेड़छाड़ है|
दूसरी बड़ी छेड़छाड़ है आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर एस. वेंकटरमण को इस समस्या के निदान का इकलौता नायक दिखाने के लालच में इस तथ्य को छिपा लिया गया कि सोना गिरवी रखने की योजना मूल रूप से एस वेंकटरमण की थी ही नहीं| जब भारत के सामने विदेशी मुद्रा का संकट आया तब स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया ने यह प्रस्ताव सरकार और आरबीआई के सामने रखा था कि स्मगलरों से बरामद किये गए सोने के भण्डार को गिरवी रखकर विदेशी मुद्रा का प्रबंध किया जा सकता है| जनवरी 1991 में एसबीआई ने इस योजना के विवरण भारत सरकार और आरबीआई दोनों को भेजे थे| एसबीआई के तत्कालीन चेयरमैन एम्.एन. गाईपोरिया ने इस योजना को बनाया था और 16 जनवरी 1991 को इसे भारत सरकार के वित्त मंत्रालय और आरबीआई दोनों को सौंपा था|
चूंकि विदेशी मुद्रा का प्रबंधन और देश की मौद्रिक नीति पूरी तरह से आरबीआई के अधिकार क्षेत्र में आती है, इसलिए एसबीआई अपनी मर्जी से अंतरराष्ट्रीय बाजार में सीधे सोना गिरवी रखकर डॉलर नहीं जुटा सकता था। तत्कालीन आरबीआई गवर्नर एस.वेंकटरमण ने लगभग दो महीने बाद 13 मार्च 1991 को इस योजना को मंजूरी दी| अगर यह उनका अपना विज़न होता तो वे इस योजना पर दो महीने न बैठे होते| पूरे दो महीने उन्होंने इस योजना की समीक्षा की और इसके कानूनी और वित्ते पहलुओं को जांचा परखा| उनकी अपनी योजना होती तो इसे आगे बढाने में एक हफ्ते से ज्यादा का समय नहीं लगता क्योंकि तब इसके लाभ और इसकी कमियाँ दोनों पहले ही योजना बनाते समय ही जांच लिए जाते|
आरबीआई और इसके गार्नर ने अपनी ओर से एसबीआई को यह हिदायत अवश्य दी कि इस ऑपरेशन को पूरी तरह से गोपनीय रखा जाए जिससे कि विश्व में भारत की साख को ठेस न पहुंचे और देश में विपक्षी दल हंगामा न खड़ा कर दें|
आरबीआई द्वारा योजना को हरी झंडी दिखाने के दो हफ्ते बाद भारत सरकार के वित्त मंत्रालय और प्रधानमंत्री ने इस योजना को स्वीकृति दे दी और पहले सरकार ने कस्टम्स के पास स्मगलरों से जब्त किया गया 20 टन सोना एसबीआई को सौंपा और एसबीआई ने इसे यूनियन बैंक ऑफ़ स्विट्ज़रलैंड के पास हवाईजहाज से भेजकर गिरवी रखा और 200-240 मिलियन डॉलर्स जुटाए| सोने की यह पहली क़िस्त मई 1991 में स्विट्ज़रलैंड गयी|
46.91 टन सोने की दूसरी खेप आरबीआई द्वारा इसके पास संरक्षित सोने के भण्डार से बैंक ऑफ़ इंग्लैण्ड और बैंक ऑफ़ जापान भेजी गयी और यह हुआ जुलाई 1991 में| केंद्र में तब तक नए चुनाव के बाद पीवी नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बन चुके थे और उन्होंने डॉ. मनमोहन सिंह को अपना वित्त मंत्री नियुक्त किया था|
फ़िल्म-गवर्नर , एसबीआई और इस योजना के निर्माता एम.एन गाईपोरिया के योगदान को गायब कर देती है और इस योगदान को फ़िल्म के नायक एस.वेंकटरमण के खाते में जोड़ देती है जिससे उनका नायकत्व बहुत बड़ा दिखाई दे| यह इतिहास से मनचाही छेड़छाड़ का मामला है और योजना के निर्माता के योगदान को गायब करने का अपराध भी|
इस छेड़छाड़ को नज़रअंदाज़ कर दें तो फ़िल्म एक थ्रिलर की तरह रोमांच उत्पन्न करती है| मनोज बाजपेयी का अभिनय उस गहरे स्तर का है कि दर्शक को वे यह भूलने पर विवश कर देते हैं कि वह एक बिहार की पृष्ठभूमि से आने वाले हिन्दीभाषी अभिनेता को देख रहे हैं| परदे पर वे एक दक्षिण भारतीय अधिकारी को पूरी विश्ववसनीयता से प्रदर्शित कर देते हैं| ऐसे अधिकारी की तीव्र बुद्धि, उसका नेतृत्व और उसके मानवीय गुणों को मनोज बाजपेयी ने जबरदस्त गहराई से प्रदर्शित किया है| पिछले कुछ सालों की उनकी फिल्मों में यह उनका सबसे बेहतरीन अभिनय प्रदर्शन है|
अदा शर्मा एक पत्रकार की भूमिका में सिद्ध करती हैं कि उन पर विविध भूमिकाओं की जिम्मेदारी बड़ी आसानी से डाली जा सकती है| वे इस दौर की एक सशक्त अभिनेत्री बन कर उभरी हैं| इस फ़िल्म में एक खोजी पत्रकार होने के नाते देश के सामने संकट के समय उनके चरित्र की सक्रियता से उनका किरदार नेगेटिव लगने लगता है और दर्शकों को यह एहसास होने लगता है कि देशहित के सामने खोजी पत्रकारिता एक बाधा भी हो सकती है| लेकिन जिस त्वरित गति से पत्रकार अपनी स्पीड पर ब्रेक लगाती है और अपनी रिपोर्ट को प्रोजेक्ट के सफल होने के बाद छपने का निर्णय लेती है उस जिम्मेदारी को अदा शर्मा ने बेहतरीन तरीके से निभाकर पत्रकारिता में आदर्श को परदे पर जीवित रखा वर्ना उनकी करनी एक पत्रकार के अहं भरी जिद ही लगती| अपने चरित्र के बदलावों को अदा शर्मा ने असरदार तरीके से प्रस्तुत किया है|
चंद्रशेखर, यशवंत सिन्हा और मनमोहन सिंह को निभाने वाले अभिनेता उन तीनों जैसे बिलकुल नहीं लगते| शायद निर्देशक ने कोशिश ही नहीं की कि भारतीय इतिहास के ऐसे नाजुक मोड़ पर देश की कमान संभालने वाले नेताओं की भूमिका में वास्तविकता लाई जाए|
अभिनय का सारा दारोमदार निर्देशक ने मनोज बाजपेयी और अदा शर्मा और चंद और भूमिकाओं को निभाने वाले अभिनेताओं पर छोड़ दिया और बड़ी महत्वपूर्ण भूमिकाओं के मामले में खानापूर्ति की|
आधुनिक भारत के इतिहास के एक रोमांचक घटनाक्रम पर आधारित यह फ़िल्म और विश्वसनीय हो सकती थी अगर तथ्यों से छेड़छाड़ न की गयी होती और उस समय सक्रीय देश के नेताओं की भूमिकाओं में विश्वसनीय अभिनेताओं को लिया जाता|
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