अपनी राहों पर लौट गए
मुझसे प्रेमिल मिलने वाले
वो रुकते भी तो क्या रुकते
मौसम में थे खिलने वाले ।

वो मिले अचानक साथ चले
मौसम था फूले और फले
फिर मौसम जैसे बीत गया
मिट गए कि जैसे धूप ढले ।

कुछ याद रहा कुछ भूल गए
सावन में झूले झूल गए
लेकर तो कुछ भी जा न सके
देकर केवल कुछ शूल गए ।

कभी आंख भरी कभी मुस्काया
क्या कम है खुद पे हंस पाया
दिल का दरवाज़ा खुला रखा
फिर भी तो नहीं मैं लुट पाया ।

यह एक खज़ाना दौलत का
कुदरत की देन मोहब्बत का
इसके बदले में क्यों रख लूं
अंबार किसी की नफ़रत का ।

वो जिएं कहीं भी दुनिया में
बैसाखी पर चलने वाले ।
दुनिया भर में ही फैले हैं
परजीवी बन पलने वाले।

अपनी राहों पर लौट गए
मुझसे प्रेमिल मिलने वाले।

~ कृष्ण बिहारी

© Krishna Bihari

Painting : Vincent Von Gogh 


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