हिंदी की पत्रिका वनमाली के सितम्बर 2026 के अंक में वरिष्ठ लेखक श्री कृष्ण बिहारी जी की कहानी - यह भी कोई ज़िन्दगी है, प्रकाशित हुयी है| मनोविकार या मनोरोगों पर आधारित हिन्दुस्तानी साहित्य मंटो, राजकमल चौधरी और स्वदेश... Continue Reading →
अपनी पीड़ा ही पीड़ा है यह सोच कभी भी ठीक नहीं इस दुनिया में है कौन बचा पीड़ा जिसके नजदीक नहीं सुख याद नहीं रहता सच है युग भी उसमें पल बन जाता पर दुख की फितरत ही ऐसी आता... Continue Reading →
अपनी राहों पर लौट गए मुझसे प्रेमिल मिलने वाले वो रुकते भी तो क्या रुकते मौसम में थे खिलने वाले । वो मिले अचानक साथ चले मौसम था फूले और फले फिर मौसम जैसे बीत गया मिट गए कि जैसे... Continue Reading →
क्षार क्षार होना पड़ता है ज़ार ज़ार रोना पड़ता है कंचन काया का रूप हमेशा दरपन से बाहर था अंटता नहीं किसी आंख में जलवा इतना नाहर था राख हुई उस काया को भी अंजुरी में ढोना पड़ता है पल... Continue Reading →
कोई साथ नहीं जाता है ! साथ जियेंगे साथ मरेंगे झूठा एक दिलासा है नश्वरता के शिलालेख की शाश्वत अनगढ़ भाषा है वापस लौट कौन आता है ! पलक झपकते भूली दुनिया रीति यही तो उसकी है पल भर रुककर... Continue Reading →
हर वक्त वक्त को मत कोसो यह एक समान नहीं रहता तुम देखो उसके हाथों में कब तीर कमान नही रहता फिर राह बनाओ अपनी तुम स्वप्निल अरमान नहीं रहता । इससे अच्छा जग में बोलो कोई मरहम कब मिला... Continue Reading →
हिंदुस्तान में दो प्रयोग चलते थे पिछले पचास सालों में, शायद आपको खयाल में भी नहीं होगा कि हिंदुस्तान में दो विपरीत ढंग के प्रयोग पचास सालों में चले। एक प्रयोग गांधी ने किया, एक प्रयोग श्री अरविंद करते थे।... Continue Reading →
श्रीअरविंद से किसी ने एक बार पूछा," आप भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में अग्रणी सेनानी थे; लड़ रहे थे। फिर अचानक आप पलायनवादी कैसे हो गये कि सब छोड़कर आप पांडिचेरी में बैठ गए आँख बंद करके? वर्ष में... Continue Reading →
अभिनेता मंच पर या कैमरे के सामने अपने को उघाड़ते तो हैं लेकिन वहां उनके ऊपर चरित्र का काया चढ़ी रहती है और वे भले अपने ही अन्दर के सच को या सच्चे अनुभव के आधार पर जन्मते भाव को... Continue Reading →
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