कोई साथ नहीं जाता है !
साथ जियेंगे साथ मरेंगे
झूठा एक दिलासा है
नश्वरता के शिलालेख की
शाश्वत अनगढ़ भाषा है
वापस लौट कौन आता है !
पलक झपकते भूली दुनिया
रीति यही तो उसकी है
पल भर रुककर सबने सोचा
डोली रक्खी सबकी है
जो आया है वह जाता है !
काल खंड जब बीत गए सब
उम्र अचानक ठहर गई
मिटा अंधेरा तब मन माना
उजियारे की सहर गई
काल समझ में तब आता है !
चार कहार मिलेंगे सबको
जानें हों पहचाने हों
कोई फर्क कहां पड़ता है
कितने भी अफ़साने हों
रद्दी कागज़ गल जाता है !
कोई साथ नहीं जाता है !
~ कृष्ण बिहारी
© Krishna Bihari
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