सही मार्ग पर चलने वाले, ईमानदारी से जीवन व्यतीत करने वाले, अच्छे  गुणों के आधार पर अन्य लोगों को पसंद और बुरे गुणों के आधार पर नापसंद करने वाले, और एक व्यक्ति किस तरह का व्यवहार अन्यों से करता है, विशेषकर अपने से नीचे के आर्थिक और सामाजिक स्तर वालों के साथ और वह अपने संपर्क में आने वालों के पद-प्रतिष्ठा के आधार को  देखकर कैसा व्यवहार करता है, ऐसा  मूल्यांकन करने वाले व्यक्तियों का जीवन व्यवहारिक रूप में बहुत सफल नहीं रहता| बाकी जगत उनकी ईमानदारी और स्पष्टता के बावजूद और इन गुणों के कारण ही उन्हें अपनी राह का रोड़ा मानता आया है|

दुनिया में ज्यादातर लोग चापलूसी और नकली भावनाओं के प्रदर्शन से अपना जीवन चलाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनका जीवन सुगम हो जाएगा| उन्हें उसी तरह से केवल अपने जीवन में आसानी और आरामतलब स्थितियां चाहियें और बाकी के जीवन से उनका कोई संबंध रहता भी नहीं| जैसे स्वच्छता , विशेषकर सार्वजानिक स्थल की, के प्रति कोई अपने को जिम्मेदार नहीं मानता और गंदगी फैलाता ही जाता है| इसी तरह जीवन को अच्छा और सच्चा बनाने के प्रयास नहीं किये जाते क्योंकि लोगों ने ठेका तो ले नहीं रखा है समाज में सुधार का|

वरिष्ठ साहित्यकार श्री कृष्ण बिहारी जी के कथा संसार में सतह से नीचे कुछ बातें पायी जाती हैं| साहित्यकारों के कथा साहित्य में कई श्रेणियों का वर्गीकरण हो सकता है और मोटे तौर दो स्पष्ट वर्ग अवश्य ही देखे जा सकते हैं| कुछ साहित्यकार ऐसा साहित्य रचते हैं जिसे पत्रकारिता की ओर उन्मुख कथा साहित्य कहा जा सकता है| उनकी रची कहानियों में घटनाएं इस तेजी से घटती जाती हैं और वे चरित्रों का बखान इस रूप में करते हैं जैसे कोई पत्रकार किसी घटित पर रपट लिख रहा हो|  साहित्य समाज का दर्पण होता है का अर्थ वे इस रूप में लेते हैं कि जैसे को तैसा उन्होंने दिखा दिया| उनके साहित्य में आशा, आदर्श और उम्मीद का समावेश अपवाद स्वरूप ही दिखाई देता है| उनके लगभग सभी चरित्र ग्रे शेड वाले होते हैं|

दूसरे वर्ग में ऐसे कथाकार हैं जिनकी कहानियों के कुछ चरित्रों में जीवन के आदर्श और अच्छे गुणों का समावेश अवश्य ही मिलेगा| सतह पर कुछ भी घटित हो रहा हो उनका कोई चरित्र या कुछ चरित्र ऐसे अवश्य होंगे जो आशामयी जीवन की मशाल थामे दिखाई देंगे| भले वे स्पष्ट शब्दों में इस बात की घोषणा न करें लेकिन वे अपने चरित्रों को ढालते ही इस रूप में हैं या उनके भीतर से चरित्र निकलते ही इसी रूप में हैं कि मानवता से भरे अच्छे गुण उनमें झलक दिखा जाते हैं| पहले वर्ग के साहित्य, जिसमें समाज में जैसा घटित हो रहा है उसका वर्णन करने की परिपाटी, से अलग इस दूसरे वर्ग के साहित्य में समाज में क्या और कैसा होना चाहिए पर ज्यादा जोर दिया जाता है|

कृष्ण बिहारी जी का कथा संसार इस दूसरे वर्ग के कथाकारों वाला है| उनकी कहानियों में विवाहेत्तर संबंधों में रत चरित्र भी अन्य चारित्रिक गुणों में मजबूत होते हैं और वे प्रेम नामक संबंध की गरिमा को बनाए रखते हैं| उनके रचे प्रेम संसार में कहीं भी बदसूरती नहीं है| इन ऊँचे तत्वों के कारण  उनकी कथाओं के पाठकों को यह बात नहीं सताती कि वे ऐसे प्रेम संबंधों के बारे में पढ़ रहे हैं जिनमें कुछ को समाज सामान्य मान्यता नहीं देता और वहां मान्यता स्थितियों पर निर्भर होती है| लेकिन यह उनकी लेखनी का प्रभाव है कि पाठक कथा के बहाव में बह जाता है और कथ्य के शिल्प और कथन के रस में सराबोर होता जाता है|

“नो बॉस नो” उनकी ऐसी कहानी है जिसमें वे हास्य का सहारा ले मनुष्यों के दुर्गुणों पर प्रहार करते हैं| आत्मकथात्मक स्टाइल में रची कथा का नायक बेहद स्पष्टवादी और यारों का यार किस्म का इंसान है और जिसकी सहायता उसे करनी हो उसके लिए अपने उच्च स्तर के संबंधों को भी इस्तेमाल  करने से भी वह नहीं हिचकिचाता जबकि ज्यादातर लोग इस तरह की सहायता करने से परहेज करेंगे क्योंकि उनके अपने संबंध प्रभावित हो सकते हैं| अरब देश में स्थापित यह कहानी ऐसी कम्पनी का माहौल रचती है जिसमें बहुतायत में हिन्दुस्तानी काम करते हैं|

लगभग हरेक दफ्तर में ऐसा ही पाया जाता है कि कुछ लोग तो ईमानदारी से अपना काम करते रहते हैं और पर-निंदा में रस नहीं लेते, अपने से ऊँचे पदाधिकारियों की चापलूसी का प्रयास नहीं करते लेकिन उनके उलट ऐसे लोग अवश्य ही पाए जाते हैं जिनका दफ्तरी जीवन बॉस की चापलूसी, सहकर्मियों की निंदा और कनिष्ठों की प्रताड़ना किये बगैर नहीं चलता| वे अन्यों के जीवन दुष्कर बनाए रखते हैं| वे अपने बॉस की गतिविधि अनुसार अपनी गतिविधियों की घड़ी सेट करके रखते हैं जिससे बॉस की निगाह में वे सदैव सक्रिय दिखाई दें, बॉस की किसी बात को काटते न दिखाई दें|

इस कहानी में भी एक ऐसी स्त्री और उसके पति का वर्णन है जो गप्प रचने में सारी सीमाएं लांघ चुके हैं और इस तथ्य के बावजूद कि कभी नौकरी के  शुरुआती दौर में विवाहित होने के बावजूद नायक और यह स्त्री एक दूसरे की ओर आकर्षित हो गए थे, नायक उसकी बुरी आदतों की ओर तब इशारा करने से नहीं रुक पाता जब उसके बोले झूठ उससे सहन नहीं होते|

चापलूस स्त्री अकेले अपने दम पर ही बॉस को अपने झूठ के चंगुल में फंसाकर दफ्तर का माहौल दमघोंटू बनवा देती है| नायक के लिए यह देखना और सहना बेहद मुश्किल है और बॉस द्वारा अपने घर में दी गयी पार्टी में स्त्री और उसके पति द्वारा बड़े बड़े झूठ बोलते ही चले जाने से उसके सब्र का बाँध टूट ही जाता है और वह बॉस के सामने सत्य स्थितियों का वर्णन करने लग जाता है कि बॉस कितने बड़े भ्रम में घिर छुआ है और उसने अपने चारों ओर झूठ का घेरा घेर लिया है, और वह सबसे कट चुका है आदि|

यह कहानी मानवीय गुणों वाले व्यक्ति का कैथार्सिस है और बड़े रोचक अंदाज़ में सभी घटनाओं का वर्णन करती है| यह कथा भरपूर दृश्यात्मक है और दूसरे देश में घटित को शब्द मानों एक फ़िल्म की तरह से पाठक के सामने चित्रित करते जाते हैं|

सद्गुणों की महिमा जाति, पंथ, और रंग, आदि से निरपेक्ष होती है, और समाज में आपसी सदव्यवहार की बड़ी  महत्ता होती है: ऐसी बातों को यह कहानी स्थापित करती है|

त्रैमासिक कथा पत्रिका – ‘निकट‘ के 45वें अंक में यह लम्बी कहानी छपी है|

…[राकेश]

नो बॉस नो … (कृष्ण बिहारी)

 


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