हर वक्त वक्त को मत कोसो यह एक समान नहीं रहता तुम देखो उसके हाथों में कब तीर कमान नही रहता फिर राह बनाओ अपनी तुम स्वप्निल अरमान नहीं रहता । इससे अच्छा जग में बोलो कोई मरहम कब मिला... Continue Reading →
हिंदुस्तान में दो प्रयोग चलते थे पिछले पचास सालों में, शायद आपको खयाल में भी नहीं होगा कि हिंदुस्तान में दो विपरीत ढंग के प्रयोग पचास सालों में चले। एक प्रयोग गांधी ने किया, एक प्रयोग श्री अरविंद करते थे।... Continue Reading →
श्रीअरविंद से किसी ने एक बार पूछा," आप भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में अग्रणी सेनानी थे; लड़ रहे थे। फिर अचानक आप पलायनवादी कैसे हो गये कि सब छोड़कर आप पांडिचेरी में बैठ गए आँख बंद करके? वर्ष में... Continue Reading →
अभिनेता मंच पर या कैमरे के सामने अपने को उघाड़ते तो हैं लेकिन वहां उनके ऊपर चरित्र का काया चढ़ी रहती है और वे भले अपने ही अन्दर के सच को या सच्चे अनुभव के आधार पर जन्मते भाव को... Continue Reading →
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