क्षार क्षार होना पड़ता है
ज़ार ज़ार रोना पड़ता है
कंचन काया का रूप हमेशा दरपन से बाहर था
अंटता नहीं किसी आंख में जलवा इतना नाहर था
राख हुई उस काया को भी
अंजुरी में ढोना पड़ता है
पल प्रतिपल हर पल याद आए हर चितवन याद आई
जीवन के आभा मण्डल की किरन किरन याद आई
पता चला तुम बिन साथी तो
पूरा जग खोना पड़ता है
बहुत अकेली दुनिया सबकी कभी तो होनी ही है
नयन कोटरों के आँसू से क़िस्मत तो धोनी ही है
जी भर चाहे जितना हँस लो
फिर जी – भर रोना पड़ता है
क्षार क्षार होना पड़ता है
ज़ार ज़ार रोना पड़ता है
~ कृष्ण बिहारी
© Krishna Bihari
पेंटिंग : रजा रवि वर्मा
Discover more from Cine Manthan
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
October 5, 2026 at 10:44 AM
बहुत खूब