अपनी पीड़ा ही पीड़ा है
यह सोच कभी भी ठीक नहीं
इस दुनिया में है कौन बचा
पीड़ा जिसके नजदीक नहीं

सुख याद नहीं रहता सच है
युग भी उसमें पल बन जाता
पर दुख की फितरत ही ऐसी
आता है आकर तन जाता

कभी भारी वक़्त ठहर जाए
वह बोझ सदृश लगने लगता
सर्पिल जकड़न में जीवन ही
हर क़दम क़दम थकने लगता

पर एक मनुज ही वह प्राणी
हिम्मत जिसकी अनुगामिनी है
वह सूरज खुद ही होकर के
ढक देता कहर यामिनी है

पुरुषार्थ हमेशा जग जीते
अमृत बाँटे वह विष पीते
सतयुग से रीति चली आई
वनवास भी संयम से बीते

मुस्काकर पीड़ा को पीना
यह सबसे हसीं तरीक़ा है
कुछ ख़र्च नहीं होता इसमें
बस स्वाद ज़रा – सा तीखा है

सुख – दुख तो केवल मेहमान हैं
आयेंगे क्रम से जायेंगे
मत होना अडिग उदास यहां
अधरों पर गीत भी आयेंगे ।

~ कृष्ण बिहारी

© Krishna Bihari


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